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Tuesday, March 31, 2009

ऐसे फनकार बिरले पैदा होते है ....

आज मेहदी हसन की याद आ रही है .... सोच रहा हूँ ,ऐसे फनकार बिरले पैदा होते है.....अपने इलाज के लिए भी उन्हें पैसे पैसे के लिए तरसना पड़ रहा है , यह देख नई पीढी क्यों गजल गायन या शास्त्रीय संगीत में रूचि दिखायेगी . फिर पत्ता बूटा बूटा जैसी गजलों को अपनी आवाज़ के जादू से यादगार बनाने वाले 82 साल के हसन गरीबी से इस कदर जूझ रहे हैं कि उनके इलाज के लिए भी पूरा बंदोबस्त नहीं हो पा रहा है।दुनिया भर के उनके प्रशंषकों को इलाज के लिए पैसे जुटा कर भेजने चाहिए । पाकिस्तानी या भारतीय सरकार को भी मदद करनी चाहिए । वह फेफड़ों के संक्रमण के कारण पिछले डेढ़ महीने से कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती हैं। राजस्थान के लूना में जन्मे हसन नौ बरस पहले पैरलाइसिस के चलते मौसिकी से दूर हो चुके है । अन्तिम समय में यह दिन भी देखना पड़ रहा है । क्यों किसी फनकार के पास इतना भी पैसा नही होता जिससे वह अपना जीवन सुखमय बिता सके ।

Monday, March 30, 2009

नीरजा बनी इंडियन वूमन प्रेस कोर की अध्यक्षा

नई दिल्ली। इंडियन वूमन प्रेस कोर के आम चुनाव और सहमति से इंडियन एक्सप्रेस की नीरजा चौधरी को अध्यक्ष चुन लिया गया। जबकि फ्रंटलाइन की टी के राज्यलक्ष्मी आम सहमति से महा सचिव चुनी गई हैं । टाइम्स नाऊ की नविका कुमार नई कोषाध्यक्ष बनी और नवभारत टाइम्स की मंजरी चतुर्वेदी और साधना न्यूज की अरूणा सिंह को उपाध्यक्ष चुना गया। इन्हें भी चुनाव से पहले ही सहमति के आधार पर चुना गया जबकि आउटलुक की गीताश्री को हरा कर सोनल केलांग संयुक्त सचिव पद पर काबिज हो गयी। करीब चार सौ सदस्यों वाली संस्था इंडियन वूमन प्रेस कोर की कार्यसमिति के लिए शनिवार को चुनाव हुआ और इसमें 175 सदस्यों ने हिस्सा लिया।प्रबन्ध समिति के 21 सदस्यों के लिए 29 उम्मीदवार मैदान में थे । चुनाव के बाद पूरी टीम चुन ली गई । मैनेजिंग कमेटी में गार्गी परसाई ( हिन्दू ) , सुषमा रामचंद्रन ( फ्रीलांस ) , नीलम जीना ( आंध्र पभा ) , अन्नपूर्णा झा ( यूएनआई ) , अनीता कत्याल ( द ट्रिब्यून ) , ज्योति मल्होत्रा ( फ्रीलांस ) , इरा झा ( फ्रीलांस ) , कल्याणी शंकर ( फ्रीलांस ) , रितू सरीन ( इंडियन एक्सप्रेस ) , कुमकुम चड्ढा ( हिन्दुस्तान टाइम्स ) , शांता सरवजीत सिंह ( आर्ट क्रीटिक ) , रश्मि सहगल और नारायणी गणेशन ( टाइम्स आफ इंडिया ) , विमल इस्सर ( फ्रीलांस ) , रविन्द्र बावा ( आजतक ) , मनेका चोपडा ( फ्रीलांस ) , पारुल शर्मा ( जनसत्ता ) , करूणा मादान ( फ्रीलांस ) और सरोज नागी ( हिन्दुस्तान टाइम्स) को शामिल किया गया है।

अफसर के कुत्ते का मरना

अब आपसे विदा लेने का समय नजदीक आ रहा है। बस दो दिन की बात है। दो दिन हँसते हँसते निकल जायें तो बेहतर होगा। चलो थोड़ा हंस लेते हैं मेरे ओठों से तो हँसी गायब हो चुकी है, जब जाने का समय आ जाए तो बड़े बड़े हंसोकडे हँसाना हंसना भूल जाते हैं।एक बहुत बड़ा अफसर था। उसके पास जानदार शानदार कुत्ता था। अफसर का कुत्ता था तो उसकी चर्चा भी इलाके में थी। सब उसको नाम और सूरत से जानते भी थे। लो भाई एक दिन कुत्ता चल बसा। ओह! अफसर के यहाँ शोक प्रकट करने वालों की भीड़ लग गई। नामी गिरामी से लेकर आम आदमी तक आया। [आम आदमी तो तमाशा देखने आया.उसको अफसर के पास कौन जाने देता।] हर कोई कुत्ते की प्रशंसा करे। मीडिया भी पीछे नहीं रहा। ब्लैक बॉक्स में कुत्ते की फोटो लगा कर उसकी याद में कई लेख लिखे गए। अफसर के खास लोगों ने कुत्ते के बारे में संस्मरण प्रकाशित करवाए। शोक संदेश छपवाए। तीये की बैठक तक मीडिया से लेकर घर घर कुत्ते की ही चर्चा थी।अफसर कुत्ते की मौत का गम सह नही सका। उसकी भी मौत हो गई। अब नजारा अलग था। कोई माई का लाल शोक प्रकट करने नही पहुँचा। जरुरत भी क्या थी। जिसको सूरत दिखानी थी वही नही रहा।

