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Thursday, November 26, 2009

लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-2

संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य
अनादिकाल से ही आदर एवं सत्य, न्याय एवं न्याय करने वाले व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहा है जिसके कारण न्याय प्रक्रिया की पर्याप्त जाँच नहीं की जा सकी है। मानव समाज के विकास में प्राचीन काल से वर्तमान प्रजातांत्रिक युग तक यह धारणा बनी रही है कि न्यायिक शक्ति की उत्पत्ति दैवीय है। जैसे-जैसे आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था नवीन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सत्य को ध्यान में रखते हुए अपनायी गई, न्याय पालिका राज्य के एक पृथक अंग के रूप में उभरकर सामने आई। यूरोप में शक्ति पृथक्कीकरण के सिद्धांत को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। सत्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड में व्यापारिक एवं वाणिज्यिक वर्गों ने राजा की निरंकुशता को चुनौती दी। गृह युद्ध के फलस्वरूप राजा को फाँसी दी गई ताकि इंग्लैण्ड में संसद की स्वच्छता को स्थापित किया जा सके। मध्यम वर्ग ने संसद के अन्दर तथा बाहर अपनी उपस्थिति एक प्रभावी वर्ग के रूप में दर्ज की। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात फ्रांस में भी सत्ता का हस्तान्तरण राजतंत्र से व्यापारिक वर्ग को किया गया। फ्रांसीसी क्रांति का नेतृत्व मध्यम वर्ग ने किया। इसमें मजदूरों एवं किसानों ने अहम भूमिका अदा की। क्रांतिकारी हिंसा एवं अन्य बहुत सी ज्यादतियाँ जो इस क्रांति के फलस्वरूप लोगों पर हुईं, वे उन सारी हिंसा, अन्याय, कष्ट एवं पीड़ा से कहीं कम थीं जो निरंकुश राजतंत्र एवं कुलीन वर्ग के द्वारा इसके पूर्व की गईं। यही कुछ लोग सम्पूर्ण कृषि एवं व्यावसायिक सुविधाओं का भोग करते रहते थे। यही कुलीन वर्ग के लोग आम लोगों पर अत्याचार करते, उनको जेल में डालते एवं उनकी हत्या कर देते। जवाहर लाल नेहरू ने फ्रांसीसी क्रांति पर टिप्पणी करते हुए जेल में लिखा था:- ‘‘फ्रांसीसी आतंक एक बहुत भयानक चीज थी। यह फ्रांस की क्रांति से पहले की गरीबी एवं बेरोजगारी की बुराइयों की तुलना में एक पिस्सू की दंश की भाँति थी। सामाजिक क्रांति का मूल्य चाहे कितना बड़ा ही क्यों न हो, वह उन बुराइयों एवं युद्ध की कीमत से कम है जिनका सामना हमें वर्तमान सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में समय-समय पर करना पड़ता है। फ्रांस की क्रांति का भय अभी बना हुआ था क्योंकि कुलीन वर्ग के बहुत से लोग इस क्रांति में भुक्तभोगी थे एवं हमारी परम्परा इस विशिष्ट वर्ग के प्रति सम्मान की रही है। इस वर्ग से हमदर्दी करना गलत नहीं है। एवं हमारी शुभकामनायें उनके साथ है, परन्तु जो लोग अधिक महत्वपूर्ण हैं, वे आम लोग हैं। हम कुछ लोगों के लिए बहुसंख्यक वर्ग (आम लोगों) की बलि नहीं दे सकते है।’’ इन्ही राजनैतिक विकासों के फलस्वरूप, अमेरिकी स्वतंत्रता के 1776 के युद्ध के पश्चात, शक्ति का सन्तुलन बनाए रखने के लिए, शक्ति पृथक्वीकरण के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया एवं एक स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था अमेरिकी संविधान में की गई। यह व्यवस्था फ्रांसीसी राजनैतिक दार्शनिक, मान्टेस्क्यू एवं यूरोप में हुए घटनाक्रम के फलस्वरूप हुई। न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं राजनैतिक सत्य में कहाँ तक समानता है, इस बात का फैसला करने के लिए अमेरिका (यू0एस0ए0) एवं भारत के सर्वोच्च न्यायालयों की कार्यप्रणाली का गूढ़ अध्ययन करना होगा। यह आमतौर पर स्वीकार किया जाता है कि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का इतिहास वास्तव में अमेरिका का इतिहास है। इसके कथनों एवं निर्णयों में अमेरिकी समाज का गूढ संघर्ष एवं तनाव दृष्टिगोचर होता है। यही बात भारतीय सर्वोच्च न्यायालय पर भी लागू होती है, हालाँकि उस सीमा तक नहीं, क्योंकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच, न्यायिक सहायता के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश लोगों के लिए संभव नही है। अमेरिकी एवं भारतीय दोनों सर्वोच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनरावलोकन की असीम शक्तियाँ प्राप्त है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय सैद्धांतिक रूप से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से अधिक शक्तिशाली है। परन्तु वास्तविकता कहीं इससे परे है। इन देशों की न्यायिक संस्थाएँ, आर्थिक एवं राजनैतिक नीतियों से काफी सीमा तक प्रभावित होती हंै। पिछली दो सदियों में न्यायपालिका यद्यपि एक पृथक संस्था के रूप में उभरकर आई है, तथापि यह आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक अन्याय के प्रति, राजनैतिक संघर्ष का बदल नही हो सकती है। यह संघर्ष ही किसी समाज में शक्तियों के सन्तुलन को परिवर्तित करता है। न्यायपालिका अपने नेक इरादों के बावजूद भी, सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक क्रांति को जन्म नहीं दे सकती है क्योंकि इसका कार्य वर्तमान कानूनों की व्याख्या करना एवं उसको लागू करना है। वर्तमान कानून केवल वर्तमान स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हंै। यदि विधायिका एवं कार्यपालिका स्थिरता की ओर झुकी हुई हंै या अवनति या प्रतिक्रिया के मार्ग पर हंै, तो न्यायपालिका की परेशानियाँ और भी बढ़ जाती हंै। इन सीमाओं के बावजूद भी, यह न्यायपालिका का संवैधानिक उत्तरदायित्व है कि वह मूलभूत अधिकारों की रक्षा करे तथा जीवन के अधिकार एवं राजनैतिक स्वतंत्रता के कानून के समक्ष, समानता के अधिकार की रक्षा करे, सामाजिक आर्थिक अन्यायों एवं भेदभावों के उन मामलों को समाप्त करे जो न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ। अमेरिकी समाज में एक पृथक एवं भिन्न न्याय व्यवस्था की स्थापना मात्र से न्याय की प्राप्ति संभव नहीं हुई। डेªड स्काट बनाम जाॅन एफ0 ए0सैनफोर्ड मुकदमा, 60 यू एस0 393 जिसका फैसला 1857 में हुआ, इसका जीता जागता सबूत है। मुख्य न्यायाधीश ने फैसला दिया कि ‘‘एक गुलाम की हैसियत, सम्पत्ति से अधिक नहीं है। वह व्यापार एवं क्रय की एक वस्तु है। अमेरिकी स्वतंत्रता की उद्घोषणा की तरफ इंगित करते हुए मुख्य न्यायाधीश रोजर बी0 टैने ने इस मामले में टिप्पणी भी की थी कि ‘‘ इस विवाद से पूरी तरह स्पष्ट है कि गुलाम अफ्रीकन प्रजाति को वे लोग अपने में शामिल करना नहीं चाहते थे जो कानून बना रहे थे या उसको लागू कर रहे थे।’’ यह निर्णय उस समय के कपास एवं अन्य बाग़वानी करने वाले मालिकों के हितों की रक्षा करने से प्रेरित था। यही वर्ग उस समय अमेरिका के प्रभावकारी आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करता था। उस समय के दुराग्रह अब भी विद्यमान हैं। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा पारित डरबन नस्लवाद (प्रथम) एवं डरबन नस्लवाद (द्वितीय) के विरुद्ध एवं इजराइल के नस्लीय भेदभाव (जहाँ कि चुनी हुई प्रजाति की नीति सरकारी नीति है) के विरुद्ध प्रस्तावों के सम्बन्ध में प्रभावकारिता से सहयोग करने या उनको लागू करने में पूरी तरह अक्षम साबित हुआ है। यद्यपि अमेरिका में गुलामी प्रथा का अन्त कर दिया गया है फिर भी वर्ग एवं जाति पर आधारित नस्लवाद अमेरिकी न्यायिक व्यवस्था में अब भी मौजूद है। अफ्रीकी नस्ल के काले अमेरिकी, मजदूर एवं खेतिहर मजदूर का एक बड़ा हिस्सा हैं। कुछ दशक पूर्व उन्हें वोट देने का अधिकार न था। इसलिए उनका राजनैतिक प्रभाव नहीं है। आज लगभग तेईस लाख उन्नीस हजार दो सौ अट्ठावन नागरिक व्यक्तिगत (प्राइवेट) अमेरिकी जेलों में बंद हैं। यह विश्व की सबसे बड़ी जेल संस्था है। अमेरिका के जेल, जो एक प्रकार का उद्योग हैं, प्राइवेट हाथों में हंै। यह एक बढ़ता हुआ उद्योग है। अमेरिका में उच्च शिक्षा की अपेक्षा जेलों पर अधिक पैसा व्यय किया जाता है। यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि अफ्रीकी नस्ल के काले अमेरिकी, अमेरिकी जेलों में सर्वाधिक हैं। लगभग 9 लाख काले अमेरिकी जेलों में सड़ रहे हैं। 20 से 35 आयु वर्ग के पुरूषों में 9 में से एक अफ्रीकी अमेरिकन जेल में है एवं 35 से 39 आयु वर्ग की महिलाओं में 100 में से एक अफ्रीकी- अमेरिकन महिला नागरिक जेलों में बन्द है। उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जो कि ड्रग सम्बंधी एवं अन्य छोटे-मोटे अभियोगों में जेलों में बन्द हैं। एक काले अमेरिकी व्यक्ति ओबामा का राष्ट्रपति के रूप में चुनाव अतीत से एक भिन्न वस्तु अवश्य है, परन्तु इसने अमेरिकी समाज की, जो कि एक बड़े आर्थिक संकट से त्रस्त है एवं कर्जे में डूबा हुआ है, सामाजिक तथा राजनैतिक सच्चाई को नही बदला है एवं अमेरिकी समाज का मूल ढाँचा वैसे ही मौजूद है। यद्यपि पचास के दशक के अफ्रीकी-अमेरिकनों पर हत्या के नजरिये से आक्रमण अब अतीत का हिस्सा बन गया है फिर भी अमेरिकी पुलिस समय-समय पर अपने कुकृत्यों से श्वेत वर्ग की ओर अपने नस्लीय झुकाव को पूरी तरह से जाहिर करती रहती है। अबू जमाल जो कि एक सम्मानित अफ्रीकी नस्लीय, अमेरिकन पत्रकार एवं प्रसिद्ध राजनैतिक कार्यकर्ता है पिछले 25 वर्षों से अमेरिकी जेल में सड़ रहा है। वह अब मृत्यु की कगार पर है। उसकी पुनः मुकदमा करने की अपील को अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। यह मामला सम्पूर्ण अमेरिकी न्याय व्यवस्था एवं अमेरिकी जजों की निष्पक्षता पर एक सवालिया निशान खड़ा करता है। लेखिका-नीलोफर भागवत उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स अनुवादक-मोहम्मद एहरार मोबाइल - 9451969854 जारी .... loksangharsha.blogspot.com

Wednesday, November 25, 2009

लो क सं घ र्ष !: न्यायपालिका की स्वतंत्रता-1

संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य
पश्चिमी उदारवादी प्रजातंत्र एवं पश्चिम तुल्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले विधिवेत्ता, न्यायाधीश एवं अधिवक्ता न्यायपालिका की स्वतंत्रता का बखान करने से नहीं थकते। परन्तु शायद ही ऐसा कोई हो जो इस संस्था की वाह्य मान्यता एवं आडम्बर के उस पार भी देखने का प्रयास करता हो। शायद ही कोई ऐसा हो जो इस बात का पता लगाने का प्रयास करे कि संवैधानिक व्यवस्था की कार्य प्रणाली की वास्तविकता एवं सिद्धान्त में कितना मेल है? जजों की व्यक्तिगत क्षमता, ईमानदारी एवं उनके द्वारा उच्चतम् कोटि की न्यायिक दक्षता को यदि अलग रख दिया जाये, तो राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि निर्मित कानूनों की प्रकृति, नौकरशाही एवं पुलिस की कार्यप्रणाली, खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली एवं प्रकृति, योग्य वकीलों तक पहुँच, राज्य द्वारा प्रदत्त कानूनी सहायता, मुकदमों का निष्पक्ष एवं त्वरित फैसला ये सभी ऐसे कारक है जो कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं। निस्संदेह रूप से जजों की चयन प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता की प्राप्ति में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। यदि न्याय बिना भय एवं पक्षपात के प्राप्त करना है तो उसके लिए आवश्यक है कि उन परिस्थितियों पर नियंत्रण रखा जाये, जो समाज को चरम सीमा तक आर्थिक एवं सामाजिक धु्रवों में विभाजित करती हैं। समाज को ऐसे आर्थिक एवं सामाजिक शोषण से मुक्त रखें जो मानव को धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल एवं लिंग के आधार पर विकसित करता हो तथा जो राजनैतिक प्रभाव एवं सामाजिक आलोचना से मुक्त हो। राजनैतिक यथार्थ को सामने रखकर ही हम इस परिचर्चा को आगे बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से हमारे लिए यह प्रश्न करना महत्वपूर्ण है कि क्या न्यायपालिका वर्तमान समय में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से कार्य कर सकती है! जबकि हमारी राजनैतिक एवं संवैधानिक व्यवस्था का सिर्फ ढाँचा ही शेष रह गया तथा कि कारपोरेट घरानों के द्वारा मुख्य क्षेत्रों को पंगु बना दिया गया है। धन का संचय कुछ ही हाथों में सिमट कर रह गया है, जबकि महत्वपूर्ण आर्थिक एवं वित्तीय नीतियाँ धनी वर्ग के पक्ष में हैं। समाज का अपराधीकरण हो चुका है, जबकि नेटवर्किंग कारपोरेटों के द्वारा मीडिया के माध्यम से कई देशों में युद्ध़़ किया जा रहा है एवं राजनैतिक माध्यमों के द्वारा लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से गुलाम बनाया जा रहा है, ताकि वे समाज पर आर्थिक एवं अन्य तरीकों से नियंत्रण बनाये रखने में सफल हो सकें। इस युग की वास्तविकताओं में अमेरिका, ब्रिटेन नियंत्रित अधिग्रहीत देशों में बागराम, अबू गरीब एवं ग्वान्टानामों बे की जेले हैं, गुप्त रूप से आर्थिक सहायता देकर विभाजित करने के लिए (दूसरे देशों में) बम विस्फोट करवाया जाता है, जिसमें हजारों बेगुनाह लोग मारे जाते हैं एवं हजारो लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं। गुप्तचर एजेन्सियाँ इस बात से पूरी तरह भिज्ञ होती हैं। एक अन्य वास्तविकता-अमेरिका का पैट्रियट एवं होमलैण्ड कानून हैं जो वहाँ के नागरिकों के जीवन को नियंत्रित करता है। कुछ देशों में मुकदमे जेल की दीवारों के अन्दर चलाए जाते हैं ताकि लोगों की निगाहों से सत्य को छुपाया जा सके। एक राष्ट्र की कानून व्यवस्था के अन्तर्गत सैनिक न्यायालयों का गठन किया जाता है। अनेक गणतन्त्रात्मक क्रांतियों की ऐतिहासिक स्मृतियों के बावजूद, यूरोप में अवैध रूप से लोगों को गिरफ्तार किया जाता है एवं गुप्त जेलों में रखा जाता है। अफ्रीका एवं एशिया के देशों में विशेष रूप से भारत तथा पाकिस्तान के लोगों को गैर कानूनी ढंग से गिरफ्तार किया जाता है। सरकार अधिग्रहीत सेनाओं से मिलकर अपने देश के लोगों पर बमबारी करवाती है जिसके कारण हजारों बेगुनाह लोग लापता हो गए हैं। वकीलों पर भारत में फासीवादी शक्तियों के द्वारा किराये के गुण्डों के द्वारा आक्रमण कराया जाता है। पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रहती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि फासीवादी शक्तियों पर चलाए गए मुकदमों को रोका जा सके तथा धमाकों एवं सामूहिक हत्याओं के पीछे छिपे सत्य को प्रकट होने से रोका जा सके। मुख्य जाँचकर्ता अधिकारियों की हत्या करवा दी जाती है। फिलीपाइन्स में जन आन्दोलनों के प्रतिनिधियों, जिनमें वकील भी शामिल हैं को मौत के घाट उतार दिया जाता है। इस्राइल के द्वारा, जहाँ कि कानून व्यवस्था नस्ल एवं अन्याय पर आधारित है, पैलिस्टाइन भूमि पर अवैध रुपसे कब्जा कर लिया गया है एवं घरों को तबाह व बरबाद कर दिया गया है। हद तो यह कि इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को प्रजातांत्रिक कहा जा रहा है। इराक में हजारों बेगुनाह जेलों में सड़ रहे हैं। लाखों लोग शरणार्थी बन चुके हैं। उन लोगों के जीवन का कोई महत्व नहीं रह गया है। इराक पर अमेरिका का अनधिकृत कब्जा है एवं सार्वजनिक पदों पर सम्प्रदाय के आधार पर नियुक्तियाँ की जा रहीं है। अफ्रीका महाद्वीप में कांगो में संसाधनों पर कब्जा करने के लिए युद्व चल रहा है। छापा मार सेनाएँ विदेशी कम्पनियों एवं सरकार के साथ साठ गाँठ करके गृह-युद्धभड़का रही हैं । साथ ही साथ व्यक्तिगत सेनाएँ भी सक्रिय हैं । चीन में हजारों फैक्टरियाँ बन्द हो चुकी हैं एवं फैक्ट्रिरियों के मालिक हजारों मजदूरों का बकाया धन लेकर फरार हो चुके हैं। जापान मे बेरोजगारी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है जिससे वहाँ आत्महत्या की दर में जो पहले ही बहुत ज्यादा थी अब और बढोत्तरी हो रही है। ये कुछ ऐसे सत्य हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में हमारे न्यायिक संस्थान कार्य कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का पुनरावलोकन करना आवश्यक है ताकि हम सत्य की तह तक पहुँच सकें। लेखिका-नीलोफर भागवत उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स अनुवादक-मोहम्मद एहरार मोबाइल - 9451969854 जारी .... loksangharsha.blogspot.com

Tuesday, November 24, 2009

लो क सं घ र्ष !: बाबरी मस्जिद और लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट

बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद सरकार ने लिब्रहान आयोग की स्थापना की थी। जिसकी रिपोर्ट संसद में पेश नही हुई कि उससे पूर्व मीडिया ने उसको प्रसारित कर दिया जिसको लेकर संसद में जबरदस्त हो हल्ला हंगामा हुआ। सरकार जब महंगाई के मोर्चे पर जबरदस्त तरीके से असफल है तो लोगो का ध्यान हटाने के लिए लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट की लीकेज़ का ड्रामा शुरू कर दिया है । जिससे जनता का ध्यान मूल समस्याओं का ध्यान हटा रहे। लिब्रहान आयोग की आयोग भी स्पष्ट तरीके यह कहती है की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उनके अनुशांगिक संगठनों ने योजनाबद्ध तरीके से बाबरी मस्जिद को तोडा था । केन्द्र सरकार में यदि जरा सा भी नैतिक साहस है तो ऐसे संगठनों के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दे जो देश की एकता और अखंडता को क्षति पहुंचाते है । कांग्रेस की धर्म निरपेक्ष सोच बदल चुकी है जिसके चलते फांसीवादी संगठन बढ़ते हैं और देश के अन्दर दंगे फसाद शुरू होते हैं । महाराष्ट्र के अन्दर भी शिव सेना की गतिविधियाँ जारी रखने में समय-समय पर कांग्रेस सरकार का भी संरक्षण रहता है अन्यथा राज ठाकरे बाल ठाकरे जैसे लोग पनप ही नही सकते हैं । लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव की भूमिका को स्पष्ट नही किया है। श्री नरसिम्हा राव साहब ने अगर चाहा होता तो बाबरी मस्जिद को आराजक व फांसीवादी तत्व गिरा नही सकते थे । आज भी इन तत्वों का प्रचार अभियान जारी है समय रहते हुए यदि उचित कार्यवाही नही की गई तो यह देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा होंगे व एक नया आयोग बनेगा और उसकी भी रिपोर्ट लीक होगी ।
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Monday, November 23, 2009

