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Saturday, December 1, 2007

वाह ठकुराईन, क्या खूब लिखती हो......

जबसे तुलिका के लेख रंगकर्मी पर पढें है तभी से मन था कि कुछ लिख दूँ। लेकिन वक्त नही मिल पा रहा था। आज जब उनकी कविता तुलसी जी.............. पढी तो मन गदगद हो गया। मन मे त्रेता युग, द्वापर और कलियुग के अन्तर स्मरण हो आया। अगर तुलसी जी तुलिका की रचना पढ लें तो वो भी अपने राम का हाल देखकर व्याकुल हो जायेगें। तुलिका और हम साथ काम करते है। उनकी आर्ट्स और कॉस्टयूम की लिस्ट तो पढता रहता हुँ। लेकिन उनकी इस तरह की रचना पढने का मौका पहली बार मिला। Keep it up.................... सदा यूँ ही लिखती रहो। संजय बैनर्जी

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