Sunday, March 29, 2009

उर्दू एंकर के लिये ऑडिशन

उत्तर भारत की समाचार एंव प्रोडक्शन कम्पनी "सीएनएन" क्रियेटिव न्यूज़ नेटवर्क इन दिनों ई-टीवी के एक नये शो के लिये उर्दू एंकरों की तलाश कर रही है। इसी सिलसिले मे रविवार को दोपहर से शाम तक कम्पनी के आगरा कार्यालय मे ऑडिशन लिये गये। इस दौरान कई नये चेहरे अपनी किस्मत आजमाने के लिये सीएनएन ऑफिस पंहुचें। ऑडिशन के लिये प्रख्यात टीवी एंकर नन्दनी सिंह, उर्दू पत्रकार डा.एस.आई.ज़ाफरी के अलावा कम्पनी के निदेशक एस.आई.एच. ज़ैदी पैनल मे शामिल थे। गौरतलब है कि सीएनएन ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड़ मे कई समाचार पत्रों मे एंकर के लिये विज्ञापन दिया था। यदि आप भी उत्तर प्रदेश या उत्तराखण्ड़ मे रहते हैं और उर्दू एंकरिंग कर सकते हैं तो अपना बॉयोडाटा cnnnews@in.com पर मेल कर सकते हैं।

Saturday, March 28, 2009

वरुण गाँधी की टीआरपी

वरुण गाँधी की टीआरपी! है ना आश्चर्य की बात। जी बिल्कुल है। अभी तक तो न्यूज़ चैनल की टीआरपी सुनी थी। गत कई दिनों से वरुण गाँधी मीडिया की, खासकर टीवी न्यूज़ चैनल, सुर्खियाँ बने हुए थे। न्यूज़ चैनल में वरुण को अपनी ताई और देश की सबसे ताक़तवर महिला सोनिया गाँधी से भी अधिक समय मिला होगा। इस से अधिक उपलब्धि किसी युवा नेता के लिए और क्या हो सकती है। आज तो पूरा दिन वरुण गाँधी के नाम ही रहा। इतनी पब्लिसिटी तो कोई जानदार,शानदार स्पीच देकर भी नही मिलती। यह सिलसिला अभी कई दिन तक चलेगा। बाकी नेता माथे पर हाथ रखकर अपने आप को कोस रहें होंगे कि हाय मैंने ऐसा वैसा क्यों नहीं बोला। अब देखना चुनाव में नरेंद्र मोदी की तरह वरुण गाँधी की भी डिमांड बढ़ जायेगी। हर बीजेपी उम्मीदवार अपने यहाँ वरुण गाँधी को लाना चाहेगा। एक न्यूज़ चैनल का संवाददाता ख़बर में वरुण गाँधी को बीजेपी का प्यादा बता रहा था। कई बार प्यादा भी अपनी चाल से खेल का पासा पलट देता है। जब बात लडाई की हो तो हर वह इन्सान महत्वपूर्ण होता है जो उसमे सीधे सीधे भाग ले रहा होता है। किस के हाथ कब कोई दाव लग जाए क्या कहा जा सकता है। एक दाव भी सही पड़ गया तो समझो बन गई बात। चुनाव में पहला और आखिरी मकसद चुनाव जीतना होता है।वरुण गाँधी ने क्या कहा? उसको क्या कहना चाहिए था और क्या नहीं? इस बारे में हमने कुछ नहीं कहना। लेकिन इसमे कोई दो राय नहीं हो सकती कि वरुण गाँधी फिलहाल टीआरपी में अन्य तमाम लीडर्स से आगे हैं।

