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Monday, December 31, 2007

नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं .....

मैं अपने पत्रकार बन्धुओं को नए साल के आगमन पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ । २००७ विदा हुआ ,कामना है नया साल आप सभी के लिए अमन , चैन , खुशियों से भरा हो । गुजरे पन्ने को पलट कर देख लें ... उनसे कुछ सिख लें....... ईश्वर आपके साथ है । सत्येन्द्र यादव

वर्ष 2008 की शुभकामनायें


सभी पत्रकार भाईयो एवं रंगकर्मी के समस्‍त सदस्यों , परवेंज भाई को सपरिवार को आंग्ल नव वर्ष 2008 की प्रथम सुबह पर हजारों हजार शुभकामनायें

शशिकान्‍त अवस्‍थी
कानपुर ।

नया साल, नयी उम्मीदें... शुभकामनाएं

साथियों, साल 2007 मे ही रंगकर्मी की शुरुआत हुई। और खुशी की बात है कि हमारे इस परिवार मे हर रोज़ कई नये लोग जुड़ रहे हैं। हमें हर दिन रंगकर्मी की सदस्यता के इच्छुक लोगों की मेल्स आ रही हैं। रंगकर्मी के प्रति लोगों मे बढता क्रेज़ आप सभी साथियों की बदौलत है। देश ही नही विदेशों मे रह रहे हिन्दी भाषी लोग भी हमारे साथ जुड़ रहे हैं। कई साथियों ने बड़े ही शानदार तरीके से अपनी आमद दर्ज कराई है जिनका अन्दाज़ सभी को पसन्द आया। मुझे उम्मीद ही नही पूरा विश्वास है कि साल 2008 रंगकर्मी के लिये खास होगा। और हमारे सभी साथी अपनी लेखनी के ज़रीये रंगकर्मी के इस सफर को आगे बढाते रहेगें। मेरा निवेदन है उन लोगों से जो रंगकर्मी के सदस्य बनना चाहतें हैं कि वो हमें मेल करते समय अपने परिचय के साथ-साथ अपना पता और फोन नम्बर भी ज़रुर लिखें।
आप सभी साथियों के अभिवादन के साथ........... नये साल 2008 की हार्दिक शुभकामनाऐं। ईश्वर से प्रार्थना है कि नया साल आप
सभी के लिये ढेरों सफलताऐं और खुशियां लेकर आये........



आपका..........


परवेज़ सागर
www.rangkarmi.blogspot.com
www.parvezsagar.blogspot.com

Sunday, December 30, 2007

नव वर्ष की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाऐं.

मित्रों एक और नया वर्ष, एक और नय़ा साल संघर्षों का, एक और नय़ा साल उम्मीदों का, एक और नय़ा साल नई सोच बनाने का। इस नये साल में आगाज़ है,क्रांति का आगाज़ है,स्वाभिमान का आगाज़ है,चेतना का आगाज़ है,विश्वास का आगाज़ है,सत्य का आगाज़ है,अनवरत संघर्ष का आगाज़ है उस इंकलाब का, जो ऐसे भारत का नव निर्माण करेगा जिसमें योग्यता पैमाना होगी, संवेदनाओं भावनाओं का निस्वार्थ समर्पण होगा, राष्ट्र के जातिहीन,अधर्म ऱहित, विकास के लिए । और क्रांति की, बागडोर होगी, नवयुग के नव निर्माता, जातिहीन,स्वार्थ हीन द्वेष ऱहित, छात्रों के हाथ और नारा होगा इंकलाब । इस आगाज़ के साथ एक नये समाज की कल्पना संजोते हुए, अपनी एक और गज़ल को, अपने आदर्श दुष्यंत कुमार जी त्यागी को, आज उनकी पुण्यतिथि पर समर्पित करते हुए आप सभी को एक बार फिर से नव वर्ष की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाऐं । भाई मैं चाहता हूं आदमी कुछ इस कदर बदले, दर्द हो मंदिर में आंसू मस्जिद से निकले । बहुत कह चुके,अब बंद भी करो,हम एक दूसरे के बारे में, अब जब भी निकले मुँह से हमारे प्रेम के बोल निकलें । पहले कभी वो तेरी ईद,अपनी दिवाली की तरह मनाता था, कुछ कर ऐसा,उसकी हर दिवाली तेरी बारावफात सी निकले । उसकी हर आह पे तुझे भी होता था दर्द कभी, ला ऐसा वक्त उसकी गोदी में तेरा दम निकले । इतजा़र में हूँ उस वक्त के जब प्रेम और अमन की हवा बहेगी, तेरा और मेरा खुदा एक है हर तरफ यही आवाज़ निकले । बहुत खून की नदियाँ बहा ली,एक दूसरे की,अब दुआ करो, तेरे मुहब्बत के काबा से मेरे प्रेम की गंगा निकले । हमारे बीच कभी कितना प्रेम हुआ करता था,करें हम नई कोशिश, ये नया साल हमारी दोस्ती की नयी मिसाल बनकर निकले । आपका अनुराग अमिताभ

बड़ी मुश्किल से जीवन में मिलते है सच्चे दोस्त

सच है कि जिसके जीवन में कोई सच्चा मित्र नहीं वह बदकिस्मत हैं।यों तो हर व्यकित को अपने जीवन की लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती हैं। मगर कोई सच्चा दोस्त साथ हो तो कोई भी संघर्ष आसान हो जाता हैं । अकेले होने का अहसास नहीं खटकता न ही निराशा घेरती हैं। हालिया सर्वे में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया हैं कि जिनके दोस्त नहीं होते वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। यहॉ तक कि ऐसे लोग हृदय संबंधी बीमारीयों की चपेट में आकर हर साल मौत के मुँह में चले जाते हैं। मनोंवैज्ञानिकों का भी मानना है कि जीवन में एक दोस्त का होना ज़रूरी है। परिवार, पत्नी और बच्चे होने के बावजूद एक ऐसा दोस्त का होना अपने दुख-सुख कह सके। कोई पीड़ा सता रही हो उसे अपने दोस्त से कहकर मन का बोझ को हल्का किया जा सकता हैं। वैसे भी सच्चे मित्र की पहचान संकट के समय ही होती हैं ।तुलसीदास ने ठीक कहा है कि-आपत काल परखिए चारि, धर्म धीरज, मित्र अरि नारि । शेष अगले अंक में रजनीश अग्रवाल

Ek hindustani

Saturday, December 30, 2007 Ek Hindustani Is kudrat ke zarre-zarre me kuch aisa chhipa hota hai jo kabhi-kabhi humare liye akalpaniya hota hai,Insaan bhi unme se ek hai jisme atulniya pratibha samahit hai.Nishchit hi lekhan usme se ek hai.....Shabd aapko apna shagird bhi bana sakte hain to jung bhi kara sakne me mahir hote hain.maine bhi aaj se ek rangkarmi hone ke naate shabdo ke jaal se kuch nayaab shado ko chunkar ek ladi bunne ki koshish ki hai aur koshish karungi ki is ladi ki dor ko itna mazbut bana du ki har hindustani usme apni pratichhaya ko mehsus kar sake kyuki insaan ki ye indriya hi sabse mazboot hai ki wo ek- dusre ke bhawo ka sparsh tezi se karta hai.Ek hindustani hone ke nate ,Ek samvedansheel insaan hone ke nate,mujhe vishwas hai ki in shabdo me aap khud ko talashne ki koshish zarur karengeRangkarmi ki amulya nidhi.......... SMRITI DUBEY,

Saturday, December 29, 2007

शायर की बीवी

दोस्तों, चाहते हुए भी पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग पर लिख नहीं पाया। हां, आपके पोस्ट्स को पढ़ता ज़रूर रहा हूं। कल मैंने जाने-माने शायर आदिल लखनवी साहब की एक रचना पढ़ी। मुझे लगा आपको भी पढ़ना चाहिए। व्यंग्य को ज़रिए संजीदा मसलों को उजागर करने में आदिल लखनवी साहब का कोई सानी नहीं। आप भी देखिए एक शायर की बीवी की व्यथा ---- शायर की बीवी बहन मैं सोचती हूं ज़िंदगी वो कितनी अच्छी थी जब अपनी उम्र की हांडी न पक्की थी न कच्ची थी न हाय हत्या कुछ थी न कोई छी छी थी मोहल्ले में जिधर जी चाहता था आती जाती थी जवानी ने मगर आते ही ऐसा राग फैलाया के मुझको देख कर ठिठका कोई और कोई बौलाया किसी के लब पे आया मेरा नाम आहिस्ता आहिस्ता कोई करने लगा मुझको सलाम आहिस्ता आहिस्ता कोई कहता था मेरी चाल को परियों का फेरा है कोई कहता था मेरी ज़ुल्फ़ का बादल घनेरा है किसी के लब पे आहें थीं किसी के लब पे नाले थे के मेरे चाहने वाले बहुत से गोरे काले थे मेरे ये सारे आशिक़ कितने बांके और सजीले थे सफ़ेद और सुर्ख़ थे उनमें कुछ उनमें नीले पीले थे बड़े बूढ़े मगर जिस वक्त मुझको देख लेते थे बड़ी संजीदगी से अपनी आंखें सेंक लेते थे मेरे मां बाप ने मेरे लिये जब ग़ौर फ़रमाया ख़ुदा की मार हो उनको मुआ शायर पसंद आया घटाओं पर मेरे बालों के बस मरता है ये शायर कभी एक बाल्टी पानी नहीं भरता है ये शायर शफ़क़ कहता है बालों को जो लब को फूल कहता है वो घूरे के किनारे फ़ूंस के छप्पर में रहता है लंगोटी बांधता है जो ग़रारा क्या पहनाएगा लंगोटी भी कभी ठर्रे की ख़ातिर बेच आएगा निरा शायर है बहना बेअमल है और निकम्मा है मेरी गोदी नहीं भरती है ये भी एक मोअम्मा है हज़ारों बार टोका लाख समझाया नहीं माना अरे हद है संखिया खाने से धमकाया नहीं माना कभी जब सोचती हूं तो तबीयत ऊब जाती है के अब मेरी समझ में बस यही एक बात आती है कहां तक साथ आख़िर इस निखट्टू का निभाउंगी किसी दिन छोटे देवर को मैं ले के भाग जाउंगी शफ़क़- रात , मोअम्मा - रहस्य, संखिया - ज़हर

आँखे बन्द कर लेने से नज़ारे नही बदलते...

अनुराग ने रंगकर्मी पर अपनी पोस्ट "जंग लगी जम्हूरियत" ड़ालने के बाद मुझसे ऑन लाइन पूछा सर मेरे आक्रोश पर आपने कुछ लिखा नही। मैने अनुराग से कहा ये तुम्हारा आक्रोश नही भाई ये तो वो हकीकत है। जो सबके सामने है लेकिन अफसोस कि उसे कोई देखना नही चाहता। अनुराग ने अपनी रचना के ज़रीये एक ऐसी सच्चाई को शब्दों मे ढाल दिया जिससे हम सभी हरदम जो-चार होते है। जम्हूरियत का मतलब सिर्फ कहने या लिखने से ही नही बल्कि सामाजिकतौर दिखाई देना चाहिये। लेकिन हकीकत मे ऐसा नही है। अगर सपनों की दुनिया से बाहर आकर देखें तो अनुराग की रचना हकीकत की शक्ल मे आपके सामने खड़ी नज़र आती है। ज़रुरत इस बात की है कि अनुराग की तरह ही हम सभी को इस बारे मे सोचना होगा। नही तो जंग लगी ये जम्हूरियत इस हाल से भी बदतर हो जायेगी। हमारे साथी अनुराग को बधाई इस पोस्ट के लिये। सभी साथियों से उम्मीद है कि वो सब अपनी लेखनी के दम पर सच को उजागर करते रहेगें। क्योंकि आँखे बदं कर लेने से नज़ारे नही बदलते............

