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Wednesday, December 12, 2007

रिश्तों की डोर अब कानून के हाथ ?

हाल ही में एक खबर आयी थी कि एक पत्नी ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसेक पति ने शादी की पहली रात उसका बलात्कार किया । सच बोलू खबर देखते ही पहले पल में मुझे हंसी आयी कि ये क्या आरोप है ॥ लेकिन अगले ही पल ज़हन में कई सवाल उठे जिसे मैं आप लोगो के सामने रखना चाहती हूं क्योंकी मुझे इसका उत्तर नहीं मिला । मेरा पहला सवाल क्या पति पत्नी के रिश्तें की डोर अब पूरी तरह से कानून के हाथ में आ चुकी है ? क्या सारे दायरे और मर्यादा आधुनिकता के नाम पर बाजार में आ गये है ? प्रेम और विश्वास की जगह कानून की धाराओं ने ले लिया है ? क्या कोई ऐसा पैमाना है जिसे हम अगले पर भरोसा कर सके ? बार बार टूटते विश्वास के सहारे जिंदगी को कहां तक ले जाएं ? मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे इन सवालो के जवाब मुझे रंगकर्मी पर ज़रूर मिलेंगे । तुलिका सिंह, सीएनईबी

3 comments:

रचना said...

बलात्कार की बात सुनकर या पढ़कर हँस सके वे महिलाएँ तो महान ही होंगी। शादी का मतलब यह नहीं कि पुरुष को बलात्कार का अधिकार मिल गया। विवाह के भी नियम होते हैं, कसमें होती हैं, भावनाएँ और संवेदानाएँ होती हैं। और अगर किसी महिला को ऐसा लगता है कि उसका बलात्कार हुआ तो उसे न्यायालय में जाने का पूरा हक है। यह महिलाओं के हित में ही है।

tulika singh said...

रचना जी मेरी हंसी उस बालात्कार पर नहीं है बल्कि उस वक्त पर है जिस वक्त पर ये वाक्या हुआ । ये कैसे तय करेगा कानून की ये प्यार नहीं बालात्कार था । या पति इंसान नहीं बहशी था शायद एक बार को आरोप तय भी हो जाए लेकिन आरोप तय होने तक उस लड़की का नामालुम कितनी बार बलात्कार होगा ये शायद सिर्फ उसे पता होगा । सवाल ये नही है कि ऐसा हुआ नहीं होगा सवाल ये है कि रिश्ते की बुनियाद इतनी हल्की अब क्यों है कि हर वो बात जो बंद कमरे होती है अदालत तक लाया जाता है। नारी को कहा जाता है कि अब वो कमजोर नहीं है तो फिर क्यों खुद पर भरोसा नहीं है क्यों अदालत का दरवाजा खटखटाया जा रहा है । हम अपने रिश्ते तो खुद बनाते है फिर थोड़ा सा बिगड़ने पर बाजार में क्यों लेकर आते है । क्या रिश्ते अब बाजार में मिलने लगे है शायद नहीं लेकिन बिकने जरूर लगे है । मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं की अगर हम महिलाएं मजबूत होने का दावा करते है तो सबसे पहले हमें हमारे रिश्ते को मजबूत करना होगा फिर उसके लिए उसमें भावना संवेदना के साथ साथ वो अधिकार भी लगाना चाहिए जो हमें दिए गए है । शायद मेरे विचार सभी से मेल न खाएं लेकिन मैं तो यही जानती हूं कि खुद के अंदर इतनी gravity हो कि अपने से जुड़ी हर चीज का खयाल हम खुद रख सके तब शआयद सही मायने में हम मजबूत कहे जाएगें।

Sanjay said...

Jab tak "Tulika" jaise Vyakti mojood rahenge, Insaniyat khatm nahi ho sakti. Aise Dik soochakon ki samaj ko aaj bahut jaroorat hai!

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