Friday, March 27, 2009

विश्व रंगमंच दिवस की शुभकामनाऐं

रंगकर्मी के सभी
सदस्यों
एंव
पाठकों को
विश्व रंगमंच दिवस
की हार्दिक शुभकामनाऐं।

पाक घुसपैठिये आतंकवादी थे

videoश्रीगंगानगर जिले से लगती भारत-पाक सीमा गत दिवस जो दो पाक घुसपैठिये बी एस एफ ने मारे थे वे आतंकवादी थे। बल के डीआईजी सी आर चौहान ने कहा दोनों ९९.९९% आतंकवादी ही थे। एक सप्ताह में बल ने दो पाक घुसपैठियों को मारा और एक को जिन्दा पकड़ लिया। अब सीमा सुरक्षा बल के बड़े अफसर मुश्किल में फंस गए हैं। उनसे यह पूछा जा रहा है कि घुसपैठियों को मारा क्यों,जिन्दा क्यों नहीं पकड़ा। बल के सूत्र बताते हैं बजाये पीठ थपथपाने के बहुत बड़े अफसर यहाँ के अफसरों से कई बार सवाल जवाब कर चुके हैं। श्री चौहान ने कहा कि पहले उनको चेतावनी दी गई, मगर वे रुके नहीं। उनके पास किसी प्रकार का कोई हथियार ना हो, इस आशंका के चलते बल के जवानों ने फायर किए। यहाँ यह सवाल है कि आख़िर उनको गिरफ्तार करके क्या होता! जेल में पड़े पड़े रोटियां तोड़ते,उनकी सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते,राजनीति होती अलग से। खैर राजनीति तो अब भी होने की बात सामने आई है। क्योंकि लोकसभा चुनाव में एक समुदाय के वोट पर कब्जा जो करना है। इसलिए अगर वो किसी कारण मारे जाते हैं तो धर्मनिरपेक्ष? पार्टियों को तो दुःख होता ही है। [ पोस्ट के साथ डीआईजी श्री चौहान का विडियो है। वह विडियो भी हमारे पास है जिसमे उन्होंने घुसपैठियों के आतंकवादी होने की बात कही है। इस विडियो में कुछ अलग बात है मगर महत्वपूर्ण। ]

Wednesday, March 25, 2009

इसे कहते है बरगलाना ...

बात उस समय की है जब मै हाई स्कूल में पढ़ रहा था । रेडियो पर सुना की आज नामीबिया दिवस है । समझ नही पाया । स्कूल में जब मैंने अपने भूगोल के टीचर से पूछा तो उन्होंने थोडी देर सोचा .... फ़िर बताया की नामीबिया का मतलब खुशी होता है ...यह दिवस विदेशों में खुशी को हासिल करने के निमित मनाया जाता है । मै संतुष्ट हो गया । करीब एक साल बाद मुझे पता चला की नामीबिया अफ्रीका का एक देश है और वह अपने स्थापना दिवस को नामीबिया दिवस के रूप में मनाता है । यह जानकर काफी हैरानी हुई..... अब सोचता हूँ ... एक न एक दिन तो पोल खुल ही जाती है सो बरगलाना छोड़ देना ही समझदारी है ... इज्जत का कबाडा तो अलग ही होता है । हम अपनी नजरों में ही गिर जाते है ।

Tuesday, March 24, 2009

जो हिंदू विरोधी बात करेगा....

चुनाव आयोग ने वरुण गान्धी को टिकट ना देने की सलाह देकर अपने आप को पता नहीं क्या साबित करना चाहता है। ना जाने कितने ऐसे "नेता" हैं जिन पर दर्जनों आपराधिक मुकदमें चल रहें हैं। उनके चाल चलन पर उंगुलियां उठतीं हैं। इसके बावजूद वे चुनाव लड़तें हैं,जीतकर विधायक,सांसद बन जाते हैं। चुनाव आयोग इनको टिकट दिलाने से क्यों नही रोकता। मीडिया में बार बार ऐसे "नेताओं" के बारे में बताया और दिखाया जाता है। चुनाव आयोग चुप्प। इसका तो सीधा सा यही मतलब है कि बस हिन्दुओं के पक्ष में बात करने वाला ही सबसे बड़ा देशद्रोही है। हिन्दुओं की वकालत करने वाला साम्प्रदायिक है। हिंदू हित की बात करने वाला विधायक या सांसद बनने के लायक नहीं। हिन्दुओं के बारे में सोचना भी गुनाह है। ऐसी क्या कमी है हिन्दुओं में? क्या जुल्म कर दिया हिन्दुओं ने? इंसान अपने भले की बात भी ना करे। यह कैसा वातावरण है? यह कोई किसी की चाल तो नहीं? मुस्लिम समाज की वकालत करने वाले नेता वन्दनीय और पूजनीय हो गए।हिंदू की बात करने वाला साम्प्रदायिक। कितनी हैरानी की बात है कि देश के कई कानून केवल हिन्दुओं पर ही लागू होतें हैं। कानून भी जाति,धर्म के अनुसार लागू किए जा रहें हैं। हिंदू-मुस्लिम भाई भाई हैं तो भेद-भाव क्यों? दोनों को सभी जगह समानता क्यों नहीं मिलती? अगर कोई इस बारे में बात करता है तो देश में बवाल क्यों मचाया जाता है। सही बात करने वाले की पीठ थपथपाई जानी चाहिए। यहाँ चुनाव आयोग सलाह देते हैं कि उसको टिकट ना दी जाए। चुनाव आयोग जी थोडी सलाह मुलायम सिंह यादव,लालू प्रसाद यादव,मायावती,राम बिलास पासवान,अमर सिंह जैसों को भी दे दो आपका क्या घट जाएगा। इस देश में तो अब नया नारा होना चाहिए-- जो हिंदू विरोधी बात करेगा, वही देश पर राज करेगा।