परवेज़ सागर

Benazir, Benazir & Benazir........

I am not her relative, not her friend, never interviewed her, never met her, never talked to her! Then why I am writing about her. I myself don't know. I was little sad when the news broke of her assasination. I don't know why. I was glued to a TV set, talking to my friends about the news but no one seemed to be interested. They said it was nothing new in Pakistan. Sooner or later It had to happen. But why Benazir, why not someone else? As far I am concerned It was a black day for the entire region but more for our neighbour. They lost a charismatic leader. But why I am concerned! Why I was not able to sleep whole night? I did'nt had my breakfast the next morning. I was feeling low. Why? As i said I had no relation with the departed soul. After introspecting for almost two days I sat to write down. As the title says Benazir,Benazir & Benazir......... meaning beautiful. She was beautiful, charismatic leader with mass appeal, well educated. And most Important she was almost on the verge of becoming Prime Minister Of Pakistan. But again why I am disturbed? Am I disturbed for Pakistan. May be Yes. Yes........... Yeas I got it right........ Its for pakistan. I am sad for Pakistan. SHHHHSSSSSS. If someone hear this will brand me as a traitor. Right! No not in todays scenario. Things have changed in past few years. Both the countries are looking to each other as strategic partners. But this untimely demise of Mrs. Bhutto will change something. It will change pakistan. In fact It has changed Pakistan. Mush......... Please listen. Death of Mrs Bhutto will change Pakistan. I cannot say how right now....... But Still I am sad...........This post is incomplete. Will get back as soon as i gather my words.

Friday, December 28, 2007

जंग लगी जम्हूरियत

घर नया खरीदा है, रोशनी नहीं हैं यारों, वतन हो चुका आजाद, हर शख्स यहाँ लुटेरा है यारों। बदनसीबी, गरीबी से शिकस्त होती है हर बार, गरीब हो तुम गरीबी में ही रहो यारों । कल सुना है की पटरी पर कोई शख्स कटा है, दुनियावी जहमतों से वो आजाद हो गया यारों । इन इंसानों की निगाहों में कुछ कमीनापन सा दिखता है, घर में बहन बेटी हो तो सम्हालों यारों । हिंद को बदलनें की बात कर रहे थे जो हरामखोर, विदेशी सरज़मीं पर घर खरीद लिया है यारों । परदा किये हुए अपनी माँ को देखा है हर बार, सड़ चुकी जो परम्पराऐं, बदलो नया वक्त है यारों । नलों में पानी, खंबों में बिजली, पेट मे खाना नहीं, सटीक देश है, गुजारिश है, जहां मिले नेता, सालों को पटक पटक के मारो यारों । अनुराग अमिताभ

बेनजीर की हत्या पर रोष

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की कड़ी भर्त्सना की है. सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान की जनता से संयम बरतने और देश में स्थायित्व बरकरार रखने की अपील करते हुए कहा है कि इस अपराध को अंजाम देने वालों, योजना बनाने वालों और धन उपलब्ध कराने वालों को क़ानून का सामना करना पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना की कड़ी निंदा हो रही है. अमरीका ने इसे 'कायरतापूर्ण' कार्रवाई करार दिया है. अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक बयान में कहा ' यह एक कायरतापूर्ण कार्रवाई है और जिन्होंने ऐसा किया है उन्हें क़ानून का सामना करना पड़ेगा.' उन्होंने कहा कि ऐसे समय में उनका पूरा समर्थन पाकिस्तानी जनता के साथ है जो लोकतंत्र की बहाली चाहते हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान कि मून ने बेनज़ीर की हत्या की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा है कि यह एक नृशंस हत्या है और पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए ऐसा किया गया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इस मामले में एक आपात बैठक कर रहा है. ब्रिटेन सरकार ने भी बेनज़ीर की हत्या की निंदा की है और कहा कि ऐसी निरर्थक हिंसा का कोई मतलब नहीं है. प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने अपने बयान में कहा कि बेनज़ीर ने यह साबित कर दिया कि वो दिलेर महिला थीं. उन्होंने कहा कि भले ही बेनज़ीर भुट्टो अब हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन पाकिस्तान को लोकतंत्र की राह बंद नहीं होती है. पाकिस्तान को लोकतंत्र की बहाल के लिए प्रयास करते रहना चाहिए. इससे पहले ब्रिटेन के विदेश मंत्री मिलीबैंड ने इसे जघन्य कृत्य बताया है और और पाकिस्तान में संयम और एकता की अपील की है. पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री और पीपुल्स पार्टी की नेता बेनज़ीर भुट्टो की गुरूवार, 27 दिसंबर 2007 को एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई है. बेनज़ीर भुट्टो इस्लामाबाद के नज़दीक रावलपिंडी में एक चुनाव रैली को संबोधित कर रही थीं और वह आत्मघाती हमले का शिकार हो गईं. राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ और उनकी सरकार ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है ताकि "आतंकवादियों को नापाक इरादों को नाकाम किया जा सके."
पाकिस्तान के एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने उनकी मौत पर गहरा शोक व्यक्त किया है.

सौजन्य- BBCHINDI

नफस-नफस, कदम-कदम

नफस-नफस कदम-कदम बस एक फ्रिक दम-ब-दम, घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिये, जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिये, इंकलाब ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद इंकलाब

नयी पतितकारिता

आज दुष्यंत जी को फिर पढ रहा था, मेरे अंदर भी कहीं न कहीं एक दुष्यंत है शायद आप मैं भी हो। आज इस नकली पत्रकारिता के दौर मैं जहाँ हमारी नस्ल नें पत्रकारिता को बाजार के कोठे पर बिठा पर बिठा दिया है और खबरों का बलात्कार करना हम जैसों को सिखा दिया है, वहाँ दुष्यंत का एक एक शेर खबरों के हम्माम में हमें आज भी नगां कर रहा है। मैनें भी सोच रखा है की मुझे खबरों का बलात्कार कैसे करना है। मैं कुछ कुत्ते,बिल्ली,साँप,गधा,घोडा, पाल रहा हूं जो निश्चित रुप से खबरों का गोदाम मेरे लिए साबित होगा। माफ कीजीए तोता, कबूतर, भूल गया था और आप से भी गुजारिश है कुछ सलाह आप भी दें, ताकी आपका मित्र इस नये जमाने की शानदार पतितकारिता मैं अपना अमूल्य योगदान दे पाऐ। बहरहाल दुष्यंत जी के शेर हम जैसों की ईज्जत अफजाई के लिए लिख रहा हूँ। हर एक शेर जैसे उन्होनें आज के मीडिया के उच्च स्तरीय घटियापन को निशाने पर रख के लिखा हो । तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई जमीन नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकी़न नहीं। मैं बेपनाह अँधेरे को सुबह कैसे कहूँ, मैं इन नजा़रों का अंधा तमाशबीन नहीं। तेरी जुबान है (मीडिया की) झूठी जम्हूरियत की तरह, तू एक जलील सी गाली से बेहतरीन नहीं । तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जायें, अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं । तुझे कसम है ( मुझ जैसों को) खुदी को बहुत हलाक न कर, तू इस मशीन का पुर्जा़ है, तू मशीन नहीं । बहूत मशहूर है आयें जरूर आप यहाँ, ये मुल्क देखने के लायक तो है, हसीन नहीं । ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो, तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं । सलाम दुष्यंत जी को और क्षमा एक भोपाली होने के नाते ।

Thursday, December 27, 2007

इंकलाब , इंकलाब , इंकलाब

इंकलाब , इंकलाब उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब सुर्ख सा था इंकलाब गर्म सा था इंकलाब दिल मैं था जो इंकलाब अब जुबां पसंद ये इंकलाब, उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब जमीं इंकलाब फलक इंकलाब थे ख्याल कभी इंकलाब, जवां उम्मीद थी तब इंकलाब फनां तारीख इंकलाब कयामत सा इंकलाब, उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब रूह इंकलाब जिस्म इंकलाब मौतें मिलीं वो इंकलाब सांसें भी थीं जो इंकलाब दिल दिमाग इंकलाब तन बदन इंकलाब, उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब जुबां पसंद अब इंकलाब नकली सा कुछ आज इंकलाब बदला हुआ सा इंकलाब ठहरा हुआ सा इंकलाब ठिठका हुआ सा इंकलाब घिसट रहा अब इंकलाब उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब अंधा इंकलाब लंगडा इंकलाब बदला है वक्त ...................कहां इंकलाब ठडां क्यों खून ................. कहां इंकलाब हमसे तुम अलग .............. कहां इंकलाब घायल वतन .....................कहां इंकलाब रोता चमन ...................... कहां इंकलाब उफ इंकलाब हाय इंकलाब हद इंकलाब अब ख्याल इंकलाब झूठा सा सच अब इंकलाब गुम है आज इंकलाब ढूंढो कहीं अब इंकलाब इंकलाब , इंकलाब , इंकलाब अनुराग अमिताभ

पाकिस्तान ? बेनजीर की हत्या........

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई है । बेनजीर की हत्या आत्मघाती हमलावर ने किया । बेनजीर की गले में गोली लगी थी । किसी देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि उस देश के नेताओं की हत्या दिन दहाड़े हो ? पाकिस्तान में आत्मघाती हमला कोई ने बात नही है । जिस देश के कर्ता - धर्ता सुरक्षित नही हैं तो उस देश की जनता का क्या हाल होगा ? भोली जनता भय के साये में सहमें हुए है । मेरा अपने साथियों से एक प्रश्न है - क्या किसी देश की राजनीति की हत्या कर उस देश का विकास किया जा सकता है ?

thanks!

hi i am shantanu srivastava and i have been reading the blog for quite some time now and i am seriously amazed at the quality of posts written by the members. i mean, it is really heartening to see so many young people can actually scratch under the surface and make a lot of sense. i might post a few my inner thoughts here, which probably would be in english, (MBA, American Express and call centres have actually forced me to think in english). i might not make enough sense sometimes, so please bear with me. and oh, another thing, my posts would be signed, "come here travis". remember, i warned you about that not making sense part. thanks and kudos to pervez sagar.