लो क सं घ र्ष !: पुलिस ठगी गयी अपने जाल साजों से

उत्तर प्रदेश पुलिस आये दिन आतंकवाद से लेकर भ्रष्टाचार से लड़ने तक का दावा करती रहती हैविभाग में कार्यरत जालसाजों ने 1986 में एक शासनादेश में परिवर्तन कर उसको पूरे विभाग के ऊपर लागू करा दियापुलिस विभाग में नियम यह है कोई पुलिस कर्मचारी पुलिस अफसर अपने गृह जनपद या गृह के नजदीक तैनात नही रह सकता है , किंतु जालसाजों ने 11 जुलाई 1986 में एक फर्जी शासनादेश जारी कर उस नियम में परिवर्तन कर लिया और उनके अपने गृह जनपद में भी तैनाती होने लगी । अपराधियों से साँठ-गाँठ करना तथा अपराधों में भी लिप्त होना लगा रहेगा । उत्तर प्रदेश गृह विभाग के भोले-भाले अधिकारी पुलिस के उच्च अधिकारी फर्जी शासनादेश को लागू करते रहे है । अब जाकर इस खुलासा हुआ है कि उक्त शासनादेश फर्जी हैइससे पहले पुलिस विभाग की भर्तियाँ फर्जीवाड़ा का एक उत्कृष्ट नमूना हैऐसे भोले भाले अधिकारियों से कानून व्यवस्था बचाए और बनाये रखने की उम्मीद रखना बेईमानी हैआज जरूरत इस बात की है कि पूरे पुलिस विभाग की ईमानदारी से समीक्षा की जाए और अपराधी और भ्रष्टाचारी तत्वों से उसको साफ़ किया जाएवर्तमान में पुलिस के क्रियाकलापों को देखकर माननीय न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला की टिपण्णी याद जाती है कि पुलिस अपराधियों का एक संगठित गिरोह है, इसके अतिरिक्त कुछ नही हैआये दिन पुलिस अपने जालसाजों से ठगी जायेगी और जनता तबाह होती रहेगी और सबसे बड़े आश्चर्य कि बात यह है कि जिस तरीके से अपराधियों का अपराधिक इतिहास होता है उसी तरीके से थाने से लेकर पुलिस प्रमुख तक का भी अपराधिक इतिहास होता है , सिर्फ़ उसको प्रकाशित करने कि जरूरत है । सुमन loksangharsha.blogspot.com

Sunday, November 22, 2009

लो क सं घ र्ष !: भू लोक से लोगो को बिना टिकट स्वर्ग लोक भेजने का कार्य

प्रधानमंत्री जी , रेल मंत्री पद पर सुश्री ममता बनर्जी आसीन हैं । रेल विभाग की हालत यह हो गई है कि प्रतिदिन अखबार के मुख्य पृष्ट से ज्ञात होता है कि कोई कोई दुर्घटना हो गई हैJustify Fullआज के अखबार में छपा है कि गोरखधाम एक्सप्रेस ट्रक से टकराया या आए दिन ट्रेन टे्क्टर भिडंत में 4 मरे", "ओवर स्पीडिंग से मंडोर एक्सप्रेस पलटी, 7 मरे ", "मालगाड़ी पलटी रेल मार्ग ठप " के शीर्षक से समाचार प्रकाशित होते रहते हैं । मुझे भी अम्बाला से लखनऊ तक की यात्रा का अच्छा अनुभव इस बीच में हुआस्लीपर क्लास के डिब्बे में चार शौचालय होते हैं चारो टूटे-फूटे थेउनके दरवाजे टूटे थे, पानी नदारद था यात्री सुविधाएं शून्य थीहाँ हर बड़े स्टेशन पर चेकिंग स्टाफ आकर यात्रियों से वसूली जरूर कर रहा था , जुर्माने कर रहे थेरेलवे के अधिकारीयों से बात करने पर यह भी पता चला कि टै्फिक स्टाफ बहुत कम है जो स्टाफ है उससे 18-18 घंटे कार्य लिया जा रहा है जिससे उनकी कार्यकुशलता में कमी रही है एक स्टेशन मास्टर ने बताया कि उनकी ड्यूटी पीरीयड़ में 200 ट्रेनों को पास कराना होता हैसाँस लेने की फुर्सत नही होती है ऐसे समय में मानवीय चूक तो होगी हीरेल मंत्री सुश्री ममता बनर्जी के पास रेल मंत्रालय के लिए वक्त नही हैममता बनर्जी की इच्छा है कि बंगाल की वाम मोर्चा सरकार को किसी भी तरीके से हटा कर स्वयं मुख्य मंत्री बने । उनकी इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें वाम मोर्चा सरकार हटाओ मंत्री बना दें । किसी दूसरे व्यक्ति को रेल मंत्रालय देखने की लिए दे दीजियेरेल में सफर करने का यह मतलब यह नही है कि आप भू लोक से लोगो को बिना टिकट स्वर्ग लोक भेजने का कार्य करेंसुमन loksangharsha.blogspot.com

Saturday, November 21, 2009

इन्साफ की खातिर

उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन व( मंत्री पद प्राप्त ) वरिष्ट अधिवक्ता पूर्व एडवोकेट ज़नरल श्री एस.एम काजमी ने एस.टी.एफ द्वारा खालिद मुजाहिद को 16 दिसम्बर 2007 को मडियाहूँ, जिला जौनपुर से पकड़ कर २२ दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर आर.डी.एक्स ड़िकोनेटर की बरामदगी दिखाकर जेल भेज दिया था , के मामले में अपने पद की परवाह करते हुए दिनांक 20 नवम्बर 2009 लो माननीय उच्च न्यायलय इलहाबाद खंडपीठ लखनऊ में खालिद मुजाहिद की तरफ़ से जमानत प्रार्थना पत्र पर बहस की आज की दौर में पद पाने के लिए लोग सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं वहीं श्री काजमी उत्तर प्रदेश के न्यायिक इतिहास में (जहाँ तक मुझे ज्ञात है ) पहली बार सरकार के ग़लत कार्यो के विरोध करने के लिए किसी मंत्री पद प्राप्त व्यक्ति ने किसी अभियुक्त की तरफ़ से वकालत की हो ज्ञातव्य है कि एस.टी.एफ पुलिस के अधिकारियो ने कचहरी सीरियल बम ब्लास्ट (लखनऊ, फैजाबाद, वाराणसी ) में खालिद मुजाहिद तारिक काजमी को घरो से पकड़ कर उक्त वाद में अभियुक्त बना दिया था ऐसा कार्य एक सोची समझी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में हुआ था माननीय उच्च न्यायालय के न्यायधीश न्याय मूर्ति श्री अश्वनी कुमार सिंह ने एस.टी.एफ के वरिष्ट अधिकारी वाद के विवेचक तथा क्षेत्र अधिकारी पुलिस मडियाहूँ, जिला जौनपुर को 26 नवम्बर 2009 को न्यायलय में समस्त अभिलेखों की साथ तलब किया है खालिद मुजाहिद के चाचा मोहम्मद जहीर आलम फलाही द्वारा क्षेत्र अधिकारी मडियाहूँ से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत सूचना मांगी थी कि एस.टी.एफ ने किस तारीख को खालिद मुजाहिद को गिरफ्तार किया था जिस पर क्षेत्र अधिकारी मडियाहूँ ने लिखकर दिया था कि 16 दिसम्बर 2007 खालिद मुजाहिद को एस.टी.एफ पकड़ कर ले गई थी श्री एस.एम काजमी द्वारा माननीय उच्च न्यायलय में निर्दोष युवक खालिद मुजाहिद की तरफ़ से जमानत प्रार्थना पत्र की बहस करने से ये महसूस होने लगा है की इन्साफ दिलाने की लिए लोगो में जज्बा है काजमी साहब बधाई की पात्र हैं सुमन loksangharsha.blogspot.com

Friday, November 20, 2009

नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र

आप कहते हैं तो कहा करें! मैं अपने दोस्तों और अपनी बात जरूर करूंगा, अभी हाल ही में मेरे दोस्त सत्येन्द्र राय सपत्नीक मेरे घर आये और हम दोनों दम्पत्तियों के बीच बात शुरू हुई। मेरी पत्नी की तरह सत्येन्द्र राय की पत्नी कामकाजी महिला हैं। दोनों प्राप्त होने वाला अपना वेतन अपने घर पर खर्च करती हैं। यह बात मेरे साथ मेरे मित्र भी स्वीकार करते हैं। घर का खर्च उठाना ही नहीं बल्कि घर के कामकाज की भी जिम्मेदारी दोनों बखूबी संभालती हैं। यह तारीफ मैं अपनी और अपने मित्र की पत्नी को खुश करने के लिए नहीं कर रहा हूं बल्कि उनके सशक्तीकरण पर कुछ सवाल उठा रहा हूं।
हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों को शायद ही कभी कुछ कहते हों सिवाय उनकी तारीफ के, क्योंकि वह तारीफ के लायक हैं। जब बात शुरू हुई तो हम दोनों ने खुले मन स्वीकार किया कि हम खुले मन से निःसंकोच महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं लेकिन अपने घर की महिलाओं की समर्पण की भावना को सहज रूप मेे स्वीकार कर लेते हैं और उनको जी-तोड़ मेहनत से बचाने का प्रयास नहीं करते। इसके पीछे हमारी सोच यह भी हो सकती है कि परिवार रूपी गाड़ी के दोनों पहिये सुगमता से चलते रहें तो गाड़ी रूकेगी नहीं। पति और पत्नी परिवार रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं जिन्हें मिलकर गाड़ी को खींचना होता है।
सच यह है कि परिवार रूपी गाड़ी को चलाने के लिए पहियों को दुरूस्त रखना जरूरी है बिल्कुल उस तरह से जैसे गाड़ी के पहियों को समय-समय पर तेल और ग्रीस देकर चिकना किया जाता है। परिवार की इस गाड़ी के पहियों को पति-पत्नी का पारस्परिक व्यवहार, एक दूसरे के प्रति प्रेम और एक-दूसरे पर भरोसा ही इन पहियों की रफ्तार में तीव्रता लाने के लिए चिकनाई का काम करता है। महिला सशक्तीकरण से आशय यह कभी नहीं लेना चाहिए कि महिला या पुरूष प्राकृतिक नियम को बदल देंगे। प्रकृति ने नर और नारी दोनों को अलग-अलग बनाया ही है इसलिए कि दोनों प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपना-अपना काम करेंगे, लेकिन यह आवश्यक है कि दोनों में पारस्परिक सहयोग बना रहे। दोनों में से कोई एक-दूसरे को हेय दृष्टि से न देखें और न ही वह एक-दूसरे को अपमानित करें। दोनों के लिए एक-दूसरे का सम्मान आवश्यक है लेकिन यह सम्मान प्रेमपूर्ण होना चाहिए।
अक्सर यह देखा गया है कि शादी से पूर्व नर और नारी में एक-दूसरे के प्रति प्रेम होता है और वह प्रेम कभी-कभी इतना परवान चढ़ता है कि दोनों एक दूसरे से शादी कर लेते हैं शादी से पहले लड़का लड़की के लिए आसमान से तारे तोड़कर लाने के लिए तैयार रहता है और लड़की भी लड़के पर अपनी जान न्योछावर करने को तत्पर दिखती है। शादी से पूर्व के इस प्रेम में एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना होती है लेकिन अक्सर ऐसी शादियों में कटुता आते हुये भी देखा है। ऐसा केवल इसलिए कि पुरूष प्रधान इस समाज में शादी के बाद पति मर्द बन जाता है और वह अपनी पत्नी पर अपनी प्रधानता कायम करने का प्रयास करता है, जिसे पत्नी बर्दाशत नहीं कर पाती और परिवार रूपी इस गाड़ी के पहियों की चिकनाई यानी पारस्परिक प्रेम, एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना और एक-दूसरे के प्रति विश्वास समाप्त हो जाता है। पत्नी की यह आकांक्षा कि शादी से पहले जैसा व्यवहार उसका पति करता था, शादी के बाद भी करता रहेगा, पूरी नहीं होती और इस प्रकार निराश होकर वह या तो दुखी होकर साथ निभाती है या फिर साथ छोड़ देती है और परिवार टूट जाता है। परिवार टूटने का एक कारण और भी हो सकता है कि पति धन का लोभी हो और दहेज न मिलने के कारण वह दामपत्य जीवन से अलग हो जाता है। दहेज भी हमारे समाज की एक बढ़ी बीमारी है और सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि संक्रामक बीमारी है। जो भारतीय समाज के हर पंथ में जड़ें मजबूत करती जा रही है। इसका समूल नाश होना चाहिए लेकिन इसका नाश करने के लिए अब तक कोई एन्टीबायटिक दवा नहीं तैयार हो पायी है। इसकी एक ही एन्टीबायटिक दवा है, इसको समाप्त करने की हमारे मन में तीव्र इच्छा पैदा हो। मां-बाप दहेज के बिना अपने बच्चों की शादी करने का संकल्प लें, लड़के दहेज रूपी भीख लेने से बचें और लड़कियां ऐसे परिवार में शादी करने से मना कर दें जहां दहेज की मांग की जाती हो। दहेज की इसी लानत ने हमारे देश के समाज को 1400 वर्ष पूर्व अरब देश के समाज सक बद्तर बना दिया है। 1400 साल पहले अरब देशों में लड़कियों को पैदा होते ही जिन्दा गाड़ दिया जाता था ताकि उनके मां-बाप को किसी के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े या सिर न झुकाना पड़े। आज हमारे देश के समाज ने गर्भ में ही लड़कियों को मार दिया जाता है और इस अपराध में नर-नारी बराबर के दोषी हैं। यह काम केवल इसलिए किया जाता है कि लड़की पैदा होने पर उनके सिर पर दहेज का भार पड़ेगा और लड़की के बाप को अपनी पगड़ी लड़के और उसके बात के चरणों में रखना होगा। कहां हैं वो महिला सशक्तीकरण की बात करने वाले लोग जो इस संक्रामक रोग को समूल नष्ट करने के लिए तैयार हों और सिर्फ तैयार न हों बल्कि इसके विरोध में लड़ाई का बिगुल फूंक दें। अन्यथा एक दिन वो आयेगा जब समाज में लड़कियों का संकट होगा और यह समाज पतन की और बढ़ेगा।
नारी सशक्तीकरण आन्दोलन चलाने वाले लोग यह बात भूल जायें कि नारी सशक्तीकरण का अर्थ पुरूष प्रधान समाज को समाप्त कर नारी प्रधान समाज स्थापित करना है। उन्हें हमेशा यह बात याद रखनी होगी कि समाज न पुरूष प्रधान हो और न नारी प्रधान बल्कि समाज ऐसा हो जिसमें नर-नारी सामंजस्य बना रहे और न तो नर नारी के सिर पर पैर रखकर चले और न ही नारी नर को कुचलने के लिए प्रयासरत हो, इसी में समाज की भलाई है और यही है नारी सशक्तीकरण का मूलमंत्र है।
मुहम्मद शुऐब एडवोकेट मोबाइल- 09415012666 loksangharsha.blogspot.com

Thursday, November 19, 2009

लोकसंघर्ष पत्रिका का फोटो फीचर -2

लोकसंघर्ष पत्रिका का फोटो फीचर

लोकसंघर्ष पत्रिका का अन्तिम पृष्ट

लोकसंघर्ष पत्रिका का अन्तिम पृष्ट

Wednesday, November 18, 2009

राजनीति में विश्वासघात

एक खबर को अधिकतर अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी गई, ‘‘मुलायम और कल्याण की दोस्ती समाप्त।’’ राजनीति के पंडित जानते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं हुआ करते। वक्त की जरूरत थी, दोनों ने दोस्ती की। दोनों ने यह दोस्ती, अपने-अपने फायदे के लिए की थी। चूंकि मैं छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा रहा हूं इस कारण आचार्य नरेन्द्र देव, डा0 राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण से परिचित हूं। जब इन लोगों का नाम लेता हूं तो उस शख्सियत को भी नहीं भूल पाता जो समाजवादी आन्दोलन का एक स्तम्भ था जिसे नेताजी (राज नारायण) के नाम से जाना जाता है। हालांकि नेताजी के नाम से केवल सुभाष चन्द्र बोस को ही जाना जाता रहा है लेकिन राज नारायण के लोगों ने उन्हें नेताजी का नाम दिया और धरतीपुत्र कहा। सचमुच धरतीपुत्र ने समय के अनुसार राजनीतिक दोस्ती उन लोगों से भी की जिन्हें वह राजनीतिक दुश्मन मानते थे लेकिन सिद्धान्त विरोधी राजनीतिक दुश्मन का साथ उन्होंने केवल इसलिए पकड़ा कि उनके नेता डा0 राम मनोहर लोहिया देश में सही लोकतंत्र देखना चाहते थे और सही लोकतंत्र स्थापित करना चाहते जिसके लिए वह राजनीति में व्यक्तित्व पूजा और वंशवाद का मूल नष्ट करने के प्रयास में रहे। डा0 राम मनोहर लोहिया के शब्दों में, ‘‘मैं जानता हूं कि मैं एक चट्टान से टकरा रहा हूं और यह भी जानता हूं कि चट्टान को नहीं तोड़ सकूंगा लेकिन मुझे विश्वास है कि दरार जरूर डाल दूंगा।’’ यह शब्द उनके उस वक्त के थे जब वह पं0 जवाहर लाल नेहरू के मुकाबले चुनाव मैदान में उतरे। एक वाक्य और उद्धृत करता हूं डा0 राम मनोहर लोहिया का, जब उन्होंने ग्वालियर की महारानी के खिलाफ सुक्खो रानी को चुनाव मैदान में उतारा था, ‘‘लोकतंत्र में लोक प्रतिनिधि का चुनाव होता है और यही कारण है कि ग्वालियर के चुनाव में एक तरफ है ग्वालियर की महारानी तो दूसरी तरफ है हमारी उम्मीदवार हैं सुक्खो रानी।’’ समाजवाद के दार्शनिकों का यह मूलमंत्र समाप्त हो गया और समाजवादी आन्दोलन सुविधा और भोग की राजनीति में खो गया और समाजवादी नेता और कार्यकर्ता जो सुविधा और भोग की राजनीति में अपना स्थान बना सके, जीवित हैं, अन्यथा खो गये। समाजवादी आन्दोलन तो नहीं रहा, लेकिन समाजवाद के नाम पर डा0 राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव के नाम पर शोषण की राजनीति शुरू हो गई और समाजवादी पार्टी ने जन्म लिया। इस पार्टी में सुविधा भोगी जातिवादी और सम्प्रदायवादी लोगों ने गठजोड़ किया और जिसके विरूद्ध समाजवादी नेता लड़ते रहे वही इस पार्टी में परवान चढ़ा और वह है वंशवाद। मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, राम नारायण यादव और अखिलेश यादव। भाई-भतीजावाद पर उठार-प्रहार करने वाली राजनीति पर भाई-भतीजावाद हावी हो गया। साम्प्रदायिकता और जातिवाद का बोलबाला रहा। मुझे याद है कि जब हम समाजवादी योजन सभा संसोपा और सोपा के लोग जाति तोड़ो सम्मेलन किया करते थे, आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले दलितों को विशेष अवसर दिलवाने के लिए संघर्ष करते थे, आये दिन जगह-जगह सहभोज का आयोजन करते थे, भाई-भतीजावाद को मानना एक गाली समझते थे, आज हम उन्हीं मूल्यों को जीति रखकर अपने को समाजवादी घोषित करने में गर्व महसूस करते हैं। अब अगर मुलायम सिंह यादव भाई-भतीजावाद और वंशवाद को अग्रसर करने के लिए अपने ही जैसे चरित्र के व्यक्ति से दोस्ती करता है और दोस्ती करने के नतीजे में अपनी नींव खिसकती हुई देखकर दोस्ती समाप्त करता है तो इसमें कैसा विश्वासघात? कल्याण सिंह जो एक समय में बावरी मस्जिद गिराने के दोषी रहे, भारत के संविधान की धज्जियां उड़ायी, अपने ही देश के कानून को जूतों की नोंक पर रखा, भारतीय जनता पार्टी से अलग होने के बाद उन्हें भी सहारे की जरूरत थी और अपनी इसी जरूरत को पूरा करने के लिए मुलायम सिंह का हाथ थामा। आवश्यकता के अनुसार हिन्दू राष्ट्र की स्थापना और मन्दिर आन्दोलन से जोड़ कर सत्ता में भागीदार बनाने के उद्देश्य से जब उन्हें मुलायम का साथ अच्छा लगा साथ हो लिए और जब यह साथ दोनों के लिए नुकसानदेह लगा तो दोनों ही अलग हो गये। ये थी स्वार्थ की राजनीति, फिर यह कहा जाय कि मुलायम ने कल्याण सिंह के साथ विश्वासघात किया या कल्याण सिंह ने मुलायम सिंह के साथ विश्वासघात किया, कोई मायने नहीं रखता और सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि जब दोनों को एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी साथ रहे और जब जरूरत समाप्त हुई तो अलग हो गये। सिर्फ इन्हीं दोनों नेताओं को नहीं बल्कि देश के किसी दल या दल के किसी नेता को देश की चिन्ता नहीं है और अगर चिन्ता है तो सिर्फ अपने स्वार्थ की। जिस नेता का स्वार्थ जिस दल से सिद्ध होता है, वह उसके लिए उस समय तक वफादार रहता है जब तक कि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहे, स्वार्थ टकराने के बाद वह जिस दल के प्रति वफादार रहा है उसका साथ छोड़कर उस दल के साथ हो लेता है जहां पर उसके स्वार्थ सिद्धि की गुंजाइश हो। यही कारण है मुलायम सिंह और कल्याण सिंह का एक-दूसरे के साथ विश्वासघात का। अगर दोनों को अपने स्वार्थ की चिन्ता न होकर देश की चिन्ता होती तो दोनों को यह कभी न लगता कि दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात किया। सच तो यह है दोनों ने एक दूसरे के साथ विश्वासघात न करके हमेशा देश के साथ विश्वासघात किया है, कर रहे हैं और करते रहेंगें, इसलिए आवश्यक है कि अपना भला छोड़कर देश का भला चाहने वाले एक साथ उठें और जन-जागरण चलाकर देश के कल्याण के लिए स्वार्थ त्यागकर आगे बढ़ें, इसी में हमारी भलाई है। मुहम्मद शुऐब एडवोकेट मोबाइल - 9415012666 loksangharsha.blogspot.com

