Thursday, November 26, 2009
लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-2
Wednesday, November 25, 2009
लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-1
Tuesday, November 24, 2009
लो क सं घ र्ष !: बाबरी मस्जिद और लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट
Monday, November 23, 2009
लो क सं घ र्ष !: पुलिस ठगी गयी अपने जाल साजों से
Sunday, November 22, 2009
लो क सं घ र्ष !: भू लोक से लोगो को बिना टिकट स्वर्ग लोक भेजने का कार्य
आज के अखबार में छपा है कि गोरखधाम एक्सप्रेस ट्रक से टकराया या आए दिन ट्रेन टे्क्टर भिडंत में 4 मरे", "ओवर स्पीडिंग से मंडोर एक्सप्रेस पलटी, 7 मरे ", "मालगाड़ी पलटी रेल मार्ग ठप " के शीर्षक से समाचार प्रकाशित होते रहते हैं । मुझे भी अम्बाला से लखनऊ तक की यात्रा का अच्छा अनुभव इस बीच में हुआ। स्लीपर क्लास के डिब्बे में चार शौचालय होते हैं चारो टूटे-फूटे थे। उनके दरवाजे टूटे थे, पानी नदारद था यात्री सुविधाएं शून्य थी । हाँ हर बड़े स्टेशन पर चेकिंग स्टाफ आकर यात्रियों से वसूली जरूर कर रहा था , जुर्माने कर रहे थे। रेलवे के अधिकारीयों से बात करने पर यह भी पता चला कि टै्फिक स्टाफ बहुत कम है जो स्टाफ है उससे 18-18 घंटे कार्य लिया जा रहा है जिससे उनकी कार्यकुशलता में कमी आ रही है एक स्टेशन मास्टर ने बताया कि उनकी ड्यूटी पीरीयड़ में 200 ट्रेनों को पास कराना होता है । साँस लेने की फुर्सत नही होती है ऐसे समय में मानवीय चूक तो होगी ही ।
रेल मंत्री सुश्री ममता बनर्जी के पास रेल मंत्रालय के लिए वक्त नही है। ममता बनर्जी की इच्छा है कि बंगाल की वाम मोर्चा सरकार को किसी भी तरीके से हटा कर स्वयं मुख्य मंत्री बने । उनकी इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें वाम मोर्चा सरकार हटाओ मंत्री बना दें । किसी दूसरे व्यक्ति को रेल मंत्रालय देखने की लिए दे दीजिये । रेल में सफर करने का यह मतलब यह नही है कि आप भू लोक से लोगो को बिना टिकट स्वर्ग लोक भेजने का कार्य करें ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
Saturday, November 21, 2009
इन्साफ की खातिर
Friday, November 20, 2009
नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र
Thursday, November 19, 2009
Wednesday, November 18, 2009
राजनीति में विश्वासघात
Tuesday, November 17, 2009
समय की सबसे बड़ी गाली-2
Monday, November 16, 2009
समय की सबसे बड़ी गाली-1
Sunday, November 15, 2009
जेलों में सड़ने को अभिषप्त हैं मुस्लिम युवा-2
आतंकी घटनाओं के संबंध में विभिन्न जगहों से गिरफ्तार आरोपियों पर दर्ज मुकदमे
नाम | अहमदाबाद | ै सूरत | दिल्ली | मुबंई | जयपुर | अन्य | योग |
सदिक षेख | 20 | 15 | 5 | 1 | हैदराबाद कोलकाता | 54 | |
आरिफ बदर | 20 | 15 | 5 | 1 | 41 | ||
मंसूर असगर | 20 | 15 | 5 | 1 | 41 | ||
मो सैफ | 20 | 15 | 5 | 5 | 45 | ||
मुफ्ती अबुल बषर | 21 | 15 | बेलगाम, हैदराबाद | 40 | |||
ैं सैफुर रहमान | 20 | 15 | 6 | 40 | |||
कयामुद्दीन कपाड़िया | 21 | 15 | 5 | इंदौर | 40 | ||
जावेद अहमद सागीर अहमद | 21 | 15 | 36 | ||||
गयासुद्दीन | 21 | 15 | 36 | ||||
र् | 20 | 15 | 1 | 36 | |||
ैुंसाकिब निसार | 20 | 15 | 5 | 40 | |||
र् | 20 | 15 | 5 | 40 |