आज सुबह

कितने दिनों बाद आज सांझ के बादल छंटे ज़िन्दगी, झरोखे से हंसी इठला मासूम खुशियां हथेलियों में सजी संवरी भोर के अंगना से चुन खुशनुमा पल धड़कने कुछ गुनगुनायी औंस की ज़मी पे थिरक आज, सुबह कुछ ऐसे गुजरी कीर्ती वैद्य

असफलता, सफलता की सीढ़ी

जीवन उजाले और अंधेरे, खुशहाली, दरिद्रता, सफलता और असफलता का मिश्रण है। किसी भी काम में सफलता या असफलता निश्चित होती है। जिन्दगी में सफलता प्राप्त करने का कोई सरल मार्ग नहीं होता। सफलता सिर्फ चाहने से नही मिलती, बल्कि ये उन्हीं को मिलती है, जो असफलता से नही घबराते। असफलता ही सफलता का रास्ता दिखाती है। टाम वैटसन सीनियर ने कहा है - अगर आप सफल होना चाहते हैं तो असफलता की दर को दुगुनी कर दीजिए। एक आदमी 21 वर्ष की आयु में व्यापार में असफल हुआ, 22 वर्ष आयु में एक चुनान हारा, 24 साल की उम्र में फिर व्यापार में असफल हुआ, 26 साल की उम्र में उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई, उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया, 34 साल की उम्र में कांग्रेस का चुनाव हार गया, 45 वर्ष की आयु में सिनेट के चुनाव में असफल हुआ, 47 साल की उम्र में एक बार फिर चुनाव में असफल हुआ और 52 वर्ष की उम्र में वह अमरीका का राष्ट्रपति बना। ये शख्स था अब्राहिम लिंकन। क्या उन्हें असफल कहा जायेगा। उनके लिए असफलता एक पल की बाधा थी कोई अन्त नहीं । सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि आप ज़िंदगी में कितनी ऊचाईयों तक जाते हैं बल्कि इस बात से तय होती है कि हम गिर कर कितनी बार उठते हैं। गिर कर बार-बार उठने की शक्ति ही सफलता का रास्ता बनाती है। हर असफलता के बाद खुद से पूछे की इस घटना से मैंने क्या सीखा। और तभी आप रास्ते की असफलता को सफलता की सीढ़ी मे बदल पाएंगे। रूफ़ी ज़ैदी

Wednesday, December 26, 2007

एक भावुक पोस्ट

साथियों एक पोस्ट की कॉपी यहां डाल रहा हूँ। ये वो पोस्ट है जो उन दिनों (सितम्बर 2007) कई ब्लॉगस् पर डाली गयी। जब जामिया पुलिस चौकी पर हुये हमले के दौरान उपद्रवीयों ने मुझे भी अपना निशाना बनाया था। इस घटना के दौरान मैं घायल हो गया था। और मुझे एक हफ्ता बैड़ पर रहना पड़ा था। ये पोस्ट मेरे छोटे भाई समान नसीम अहमद ने लिखी थी। जो इस वक्त आगरा मे एनडीटीवी के संवाददाता है। इस पोस्ट को जब मैने पहली बार पढा था तो मेरी आँखे भर आयी थी। ये पोस्ट सभी साथियों के लिये एक बार फिर....... आपकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा। परवेज़ सागर दोस्तों मेरा नाम नसीम अहमद है। मै आगरा की पत्रकारिता मे करीब दस सालों से सक्रीय हुँ। पहले मैं कई साल प्रिन्ट मे रहा और उसके बाद अब एक हिन्दी न्यूज़ चैनल के साथ काम कर रहा हुँ। मै रंगकर्मी को नियमित पढता रहा। फिर ख्याल आया कि मै भी कुछ लिखुँ। तो आज एक ऐसे व्यक्ति के बारे मे बताना चाहता हुँ जो शुरु से अपनी खबरों के कारण चर्चाओं मे रहे कई लोगों को टीवी पत्रकारिता के गुण सिखाऐ। पर किसी से कोई उम्मीद कभी नही रखी। वो है मेरे बड़े भाई समान परवेज़ सागर जो पिछले कई सालों से आज तक के साथ काम रहे है। वही थे जो मुझे प्रिन्ट से टीवी की तरफ ले आये। उन पर पत्रकारिता का जो जुनून मैने देखा वही मेरे लिये भी प्रेरणा बना। उन्होने तीन साल आगरा मण्ड़ल मे आज तक का परचम लहराया। कई ऐसी खबरें की जो हम सोचते भी नही थे। पार्टी विशेष की सरकार मे लखनऊ विकास प्रधिकरण घोटाले का खुलासा करने के बाद भले ही धीरेन्द्र जी दिल्ली चले गये हो पर परवेज़ सागर ने यहीं रह कर परेशानियों को सामना किया। उन पर तीन बार जान लेवा हमला किया गया। लेकिन उन्होने अपने काम के साथ कभी समझोता नही किया। बात ज़्यादा बढी तो आज तक ने उन्हे अगस्त 2006 मे दिल्ली बुला लिया। वहां भी उन्होने अपनी खबरो के दम पर एक नया मुकाम हासिल किया। ज़हरीली सब्ज़ीयों का खुलासा कर राजधानी मे सनसनी फैला दी। इस खबर के लिये उन्हे ईएम बैस्ट रिर्पोटर अवार्ड से नवाज़ा गया। और बीते शनिवार की शाम एक बार फिर परवेज़ सागर का नाम चर्चओं मे आ गया जब जामिया इलाके की पुलिस चौकी पर आतंक का नंगा नाच खेला जा रहा था। उस वक्त परवेज़ सागर वहां पंहुचने वाले पहले पत्रकार थे। वो अपना काम अन्जाम दे रहे थे अकेले निड़र। उन्होने अपनी जान की परवाह किये बगैर अराजकता के खेल की सारी कवरेज की लेकिन इसी दौरान आगजनी करने वाले उपद्रवीयों ने उन्हे अपना निशाना बनाया। उनका कैमरा आई डी वगैरह सब लूट लिया गया। उन्हे बेरहमी के साथ पिटा गया। वो किसी तरह से जान बचाकर वहां से निकले। परवेज़ जी को पेट मे गम्भीर चोट आयी है। फिलहाल वो छुट्टी पर चले गये है। एक बार फिर उन्होने अपनी जान दांव पर लगाई। इस तरह के लोग पत्रकारिता मे भले ही आज कम हो लेकिन वो पत्रकारिता के क्षेत्र मे कदम रखने वालों के लिये मिसाल साबित होते है। उनके मार्ग निर्देशन मे कई साल काम किया इस लिये उनके बारे मे लिखना ज़रुरी समझा। ईश्वर से प्रार्थना है कि वो जल्द स्वस्थ होकर अपने काम पर वापस लौटें। नसीम अहमद, आगरा

अनुराग अमिताभ की तस्वीरें........

हमारे साथी अनुराग अमिताभ ने भोपाल जाकर मोर्चा सम्भाल लिया है। मेरा मतलब है कि सीएनईबी न्यूज़ चैनल ने अनुराग को भोपाल ब्यूरो की ज़िम्मेदारी दी है। उनके साथ कैमरामैन अरविन्द रहेगें। ये जो तस्वीरें आप देख रहे हैं, सभी अनुराग के मोबाइल से ली गयी हैं। इसमे एक तस्वीर को छोड़कर बाकी सारी तस्वीरें सीएनईबी के नोएड़ा ऑफिस की हैं। उन्होने आज ही मुझे ये तस्वीरें भेजी हैं।













TUMKO NA BHOOL PAYENGE.........

ALL CREDITS TO THE MAN WHO GIFTED US EVERLIVELY “SHOLAY”……
May Sippi ji’s soul rest in peace of heaven……
A glimpse of Sholay that’s still bombarding Sholay………Sholay is a film with many firsts to its credit. It is the highest grossing film of all times in India. BBC India declared it the film of the millennium . It ran for 286 weeks straight in Mumbai's Minerva theatre. It was the first film in the history of Indian cinema to celebrate silver jubilee (25 weeks) at over a hundred theatres across India. It’s a film that has ignited not just the entertainment quotient but the emotional quotient of people for decades.Gabbar's name might not scare children today, but on hearing the dacoit's name they'll confidently say kitne aadmi the. Dialogues like tera kya hoga re kaaliya, arre o sambha have become a part of our daily parlance.Such is the popularity of the Sholay-talk that for the first time in the history of Bollywood, LPs of the film's dialogues was released. Sholay not only captured the imagination of the viewers, it provided fodder for a generation of filmmakers to draw inspiration from.After the release of Sholay, the film as if got a life of its own - spawning remakes, spoofs, inspiring Amul hoardings, mobile games and even local remakes. So great is the wealth of this cult classic that it caused a rift in the Sippy family over issues of rights and revenues from the film. The very filmmaker whose genius was behind Sholay has currently no claims over the film.Sholay is unique in many ways. When was the last time that a character with only one dialogue in a film as been as memorable as Sambha? With barely two scenes to his credit, Soorma Bhopali became a household name. Believe it or not, such was the popularity of this character that in 1988 a film titled Sorrma Bhopali was made.Strangely, Sholay won only one Filmfare award in 1976 for best editing. Interestingly, when first released it was declared a commercial disaster. Word of mouth convinced movie-goers to give the film a chance. And the rest, as they say, is history

Some Amazing Facts

1. Look at your zipper. See the initials YKK? It stands for Yoshida Kogyo Kabushibibaisha, the world's largest zipper manufacturer. 2. A raisin dropped in a glass of fresh champagne will bounce up and down continuously from the bottom of the glass to the top. 3. A duck's quack doesn't echo. No one knows why. 4. 40 percent of McDonald's profits come from the sales of Happy Meals. 5. 315 entries in Webster's 1996 Dictionary were misspelled. 6. On the average, 12 newborns will be given to the wrong parents daily. 7. Chocolate kills dogs! True, chocolate affects a dog's heart and nervous system. A few ounces is enough to kill a small sized dog. 8. Most lipstick contains fish scales. 9. Ketchup was sold in the 1830's as a medicine. 10. Leonardo da Vinci could write with one hand and draw with the other at the same time.

Tuesday, December 25, 2007

Modi-Saudagar ya Jadugar?

Modi magic worked for the third time. Hope it is good answer to whoever called him "Maut ka Saudagar". His first SMS was the perfect decription "I am CM and always be the CM. For me CM means Common Man" It was a very touching sight when he spoke to his supports y'day. He said "I won b'cause of u all. This victory belongs to u". On the issue that Modi is now bigger than the party, his reply was very emotional. He said,"Those who say I have become bigger than the party, does not know about the history of the party." At this point he got so emotional that for few seconds he was not able to speak. He controlled himself and then said,"Can ever a child become bigger than his Mother?." It said it all..... (for this and other posts plz visit n comment on my all new blog at- http://alok12345.blogspot.com/

Monday, December 24, 2007

ब्रिटनी और विवाद साथ-साथ......