Monday, March 23, 2009

शहीदों को नमन करने का दिन

आज से ७८ साल पहले इसी दिन की शाम को अंग्रेजी हकुमत ने सरदार भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढा दिया था। सब ग़लत और दो नंबर के काम अंधेरे में होते हैं। यही किया अंग्रेजों ने २३ मार्च १९३१ की शाम ७-३० बजे। जनता के आक्रोश के डर से पुलिस ने उनके मृत शरीर उनके परिजनों को नहीं सौंपे। डरी सहमी सरकार ने आधी रात को सतलुज नदी के किनारे इन शहीदों के मृत शरीरों का दाह संस्कार किया। तब वहां यह ऐलान किया गया " जनता को सूचित किया जाता है कि भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव के मृत शरीरों को,जिन्हें कल शाम[२३ मार्च] फांसी दे दी गई थी,जेल से सतलुज के किनारे ले जाया गया है, जहाँ सिख और हिंदू धर्मविधि के अनुसार उनका दाहसंस्कार कर दिया गया। उनके अवशेसनदी में प्रवाहित कर दिए गए।" आज इनके शहीद दिवस पर इनको याद करके हम इनपर कोई अहसान नहीं कर रहे। यह हमारा धर्म भी है और कर्तव्य भी। क्योंकि यही वे लोग थे जिन्होंने बिना किसी निजी स्वार्थ के देश के लिए काम किया। आज अपने बच्चों को यह बताने का दिन है कि ये महान युवक कौन थे और हमारे लिए आदरणीय किस कारण हैं। हम मन,कर्म और वचन से उनको श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

Sunday, March 22, 2009

बॉर्डर पर दो पाक युवक बीएसफ ने मर गिराए

श्रीगंगानगर जिले की भारत पाक सीमा पर बीएसफ ने २ पाकिस्तानी युवकों को मार गिराया। ये दोनों दिन में भारत की सीमा में घुसने का प्रयास कर रहे थे। इनके पास से अलग अलग कंपनी के पाँच मोबाइल फ़ोन के सिम कार्ड और पाकिस्तानी मुद्रा बरामद हुई है। इनकी उम्र २१ से २५ साल के बीच है। इस घटना के बाद बीएसफ ने पाक रेंजर्स के साथ फ्लैग मीटिंग की। रेंजर्स ने इन युवकों के शव लेने से इंकार कर दिया। दिन दिहाड़े इस प्रकार से पाकिस्तानी युवकों की भारत में घुसने की इस कोशिश ने खुफिया एजेंसियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं मारे गए युवकों का सम्बन्ध किसी आतंकवादी संगठन से तो नहीं है।

Saturday, March 21, 2009

है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है ....

है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है ..... यह कथन मुझे रात में याद आ रहा था । रात में बिजली चली गई थी , कुछ पढ़ने का मन भी कर रहा था पर आलस की वजह से बाहर जाकर मोमबती लाने में कतरा रहा था । तभी दिमाग में यह बिचार आया और भाग कर मोमबती लेने चला गया । बिजली काफी देर तक नही आई .... इसी बिच मैंने कुछ पढ़ लिया ।

यह एक छोटी सी घटना है । पर इसका अर्थ काफी बड़ा है । जीवन में कई ऐसे मौके आते है जब हम अँधेरी रात का बहाना बना काम को छोड़ देते है । माना की समाज के सामने चुनौतिया ज्यादा है और समाधान कम । तो क्या हुआ ? यह कोई नई बात तो है नही .... हमेशा से ऐसा ही होता रहा है । आम आदमी की चिंता करने वाले काफी कम लोग है । गरीबों के आंसू पोछने वाले ज्यादातर नकली है ... तो क्या हुआ , आपको कौन मना कर रहा है की आप असली हमदर्द न बने । मै समझता हूँ की यह ख़ुद को धोखा देने वाली बात हुई । एक चिंगारी तो जलाई ही जा सकती है .... इसके लिए किसी का मुंह देखने की जरुरत नही है । परिस्थितिओं का रोना रो रो कर तो हम बरबाद हो चुके है । अब और नही ..... यह शब्द दिल से जुबान पर आना ही चाहिए ।

सोचता हूँ , अँधेरी रात का बहाना हम अपनी कमियों को छिपाने के लिए बनाते है .... औरो का तो नही पता पर मै इस काम में माहिर हूँ । ये बड़ी शर्म की बात है .... जीवन को अर्थहीन बनाने में इसका बड़ा योगदान रहा है । पर अब एक मकसद मिल गया है ..... दीपक तो जलाना ही पड़ेगा ।

इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है

हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है .......

यह सही है की घुटनों तक कीचड़ सना है .... भ्रष्टाचार का बोलबाला है । पर किसी न किसी को तो कीचड़ साफ़ करना ही पड़ेगा और वह हम ही क्यों न हो .... किसी ने रोका तो नही है न ....

कांग्रेस बीजेपी करे तालमेल

हिंदुस्तान में जब से छोटे छोटे दलों के हाथ में सत्ता में मोल तोल करने की जुगत आई है तब से देश पीछे हो गया । सरकार चलने वाला दल इन प्राइवेट कम्पनी की भांति चलने वाले दलों के दल दल में फंस जाता है। वह देश हित की बजाय सरकार बचाने के जुगाड़ में लगा रहता है। हर दल को समर्थन के बदले में कुछ ना कुछ नही बहुत कुछ चाहिए। ऐसा १९८९ से चल रहा है। पहले यह कम था अब ज्यादा। अगर यही हाल रहा तो देश की कीमत पर समर्थन का सिलसिला चलता रहेगा। मगर थोड़ा सा परिवर्तन हो तो कुछ बेहतर हो सकता है। बस इसके लिए बीजेपी-कांग्रेस को तैयार होना होगा। करना कुछ भी नहीं। अब लोकसभा चुनाव में इन दोनों में से जो सबसे अधिक सीट ले वह सरकार बनाये और दूसरी पार्टी उसको समर्थन दे। कांग्रेस को सीट अधिक मिले तो वह सरकार बनाये और बीजेपी उसको पाँच साल तक बाहर से समर्थन दे। बीजेपी को अधिक सीट मिले तो सरकार बीजेपी की कांग्रेस के समर्थन से पाँच साल चले. इस प्रयोग से छोटे छोटे दलों को बारगेनिंग करने का मौका नहीं मिलेगा। बेशक यह अटपटा सा है, किंतु प्रयोग करके देखने में हर्ज ही क्या है। इस से रोज की किच किच तो नही हुआ करेगी। वरना तो ये प्राइवेट कम्पनियाँ समर्थन के बदले इतना कुछ मांगने लगेंगी कि जिसको चुकाना देश के लिए भी सम्भव नहीं होगा। वैज्ञानिकों ने भी कई प्रयोग किए तब कहीं जाकर कोई एक प्रयोग सफल होकर आविष्कार के रूप में सामने आया। जो प्रयोग यहाँ बताया गया है उस से किसी का कोई नुकसान तो है ही नहीं। बस अपना अपना अहम् त्यागना होगा।

Thursday, March 19, 2009

चित्त भी मेरी पट्ट भी, सिक्का मेरे बाप का

बिहार में लालू प्रसाद यादव ने अपने कट्टर राजनीतिक 'दुश्मन" रामबिलास पासवान से एका कर लिया है। ऐसे में सारी खुदाई एक तरफ़ और जोरू का भाई एक तरफ़ हो गया। परिणाम यह हुआ कि जोरू का भाई साधू यादव नाराज हो गया। उसने कांग्रेस की ओर झाँका,कांग्रेस ने उसकी ओर। दोनों ने एक दूसरे की ओर झांक लिया , इसलिए देर सवेर इनको एकम एक हो ही जाना है। अब इस से इनमे से किसी को भी राजनीतिक रूप से नुकसान होने वाला नहीं। पासवान तो हर सरकार में एडजस्ट हो जाते है, शायद यही कारण है कि लालू ने उनको गले लगा लिया साधू यादव अलग पार्टी में हो जायेंगें। तब सरकार किसी भी पार्टी की हो हमारी ही होगी।होना भी यही चाहिए। भगवान परिवार में कई मेंबर दे तो सब को अलग अलग पार्टी में एडजस्ट करवा देना चाहिए। सरकार अपने घर में ही रहेगी। सोनिया गाँधी-मेनका गाँधी को आदर्श के रूप में अपनाया जा सकता है। सिंधिया परिवार का उदाहरण दिया जा सकता है। चौटाला परिवार को देख आगे बढ़ सकते हो। नए लोग प्रिया दत्त-संजय दत्त से प्रेरणा ले सकते हैं। ऐसे प्रेरणादायी व्यक्तित्व पंचायत स्तर से लेकर सरकार तक होते हैं। संस्कार,विचार,जमीर,आत्मा,आस्था जैसे शब्द गरीब और कुचले हुए लोगों के लिए हैं। बड़े लोग इनको इस्तेमाल नही करते । वे तो हमेशा यही कहते हैं कि चित्त भी मेरी,पट्ट भी और सिक्का मेरे बाप का।

Wednesday, March 18, 2009

हम आजाद हुए थे आधी रात को और सबेरा अभी तक नही हुआ ...

हम आजाद हुए थे आधी रात को और सबेरा अभी तक नही हुआ ...... सोचिए किसका दोष है ? हमारा , जी एकदम सही कहा ..... दूसरों पर जिम्मेदारी डालना हमारी नियति बन गई है । माना की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी सरकार की और हमारे नेताओं की बनती है , लेकिन वो पैदा कहाँ से होते है .... हमें सब पता होता है ....पर हम समझना नही चाहते .... कोई बात नही , मत समझिये ..... आगे सबेरा होगा भी नही ।

परिपक्व कौन? पाकिस्तानी या हिन्दुस्तानी

आशंकाओं के बिल्कुल उलट पाकिस्तान में सब कुछ ऐसे शांत हो गया जैसे कहीं कुछ अशांत था ही नहीं। मीडिया पाक में पता नहीं क्या क्या होने की आशंका,संभावना जाता रहा था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वहां के सैनिक अफसर,राजनेता,सरकार कैसी है इस बारे में कोई बात नहीं करेंगे। बात उस जनता की जिसको लोकतंत्र में रहने की आदत नही इसके बावजूद उसने परिपक्वता का परिचय दिया। इतना लंबा मार्च,हजारों हजार जनता,सब के सब अनुशासित। सरकार के खिलाफ आक्रोश परन्तु सरकारी सम्पति को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचाया। मीडिया में एक भी ख़बर ऐसी नहीं थी जिसमे ये बताया गया हो कि जनता ने फलां स्थान पर सम्पति को नुकसान पहुँचाया। इसको परिपक्वता नहीं तो और क्या कहेंगें।इसके विपरीत हिंदुस्तान में अगर ऐसा होता तो सबसे पहले सरकारी सम्पति की ऐसी की तैसी होती। सबसे बड़े लोकतंत्र वाहक रेल पटरियां उखाड़ देते, सरकारी भवन,सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया होता। जो उनके रास्ते में आता तहस नहस हो जाता। हिंदुस्तान में इस प्रकार से न जाने कितनी बार हो चुका है। हमारी तो फितरत है, " हारेंगें तो मारेंगें,जीतेंगें तो लूटेंगें"। पाकिस्तानियों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।लोकतंत्र की डींग मारने वाले हिन्दुस्तानी अपने पड़ौसी से कुछ तो सीख ही सकते हैं। पाकिस्तान की जनता को सलाम करने में मेरे ख्याल से कोई बुराई नहीं है। चाहे पाकिस्तान में यह सब कुछ दिनों के लिए ही हो , किंतु जब अच्छा हुआ तब तो उसकी प्रशंसा कर ही देनी चाहिए।

Tuesday, March 17, 2009

सबकुछ याद है

मुझे अपने घर का आँगन सामने की गली याद आती है , जहाँ कभी , किसी जमाने में मेले लगते थेवो खिलौने याद आते है ,जो कभी बिका करते थेछोटा सा घर , पर बहुत खुबसूरत , शाम का समय और छत पर टहलना , सबकुछ याद हैकुछ मिटटी और कुछ ईंट की वो इमारत , वो रास्ते जिनपर कभी दौडा करते थे , सबकुछ याद हैगंवई गाँव के लोग कितने भले लगते थे , सीधा सपाट जीवन , कही मिलावट नही , दूर - दूर तक खेत , जिनमे गाय -भैसों को चराना , वो गोबर की गंध भैसों को चारा डालना , सबकुछ याद हैगाय की दही सही , मट्ठे से ही काम चलाना , मटर की छीमी को गोहरे की आग में पकाना , सबकुछ याद हैवो सुबह सबेरे का अंदाज , गायों का रम्भाना , भागते हुए नहर पर जाना और पूरब में लालिमा छाना , सबकुछ याद हैबैलों की खनकती हुई घंटियाँ , दूर - दूर तक फैली हरियाली , वो पीपल का पेड़ और छुपकर जामुन पर चढ़ जाना , सबकुछ याद हैपाठशाला में किताबें खोलना और छुपकर भाग जाना , दोस्तों के साथ बागीचों में दिन बिताना , सबकुछ याद हैनानी से कहानी की जिद करना ,मामा से डांट खाना , नाना का खूब समझाना , मीठे की भेली को चुराना और चुपके से निकल जाना सबकुछ याद हैअब लगता है , उन रास्तों से हटा कर कोई मुझे फेंक रहा हैवो दिन आज जब याद याते है तो मन को बेचैन कर देते है ...... अब कुछ यादें धुंधली होती जा रही हैफ़िर भी बहुत कुछ याद है

Sunday, March 15, 2009

.....अभी बाकी है

जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है , आपके इरादों का इम्तिहान अभी बाकी है , अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीं , आगे अभी सारा आसमान बाकी है ......

Saturday, March 14, 2009

फैसला जान के रहिये ।

अब इस बेरुखी को क्या कहिये वो हैं क्यूं चुप, जरा पता करिये हमनें अब किया है ऐसा क्या खफा खफा से आप क्यूं रहिये । हम न समझे न कुछ उन्होने कहा ऐसे हालात हैं कि क्या करिये गलतफहमी का शिकार है दोनों चुप की दीवार तोड के रहिये । बिना गलती के सजा क्यूं काटें जो भी है खुल के बात तो करिये पार इस रहें या हों उस पार फैसला आज जान के रहिये

Friday, March 13, 2009

ये जख्म गहरा है..

ये जख्म गहरा है कोई मरहम दे दे । मेरी प्यास है बड़ी कोई सागर दे दे । तिल तिल कर मर रहा कोई एक उमर दे दे । अँधेरा गहरा रहा कोई चाँद की नजर दे दे । ये जख्म गहरा है कोई मरहम दे दे ।

Wednesday, March 11, 2009

आप सभी को होली की शुभकामनाऐं

रंगकर्मी के सभी सदस्यों और पाठकों को होली की ढेरों शुभकामनाऐं। आईये इस होली पर हम सब हिन्दुस्तानी मिलकर भाईचारे और सौहार्द का एक ऐसा रंग तैयार करें जो आतंकवाद रुपी दाग़ पर इस तरह से चढे कि वो दाग हमारे देश की सरज़मी से हमेशा के लिये मिट जाये। एक बार फिर कलम के सभी सिपाहियों को होली की मुबारकबाद... आपका.. परेवज़ सागर संपादक, रंगकर्मी

Tuesday, March 10, 2009

होली के अलग रंग .....

होली एक रंगीन त्यौहार है .... हर गम को खा जानेवाला । खुशियाँ बरसाने वाला । फुल खिलाने वाला । मुस्कान लाने वाला । सपने दिखाने वाला । साल भर इन्तजार कराने वाला । आजादी और जिन्दादिली का प्रतिक ।बचपन से मुझे होली का पर्व काफी पसंद है .... पर वो हरकते नही जो कुछ लोग करते है । शराब पीकर ऐसे इतराते है जैसे किसी पर बहुत बड़ा एहशान कर दिया हो । सच दारू ने तो होली का मजा ही ख़राब कर दिया है । ये भी सच है की सबकी अपनी जिंदगी है ,वो चाहे जैसे करे पर इसका मतलब यह तो कतई नही है की वो दूसरों का नुकशान कर सकते है । होली के दिन मुझे बाहर निकलने में डर लगता है और इसलिए नही की रंगों से नफ़रत है बल्कि बाहर पीकर चलते हुए लोगों से डर लगता है । वे उस हालत में कुछ भी कर सकते है .....बड़ा डर लगता है ।मेरी होली साफ़ सुथरी होती है । कोई जबरदस्ती नही ..... प्यार का पर्व है भाई , जबरदस्ती का नही ।गम को भुलाने का त्यौहार है न की दारु पीकर लुढ़क जाने का और गाली बकने का । ऐसी होली ..... तो होली है ही नही ,तमाशा है ।इतना सुंदर त्यौहार है .... सुन्दरता गायब नही होनी चाहिए वरन कोई मतलब ही नही रह जायेगा । कुछ लोग इसके मूल उद्देश्य से वाकिफ नही है , उन्हें यह एहसाश कराना ही होगा । हम अपनी विरासत को यूँ ही बरबाद होते नही देख सकते ......

होली मुबारक

होली मुबारक

चलते चलते यह फ़न भी सिख लिया (Ghazal) रंग अल्हड़ लेकर आयो रे फिर से फाग

Monday, March 9, 2009

वो बचपन कहाँ गया ....

जब स्कूल में था, तो ये दुनिया बड़ी अजीब लगती थी . सबकुछ बड़ा ही अजीब लगता था . बाल मन में कई अजीब सवाल उठते थे ....उन सवालों के जबाब कोई देने वाला नही था । आज जब कई लोग उनका जबाब दे सकते है तो सवाल ही नही उठते । वो बचपन कहाँ गया ....वो इक्षाशक्ति और जानने की लालशा कहाँ गई ....भाई मै तो बड़ा ही परेशान हूँ । कहतें है अतीत को याद नही करना चाहिए लेकिन मै अपनी बचपन की यादों को कैसे छोड़ दूँ ? वो मस्त जीवन , वो मीठी यादें .....नही भूल सकता । गाँव की गलियों में घूमना । कोई चिंता फिकर नही .... डांट खाना और फ़िर वही करना ,आगा पीछे सोचने की कोई कोशिश नही । घर से ज्यादा दोस्तों की चिंता ....कौन क्या कर रहा है .....इसकी ख़बर रखना । आज कई यादें धुंधली हो गई है ....कुछ तो लुप्त हो गई है ....हाय रे मेमोरी । याद करने की कोशिश बेकार हो जाती । वो बचपन छोटा सफर था लेकिन अकेला सफर तो कतई नही था । आज तो मन भीड़ में भी अकेला है .... ये दर्द बयां नही कर सकता । केवल महशुश कर सकता हूँ ।
ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए, दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए, ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए, मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए, कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ, दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए, उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें, और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए, मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए, बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए, उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे, इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए, अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है, मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए, यूँ तो 'मित्र' का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ, पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए..........

Saturday, March 7, 2009

कब है होली !

मैंने देखा एक सिनेमा देखने लायक ; जिसमें था एक कमीना , कहते जिसको खलनायक हरदम दम करता एक सवाल ; कब है होली ,कब है होली ! खून का रंग बहेगा उस दिन ; बंदूकों से चलेगी गोली एक था ठाकुर बलदेव सिंह ; जिसके हाथ गब्बर ने काटे थे , जिसके बगिया में कांटे ही कांटे थे , शोले के बनने के ३३ साल बाद भी; जीवंत है प्रश्न आज भी ; कब है होली ,कब है होली ! होली नाम है सारे दुर्गुण मिटाने का ; जग में भक्ति भाव बढ़ाने का ; सब कुछ भुला कर सबको गले लगाने का ! क्या आपने देखी है ऐसी होली ; भूख की किलकारी की जगह पिचकारी ; बंदूख की जगह भंग की गोली ; सब के दिल मिलें ,मीठी हो बोली ; हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख ,इसाई सब मिल खेलें जग में होली; कहत विनय बोल मेरे बन्धु ; कब कब है होली , कब कब है होली !! ~विनयतोष मिश्र

Friday, March 6, 2009

खामोश नजरें....