Tuesday, November 17, 2009

समय की सबसे बड़ी गाली-2

समय की सबसे बड़ी गाली का पहला भाग पढने के लिए यहाँ क्लिक करें ट्रेन में सफर करते हुए अगर कुछ सैनिक मिल जाएँ तो सम्मान से अपनी रिजर्व सीट छोड़ दें, अन्यथा आपको जबरदस्ती उठा दिया जाएगा, गुस्सा आने पर चलती ट्रेन से धक्का भी दिया जा सकता है। आज-कल सेना के जवानों द्वारा सिवीलियन्स की पिटाई, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ अक्सर सुनने में मिलती हैं। पता नहीं उन्होंने यह सब करना अपना अधिकार समझ लिया है या यह कुण्ठा है जो कहती है ‘‘इन्हीं लोगों की सुरक्षा के नाम पर हमें अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ता है।‘‘ सच है-वे बहुत काम करते हैं, वे इतने व्यस्त हैं कि सी.आर.पी.एफ. भी अब रिजर्व नहीं रहा। इसके 87 फीसदी जवान किसी न किसी मुहिम से जुड़े हैं। जम्मू-कश्मीर में 39 प्रतिशत पूर्वोत्तर राज्य में 29 प्रतिशत और 19 फीसदी जवान देश के अन्दरूनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में कठिन और लम्बे संघर्ष तथा पाकिस्तान की नकारात्मक भूमिका के बावजूद क्या भारत कश्मीर की समस्याओं में अपना हाथ होने से खुद को पूरी तरह निर्दोष करार दे सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों की हम बात भी कैसे कर सकते हैं जहाँ की जनता इन जवानों की तैनाती से इतनी व्यथित हो चुकी है कि इसके विरोध में आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं। अन्दरूनी इलाकों में नक्सलियों से लड़ने के नाम पर, आदिवासियों और किसानों को गोलियों से भूना जा रहा है। इससे बढ़ कर ‘सलवा जूडूम‘ जैसी गालियाँ विकसित की जा रही हैं। दिल्ली में ‘सिटीजन फाॅर पीस एण्ड जस्टिस इन छत्तीसगढ़’ की बैठक में एक आदिवासी का यह बयान अगर आपका दिल नहीं दहला सकता तो कुछ भी ऐसा नहीं जो आपको विचलित कर सके-‘‘एक दिन अप्रैल महीने में मैं महुआ बीनने गया हुआ था कि अचानक सलवा जुडूम के लोग वहाँ आ पहुँचे। मैं पेड़ के पीछे छुप गया पर उन्होंने महुआ बीनती चार महिलाओं को पकड़ लिया। उन्होंने मेरे सामने सन्नू ओयामी की 16 साल की बेटी कुमारी और बन्डे की 27 साल की पत्नी कमली का बलात्कार किया। 2 बुर्जुग महिलाओं को उन्होंने छोड़ दिया और जवान लड़कियों को नक्सलियों के रूप में ढ़ालकर अपने साथ ले गए। ये दोनों लड़कियाँ आज भी जगदलपुर की जेल में नक्सली होने के आरोप में बन्द हैं। वकील को अब तक हम लोग 12 हजार रुपये दंे चुके हैं पर वह कहता है कि 20 हजार देंगे तभी वह लड़कियों को छुड़वा सकेगा।’’ 13 मार्च 2007 को नागा बटालियन और सलवा जुडुम के लोगों ने गगनपल्ली पंचायत के नेन्दरा गाँव में कुछ नक्सलियों को मार गिराया था। उनके नाम उनकी उम्र के साथ इस प्रकार है - सोयम राजू (2साल), माडवी गंगा (5 साल), मिडियम नगैया (5साल), पोडियम अडमा (7 साल), वेट्टी राजू (9साल) वंजम रामा (11 साल), सोयम राजू (12 साल), सोडी अडमा (12 साल), मडकम आइत (13 साल) मडकम बुदरैया (14 साल), सोयम रामा (16 साल) सोयम नरवां (20 साल)। आखिर इन निहत्थे किसानों और आदिवासियों से हमें क्या खतरा है, क्या यही नहीं कि देश की ज्यादातर खनिज सम्पदा इन्हीं इलाकों में है और अब पूँजीपतियों के विस्तार के लिए इन इलाकों पर कब्जा जरूरी है। गृह मन्त्री परेशान हैं क्योंकि पहले वे वित्त मन्त्री भी थे विकास! विकास! विकास! किसानों, आदिवासियों और सेना के अत्याचार झेल रहे दूसरे राज्यों के लोगों तुम मूर्ख हो। हम विकास की बात कर रहे हैं जो तुम समझ ही नहीं सकते और जरूरत भी क्या है कि तुम समझो, हम कौन सा तुम्हें उस विकास में हिस्सेदारी देने वाले हैं। लेकिन इसके बावजूद इतना तो तुमको समझना ही चाहिए कि देश एक है और कानून जरूरी, तुम्हें इसमें यकीन करना चाहिए। पिछले 65 सालों में हमने एक वर्ग की तिजोरियों को इतना भर दिया कि दुनिया के सौ अमीरों में उनके नाम हैं, और तुम मूर्ख! कपटी! देशद्रोही! देश की तरक्की में तुम्हारा यकीन ही नहीं। हाँ सच है इन 65 सालों में हम तुम्हारा भरोसा अब तक नहीं जीत पाये और इसकी तुम्हें सजा मिलेगी। सेना को कौन बताता है कि ये लोग दुश्मन हैं। यही क्यों, लगे हाथ पाकिस्तान और दूसरे देशों पर भी विचार कर लिया जाए। या फिर पाकिस्तान की सेना को कैसे पता चलता है कि उन्हें भारतीय सैनिकों पर हमला बोलना है। जाहिर सी बात है यह तय करती हैं मुखौटा बदलती और नए साँचे में ढ़लती वे सरकारें, जो शोषण पर टिकी व्यवस्था को कायम रखती हैं। आत्महत्या करने या गोली खाने पर मजबूर किसान को देश शब्द से क्या फर्क पड़ता है, फिर वह चाहे आदिवासी क्षेत्र का हो, विदर्भ का या फिर पाकिस्तान के किसी पिछड़े इलाके का। असल में हमारे जवान रोबोट भर हैं जिनकी उँगलियाँ ट्रिगर पर हैं और उनके पीछे उनके संचालक (इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अंग्रेज नहीं।) दुश्मनों को चिन्हित करने में व्यस्त हैं। मन दहल जाता है कि अन्दरूनी समस्याओं से निपटने के नाम पर शस्त्रों से लैस हमारी सेना के कसरती जवान, दिन रात अभ्यास करते हैं - निहत्थे किसान, मजदूर और आदिवासियों को कुचलने के लिए। ऐसा नहीं वे चैन से बैठे हैं इस हेतु वे दिन-रात मेहनत करते हैं। बिना छुट्टी लिए अपने परिवार से दूर अकल्पनीय अमानवीय हालात (हालाँकि देश की बड़ी आबादी भी उसी हालत में रहती है। ) का सामना करते हुए, वे हत्याएँ एवं बलात्कार कर रहे हैं और घर जला रहे हैं, क्योंकि उन्हें आदेश मिला है ये शोषित लोग दुश्मन हैं। इस तरह वे वाकई नए दुश्मन पैदा करते हुए लड़ रहे हैं, मर रहे हैं। पिछले 37 सालों में हमने बेशक कोई यु़द्ध न लड़ा हो पर हमारी सीमाओं के अन्दर यह रोज जारी है। इन परिस्थितियों में लड़ते हुए हमारे जवान वहाँ की जनता से देश भक्तों सा गौरव भी नहीं प्राप्त कर पाते जो वेतन के अतिरिक्त एक आवश्यक ऊर्जा स्रोत है। अतः सेना के जवान तनावग्रस्त हो कर आत्महत्या की राह पर चल पड़े हैं। दो साल पहले सेना के जनरल जे.जे. सिंह ने खुद स्वीकार किया था कि पिछले चार-पाँंच सालों से हर साल कम से कम 100 जवान आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं। इसका अर्थ यह है हर हफ्ते कम से कम दो जवान आत्महत्या करते हैं। इसमें सबसे बड़ी संख्या सी.आर.पी.एफ. की है जिसे अन्दरूनी हिस्सों में लगाया जाता है। 2004-06 में 283 जवान मिलिटेन्ट हमलों में मारे गए। जबकि इसी दौरान खुद अपनी या अपने साथियों की जान लेने वाले सैनिकों की संख्या 408 थी जिसमें से 333 जवान आत्महत्या के शिकार हुए थे। लेकिन इस सब से क्या फर्क पड़ता है, व्यवस्था में सब कलपुर्जे हैं, फिर वे किसान हों या जवान। इन सबका संचालन वास्तव में वे लोग करते हैं जिन्हें अपनी पूँजी बढ़ानी है। टेक्नोलाॅजी और दूसरे हितों के लिए बाहरी कम्पनियों से हाथ मिलाना है। बेचना है-खरीदना है। किसानों, आदिवासियों से उनकी जमीन छीननी है। इसके लिए उनके पास मुखौटा बदलती सरकार है, जो हमें समझा सके-‘राष्ट्रीय हित‘ में यह सब होना कितना जरूरी है। विरोध को कुचलने के लिए सेना है ओर उसमें भरती होने के लिए बेरोजगारों की फौज, जो भरती हो कर यदि दुश्मन (जिसे चिन्हित किया गया है। ) का सामना करते हुए मरे तो शहीद, किन्तु भर्ती के दौरान यदि भगदड़ मचने से मरे या सेप्टिक टैंक टूटने से उसमें डूब कर मरें तो कुत्ते की मौत मरेंगे यकीन मानिए आक़ाओं को देश शब्द से कोई फर्क नहीं पड़ता। अन्तिम सत्य यह है कि सम्मानजनक जीवन की माँग शान्तिपूर्ण ढ़ंग से करना आत्महत्या है और हताशा में हथियार उठा लेना देशद्रोह। सबसे सच्चा वह ‘मैं’ है जो ‘धारक’ को एक के नोट पर एक रू. अदा करने का वचन देता है यह बात और है उसकी कीमत कभी भी एक रू. नहीं थी। -पवन मेराज मो0 09179371433 लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाशित

Monday, November 16, 2009

समय की सबसे बड़ी गाली-1

मैं एक भारतीय हूँ और हर भारतीय की तरह मुझे कुछ मूल्य घुट्टी में मिले हैं। मसलन परम्परा, देश और देश की सेना पर गर्व करना। हालाँकि ये समझना मुश्किल है कि हमारी परम्परा क्या है और देश का मतलब टाटा, अम्बानी और मित्तल है या फिर जनता; जिसमें किसान भी हैं और दूर दराज के आदिवासी भी; इसमें क्या वाकई बेरोजगार भी शामिल होते हैं? पर छोड़िए ना मैं देश पर गर्व करता हूँ और मानता हूँ कि सीमाओं की रक्षा करने वाले हमारे जवान कठिन परिस्थितियों में मौत का सामना करते हैं। अब जबकि उन पर गर्व करना कर्तव्य ही नहीं धर्म भी है तो हर भारतीय की तरह मैं भी उन पर गर्व करना चाहता हूँ। पर क्यों मनोरमा की लाश आँखांे के सामने आ जाती है। क्यों वस्त्रहीन दौड़ती हुई महिलाओं की दर्द भरे गुस्से की चीख दिल को चीर देती है ‘‘आओ! गाड़ दो अपना तिरंगा हमारी छाती पर।‘’ मनोरमा, याद है ना आपको, जुलाई 2004 में उनकी लाश झाड़ियों में पड़ी मिली। सात दिनों पहले सेना के जवानों ने उन्हें आतंकियों का सहयोगी होने के संदेह में, बिना किसी लिखा-पढ़ी या वारन्ट के घर से अगवा कर लिया था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उनके शरीर पर भयंकर शारीरिक यातनाओं और सामूहिक बलात्कार के चिन्ह थे वैसे जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में मनोरमाओं की संख्या गिनता ही कौन है। यहाँ सेना द्वारा किसी को अगवा करने के लिए शक का बहाना भी नहीं चाहिए। इसी साल सोपिया (जम्मू कश्मीर) में दो लड़कियाँ (आसिया जान और उनकी रिश्तेदार निलोफर जान) सेना कैम्प के पास से गायब हो गईं, एक लड़की की उम्र महज 17 साल थी। लोग जब सड़कों पर उतर आए और जाँच का घेरा तंग होने लगा तो उनकी लाशें अचानक एक नाले में प्रकट हो गईं, हैरानी की बात थी इस जगह की छानबीन पहले भी की जा चुकी थी। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के साथ अमानवीय तरीके से बलात्कार किया गया था। जाँच की हर दिशा सेना कैम्प की ओर इशारा करती रही। सूत्र बताते हैं कि जिस दिन दोनों गायब हुई थीं सेना कैम्प में किसी पार्टी का आयोजन था। कहने की जरूरत नहीं दोनों वाक़िअ़ात मंे किसी को सजा नहीं हुई। यह तथ्य दिल दहला देता है कि ये घटनाएँ अपवाद नहीं। छेड़छाड़ और बलात्कार सेना की आदत में शामिल होता जा रहा है। अधिकतर मामले प्रकाश में ही नहीं आ पाते क्योंकि अधिकांश पीड़ित जिस वर्ग के होते हैं, उनके लिए सेना जैसे संगठित गिरोह के सामने खड़े होने का साहस जुटा पाना ही असम्भव है। उपर्युक्त वाक़िअ़ात भी तब प्रकाश में आ सके जब स्थानीय लोगों ने इसके खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रकट किया। मणिपुर में ऐसे अनेक वाक़िअ़ात को झेलती आ रहीं महिलाओं का धैर्य मनोरमा प्रकरण में चुक गया। उन्होंने मणिपुर सेना मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किया और नारे लगाए ‘‘हम सब मनोरमा की माएँ हैं हमारा बलात्कार करो।’’ शायद यह पहला वाक़िआ था जब प्रचलित मीडिया ने मणिपुर की हालत का जायजा लेने की कोशिश की। खैर दोषियों को तो सजा नहीं मिली लेकिन प्रदर्शनकारी महिलाओं को अश्लील व्यवहार करने के जुर्म में तीन माह की सजा हुई। क्या हमने वाकई कभी उस दर्द तक पहुँचने की कोशिश की है जो उन्हें कहने पर मजबूर करता है ‘‘वी आर इन्डियन बाई कर्स‘‘। 3 जून 2008 को श्रीनगर में शेख नाम का एक दिहाड़ी मजदूर अचानक हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो गया। इसके कुछ दिनों बाद ही सेना के एक जवान की बेटी के अपहरणकर्ता का पीछा करते-करते बड़गम पुलिस ने चीची नामक एक व्यक्ति को वहाँ की एस.डी. कालोनी से गिरफ्तार किया। चीची के पास जो दस्तावेज प्राप्त हुए, वे उसे बन्दीपुर में सेना का सूत्र बताते थे। थोड़ी ही छान-बीन के बाद बड़गम पुलिस सक़्ते में आ गई क्यांेकि सूत्र बता रहे थे कि चीची को कुछ दिनों पहले मार गिराए गए एक आतंकवादी के साथ भी देखा गया था। चीची ने टूटने के बाद जो कहानी बताई वह एक दुःस्वप्न है। मार गिराया गया आतंकवादी ‘शेख’, वास्तव में श्रीनगर का दिहाड़ी मजदूर था जिसे चीची 200 रू प्रतिदिन की दिहाड़ी पर बन्दीपुर लाया था। बाद की कहानी साफ थी एक एनकाउण्टर और लाश के पास बन्दूक वगैरह-वगैरह। यह सब इसलिए क्योंकि एक मेजर ने चीची को आतंकवादी मुहैया करवाने के बदले एक लाख रूपये देने का वादा किया था। इस पर रक्षा प्रवक्ता एन.सी.विज का बयान था ‘‘वी विल इन्वेस्टिगेट व्हाट लेड टू दीज ऐलीगेशन अगेन्स्ट आर्मी यूनिट’’। स्थान- मेण्डेवाल, साल-2006, एक ऐसा ही एनकाउण्टर हुआ बाद में झूठा पाया गया। पाँच सैनिक गिरफ्तार किए गए जिसमें कमाण्ंिडग आफिसर भी शामिल था। मारे गए शौकत अहमद, जदिवाल जिले की मस्जिद के मौलवी थे। यह मामला भी तब प्रकाश में आया जब एक अन्य झूठे एनकाउण्टर की जाँच चल रही थी जिसमें अब्दुल रहमान नामक एक बेगुनाह व्यक्ति को विदेशी आतंकवादी बता कर मार गिराया गया था। सितम्बर 11, कुपवाड़ा जिले में तो खुद सेना में भर्ती होने गए चार लोगों को मेडल की लालच में आतंकवादी बता कर मार ड़ाला गया। 22 सितम्बर 2003 को कोराझार जिले के चार बोडो युवकांे की सेना द्वारा हत्या। ये फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि शायद कभी खत्म ही न हो। अभी पिछले महीने-अक्टूबर की 28 तारीख को जम्मू-कश्मीर की निवासी मुगनली अपने बेटे की राह तकते-तकते मर गईं। वह जम्मू कश्मीर के उन 10000 लोगों के परिजनों में से एक थी जो 1990 के बाद से गायब होते रहे। यही वह समय है जब जम्मू कश्मीर में सेना ने अपनी कवायदें तेज कीं थीं। आखिर सेना के जवान ऐसा कैसे कर पाते हैं। साफ है इन जगहों पर उन्हें विशेषाधिकार दिए गए हैं। मणिपुर की बात करें तो वहाँ सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम 1958 लागू है, इसके अनुसार सैनिक मात्र शक होने पर न कि सिर्फ किसी को गिरफ्तार कर सकते हैं बल्कि गोली भी मार सकते हैं। मारे जाने वाले निर्दोष लोगों की संख्या भयावह है लेकिन उससे भी भयावह -हमारे देश में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ के लोगों की जिन्दगी किसी सैनिक के संदेह की मोहताज है। यही नहीं पीड़ित व्यक्ति न्याय के लिए अदालत का दरवाजा भी तब तक नहीं खटखटा सकता जब तक सेना इसकी इजाजत न दे दे। सन् 2000 में पैरामिलिट्री असम राइफल ने मालोम बस स्टैण्ड पर 10 निर्दाेष नागरिकों को मार गिराया। इरोम शर्मिला (जो बतौर मानवाधिकार कार्यकर्ता ऐसे मामलों को पिछले कई सालों से देखती आ रहीं थीं ) 2 नवम्बर 2000 को आमरण अनशन पर बैठीं। माँग स्पष्ट थी। सैन्यबलों की तैनाती को मणिपुर से हटाया जाए और सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम 1958 निरस्त किया जाए। उनका यह संघर्ष आज एक मिसाल बन चुका है और वे मानवाधिकारों की सुरक्षा चाहने वालों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। अपने इतिहास की किताबों में हम बेशक ‘रोलट एक्ट’ का विरोध करने वाले स्वतन्त्रता सेनानियों पर गर्व करते आ रहे हों पर आमरण अनशन के 9 साल पूरे कर चुकीं इरोम शर्मिला आज भी हिरासत में हैं। उन पर आत्महत्या के प्रयास का दोष लगाया गया है। ऐसे मामले में किसी व्यक्ति को 2 साल से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता इसलिए हर 2 साल बाद उन्हें रिहा कर फिर से हिरासत में ले लिया जाता है, जहाँ उन्हें नाक के सहारे भोजन दे कर ज़िन्दा रखा जाता है। लेकिन भूल जाइए सब। बस याद रखिए देश और देश की सेना पर गर्व करना, सुकून देता है खास तौर पर तब, जब पल्ले कुछ भी न हो और हमारी सरकार हमसे वह भी छीन लेना चाहती हो। कितना अच्छा होता है खाली जेबों और विपन्न लोगों द्वारा, पड़ोसी देशों के आक्रमण का खतरा बुन लेना और उसका सामना करती हमारी फौजों पर गर्व करना। जबकी हमारी फौजों का संचालन करने वाली सरकारें और भरी जेबें, जनता के अधिकारों पर अपना शिकंजा रोज-ब-रोज तंग करती जा रही हों। आइए वास्तविक खतरों को भुला दें और दूसरे डर पाल लें। मसलन - पाकिस्तान, चीन ही नहीं श्रीलंका से लेकर नेपाल यहाँ तक कि बंगला जैसे देश हम पर आक्रमण करके हमें अपना गुलाम बना लेंगे। इस तरह हमें अपने अधिकारों को खोने की प्रक्रिया में कम कष्ट का सामना करना पड़ेगा। -पवन मेराज मो0 09179371433 लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाशित

Sunday, November 15, 2009

जेलों में सड़ने को अभिषप्त हैं मुस्लिम युवा-2

आतंकी घटनाओं के संबंध में विभिन्न जगहों से गिरफ्तार आरोपियों पर दर्ज मुकदमे

नाम

अहमदाबाद

ै सूरत

दिल्ली

मुबंई

जयपुर

अन्य

योग

सदिक षेख

20

15

5

1

हैदराबाद कोलकाता

54

आरिफ बदर

20

15

5

1

41

मंसूर असगर

20

15

5

1

41

मो सैफ

20

15

5

5

45

मुफ्ती अबुल बषर

21

15

बेलगाम, हैदराबाद

40

ैं सैफुर रहमान

20

15

6

40

कयामुद्दीन कपाड़िया

21

15

5

इंदौर

40

जावेद अहमद सागीर अहमद

21

15

36

गयासुद्दीन

21

15

36

र्


र् जाकिर षेख

20

15

1

36

ैुंसाकिब निसार

20

15

5

40

र्


र् जीषान

20

15

5

40

पुलिस ने उनकी चार्जषीट को भी तोड़मरोड़ कर पेष किया। अहमदाबाद व सूरत के 35 मामलों में पुलिस ने 60 हजार पेजों की आरोप पत्र पेष किया। मुबंई अपराध ब्यूरो ने 18 हजार पेजों का आरोप पत्र पेष किया। इसी प्रकार जयपुर विस्फोट के मामले में 12 हजार पेजों का आरोप पत्र पेष किया गया। सभी आरोप पत्र हिंदी, मराठी व गुजराती में हैं यदि यह मामले सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं तो आरोप पत्रों को अंग्रेजी में अनुवाद करने में और ज्यादा परिश्रम व समय की जरूरत होगी।

विभिन्न मामलों में दर्ज मुकदमे व आरोप पत्र

षहर

केसों की संख्या

आरोपी

गिरफ्तार

आरोप पत्र के पेज

अहमदाबाद व सूरत

36

102

52

60ए000

मुंबई

1

26

21

18009

जयपुर

8

11

4

12ए000

दिल्ली

7

28

16

10ए000

अभियोजन पक्ष इन सभी मामलों में चष्मदीदों की भीड़ भी जुटा चुका है। हर केस में 50-250 चष्मदीद गवाह हैं। अहमदाबाद व सूरत केस में तो कई दोशी विस्फोट के पहले से ही जेलों में हैं। उदाहरण के लिए सफदर नागौरी, षिब्ली, हाफिज, आमील परवेज सहित 13 अन्य को 27 मार्च 2008 को ही मध्य प्रदेष से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उन्हें अहमदाबाद व सूरत मामले का मुख्य आरोपी बताया गया। इसी तरह राजुद्दीन नासिर, अल्ला बक्ष और मिर्जा अहमद जून 2008 से कर्नाटक पुलिस की हिरासत में थे, लेकिन उन्हें भी अहमदाबाद व सूरत मामलों का दोशी बताया गया।

एडवोकेट षाहिद आजमी कहते हैं कि साजिष रचने का आरोप एक हथियार की तरह है जिसे पुलिस कभी भी किसी भी मामले में प्रयोग कर सकती है। आफकार-ए-मिल्ली से बातचीत में वह कहते हैं कि अफजल मुतालिब उस्मानी जिसे 24 सितम्बर को मुंबई से गिरफ्तार दिखाया गया, उसे वास्तव में 27 अगस्त को लोकमान्य टर्मिनल से पकड़ा गया था। वह अपने घर वह अपने घर से गोदान एक्सप्रेस पकड़ मुंबई पहुंचा था। हमने संबंधित अधिकारियों को तुरंत टेलीग्राम से इसकी सूचना दी लेकिन उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। 28 अगस्त को उसे मेट्ोपोलिटीन मजिस्टे्ट के सामने पेष किया गया। लेकिन मुंबई अपराध ब्यूरो के अनुरोध पर मजिस्टे्ट ने उसकी गिरफ्तारी और रिमांड को रजिस्ट्र में दर्ज नहीं किया। इसी तरह सादिक षेख को 17 अगस्त को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उसे 24 अगस्त को विस्फोटक, हथियारों व पांच अन्य के साथ गिरफ्तार दिखाया गया। विषेशों के अनुसार पकड़े गए आरोपियों के किसी भी मुकदमें का निस्तारण दो साल से कम समय में नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग जगहों से पकड़े गए आरोपियों के केस और लंबे खिचेंगे।

सवाल उठता है कि एक बूढ़ा पिता अपने बेटे को छुड़ाने के लिए कब तक लड़ेगा। गिरफ्तारी के एक साल बाद भी न तो आरोपियों पर आरोप तय हो सके हैं न ही मुकदमे षुरू हो सके हैं। उन्हें खुद को निर्दोश्ज्ञ साबित करने में और कितना समय लगेगा? न्याय की धीमी गति को देखकर लगता है कि वह केस का अंत देख सकेंगे? यह सादिक षेख, अबुल बषर, मंसूर असगर, आरिफ बद्र या सैफुर रहमान के ही सवाल नहीं बल्कि उन 200 युवकों के सवाल भी हैं जो पिछले एक साल से जेलों में सड़ रहे हैं।