मुसीबत में घिरी रहने वाली पॉप स्टार ब्रिटनी स्पीयर ने उस समय तमाशा खड़ा कर दिया जब एक स्टोर में उन्हें चिड़चिड़ेपन का दौरा चढ़ा और दुकान के कर्मचारियों के सामने ही उन्‍होंने कपड़े उतार दिए। वेबसाइट contactmusic.com की खबर के मुताबिक स्पीयर्स हॉलीवुड सेक्स स्टोर पहुंचकर कुछ उत्तेजक कपड़ों को पहनकर देखना चाहती थीं। जब दुकान के कर्मचारी ने कहा कि वे अंडरवियर पहनकर नहीं देख सकतीं तो ब्रिटनी आग बबूला हो गईं। उन्होंने अपना अंडरवियर उतारा और पुरूषों के पहने जाने वाले ‘बेयरली लीगल’ लिखे छोटे पेंट की जोड़ी पर पहनाने लगी। हैरान-परेशान कर्मचारी उन्हें देखते रहे। एक सूत्र ने इस बारे में बताते हुए कहा कि सचमुच वे काफी परेशान लग रही थीं। वे इस घटना से अलग दिखाई पड़ रहीं थीं। उनकी आंखें में कुछ नहीं चल रहा था। इस घटना के वक्त मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि ऐसा लग रहा था मानो बच्चे से निबटा जा रहा हो। बाद में ब्रिटनी ने अपने अंडरवियर के लिए क्रेडिट कार्ड से भुगतान किया और अपने रास्ते में आने वाले पुतले को धक्के देती हुई बाहर निकल गयी।
ब्रिटनी स्पियर्स ने अपनी 16 वर्षीया बहन के गर्भवती होने का सारा दोष अपनी मां लिने स्पियर्स पर डाला है। स्पियर्स ने अपनी बहन के गर्भवती होने की सूचना पाते ही अपनी मां को बुलाया और काफी देर तक इस बारे में चर्चा की। वेबसाइट ‘pegesix.com’ (पेजसिक्स डॉट कॉम) ने एक सूत्र के हवाले से कहा, "ब्रिटनी लगातार उन पर गुस्सा हो रही थीं और यह आरोप लगा रही थीं कि उन्होंने ही उनकी बहन की जिंदगी खराब की है। " इस सूत्र के हवाले से बताया गया है कि "ब्रिटनी को ऐसा लगता है कि जब उन्हें अपने परिवार की जरूरत थी तो किसी ने उनका साथ नहीं दिया। उन्हें ऐसा लगता है जैसे उन्हें परिवार से अलग कर दिया गया है।" इस वजह से ब्रिटनी अब अपने परिवार के सदस्यों को अपने बच्चों से मिलने नहीं दे रही हैं। इस सूत्र ने कहा, "ब्रिटनी की मां को अब यह देखना है कि जेमी लिने और उसके आने वाले बच्चे का स्वास्थ्य ठीक रहे।" अंग्रेजी पॉप गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स की 16 वर्षीय बहन जेमी लिन्न स्पीयर्स गर्भवती हैं। टेलीविजन धारावाहिक ‘जोए 101’ में स्कूली छात्रा का किरदार निभाने वाली जेमी तीन महीने से गर्भवती हैं और उन्होंने निर्णय लिया है कि वह इस बच्चे को जन्म देंगी।

सौजन्य- जोश

थोड़ी सी जो पी...ली.... है.........






I M P O R T A N T W A R N I NG !

Anyone-using Internet mail such as Yahoo, Hotmail, AOL and so on. This information arrived this morning, Direct from both Microsoft and Norton. Please send it to everybody you know who has access to the Internet. You may receive an apparently harmless e-mail with a Power Point presentation ' Life is Beautiful'. If you receive it DO NOT OPEN THE FILE UNDER ANY CIRCUMSTANCES, and delete it immediately. If you open this file, a message will appear on your screen saying: 'It is too late now, your life is no longer beautiful.' Subsequently you will LOSE EVERYTHING IN YOUR PC, and the person who sent it to you will gain access to your name, e-mail and password. This is a new virus which started to circulate on Saturday afternoon. AOL has already confirmed the severity, and the anti virus software's are not capable of destroying it. The virus has been created by a hacker who calls himself 'life owner.'PLEASE SEND A COPY OF THIS TO ALL YOUR FRIENDS, and ask them to PASS IT ON IMMEDIATELY

Why every body is afraid of Modi ?

Modi, Modi, Moditva!Why every body is afraid of modi? I throw this question to each and every member of the blog. Let us analyse his win in 2007 wiz-a-wiz his win in 2002.

Sabhi Rangkarmiyaon ka abhaar

Dear Parvez, Thanx a lot for the introduction. I will make sure that I am into the blog for some time every day. My oppologies for not writing in Hindi.Yet I am in the process of learning hindi typing and very soon all of you will finnd me posting in hindi. Anyways as written by Parvez, I am not a big name in the TV Journalism Industry. I have just started and its a long way to go and I hope that all of us i.e Rangkarmi family will make some difference.

Welcome to New Media: How to go about doing Citizen Journalism itself

We are inviting you all to India’s First Complete Citizens’ Portal http://www.mynews.in. Our second one is in Hindi: www.merikhabar.com. Since its inception in October 2006, MyNews Interactive has been focusing on how to persuade more citizen reporters/broadcasters. Now we believe its time for us to think about how to go about doing Citizen Journalism itself. There have been significant attempts to implement citizen journalism on a global scale by many Citizen Journalism Initiatives, but http://www.mynews.in is striving for on a more local level. Until now, http://www.mynews.in has been one of the few successful sites of its kind. Within one year, we are getting 20 to 30 news stories a day. We are Bi-lingual (English & Hindi, however submissions in Hindi are lesser than in English. We update the portals through the day. Rather than remaining content with around 32000 hits (as of now) and 20 to 30 news stories a day, we continue to persuade those minds who have enough investigative & expressive mettle within themselves and eager to unravel their minds towards the things around them. This is the time for Citizen Journalists to attract those readers who are fed-up with the commercialization of newspapers and eager to embrace the new real time news reporting with real-time analysis. We are also striving to know the obstacles that have hindered the spread of Citizen Journalism around the world. The http://www.mynews.in strongly believes that Citizen Journalism can find roots anywhere, not just in South Korea, United States, Japan or Europe. For it is better to have citizens’ voice with their own perspective and interests than to let the media represent them on their behalf. The position of Internet is improving around the world. As more people get online, a public square is being broadened and leveled for everyone to join in as active participant. Traditional means of newsgathering and information dissemination are quickly falling behind the new model of media. The problem with old media is the changing scenario of the news itself. We believe news is something that affects the people most, not only the things those affects Prime Minister Man Mohan Singh or George W. Bush. The news is that is created by people who are all allowed to think together. The news is a form of collective thinking. It is the ideas and minds of the people that are changing the world, when they are heard. And to be heard, we should utilize the very tool of Citizen Journalism. The concept of Citizen Journalism itself is not hard to appreciate; but its execution really is hard enough. That is why there are few successful Citizen Journalism websites. And for that reason http://www.mynews.in has opted for a bi-lingual model. We'''d like to share what we have experienced and learned from our operation. We believe that freedom of expression is fundamental to citizens' progress, peace, and prosperity. We hope http://www.mynews.in will not be merely a kind of coffeehouse for citizens to gather and freely discuss the matters that affect them, but a strong tool to reach out the authorities and be taken seriously by them. MyNews would like to serve as a kind of mediator between public and authorities. Please let us know how can we improve Citizen Journalism and better serve citizens' interests. Your coming forward to http://www.mynews.in and report the news stories/commentary in your own words with your own perspective will be greatly appreciated. These stories/comments will be published with by-line (address also if desired) of the sender Citizen Journalist. You can send/upload photographs and video also with full details.

स्वागत है विक्रम कपूर जी.........

दोस्तों, रंगकर्मी का सफर लगातार जारी है। हमारे इस काफिलें मे हर रोज़ देश के अलग-अलग स्थानों से लोग जुड़ रहे हैं। इसी कड़ी मे रंगकर्मी के तीसवें सदस्य के रुप मे हमारे साथ जुड़ा है एक ऐसा नाम जो न्यूज़ टेलीविज़न की दुनिया मे किसी परिचय का मोहताज नही है। हम सभी रंगकर्मी स्वागत कर रहे हैं विक्रम कपूर जी का। विक्रम जी को जो लोग नही जानते मैं उन्हे याद दिलाना चाहता हूँ। देश के टेलीविज़न को नई दिशा देने वाले उस कार्यक्रम की जिसने जुल्म की दुनिया मे कोहराम मचाया। मैं बात कर रहा हूँ "इन्डियाज़ मोस्ट वान्टेड़" की। इस कार्यक्रम के निर्माता सुहेब इलियासी थे। लेकिन इस कार्यक्रम की प्रोड़क्शन यानि कि इसे बनाने का काम अन्जाम दिया विक्रम कपूर जी और उनकी टीम ने। इसके बाद उन्होने पीछे मुड़कर नही देखा। टीवी जर्नालिज़्म के रास्ते पर उनका सफर आज भी बाखूबी जारी है। उम्मीद है सभी साथियों को समय-समय पर उनके अनुभव से कुछ ना कुछ सीखने को ज़रुर मिलेगा। रंगकर्मी पर विक्रम जी की पोस्ट आप विक्की के नाम से पढ पायेगें। एक बार फिर विक्रम जी का स्वागत..........

परवेज़ सागर

Nice Effort

Dear All, Got to know about this blog from Parvez this afternoon. Just opened the blog and going through what has been written. It will take me some time to read all the blogs. Any ways, would like to congratulate Parvez for his efforts. Just a word of caution! This blog is an opportunity to express ourselves but not to express others. We should make an effort to polularise this blog and express what we feel. I request all of you to write good about every thing. It should be knoen as a positive blog. No rumers please. No offensive language please. We are journalists and journalists are bonded with a specific code of conduct. We should never forget. Any ways, congrats once again Parvez. Nice effort.

Friday, December 21, 2007

मेरी खबर डॉट कॉम आपके लिए

यदि आपकी कोई न्‍यूज या लेख किसी समाचार पत्र में जगह नहीं पाता है तो आपको निराश होने की जरुरत नहीं है। देश में एक ऐसा पोर्टल भी है जो कि सामान्‍य आदमी की न्‍यूज और लेख को अपने पोर्टल पर स्‍थान देता है। जी हां मैं बात कर रहा हूं मेरी खबर डॉट कॉम की। यह पोर्टल हिन्‍दी के अलावा अंग्रेजी में भी है जिसका नाम है मेरी न्‍यूज डॉट कॉम। बस फिर क्‍या है अपनी की बोर्ड पर आज से ही लिखना शुरु कर बेब पोर्टल पर अपने नाम से न्‍यूज डालिए। है न मजेदार खबर। अधिक जानकारी के लिए आप मेरी खबर के संपादक वेदगिरी जी को उनके सेल नं 09826169126 या vedvgiri@gmail.com पर भी ई मेल कर सकते हैं

Thursday, December 20, 2007

शोक संवेदना

हमारे सक्रीय साथी अंकित माथुर के पिता जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है.. मैं उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुये उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करता हूँ ईश्वर इस दुख की घड़ी मे उनके परिवार को धैर्य रखने की शक्ति दे उनके परिवार के साथ मेरी पूरी संवेदना है..

Interesting Comments

Marriages are made in heaven, then what are made in Hell? Ans : the days after marriage During Marriage ceremony why is the bridegroom is made to sit on the horse ? He is given his last chance to run away. I wrote ur name on the sand ............ .. it got washed away, I wrote ur name in air......... ......... ........ it got blown away, So i wrote ur name in my heart....... ...... I got a HEART ATTACK

To Make A Laugh

Bhagwan ke naam pe 1 patni dede... Apni nahi toh dusre ki dede... Bhagwan tujhe 1 kay badle3 dega Anurag ki tarah Prerna kay saath Aparna aur komolika free dega... **********

Wednesday, December 19, 2007

एक दुखद समाचार

आप सभी साथियों को खेद के साथ सूचित कर रहा हूँ कि हमारे सक्रीय साथी अंकित माथुर के पिता जी का आज दोपहर सहारनपुर मे निधन हो गया। श्री माथुर पिछले एक लम्बे अर्से से बिमार चल रहे थे। उन्होने अपनी अन्तिम सांस अपने गिल कॉलोनी स्थित निवास पर ली। स्वर्गीय श्री माथुर दुनिया की जानी मानी कम्पनी आईटीसी से रिटायर होने के बाद सहारनपुर मे ही रहे। स्वभाव से वे शान्त और मिलनसार थे। मैं और रंगकर्मी परिवार उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुये उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करते है। ईश्वर इस दुख की घड़ी मे उनके परिवार को धैर्य रखने की शक्ति दे। परवेज़ सागर एंव समस्त रंगकर्मी परिवार www.rangkarmi.blogspot.com www.parvezsagar.blogspot.com

Arz kiya hai doston............