पुलिस ने उनकी चार्जषीट को भी तोड़मरोड़ कर पेष किया। अहमदाबाद व सूरत के 35 मामलों में पुलिस ने 60 हजार पेजों की आरोप पत्र पेष किया। मुबंई अपराध ब्यूरो ने 18 हजार पेजों का आरोप पत्र पेष किया। इसी प्रकार जयपुर विस्फोट के मामले में 12 हजार पेजों का आरोप पत्र पेष किया गया। सभी आरोप पत्र हिंदी, मराठी व गुजराती में हैं यदि यह मामले सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं तो आरोप पत्रों को अंग्रेजी में अनुवाद करने में और ज्यादा परिश्रम व समय की जरूरत होगी।
विभिन्न मामलों में दर्ज मुकदमे व आरोप पत्र षहर | केसों की संख्या | आरोपी | गिरफ्तार | आरोप पत्र के पेज |
अहमदाबाद व सूरत | 36 | 102 | 52 | 60ए000 |
मुंबई | 1 | 26 | 21 | 18009 |
जयपुर | 8 | 11 | 4 | 12ए000 |
दिल्ली | 7 | 28 | 16 | 10ए000 |
अभियोजन पक्ष इन सभी मामलों में चष्मदीदों की भीड़ भी जुटा चुका है। हर केस में 50-250 चष्मदीद गवाह हैं। अहमदाबाद व सूरत केस में तो कई दोशी विस्फोट के पहले से ही जेलों में हैं। उदाहरण के लिए सफदर नागौरी, षिब्ली, हाफिज, आमील परवेज सहित 13 अन्य को 27 मार्च 2008 को ही मध्य प्रदेष से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उन्हें अहमदाबाद व सूरत मामले का मुख्य आरोपी बताया गया। इसी तरह राजुद्दीन नासिर, अल्ला बक्ष और मिर्जा अहमद जून 2008 से कर्नाटक पुलिस की हिरासत में थे, लेकिन उन्हें भी अहमदाबाद व सूरत मामलों का दोशी बताया गया।
एडवोकेट षाहिद आजमी कहते हैं कि साजिष रचने का आरोप एक हथियार की तरह है जिसे पुलिस कभी भी किसी भी मामले में प्रयोग कर सकती है। आफकार-ए-मिल्ली से बातचीत में वह कहते हैं कि अफजल मुतालिब उस्मानी जिसे 24 सितम्बर को मुंबई से गिरफ्तार दिखाया गया, उसे वास्तव में 27 अगस्त को लोकमान्य टर्मिनल से पकड़ा गया था। वह अपने घर वह अपने घर से गोदान एक्सप्रेस पकड़ मुंबई पहुंचा था। हमने संबंधित अधिकारियों को तुरंत टेलीग्राम से इसकी सूचना दी लेकिन उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। 28 अगस्त को उसे मेट्ोपोलिटीन मजिस्टे्ट के सामने पेष किया गया। लेकिन मुंबई अपराध ब्यूरो के अनुरोध पर मजिस्टे्ट ने उसकी गिरफ्तारी और रिमांड को रजिस्ट्र में दर्ज नहीं किया। इसी तरह सादिक षेख को 17 अगस्त को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उसे 24 अगस्त को विस्फोटक, हथियारों व पांच अन्य के साथ गिरफ्तार दिखाया गया। विषेशों के अनुसार पकड़े गए आरोपियों के किसी भी मुकदमें का निस्तारण दो साल से कम समय में नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग जगहों से पकड़े गए आरोपियों के केस और लंबे खिचेंगे।
सवाल उठता है कि एक बूढ़ा पिता अपने बेटे को छुड़ाने के लिए कब तक लड़ेगा। गिरफ्तारी के एक साल बाद भी न तो आरोपियों पर आरोप तय हो सके हैं न ही मुकदमे षुरू हो सके हैं। उन्हें खुद को निर्दोश्ज्ञ साबित करने में और कितना समय लगेगा? न्याय की धीमी गति को देखकर लगता है कि वह केस का अंत देख सकेंगे? यह सादिक षेख, अबुल बषर, मंसूर असगर, आरिफ बद्र या सैफुर रहमान के ही सवाल नहीं बल्कि उन 200 युवकों के सवाल भी हैं जो पिछले एक साल से जेलों में सड़ रहे हैं।
अनुवाद व प्रस्तुति- विजय प्रताप
लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाशित



