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Monday, December 17, 2007

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई और मैं बस देखता रह गया कुछ साथ आए और कुछ पीछे छुटते गए फिर भी मैंने हार नहीं मानी और लोगों को जोड़ता गया जोड़ तोड़ के इस खेल में मैं खुद ही टूटता गया फिर भी अब अगली दोपहर का इंतजार है आशीष

3 comments:

Parvez Sagar said...

प्रिय आशीष,
आपकी रचना मे ज़िन्दगी की वो हकीकत है जिससे हम लोग हरदिन दोचार होते है। शब्दों का चयन और लिखने का अन्दाज़ लाजवाब है। आपके विचार सदा इसी तरह शब्दों की शक्ल मे हमे मिलते रहें। इसी उम्मीद के साथ...........

परवेज़ सागर

Keerti Vaidya said...

great...bhut payri rachna hai

sach asa he to kartey hai hum

satyandra yadav said...

dear aashish,
thanks for writing a nice kabita

life is a play . we all are players. earth is a rangmanch we all do our jobs in well manner. not only u waiting next noon... but also all human being do this.

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