UNKI GALI SE MERA JANAZA NIKLA, WO NA NIKLE JINKE LIYE JANAZA NIKLA, UNKA GHAR AAYA TO MERE DOST SITI BAJANE LAGE, RAKH KE MERA JANAZA KAMINE USKO PATANE LAGE.... ---------------------------------------------------------------- School Mein Ishq Ka Naya Mahool Tyar Ho Gaya, Class Ki Teacher Ko Papu Se Pyar Ho Gaya. Iss Baat Se Sari Class Ka Dil Udas Ho Gaya, Sari Class Fail, Aur..... Papu Pass Ho Gaya.... ---------------------------------------------------------------- Dil ki baat dil mein mat rakhna, Jo pasand ho usse ILU kehna. Agar wo ghusse mein aa jaaey to darna mat , Raakhi nikalna aur kehna pyari behna milti rehna ---------------------------------------------------------------- Tere gam me tadap kar mar jayenge, Mar gaye to tera naam lejayenge... Rishwat de ke tujhe bhi bulaenge, Tum upar aaoge to saath baith ke Kurkure khaenge.... ---------------------------------------------------------------- Arz kiya hai!!!...Itne kamjor hue teri judai se... Gaur farmaiye...Itne kamjor hue teri judai se... Ki chinti bhi ab kheech le jaati hai charpai se.... ---------------------------------------------------------------- Karuna Shankar

Tuesday, December 18, 2007

मेल के खेल! सावधान!!


आज काफ़ी अर्से के बाद अपने मित्र परवेज़ सागर से उनके नये आफ़िस CNEB News पर मुलाकात हुई, बहुत अच्छा लगा। उन्होने तूलिका सिंह जी से भी इन्ट्रोडक्शन करवाया।कुछ देर बैठ कर चाय आदि पी और डिस्कशन होने लगा इन्टर्नेट परहोने वाले तरह तरह के फ़्राड आदि पर. इस विषय पर मैने पहले भी भडास और वर्चस्व पर लिखा है।
उसी पोस्ट को परवेज़ भाई के कहने पर रंगकर्मी पर भी डाले दे रहा हूं, आशा है
जानकारी उपयोगी रहेगी।
"कल मेरे रेडिफ़ मेल के अकाउंट पर आई सी आई सी आई
बैंक की ओर से एक ई मेल आई हुई थी। ईमेल में कहा गया है कि---
"During our regularly scheduled account maintenance and verification procedures,
we were unable to verify your account information ।It has come to our attention
that your account information needs to be updated as part of our
continuing commitment to protect your account and to reduce the instance
of fraud on our website"
जिस बैंक के नाम से इसने मुझे ईमेल भेजी
गई उस बैंक में मेरी ईमेल आईडी दूसरी है ना कि जिस पर ये ई मेल भेजी गई
है, और ऐसी कैसी वेरिफ़िकेशन है जो कि ये फ़ोन के ज़रिये नही पूछ सकते।
इनकी अटेंशन में ये कौन सी बाते आई जिनसे कि इन्हे लगा कि
मेरे अकाऊंट की डीटेल अपडेट होनी चाहिये। ई मेल का मजमून देखते ही
मैं समझ गया कि ये किसी हैकर की करामात है, और
ईमेल पर अकाऊंट वेरिफ़िकेशन के ज़रिये वो मेरे अकाऊंट की डीटेल
हासिल करना चाह रहा है। ईमेल के ओरिजिनेशन पाईंट के बारे में मैने थोडी
R&D करी तो मालूम हुआ कि ईमेल फ़्रांस के पैरिस शहर के
इस पते से आई है। Agence des Medias Numeriques
12/14, Rond-point des champs elysees
75008 Paris, France+33 8 92 55 6677
मैने अपने इनबाक्स का चित्र साथ में लगाया है कृपया देखें।
अगर आप इस ईमेल को साधारण रूप में देखें तो पता चलेगा कि ये
ईमेल इस आई डी से आई है customercare@icicibank.com मगर यदि
आप इस ईमेल का जवाब देंगे तो यह ईमेल जायेगी इस पते पर
httpd@paris51.amenworld.comहै ना मज़ेदार बात?
अब एक आम आदमी तो शायद ये ही सोच कर जवाब भेज देगा या
इनके बताये गये प्रोसीजर्स follow करेगा। कि ICICI बैंक से ई मेल आई है, तो
सही ही होगी,और यहीं से वो इन्टर्नेट फ़्राड के घेरे में आ जाता है।
और यहीं से शुरुआत होती है साइबर क्राईम की। इन सभी तकनीको
से हैकर्स को आपके अकाउंट की जानकारी तो मिल ही जाती है, साथ
ही वो आपके आई पी एड्रेस को भी ट्रेस कर के उसे हैक कर सकते हैं।
आपके कम्प्यूटर में सुरक्षित जानकारी को भी चुराया जा सकता है।
इसी लिये किसी भी बैंक से आई ई मेल का जवाब देने से पहले
एक बार उस बैंक की कस्टमर सर्विस पर फ़ोन ज़रूर करें,
अव्वल तो बैंको से ऐसी मेल आती ही नही, बैंको से ट्रांसैक्शन आदि के एलर्ट
आदि आते हैं। एक छोटा सा उदाहरण दे रहा हूं कि कैसे आपके पास
एक झूठी आई डी से मेल भेजी जा सकती है।
---जो ईमेल भेजी जायेगी वो जायेगी इस पते को, abc@abc.com
और आयेगी इस आईडी से customercare@---.com
इस के लिये आपको nslookup नाम के एक छोटे से प्रोग्राम की आवश्यकता होगी।
अब पहला काम है आपको abc. कॉम में यूज़र abc के खाते की जानकारी
हासिल करना। एक स्टैण्डर्ड *निक्स सिस्टम पर आपको ये जानकारी निम्नांकित
रूप से मिल सकती है॥
% /usr/sbin/nslookup -q=MX abc.com
Resolved abc.com to
111।111।111।111 [snip]mail
exchanger: easy।abc।com[snip] %
मेल एक्स्चेंजर का डाटा सर्च करते हुए।
इस प्रोग्राम को रन करने के बाद काफ़ी डाटा आपके पास आ जायेगा,
अब आपको मेल एक्स्चेंजर के बारे में पता करना होगा,
सामान्यत: कई मेल एक्स्चेंजर होते हैं, लेकिन हमें पोर्ट न० 25 से कनेक्ट करना होगा।
% telnet easy.abc.com 25 Connecting to easy.abc.com
....Escape character is `]
abc ESMTP version 6.6.6
अब आप अन्दर हैं॥
अब आपको कम्प्यूटर को बताना है कि आप कौन हैं और कहां ईमेल भेजनी है॥
HELO ---.com 250 OK
MAIL FROM: < customercare@---.com> 250
customercare@---.com is syntactically correct
RCPT TO: <abc@abc.com>250
abc@abc.com is syntactically correct
आपका काम हो गया.. देखिये सैंपल मेल...
DATA354 Ready for data - end input with a "."
on a new line
Date: 28/11/2007Time: 8:22:08 (GMT+360)
From: मि० फ़र्ज़ी <customercare@---.com>
To: abc <abc@abc.com>
Subject: मैं आपके खाते की जानकारी उडाना चाहता हूं.
उपरोक्त ईमेल में आप जो चाहे लिख कर भेज सकते हैं जिसे चाहें जिस

भी किसी आईडी से चाहें मेल भेजी जा सकती है। जिस भी

कम्प्यूटर से आप कनेक्ट करेंगे वो सामान्यत: एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं

किंतु फ़िर भी दिखने में शायद भिन्न हो सकते हैं, और किसी भी
कम्प्यूटर से कनेक्ट होने के बाद आप सोच समझ कर लिखें क्योंकि गलत
लिखे जाने की स्थिति में आप डिलीट की का प्रयोग नही कर सकते
हैं आपको दुबारा से कनेक्शन स्थापित करना होगा। ये सब दिखने में भले
ही सरल लगे लेकिन उतना सरल भी नही है।
इसी लिये उपरोक्त उदाहरण मात्र जानकारी और सभी यूसर्ज़ की जानकारी भर के लिये
हैं प्रयोग हेतु नही... "
धन्यवाद

अंकित माथुर...

क़ैद

कई दिन बाद कमरे में आना हुआ सब सहजा, जैसे कुछ बदला ही ना वही कुर्सी व छनी धूप के कण मंद हवा से उड़ते फैले सूखे पत्ते धूल चढी हंसती तस्वीरो का रंग सब धुंधला था, कुछ शेष था, गूंजती कानो में पुरानी बाते क़ैद जो मेरी स्मृति में ना कीसी कमरे में.... कीर्ती वैद्य

Monday, December 17, 2007

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई और मैं बस देखता रह गया कुछ साथ आए और कुछ पीछे छुटते गए फिर भी मैंने हार नहीं मानी और लोगों को जोड़ता गया जोड़ तोड़ के इस खेल में मैं खुद ही टूटता गया फिर भी अब अगली दोपहर का इंतजार है आशीष

Saturday, December 15, 2007

what a call ?!

Y'day a funny(?) piece of news in TOI caught my attention.
"A 16 yr old in US of A, posing as President of Iceland,called white house and after the line was transferred to 3-4 ppl, he finally spoke secretary of President Bush and finally got an appointment for "phone meeting" the next evening.But some how the staff smelled foul and he was taken away by the police from his place before the scheduled call"
This incident raises a point - Is it so easy to do such a thing?
Also I wonder what would have happened,had the boy not been arrested?
I think- after talking to President Bush, in the end he might have said "i am not what u think"- hang the phone up and disappeared; never to be found!
Readers r requested to imagin n reply as comment to this post

Friday, December 14, 2007

बोलती तस्वीर.... ख़ामोश दर्द.......

इस तस्वीर को Pulitzer Prize से नवाज़ा जा चुका है। दिल दहला देने वाली ये तस्वीर केविन कार्टर नाम के एक जाने-माने फोटोग्राफर की है। उन्होने ये तस्वीर 1994 मे सूड़ान के भुखमरीग्रस्त इलाके से ली थी, जहां से कुछ दूर यूनाईटेड़ नेशन का फूड़ कैम्प लगा था। इस तस्वीर मे एक बच्चा भूख से बेहाल है और ठीक उसके पीछे बैठा एक गिद्ध उसके मरने का इन्तज़ार कर रहा है ताकि वो उसे अपना भोजन बना सके। इस बच्चे का क्या हुआ ये तो पता नही। लेकिन इस हकीकत को तस्वीर में उतारने वाले केविन से वो नज़ारा भूले नही भूला और उन्होने परेशान होकर तीन महीने बाद आत्महत्या कर ली। उनकी ये तस्वीर आपको कैसी लगी?

Do not....

Do not stand at my grave and weep; I am not there. I do not sleep. I am a thousand winds that blow. I am the diamond glints on snow. I am the sunlight on ripened grain. I am the gentle autumn rain. When you awaken in the morning's hush I am the swift uplifting rush Of quiet birds in circled flight. I am the soft stars that shine at night. Do not stand at my grave and cry; I am not there. I did not die. -Mary Elizabeth Frye (1904-2004).

Aren't we responsible for spoiling our children!!!!!!!!!!!!!!!!!!