वो खामोश नजरें अपलक निहारती जीवन के तरंग मन में उमंग उमड़ पड़ती नजरों का दोष नही कुछ और है हालात ऐसे सहम जाता आखें भी कराहती
खामोश नजरें अपलक निहारती कभी सुखी ,कभी भींगी वो आँखें किसी की याद दिलाती मै अनजान राही देखता रहा कुछ न समझा वो आँखे पास बुलाती खामोश नजरें अपलक निहारती आस पास एकदम शांत कुछ न पता दिन या रात आँखें भर आई मोती की कुछ बूंदें धरती पर टपक आई वो खामोश नजरें अपलक निहारती

Thursday, March 5, 2009

सोचता हूँ .......

सोचता हूँ , हल चलाता हुआ मंगरू मुझसे अच्छा है । उसे अपने काम का पता तो है न । वह मन से कर भी रहा है । मुझे तो बहुत कुछ पता ही नही और कुछ - कुछ पता है भी तो काम नही करता । मन से तो बिल्कुल ही नही । अवसर की आहट कई बार सुन कर भी अनसुना कर चुका हूँ , जिसका खामियाजा आजतक भुगत रहा हूँ । लगता है , कोई भी मंडप मेरे लिए नही सजेगा । मेरा कभी भी अभिषेक नही होगा । मै अकेला ही रह जाऊँगा । रातों में चाँदनी नसीब नही होगी । कोई राह नही कोई , कोई मंजील नही दिखती , गोल गोल घूम रहा हूँ । लगता है , आगे बढ़ रहा हूँ । क्या करू ,निर्दोष हिरणों को मारकर सेज नही सजा सकता , सो दुनिया से दो कदम पीछे रह गया । बछडे का हक़ मारकर पंचामृत नही बना सकता , सो प्यासा रह गया । चंदन तरु काटकर तिलक नही लगा सकता , सो आगे नही जा पाया ।

Bahut Khubsurat ho tum

बहूत खूबसूरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम ! कभी मैं जो कह दूं मोहब्बत है तुम से ! तो मुझको खुदारा गलत मत समझना ! के मेरी जरुरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम ! है फ़ुलों की डाली, ये बाहें तुम्हारी ! है खामोश जादू निगाहें तुम्हारी ! जो काटें हों सब अपने दामन में भर लूं ! सजाउं मैं इनसे राहें तुम्हारी ! नज़र से जमाने की खुद को बचाना ! किसी और से देखो दिल न लगाना ! के मेरी अमानत हो तुम ! बहुत खूबसूरत हो तुम ! है चेहरा तुम्हारा के दिन है सुनेहरा ! और उस पर ये काली घटाओं का पेहरा ! गुलाबों से नाजु़क मेहकता बदन है ! ये लब है तुम्हारा के खिलता चमन है ! बिखेरो जो जु़ल्फ़ें तो शरमाये बादल ! ये ताहिर भी देखे तो हो जाये पागल ! वो पाकीजा़ मुरत हो तुम ! बहुत खूबसूरत हो तुम ! मोहब्बत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम ! जो बन के कली मुस्कूराती है अक्सर ! शबे हिज्र मैं जो रुलाती है अक्सर ! जो लम्हों ही लम्हों मे दुनिया बदल दे ! जो शायर को दे जाये पेहलु ग़ज़ल की ! छुपाना जो चाहे छुपाई न जाये ! भुलाना जो चाहे भुलाई न जाये ! वो पेहली मोहब्बत हो तुम ! बहुत खूबसूरत हो तुम Rittwick Visen

Wednesday, March 4, 2009

स्लमडॉग मिलेनियर का असर

एक लम्हा....

एक लम्हा गुजर गया तेरी यादों में कही खो गया ये क्या ? तेरी कदमों की

आहट सुन वह डर गया

तेरे कुचे से निकल एक मुसाफिर किधर गया एक लम्हा गुजर गया

धुप में जलता बदन जरा सी छाँव को तलाशता मन पसीने से लथपथ दर - दर भटक कर

तुझे घर घर तलाशकर

एक मुसाफिर भटक गया एक लम्हा गुजर गया

तुम जो कहो.......

तुम जो कहो उसे प्रकाशित कर दूँ अपने सर्वस्व को तुम पर न्योछावर कर दूँ अपनी समस्त ऊर्जा को विश्रित कर दूँ तुम जो कहो अपने स्पर्श से तुझे उष्मित कर दूँ तेरे दर्द को ओढ़कर ख़ुद को धन्य कर दूँ तुम जो कहो तुझ पर जीवन अर्पण कर दूँ तेरे चेहरे का गुलाल और लाल कर दूँ दमकते सूरज को निहाल कर दूँ तुम जो कहो दिन हो या रात धुप हो या छांव तेरे कदमों में सर रख दूँ तुम जो कहो

सुरक्षा अस्त्र

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