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Tuesday, December 4, 2007

नारी रंग

श्वेत नीला काला नारंगी सुर्ख अंबर हर दिन हर पल बदले रंग अंबर ऐसे ही रंग बदले नारी हर पल परिवार के लिए ओढे शांत रंग दुनिया से लड़े बन आग का रंग पीया के लिए संवरे लगा सिंदूरी रंग कभी बरसे बन घनश्याम रंग...... कीर्ती वैद्य

7 comments:

tulika singh said...

कीर्ति जी आपकी कविता पढ़ कर इस बात का एहसास होता है कि कहीं ना कहीं आप के अन्तर्मन में भी एख ऐसी नारी छिपी हुई है जो नारी के हर रंग को बखूबी जीना चाहती है और बाकी लोगो को भी जीना सिखाना चाहती है।

तुलिका सिंह

PARVEZ SAGAR said...

नारी शक्ति के बाद नारी रंग देखकर अच्छा लगा। सही भी है नारी के बिना इस संसार की कल्पना करना भी नामुमकिन है। तुलिका और आपकी रचना सभी साथियों को पसन्द आ रही है। उम्मीद है आपकी लेखनी के सभी रंग रंगकर्मी से जुड़े साथियों को लिखने की प्रेरणा देगें। क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ..........

रंगकर्मी परिवार

Keerti Vaidya said...

haanji tulika ji..aapney theek samjha..ase he rango ko mein bhi odhti hun...kabhi ghar/office/dosto/kavi mitro/bacho ke saath

Keerti Vaidya said...

Parvez ji....

shukriya apkey abnandan aur shabdo ke liye....

mein hamesha RANGKARMI ke saath judi rahungi

हरिराम said...

बहुत अच्छी कविता है, इसी सन्दर्भ
शक्ति-अर्चना भी देखें.

ललित said...

बिल्कुल सच लिखा है। नारी बहुत adjustable होती है। "पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिलाएँ हो जाए उस जैसा" या यों भी कह सकते हैं न "गिरगिट की तरह" ?????

Nishikant Tiwari said...

Very good poem,small yet powelful

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