It was really not shocking to see a kid gunning down his batchmate just to take revenge of a fight among them. I will very frankly say or admit that the alarm was ringing since end of twentieth century. But as we all are typically Indian, we wait for something really to happen. While studying and growing all through my college, the materialism grew nad grew. What ever we say that that I joined journalism because I want to do some thing worth or what so ever; its all shit. The truth is the parents today and future parents(people like us) are so busy with our career aims and making money and adding physical assets that we forget to give quality time to our kids, the future generation of this nation. We are the one who are making this world a hell for our kids. This is because we want to enjoy everything in our lifetime and don't bother to think of generation next. Even now, its not not too late, plzzzzzzzzzzzzz wake up we all, save kids, talk to them, laugh with them, dream with them, don't just spoil them by loading all best possible toys available in the market.

Lets take a pledge, that even if we have to compramise our dreams we will do as we to fulfill and nuture the dreams of generation next.

I wish and hope the best for all the kids world over.

Salaam Bachpan.

Thursday, December 13, 2007

मौत से मुलाकात

शाम अपनी अंगड़ाइयां ले रहा था रात की चादर फैलती जा रही थी ,मैं भी हंसी खुशी अपने दिल में नए उमंग नई दुनिया के लिए बढ़ते हुए कदम के सोच को लिए घर की तरफ आ रही थी बहुत खुश थी , नहीं मालुम क्यों ,शायद कोई मेरा इंतजार कर रहा हो। घर पहुंचते पहुंचते ये भ्रम टूटा सहसा एक आवाज ने मुझे झकझोरा ......ये बच्चे थे उनकी दर्द भरी आवाज ने कहा दीदी चाची की तबियत खराब है उनको ज़रा देख लो मैं गई वहां पर जो देखा दिल दहल गया सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बेतहाश होकर गिरी हुई अपनी जिंदगी के समाप्त होने का इंतजार कर रही थी । नहीं जानती थी मैं तब तक कि एक मातृत्व की भावना पर नारी की भावना हावी हो गई थी । लड़खड़ाते हुए जबान से मौत को पुकारती वो आवाज मेरे दिल को दहला गई । समझ नहीं आया क्या करू अचानक दिमाग में आया कि उसे बचा लो एक नारी को ना सही एक मां को बचा लो । छोटा अबोध बच्चा उसे क्या पता अगले पल क्या होने वाला है । अपने जीवन में ऐसा दृश्य मैने कभी नहीं देखा था पूछती रही घंटो तक उस मां से कि क्या हुआ है खुद को आपने क्या किया है पर मां की ममता शायद नारी भावना के आगे दम तोड़ रही थी इसलिए कुछ नहीं बोला उस मां ने । फिर सहसा बच्चे के प्यार भरे शब्द मम्मी ने उस औरत की आत्मा को झकझोरा औऱ उसने बोला मैने एसिड पीया है । इतना सुन मेरा दिल दहल गया आस पास कोई भी नहीं था, उस बच्चे की रुदन ने मेरे होश उड़ा दिए मैने दृढ़ निश्चय कर लिया कि आज एक मां को मौत के पास नहीं जाने दूंगी । मां न होते हुए भी मां की ममता का अहसास हो गया था मुझे । शायद भगवान उस मां को बचाना चाहता था ,तभी तत्काल उसका उपचार हो गया नहीं तो उस दर्द से छटपटाती मां को मौत को पुकारना मैं जिंदगी में नहीं भूल सकती शायद भगवान नहीं होते तो अगले पल का नजारा क्या होता यो सोचकर कांप जाती हूं । नहीं जानती थी कि आज मेरी मुलाकात एक भयावह मौत से होनी थी । तुलिका सिंह सीएनइबी ।

हिंसा की पाठशाला?

कल अख़बार उठाया तो फ्रंट पेज कि khabar ने dil dahla दिया। "gurgaon school mein गोली चली"- ये क्या? गोली का school से क्या vasta?
हो सकता है कुछ हे दिनों mein ये भी एक choti si ghatna मान के bhula di जाये- NITHARI भी शायद bhula दी गयीpaar ये ghatna कुछ sawal jaroor poochti है
हमारे yuva pidhi किस और ja रही है? kuon zimedar है? बाल मान mein इतनी हिंसा kyoun? इन sawalon का jawab jinti zaldi koj लिया jay, उतना acha।

Wednesday, December 12, 2007

Thanx+First post from me

Thanx to Parvez Sagar for accepting my request for membership. It will be very unwise of me , if i don't thank Tulika, whose post "Bekar Haath" inspired me to contribute to "Rangkarmi". Thanx a lot, Tulika. I will try to publish the best posts to maintain the high standards.

I also blog at "http://alok12345.blogspot.com". Plz visit n comment

Here is first post from me, which i got in mail and touched my heart deeply:-

Pause and ponder

A man came out of his home to admire his new truck.

To his puzzlement, his three-year-old son was happily hammering dents into the shiny paint. The man ran to his son, knocked him away, hammered the little boy's hands into a pulp as punishment. When the father calmed down, he rushed his son to the hospital. Although the doctor tried desperately to save the crushed bones, he finally had to amputate the fingers from both the boy's hands. When the boy woke up from the surgery & saw his bandaged stubs, he innocently said, "Daddy, I'm sorry about your truck." Then he asked, "but when are my fingers going to grow back?" The father went home and committed suicide. Think about the story the next time you see someone spill milk at a dinner table or hear a baby crying. Think first before you lose your patience with someone u love.

Trucks can be repaired. Broken bones & hurt feelings often can't. Too often we fail to recognize the difference between the person and the performance.

People make mistakes. We are allowed to make mistakes. But the actions we take while in a rage will haunt us forever.

ज़िन्दगी की धूप मे किसी का खो जाना............

ज़िन्दगी की धूप मे किसी का खो जाना इतना आसान नही होता किसी का दूर जाना ज़रुरत की ऐसी आज़माईश क्यों करते है जाने दूर होकर हज़ार शिकवे किससे करते है हर आहट जिसकी एक आदत मालूम होती है ना हो तो भी महसूस होती है ऐसी कसक जो याद के आईने मे भी ढल ना पायी और यूँ रह रह कर हर पल इतनी खामोशी के साथ तड़पाना ज़िन्दगी की धूप मे किसी का खो जाना माथे पर पसीने की बून्द बनकर अगर बह जाता मुमकिन है कुछ क्षण की ठण्ड़क पड़ जाती अब तो फरियाद की आस किसी से की नही जाती जो बन सकता तो बन जाता कोई अफसाना ज़िन्दगी की धूप मे किसी का खो जाना माधुरी

रिश्ते और आधुनिकता ?

मैं यह विचार तुलिका द्वारा लिखे गए लेख पर दे रहा हूँ । मैं आधुनिकता शब्द से शुरू कर रहा हूँ । आधुनिकता का अर्थ होता है कि हमारा विचार , रहन -सहन , हमारी सोच , आदि उच्च स्तर की हो । आज हमारा समाज अपनेआप को आधुनिक होने का दंभ भर रहा है । भौतिक साधनों का जो जितना उपभोग कर रहा है वह व्यक्ति उतना ही आधुनिक कहला रहा है । लेकिन ऐसा नही है । आज लोगों के बिच संचार नही हो पा रहा है , दूरियां बढाती जा रही हैं , सोच संकीर्ण होते जा रहें हैं , रिश्तों की मिठास पैसे तय कर रहे हैं , लोगों का जीवन एकाकी होता जा रहा है , रिस्तें विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं ? यह हमारे समाज का संक्रमण काल चल रहा है । मानसिक , आर्थिक , शारीरिक , व्यवहारिक रुप से व्यक्ति बदलाव के संक्रमण से संक्रमित होता जा रहा है । तुलिका जी आपके प्रश्न का उत्तर यही है कि हमारा समाज जितना आधुनिक दिखने की कोशिश कर रहा है यदि उतना ही प्रयास अपनी मानसिकता को आधुनिक बनने में करता तो सायद पुलिस , न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष को किसी के जातीय मामले में दखल देने की जरूरत नही पड़ती । अच्छा यही होगा की हम भौतिक रुप से आधुनिक बनने के वजाय मानसिक रुप से आधुनिक बने तब जाकर हम जिंदगी को जी सकेंगे , हमें रिश्तों को ढोना नही पड़ेगा , ख़ुशी -ख़ुशी जीवन व्यतीत हो जाएगा , रिश्तों पर विश्वास करने के लिए किसी पैमाने की जरूरत नही पड़ेगी ।

रिश्तों की डोर अब कानून के हाथ ?

हाल ही में एक खबर आयी थी कि एक पत्नी ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसेक पति ने शादी की पहली रात उसका बलात्कार किया । सच बोलू खबर देखते ही पहले पल में मुझे हंसी आयी कि ये क्या आरोप है ॥ लेकिन अगले ही पल ज़हन में कई सवाल उठे जिसे मैं आप लोगो के सामने रखना चाहती हूं क्योंकी मुझे इसका उत्तर नहीं मिला । मेरा पहला सवाल क्या पति पत्नी के रिश्तें की डोर अब पूरी तरह से कानून के हाथ में आ चुकी है ? क्या सारे दायरे और मर्यादा आधुनिकता के नाम पर बाजार में आ गये है ? प्रेम और विश्वास की जगह कानून की धाराओं ने ले लिया है ? क्या कोई ऐसा पैमाना है जिसे हम अगले पर भरोसा कर सके ? बार बार टूटते विश्वास के सहारे जिंदगी को कहां तक ले जाएं ? मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरे इन सवालो के जवाब मुझे रंगकर्मी पर ज़रूर मिलेंगे । तुलिका सिंह, सीएनईबी

Tuesday, December 11, 2007

आँखों का बाँध

न आया करो मेरे पास मैं क्यों और कौन क्या रखा मेरे पास चले जाओ यंहा से बस छाया घुप अँधेरा न कोई बस्ती न हस्ती न कोई किनारा यंहा मत आया करो, भर नैनो का कटोरा नहीं मिलती प्रेम भीख मुझे बहलाने से भी चले जाओ वर्ना टूट न जाये मेरे आँखों का बाँध कीर्ती वैद्य

एक छोटा सा जनगीत

"इप्टा" के साथ रहकर कई तरह के नुक्कड़ नाटक किये। नाटक शुरु करने से पहले अक्सर पव्लिक को इक्कठा करने के लिये जनगीत गाया करते थे। जब भी जनगीत गाते तो अच्छा लगता था। हमारे कई साथी थे जो गाना नही जानते थे लेकिन जनगीत सुनने के बाद वो भी गाने लगे। ऐसा ही एक गीत था जिसकी कुछ पंक्तियां यहां डाल रहा हूँ। अच्छी लगे तो बताईगा। ग़र हो सके तो अब कोई शमां जलाईये, इस दौर-ए-सियासत का अन्धेरा मिटाईये। ............................................................ बन्द कीजिये आकाश मे नारे उछालना, आईये हमारे कांधे से कांधा मिलाईये। ............................................................. चुपचाप क्यों हैं आप जब ये देश जल रहा, पानी से नही आग से इसको बुझाईये। .............................................................. परवेज़ सागर

Monday, December 10, 2007

हिन्दी काव्य के एक संघर्षशील युग का अन्त


देश के जाने-माने हिंदी के प्रमुख कवि त्रिलोचन शास्त्री का निधन हो गया है। वह 90 वर्ष के थे और पिछले काफ़ी समय से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे। उनका असली नाम वासुदेव सिंह था। उनका जन्म 20 अगस्त 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के गांव चिरानी पट्टी में हुआ था। उन्होंने रविवार की शाम उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद स्थित अपने आवास पर अपनी अंतिम सांस ली। कवि त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। हिंदी में ‘सॉनेट’ को स्थापित करने का श्रेय त्रिलोचन शास्त्री को ही जाता है। उन्होंने करीब 550 सॉनेट की रचना की थी। हिन्दी काव्य जगत से जुड़े सभी लोग उनके निधन से दुखी है। उनका अन्तिम संस्कार राजधानी के निगमबोध घाट पर दोपहर एक बजे किया गया। इस मौके पर दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित समेत साहित्य और हिन्दी काव्य से जुड़े कई विद्वान मौजूद थे। रंगकर्मी परिवार हिन्दी काव्य के पुरोधा श्री त्रिलोचन शास्त्री को श्रद्धांजली अर्पित करता है।

रंगकर्मी परिवार

ज़रा सोचिये.... क्या होगा.......?

