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Wednesday, December 5, 2007

सुहागन

मैं सुहागन हूं ,सिर से पाव तक सिर्फ सुहागन। मन मे स्वतंत्र ,चिंतन करने की इच्छा हुई, जो मेरे दिमाग की अपनी उपज हो, मुझ से शुरु हो कर मुझ पर खत्म हो। मगर मैं ऐसा कर न सकी, क्योंकी मेरे मध्य सिर पर तो , सिंदुर की लंबी रेखा है, जो कि मुझसे कहती है कि, मैं सोचूं तो सिर्फ अपने सुहाग के लिए, क्योंकि मैं सुहागन हूं सिर्फ सुहागन। कहते है सभी के माथे पर त्रिनेत्र होता है , त्रिनेत्र अर्थात सच्चे ज्ञान और प्रकाश को देखने वाला नेत्र। मगर मेरे नेत्र पर तो लाल बिंदी है चिपकी हुई है, जो मुझसे कहती है कि, मैं देखूं तो सिर्फ सुहाग को , क्योंकि मैं सुहागन हूं, सिर्फ सुहागन। मेरे कंठ कुछ कहना चाहते थे, अपने ह्रदय में उमड़ते विचारो को , सबके सम्मुख रखना चाहते थे। मगर मेरे कंठ रुक गये जैसे वे किसी डोर से बंधे हों, हां, उन्हें भी तो मंगलसुत्र ने बांध रखा है , जो कि मुझसे कहता है कि , मैं कुछ बोलू तो सिर्फ सुहाग के लिए, क्योंकि मैं सुहागन हूं सिर्फ सुहागन। मेरे हाथ कुछ करना चाहते थे , अपने भाग्य की रेखाओ को बदलना चाहते थे , मेर पांव स्वच्छंद हो विचरना चाहते थे , उन्मुक्त हो जीवन मार्ग तलाशना चाहते थे, मगर उन्हें भी मेरी चुड़ियों और पायल ने जकड़ा हुआ था , और बार बार अपनी झनकार के माध्यम से कह रहे थे, कि मैं कुछ रचूं तो सुहाग के लिए कदम बढ़ाऊं तो सुहाग की ओर क्योंकि मैं सुहागन हूं, सिर से पांव तक सिर्फ सुहागन। तुलिका सिंह,सीएनइबी

5 comments:

Keerti Vaidya said...

TULIKA JI KO PRANAAM...

ITNI PAYRI BHAVPURN KAVITA ...SACH DIL KO JHAKORE KAR RAKH DIYA APNEY....NARI KE ROOP HAZAAR HAI AUR AAPNEY EK ROOP KA ACHA CHITRAN KIYA HAI ..USKAY DIL KE BHAVNAO KA UJAGAR BEKHUBI KIYA HAI..

tulika singh said...

kirti ji plz aap muhje pranam mat boliye mai kafi choti hu aur kafi kuch sikhna baki hai muhje apk apranma nahi sanidhy chiye.aapki hauslafjai ke liye shukriya . par ye kavitay emere college ke time ki hai aub mai isse rangkarmi par share kar rahi hu . aise vicharo aur poem ke liye bahut had mere college ki bhumika aham rahi hai aur mere teacher ki . mai unka tahe dil se shukriya karti hu aur puri jindgai karti rahungi .

abhishek said...

wah , sinddor aur lal bindiya ka badiya mel bithaya hai, par badlate arthon main hum shayad is soch ko pichey chodte ja rahe hai. maine ultramordern ladkiyan dekhi hai jo jinse main saji rahati hai par karwachauth ko bhukhi rahati hai.......

Rachna Singh said...

http://rachnapoems.blogspot.com/2007/11/blog-post_1386.html
tumharee kavita mae sach kahank rahaa hae . meri uper kii kavita dekho shaayad tumeh achhii lage

alok said...

amazing...awesome...very well written . plz keep posting

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