अनुवाद व प्रस्तुति- विजय प्रताप

लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाशित

Friday, November 13, 2009

जेलों में सड़ने को अभिषप्त हैं मुस्लिम युवा-1

जेलों में सड़ने को अभिषप्त हैं मुस्लिम युवा आतंक के नाम पर व्यवस्था एक समुदाय विषेश्ज्ञ को प्रताड़ित करने के लिए कौन-कौन से तौर-तरीके अपना सकती है, वह हाल की कुछ घटनाओं से समझा जा सकता है। आतंकी घटनाओं के नाम पर पुलिस ने थोक के भाव मुस्लिम युवको की गिरफ्तारी की। पुलिस सत्ता का यह उत्पीड़न यहीं नहीं रूका बल्कि एक सोची-समझी साजिष के तहत उन पर इतने केस लाद दिए गए ताकि वह जीवन भर जेल में सड़ने पर मजबूर हों। अगस्त 2009 में उर्दू मासिक पत्रिका अफकार--मिल्ली में अबु जफर आदिल आजमी का एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाषित हुआ। इसका अंग्रेजी अनुवाद मुमताज आलम फलाही ने किया। प्रस्तुत है उसका हिंदी रूपान्तरण- यह सच है कि अन्याय दुहारे मापदंडों के साथ कोई भी समाज बहुत दिन तक नहीं चल सकता। दुर्भाग्य से भारत तेजी से इन्हीं मापदंडों की ओर बढ़ रहा है। आंतकवाद के मामले में मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी न्याय में पुलिस, प्रषासन न्यायापालिका का दुहरा मापदंड साफ नजर आता है। 2008 में देष में कई विध्वंसकारी धमाकों में सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए। फलस्वरू, सैकड़ों मुस्लिम युवाओं को आतंकी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी का आंकड़ा हर साल बढ़ रहा है। 2007 में उत्तर प्रदेष की अदालतों में हुए धमाके के बाद गिरफ्तारी की प्रक्रिया में तेजी आई है। मुस्लिम युवकों के खिलाफ चल रहे मामलों को देखे तो ऐसा लगता है कि पुलिस प्रषासन जानबूझ कर इन केस पर केस थोप रही हैं। इन मामलों के सुनवाई की जो गति है उससे यह तय है कि ये सभी कभी भी बाहर नहीं सकेगें। आतंकवाद के मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद उन पर जैसे 40-40, 50-50 केस थोपे गए हैं यह एक बड़े शडयंत्र का हिस्सा लगता है। आतंक के मामले में बहुत से मुस्लिम युवकों पर पुलिस आरोप साबित नहीं कर सकी और अदालतों ने उन्हें मुक्त भी कर दिया। लेकिन शडयंत्र के तहत उन्हें हाल के विस्फोटों में फिर से फंसाया गया। जुलाई 2008 में अहमदाबाद श्रृंखलाबध्द विस्फोट सूरत से दर्जनों जिंदा बमों की बरामदगी के मामले में सूरत पुलिस ने 35 मामलों में 102 लोगों को दोशी माना। इसमें से 52 को गिरफ्तार किया गया और लगभग सभी मामलों में दोशी बताया गया। मई 2008 में जयपुर धमाकों के बाद 8 मामलों में 11 लोगों को दोशी बताया गया। चार की गिरफ्तारी र्हुई। सितम्बर 2008 में दिल्ली श्रृंखलाबध्द विस्फेट के बाद 8 मामले में 28 लोगों को दोशी बताया गया। इसमें 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया। मुबंई पुलिस ने इंडियन मुजाहिद्दीन के सदस्य के नाम पर 21 लोगों को गिरफ्तार किया। मुंबई पुलिस की अपराध षाखा ने सादिक षेख को देष के हालिया सभी विस्फोटों का मुख्य शडयंत्रकारी बताया। पुलिस ने मैकेनिकल इंजीयर 38र् वश्ज्ञीय सादिक षेख इंडियन मुजाहिदीन का संस्थापक सदस्य बताया। उसने अपने पाकिस्तानी मित्र आमीर रजा की मदद से देष में विस्फेटों का शडयंत्र रचा। पुलिस के अनुसार षेख 2005 के बाद देष में हुए सभी धमाकों में संलिप्त था। उसने 2001 में पाकिस्तान जाकर हथियार चलाने का प्रषिक्षण लिया तथा मुबंई आजमगढ़ के कई युवाओं को इस प्रषिक्षण के लिए पाकिस्तान भेजा। उस पर अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता मुबंई धमाकों के मामले में 52 मुकदमें कायम किए गए। उसे 11 अन्य के साथ 11 जुलाई को मुबंई की लोकल ट्नों में हुए धमाकों के मामले में भी दोशी माना गया। उसे मकोका में गिरफ्तार किया गया। उसने टीवी चैनलों के सामने इन सभी मामलों में अपनी संलिप्तता कबूल की। जिसके बाद मुंबई अपराध षाखा ने इस केस को एटीएस के हवाले कर दिया। एटीएस ने मामले को हाथ में लेते ही कोर्ट से टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे उसके कबूलनामे पर तुरंत रोक लगाने की मांग की। अदालत ने एटीएस की अपील कबूल कर ली। अपनी जांच में एटीएस ने सादिक षेख को क्लीनचिट दे दी और मकोका कोर्ट में उसके 11 जुलाई को मुबंई की लोकल टे्न धमकों के मामले में किसी भी तरह की संलिप्तता से इंकार किया। एटीएस के अनुसार षेख ने इस मामले में षेख ने बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए अतीफ अमीन के दबाव में आकर इस ब्लास्ट में खुद को षामिल होना बताया था। हालांकि एटीएस इस बात का जवाब नहीं दे सकी कि अतीफ ने कब और क्यों उस पर दबाव दिया जबकि इंडियन मुजाहिदी में वह षेख से जूनियर था। इस धमाकों में मुहम्मद सैफ को भी मुख्य दोशी बताया गया। आजमगढ़ के संजरपुर गांव के सैफ ने दिल्ली से इतिहास में एमए किया था। वह अंग्रेजी कम्प्यूटर साफ्टवेयर का भी कोर्स कर रहा था। बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने सैफ को उसके फ्लैट से गिरफ्तार किया था। 23 वर्शीय सैफ पर दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद और सूरत विस्फोट के मामलें में 45 केस लगाए। उस पर आरोप था कि उसने इन षहरों में बम रखे। उधर, उत्तर प्रदेष पुलिस ने उसे अदालतों में विस्फोट मामले में भी संलिप्त बताया। पुलिस ने उसे संकट मोचन मंदिर बनारस रेलवे स्टेषन पर हुए विस्फोट मामलों में पूछताछ के लिए कई दिनों तक पुलिस अभिरक्षा में रखा लेकिन अभी तक इस मामले में कोई चार्जषीट नहीं दे सकी। मंसूर असगर को इंडियन मुजाहिद्दीन के नाम से मेल भेजने के आरोप में पुणे से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से केवल एक माह पहले मंसूर ने 19 लाख रूपए सलाना पैकेज पर याहू में मुख्य इंजीनियर के पद पर ज्वाइन किया था। उस पर मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली हैदराबाद विस्फोटों के शडयंत्र रचने साइबर अपराध के मामले में 40 से ज्यादा केस दर्ज किए गए। मुफ्ती अबुल बषर को गुजरात पुलिस यूपी एटीएस ने संयुक्त रूप से उसके गांव बीनापारा से 14 अगस्त, 2008 को गिरफ्तार किया। लेकिन उसकी गिरफ्तारी चारबाग रेलवे स्टेषन से दिखाई गई। उसे इंडियन मुजाहिद्दीन के मुखिया और अहमदाबाद विस्फोटों का मास्टरमाइंड बताया गया। आज उस पर अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद और बलगाम विस्फोट के मामले में 40 से अधिक केस चल रहे हैं। कयामुद्दीन कपाड़िया को जनवरी 2009 में मध्यप्रदेष से गिरफ्तार किया गया। लेकिन उसके परिजनों का कहना है कि वह गिरफ्तारी के पांच माह पहले से ही लापता था। उस पर सिमी का वरिश्ठ सदस्य होने, गुजरात और केरल के जंगलों में प्रषिक्षण षिविर लगाने और अहमदाबाद, सूरत, और दिल्ली विस्फोटों में षामिल होने का आरोप लगाया गया। उस पर भी अलग-अलग राज्यों में 40 से अधिक केस चल रहे हैं। आजमगढ. के असरोली गांव निवासी 38 वर्शीय आरिफ बदरूद्दीन षेख को मुबंई पुलिस ने बम बनाने का विषेशज्ञ बताया। उसे 2005 के बाद देष में हुए सभी धमाकों से जोड़ा गया। आरिफ के पिता मानसिक रूप से कमजोर थे। उसकी गिरफ्तारी के दो माह बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। आरिफ की अंधी मां अपनी बेटी की ससुराल में टूटी-फूटी झोपड़ी में दिन गुजार रही है। आरिफ पर भी मुबंई, दिल्ली, अहमदाबाद सूरत धमाके के मामले में 41 केस चल रहे हैं। सैफुर रहमान को मध्य प्रदेष एटीएस ने जबलपुर से अप्रैल 2009 में तब गिरफ्तार किया गया जब वह अपनी बहन को आजमगढ़ से उसकी ससुराल मुबंई लेकर जा रहा था। दोनों गोदान एक्सप्रेस में सफर कर रहे थे। एटीएस ने उसकी बहन को भी 12 घंटे हिरासत में अवैध तरीके से बिठाए रखा। सैफुर रहमान को अहमदाबाद और जयपुर विस्फोटों का दोशी बताया गया। उसने भोपाल में अदालत के सामने इन विस्फोटों में षामिल होना स्वीकार भी कर लिया, लेकिन जयपुर में मजिस्ट्ेट के सामने उसने इन विस्फोटों में षामिल होने से इंकार कर दिया। मजिस्टे्ट के सामने उसने कहा कि प्र एटीएस ने उसे प्रताड़ित किया और उसकी बहन से बलात्कार करने की धमकी दी। एटीएस के दबाव में उसने अदालत में विस्फोटो में अपनी संलिप्तता की बात कही थी। जयपुर एटीएस ने अदालत से उसके नार्को टेस्ट की अनुमति भी मांगी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। इसके विपरित एक नाटकीय घटनाक्रम में जयपुर विस्फोटों के कथित आरोपी षाहबाज हुसैन ने अदालत में खुद को निर्दोश साबित करने के लिए नार्को अन्य टेस्ट कराने की गुजारिष की। यह देष में अपनी तरह का पहला ऐसा मामला था जब एक कथित दोश्ज्ञी ने खुद ही नार्को टेस्ट की मांग की। अभियोजन पक्ष ने उसकी मांग का विरोध किया, जिसके आधार पर मजिस्ट्ेट ने उसकी मांग अस्वीकार कर दी। ये हाल के बम विस्फोटों में गिरफ्तार 200 लोगों में से कुछ प्रमुख नाम हैं। इन केसों में अभी गिरफ्तार लोगों से कहीं ज्यादा फरार है। पुलिस और सरकार इन मामलों में जगह-जगह मानवाधिकार का हनन किया। मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद उन पर केस लाए गए। यह देष के इतिहास में अपनी तरह का दुर्लभ उदाहरण है। सादिक षेख पर 54 केस चल रहे हैं। इसमें अभी कई मामलों में उसे पुलिस ने रिमांड पर नहीं लिया है। अगर पुलिस उसे हर केस के लिए 14 दिन की रिमांड पर भी ले तो 2 वर्श उसे पुलिस रिमांड में ही गुजारने होंगे। दोशियों को एक से दूसरे राज्य ले जाने में जो समय लगेगा वो अलग है। अब कल्पना की जा सकती है, कि सुनवाई से पहले आरोप पत्र भरने में कितना समय लगेगा जो कि भारतीय कानून के मुताबिक किसी भी अपराधी की सुनवाई से पहले भरना जरूरी होता है। कई ऐसी भी खबरें हैं जिसमें इन कथित दोशियों को पुलिस हिरासत के अलावा जेल में भी प्रताड़ित किया गया और उन पर केस लादे गए। गुजरात में साबरमती जेल में बंद आरोपियों पर चल रहे केसों में एक केस जेल में रहते हुए दर्ज किया गया। एक के बाद एक केस लगाए जा रहे हैं मुकदमों के संबंध में जामिया सॉलिडेरिटी गु्रप की नेता मनीशा सेठी कहती हैं कि सरकार केसों को जटिल बनाकर अपना पीछा छुड़ना चाहती है। आतंक के खिलाफ युध्द जैसी आयातित अवधारणा को कांग्रेस बढ़ावा दे रही है और मुस्लिमों के खिलाफ उसे हथियार की तरह प्रयोग कर रही है। संजरपुर संघर्श समिति के अध्यक्ष मसीहुद्दीन कहते हैं कि अब इन लोगों को खुद को बेकसूर साबित करने के लिए यह जीवन भी कम पड़ेगा। जमाते-उलेमा--हिंद की तरफ से सादिक षेख का मुकदमा लड़ रहे वकील षाहीद आजमी के अनुसार यह षिक्षित मुस्लिम युवकों की जिंदगी जेलों में सड़ाने की साजिष है। यही तरीका नक्सलवादियों के खिलाफ भी अख्तियार किया जा चुका है। नक्सलवादियों में कई आज भी 30 सालों से जेलों में है और उन पर 70-80 से केस हैं। पीयूसीएल के उत्तर प्रदेष के संयुक्त सचिव राजीव यादव कहते हैं कि पुलिस सरकार का यह तरीका अमरिका से आयातित है। वहां यही तरीका काले नीग्रो लोगों के खिलाफ अपनाया गया। वे या तो इतना केस लाद देना चाहते हैं जिसमें छुटना मष्किल हो या 200-250 सालों के जेल में डाल देना चाहते हैं। गिरफ्तार युवकों के परिजन और संबंधी गूंगे बहरे की तरह केस की संख्या और जटिलता देखने पर मजबूर हैं। अनुवाद व प्रस्तुति- विजय प्रताप

Thursday, November 12, 2009

पत्नी पीड़ित चिट्ठाकार क्षमा करें

घरेलू हिंसा का मुख्य कारण पुरूषवादी सोच होना है और स्त्री को भोग की विषय वस्तु बनाना हैसामंती युग में राजा-महाराजाओं के हरण या रानीवाश होते थे जिसमें हजारो-हजारो स्त्रियाँ रखी जाती थीपुरूषवादी मानसिकता में स्त्री को पैर की जूती समझा जाता है इसीलिए मौके बे मौके उनकी पिटाई और बात-बात पर प्रताड़ना होती रहती है . समाज में बातचीत में स्त्री को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की संज्ञा दी जाती है किंतु व्यव्हार में दोयम दर्जे का व्यव्हार किया जाता है कुछ देशों की राष्ट्रीय आय का श्रोत्र देह व्यापार ही हैमानसिकता बदलने की जरूरत है भारतीय कानून में 498 आई पी सी में दंड की व्यवस्था की गई है किंतु सरकार ने पुरुषवादी मानसिकता के तहत एक नया कानून घरेलु हिंसा अधिनियम बनाया है जिसका सीधा-सीधा मतलब है पुरुषों द्वारा की गई घरेलू हिंसा से बचाव करना है इस कानून के प्राविधान पुरुषों को ही संरक्षण देते हैं समाज व्यवस्था में स्त्रियों को पुरुषों के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता है जिसके कारण घरेलू हिंसा का विरोध भी नही हो पाता है आज के समाज में बहुसंख्यक स्त्रियों की हत्या घरों में कर दी जाती है और अधिकांश मामलों में सक्षम कानून पुरुषवादी मानसिकता के कारण कोई कार्यवाही नही हो पाती हैस्त्रियों को संरक्षण के लिए जितने भी कानून बने हैं वह कहीं कहीं स्त्रियों को ही प्रताडित करते हैं , जब तक 50% आबादी वाली स्त्री जाति को आर्थिक स्तर पर सुदृण नही किया जाता है तबतक लचर कानूनों से उनका भला नही होने वाला हैकिसी भी देश का तभी भला हो सकता है जब उस देश की बहुसंख्यक स्त्रियाँ भी आर्थिक रूप से सुदृण होहमारे देश को बहुत सारे प्रान्तों में स्त्रियाँ 18-18 घंटे तक कार्य करती हैं और पुरूष कच्ची या पक्की दारू पिए हुए पड़े रहते हैं उसके बाद भी वो कामचोर पुरूष पुरुषवादी मानसिकता के तहत उन मेहनतकश स्त्रियों की पिटाई करता रहता हैघरेलु हिंसा से तभी निपटा जा सकता है जब सामाजिक रूप से स्त्रियाँ मजबूत होंयह पोस्ट उल्टा तीर पर चल रही बहस घरेलू हिंसा के लिए लिखी गई है और इसका शीर्षक यह इसलिए रखा गया है की मुझे इन्टरनेट पर पत्नी पीड़ित ब्लागरों की यूनियन बनाने की बात की पोस्ट दिखाई दी थी इसलिए पत्नी पीड़ित चिट्ठाकारों से क्षमा मांग ली गई है । सुमन loksangharsha.blogspot.com

सुरक्षा अस्त्र

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