हमारे साथी अनुराग और गरिमा बधाई के पात्र है। उन्होने अपनी पोस्ट के ज़रीये जो जानकारी दी है वो असाधारण है। जिन समस्याओं का ज़िक्र इन पोस्ट मे किया गया है। वो आने वाले वक्त मे भारत के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकती है। लेकिन अभी आमतौर पर हम सभी इन सारी बातों से अन्जान है। ग्लोबल वार्मिंग की शक्ल मे एक बड़ी समस्या दुनिया के सामने मुँह खोले खड़ी है। इससे लड़ने के लिये हम सबको एकजुट होकर सामुहिक प्रयास करने होगें। ज़रुरत इस बात की है कि हम सभी पर्यावरण को बनाये रखने के लिये सम्भावित कोशिशें जारी रखें। पर्यावरण सुरक्षित होगा तो हम सुरक्षित होगें। अगर इस तरफ ध्यान नही दिया गया तो आने वाली पीढियां हमे कभी माफ नही करेंगी। उम्मीद है अनुराग और गरिमा इसी तरह से सभी को जागरुक करने की मुहीम चलाती रहेंगें। परवेज़ सागर

Cartoons portraying Indian polity!!!!!!!!!




























Cartoons portraying Indian polity!!!!!!!!!

















How Global Warming will Affect India?

How Global Warming will affect India We keep reading about rising temperatures and sea-levels in other parts of the world like United States and the UK, but actually India is one of the most vulnerable countries when it comes to effects of global warming. India has a vast coastal line and the rising sea levels caused by global warming will cause an ecological disaster. This is according to a 1989 United Nations Environment Programme study.As this article explains: “In India, the signs already back up forecasts that as the mercury rises the Indian subcontinent, home to one-sixth of humanity, will be one of the worst-affected regions.” Bengal will sufferThe Himalayan glaciers have started to melt and the average rate of retreat is almost twice (34 metres) per year as compared to the 1971 levels of 19 metres. The melting glaciers will cause temperatures and sea-levels to rise and there will be a cascading effect on the crops and the monsoons. Worse - whole islands are expected to vanish! In fact two have already gone under - two islands in the Sunderbans, an area which India shares with Bangladesh. Temperatures in the group of islands has already gone up by one degree centigrade. You can get the details here. A quote: “Rising sea levels have submerged two islands in the Sunderbans, where tigers roam through mangrove forests in the Ganges River delta, and a dozen more islands are under threat…official records list 102 islands on the Indian side of the vast Sunderbans…but scientists found that two have been swallowed up.” And this msn site talks about a six year study which has reported that 10,000 people have already been displaced.Rising sea-levels will be a disasterWhile some climatologists say that sea levels will increase by just 4-35 inches from 1990 levels in another hundred years…some feel that the range could be higher - 20-55 inches. Thats a lot and will affect human habitat in a big way.In fact, as far back as 1993 a study to evaluate the impact of rising sea levels on India was carried out by JNU (Jawaharlal Nehru University). They calculated what would happen if the sea-levels rose by just 1 metre…and they found that as many as 7 million people would be displaced and 5,764 sq km of land and 4,200 km of roads would be lost!Orissa will suffer tooOrissa is another state which is already being hit hard by global warming. Whole villages in the coastal regions are disappearing. As this article explains: “As village after village in Orissa’s coastal Kendrapara district vanishes into the Bay of Bengal, one thing is clear: sea levels are rising …the state’s geographical location at the head of the Bay of Bengal, with a landlocked sea and a deltaic plain, makes the state extremely vulnerable to rises in sea level caused by global warming.” In September 2002, scientists at the National Centre for Agricultural Economics and Policy Research conducted a people’s perception survey on climate-induced natural disasters in the Kendrapara district of Orissa. The results showed that the frequency and intensity of droughts have increased and so have the incidents of flooding. Also, the intensity of cyclones has increased and people believed that the sea-water had become warmer.These poor villagers do not know why this is happening but climatologists know why. Global Warming. Ironically these poor villages hardly contribute to global warming…they hardly emit any greenhouse gases. There is an interesting chart at this site and it shows that the countries which contribute the maximum to global warming per capita are Australia, Canada and the United States.Why is only the east coast of India being affected?This is because the Bay of Bengal is landlocked from three sides and there is a huge delta of the rivers Brahmaputra and the Ganga. These rivers will carry the water from the melting Himalayan snows. However this does not mean that the western coastal regions are immune…just that the eastern coast is more vulnerable at this stage.So what are these green house gases which are causing the snows to melt?According to the Wiki greenhouse gases are “include water vapor, carbon dioxide, methane, nitrous oxide, and ozonecomponents of the atmosphere that contribute to the greenhouse effect. Some greenhouse gases occur naturally in the atmosphere, while others result from human activities. Global warming and India ANAND PATWARDHAN GLOBAL warming has emerged as one of the most important environmental issues ever to confront humanity. This concern arises from the fact that our everyday activities may be leading to changes in the earth’s atmosphere that have the potential to significantly alter the planet’s heat and radiation balance. It could lead to a warmer climate in the next century and thereafter, portending a potpourri of possible effects – mostly adverse. International efforts to address this problem have been ongoing for the last decade, with the Earth Summit at Rio in 1992 as an important launching point, and the Conference of Parties in Buenos Aires in 1998 as the most recent step. Although India as a developing country does not have any commitments or responsibilities at present for reducing the emissions of greenhouse gases such as CO2 that lead to global warming, pressure is increasing on India and other large, rapidly developing countries such as China and Brazil to adopt a more pro-active role. At the same time, the developed countries of the North are trying to limit the extent of their commitments for emission reduction. In this situation, the public and policy makers need to be aware of the ramifications and implications of the global warming problem, even if it is a problem that may manifest itself only sometime in the next century. What is climate change? Climate change is a newcomer to the international political and environmental agenda, having emerged as a major policy issue only in the late 1980s and thereafter. But scientists have been working on the subject for decades. They have known since the 19th century that carbon dioxide (CO2) in the atmosphere is a ‘greenhouse gas’, that is, its presence in the atmosphere helps to retain the incoming heat energy from the sun, thereby increasing the earth’s surface temperature. Of course, CO2 is only one of several such greenhouse gases in the atmosphere. Others include methane, nitrous oxide and water vapour. However, CO2 is the most important greenhouse gas that is being affected by human activities. CO2 is generated by a multitude of processes ranging from animal and plant respiration to the burning of any kind of fuel containing carbon, including coal, oil, wood and cow dung. For a long time, human activities that generated CO2 caused only a small perturbation in the natural cycle of the gas. However, since the Industrial Revolution when our usage of fossil fuels increased dramatically, the contribution of CO2 from human activities has grown large enough to constitute a significant perturbation of the natural carbon cycle.1 Since the early ’50s, as regular measurements of the atmospheric concentrations of CO2 were started, it has been conclusively established that these concentrations are increasing rapidly, driven by human activities. The concentration of CO2 in the earth’s atmosphere was about 280 parts per million by volume (ppmv) in 1750, before the Industrial Revolution began. By 1994 it was 358 ppmv and rising by about 1.5 ppmv per year. If emissions continue at the 1994 rate, the concentration will be around 500 ppmv, nearly double the pre-industrial level, by the end of the 21st century. The concentrations of other greenhouse gases such as methane and nitrous oxide have also been rising at a fairly rapid rate. The effect is that the atmosphere retains more of the sun’s heat, warming the earth’s surface. Of course, not all man-made additions to the atmosphere increase warming. For example, aerosols, tiny particles of solid or liquid suspended in the air, which result from the emissions of soot and sulphur dioxide from power plants tend to reflect heat and diminish warming. But aerosols are mostly short-lived while the CO2 released into the atmosphere will stay there for decades. At the same time, concern about local air quality is driving many countries to impose stringent controls on emissions of substances such as sulphur dioxide. As a result, many scientists feel that even as these emissions decrease in the future, the full effect of the greenhouse gases will be unmasked, leading to an even more rapid warming pattern. While the pattern of future warming is open to debate, it is indisputable that the surface of the earth has warmed, on average, 0.3 to 0.6 degrees celsius since the late 19th century when reliable temperature measurements began. Recent decades appear to be the warmest since at least 1400, according to the fragmentary information available. It is against this backdrop of knowledge that the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) concluded in its second assessment report in 1995 that the current state of knowledge ‘now points towards a discernible human influence on global climate.’ In this assessment report, the IPCC also concluded that under the existing scenarios of economic growth and development leading to greenhouse gas emissions, on a worldwide average, temperatures would rise by 1 to 3.5 degrees celsius by the year 2100, and global mean sea level by about 15 to 95 centimeters. It is likely that changes of this magnitude and rapidity could pose severe problems for many natural and managed ecosystems, as well as important economic sectors such as agriculture and water resources. Indeed, for many low-lying and deltaic areas and small islands, a sea level rise of one meter could threaten complete loss of land and extinction of habitation. Scenarios of future climate change are usually developed using complex 3-dimensional models of the earth’s atmosphere and oceans. However, while we have some degree of confidence in the gross or aggregate estimates for climate parameters (such as globally averaged surface temperature) from these models, there is a great deal of uncertainty with regard to regional details. In addition, most of the ill effects of climate change are linked to extreme weather events, such as hot or cold spells of temperature, or wet or dry spells of rainfall, or cyclones and floods. Predictions of the nature and distribution of such events in a changed climate are even more uncertain, to the extent that virtually no authoritative predictions exist at all. Despite these uncertainties, it is clear that even the possibility of changes in such extreme events is quite alarming. Global warming has often been described as one of the most serious environmental problems ever to confront humanity, as this problem is inextricably linked to the process of development and economic growth itself. Since greenhouse gases are generated by burning fossil fuels as in power plants, factories and automobiles, it is not easy to reduce emissions, since virtually every facet of our lives is intimately tied to the consumption of energy. Climate change is an unusually difficult issue for the people who make the decisions in democratic governments. First of all, the science is uncertain while governments have to make firm policy decisions, if only the decision to do nothing, long before these uncertainties can be resolved. Political leaders are already beginning to overstate the clarity of the science in order to attract public support. A lot of money is now going into climate research, and new findings with varying political implications will continue to appear. Any serious attempt to cut emissions will have clear and immediate costs, but the benefits may not appear for a long time. To the extent that the benefits may be disasters that didn’t happen, they may never be obvious. But the costs will be. As the debate develops, much of it is being cast in terms of the restraint that the present generation owes to future generations. Unlike many other environmental issues, such as local air or water pollution, or even stratospheric ozone depletion caused by chloroflourocarbons (CFCs), global warming poses special challenges due to the spatial and temporal extent of the problem – covering the globe and with decades to centuries time scales. Again, in this particular issue, science has played, and continues to play, a critical role in defining the structure and basis of the debate. The following three dimensions of the issue illustrate the vexing features of the science underlying the problem: i) Cumulative effect of the historical emissions. The climate system acts as a large integrator, that is, the response of the system is a result of the entire history of the forcing being applied. ii) Lags in the system. The response of the ocean-atmosphere system occurs several decades to centuries after the changes in the atmospheric greenhouse gas concentrations. As a result, even if emissions of greenhouse gases were stabilised immediately, it would take many years for the climate system to reach a new quasi-steady state, and some changes (such as sea level rise) would continue to happen. iii) The actual consequences of climate change are likely to exhibit considerable spatial and temporal variability – thus some regions may actually experience a transition to a milder, warmer, wetter, and overall better climate regime. As a result, there are costs as well as benefits associated with climate change; although the scientific consensus is clearly that the overall effects are likely to pose a significant burden. How have we tried to respond to climate change? Negotiations began in 1991 under United Nations auspices to formulate an international treaty on global climate protection. Those negotiations resulted in the completion by May 1992 of a Framework Convention on Climate Change (FCCC). The Convention was opened for signature at the Earth Summit in Rio de Janeiro in June 1992, and it entered into force in March 1994. The Convention has few binding requirements. It calls for nations to limit carbon dioxide and other greenhouse emissions, by ‘addressing anthropogenic emissions by sources and removals through sinks of greenhouse gases….’ It does not set out specific targets or timetables for reducing emissions. It only requires the developed country signatories to formulate and adopt policies that aim at stabilising greenhouse gas emissions at 1990 emission levels, recognising that ‘the return by the end of the present decade to earlier levels of anthropogenic emissions… would contribute to… modifying longer term trends in anthropogenic emissions consistent with the objective of the Convention… to achieve… stabilisation of greenhouse gas concentrations in the atmosphere at a level that would prevent dangerous anthropogenic interference with the climate system.’ The Convention adopted the notion of common but differentiated responsibility, recognising that the global climate was a common resource and responsibility, but that there were clear asymmetries between the developed and the developing countries in terms of both the past and present contributions to the problem as well as the resources to respond to it. That is, the developed countries are, by far the largest emitters of CO2 and other greenhouse gases. At the same time, they also have the technical and financial resources to try and reduce their emissions. Two broad groupings of countries emerged after the Convention, the countries listed in Annex-1 of the Convention, or the developed countries, and the others. Countries such as Russia or Ukraine (parts of the former Soviet Union) although a part of the Annex-1 countries are placed in a special category as Economies in Transition. At the time of the Rio Summit, proponents of more specific, legally binding targets and timetables for reducing greenhouse gas emissions successfully urged follow-on talks leading to future negotiation of a protocol or other legal instrument in order to strengthen the Framework Convention. In 1995, the Parties to the Framework Convention at their first meeting in Berlin, Germany, declared that commitments made in 1992 to reduce greenhouse gas emissions were inadequate to meet the objective of the Convention. So-called ‘next steps’ were needed to confront the potential of global warming in the post-2000 time frame. Consequently, the Parties agreed to a process, set forth in their ‘Berlin Mandate’, of analysis and assessment of just what next steps might be taken to limit greenhouse gas emissions. This process resulted in the negotiation of a protocol, the final details of which were completed at the third meeting of the Conference of the Parties to the Framework Convention held 1-12 December 1997, in Kyoto, Japan. The Kyoto Protocol to the United Nations Framework Convention on Climate Change commits industrialised nations to specific, legally binding emission reduction targets for six greenhouse gases: carbon dioxide, methane, nitrous oxide, hydrofluorocarbons, perfluorinated compounds, and sulfur hexafluoride. The protocol was opened for signatures on 16 March 1998. International political implications have proven significant. By far the majority of greenhouse gases are emitted by sources in industrial and transportation sectors (especially automobiles) that are concentrated in developed countries. These countries have shown concern not only about their own emissions, but about increased emissions from poorer countries as they expand their economies. Friction has been evident in the debates over which actions, by developed and developing countries should be undertaken, on what schedules, and which parties should pay incremental costs for mitigation measures. Developing countries generally have argued that the financial burden of change should be borne by developed countries, which are mainly responsible for current atmospheric change due to human activity. As the Framework Convention (FCCC) states, the basic goal of the negotiation process is to return the concentrations of greenhouse gases to a level that prevents dangerous anthropogenic interference with the climate system. The simplest way of conceptualising this goal is to consider a target or limit for the atmospheric concentrations of the greenhouse gases set at a level that does not lead to unacceptable climate change.2 Of course, since our ability to predict future climate change is very limited, the notion of what is ‘unacceptable’ is itself quite imprecise and fuzzy. In this conceptualisation, the economic activities in different countries that lead to greenhouse gas emissions correspond to this limit or resource being used up. The entire negotiation process then may be regarded as an effort to address the following three questions: (i) What exactly is the limit, and how should it be defined? (ii) What is the basis that ought to be used for the manner in which different countries can use up this resource? (iii) What are the instruments that could be used to divide up and actually distribute this resource to the different countries once the allocation basis has been determined? The first question centres around the level of atmospheric concentrations that would be considered acceptable in view of the possible consequences of climate change. A related issue is whether the limit would be specified individually for each greenhouse gas, or whether some sort of a ‘basket’ approach could be used where countries could trade-off amongst the different gases. This issue depends critically on whether the effects of the different gases could be made commensurate with each other through a set of equivalences3 and if greater flexibility or economy would be obtained. It has also been suggested that rather than concentrate on the greenhouse gas concentrations, it may be better to focus on the sinks for these gases – which is primarily the terrestrial biosphere and the oceans. The second question centres around the basis for the allocation and is currently the subject of much debate. Large, populous developing countries like India and China would clearly favour a per capita basis, as it gives them the greatest scope for increasing emissions further in their development processes. The final question deals with the approach to be followed once the allocations have been determined. A large variety of market based instruments such as taxes and tradable permits have been deployed for conventional pollutants such as sulphur dioxide and there is much research on their applicability in the climate context. However, the key issue to recognise here is that any instrument will necessarily have to address large scale technology and monetary transfers since developing countries could, in principle, ‘sell’ their allocations to the developed countries. For India, the climate change issue has several ramifications: First, although India does not currently have any obligations under the Convention to reduce its greenhouse gas emissions, international pressure will keep increasing in this regard. It is therefore important for us to develop a clear understanding of our emission inventory. We also need to document and analyse our efforts in areas such as renewable energy, wasteland development and afforestation – all of which contribute towards either reducing CO2 emissions or increasing CO2 removal from the atmosphere. Considering that these efforts may often be undertaken for a variety of reasons not directly related to global warming, but yet have benefits as far as climate change is concerned, we may be able to leverage such efforts in the international context. Second, we need to develop a clear and well articulated position on each of the three basic questions indicated earlier. This position needs to be supported by appropriate analysis. The Indian research community could contribute substantially in this regard. Finally, we need to recognise that even if countries do undertake immediate and rapid action to reduce their emissions, some degree of climate change is inevitable. If we consider the fact that we have very limited abilities to deal with weather extremes in the present day, the situation may get worse in the future. Therefore, we need to significantly improve our ability to plan and adapt to extreme events such as floods, droughts, cyclones and other meteorological hazards. Any robustness that we build into the system in this regard will always stand us in good stead, no matter what climate change actually transpires. Footnotes 1. For example, over 700 billion tons of CO2 cycle annually through the biosphere. The anthropogenic contribution in this cycle is around 24 billion tons. Though the natural cycles are finely balanced, this is still a significant perturbation as it leads to an accumulation of CO2 in the atmosphere. 2. For example, a value for long term atmospheric CO2 concentration of 500-550 ppmv has often been used in the discussions. This value then defines the size of the resource that can be ‘used up’. 3. Equivalences have indeed been suggested in the form of ‘global warming potentials’, an index that attempts to capture the ability of each gas to cause changes in the climate system. However, since different gases have different lifetimes in the atmosphere, and since the entire history of forcing is important, this becomes a fairly complex problem. References Authoritative reviews of the science underlying the climate change issue are provided by the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC). See, for example: J.T. Houghton, et. al. eds., Climate Change 1995: the science of climate change. Cambridge University Press, 1996; and, James P. Bruce, et. al., eds., Climate Change 1995: economic and social dimensions of climate change. Cambridge University Press, 1996. The IPCC also maintains a website at www.ipcc.ch. A good introduction to the costs of reducing emissions is provided by Robert Repetto and Duncan Austin, The Costs of Climate Protection: a guide for the perplexed, World Resources Institute, Washington, 1997. The Framework Convention secretariat operates a website at www.unfccc.de, which provides very complete information on the entire negotiation process, as well as the actual Convention and Protocol documents.

Tiger versus Dragon

Tiger versus Dragon: the debate hots up China is ahead on economic growth, but India's democracy and creativity could be its secret weapon, argues OneWorld UK's East Asia correspondent Nury Vittachi Quick: Name the huge Asian country which is set to become a dominant global economic force powered by the world’s largest population. Hands up all those who said China. The answer, actually, is India. China is set firmly on the road to having the world’s second biggest population; not the largest. That particular Number One Ranking is on its way from China to India, where it is due to arrive in about 20 years and settle for the foreseeable future. And the numbers don’t include India’s neighbour Pakistan, which is expected to become the fourth most populous country on the planet by 2050. Or put it this way: by 2050, India and Pakistan together will have more people (1.95 billion) than all the African countries put together (1.9 billion), according to the UN Population Division. Ah, India may be more populous than China, but it will never be richer, goes the argument, with east Asians waving copies of a 2003 issue of The Economist, the cover story of which was entitled: “China vs India: A Tiger Falling Behind a Dragon.” This debate has been raging for years, and more recent cover stories in Time and Newsweek, not to mention debates in thousands of Internet chatrooms, are keeping it burning brightly. The latest batch of fuel thrown onto the fire was India’s dramatic decision in the past week to allow a freer flow of cash — capital in economists’ jargon — in and out of the country. But while the most common analytical technique have been to compare growth figures of each nation’s gross domestic product, there are other measures, such as infrastructure, in which China is ahead, and personal freedoms, in which India is ahead. Arguably the most intriguing of these, although the hardest to pin down, is each country’s place in the race to create free, self-governing, independent societies. India is undeniably ahead on democracy, which is widely seen as a force which adds creativity and dynamism to an economy: but there are arguments as to whether this is an advantage or a disadvantage. Economists such as Thailand-based Dr. Marc Faber have said Chinese leaders can demonstrate that their imperviousness to individual rights is an advantage. If they want to clear a residential district and rebuild it as a business park, they go ahead and do it. Changes in public policy are implemented by rubber-stamp legislatures. In contrast, India follows a Western system of law, which has respect for property and individual rights—doing almost anything takes longer, and involves consultations, campaigns and potential delays. Yet at the same time a big-picture macro examination of historical development across the globe reveals that on large timescales, the opposite is almost always true: democracy, freedom of speech and the rule of law are strongly associated with long-term, steady, sustainable economic growth. To give a concrete example, inflexible China may have a huge population and resource base, but its economy has only recently overtaken that of Britain – which is a tiny place in terms of population and resources, yet has an over-large portion of the economic dynamism associated with free societies. The other difficulty in comparing India and China is the entrenched emotion involved, with the two giants uncomfortably sharing a border. This is compounded by a lack of debating experience on the Chinese side. While Indians often engage in self-criticism, Chinese contributors to physical or virtual forums are conditioned never to criticise their motherland. “Very soon you will find out how far behind India will be,” threatens a writer who signs himself “Chinese” in a typical on-line forum on the topic. The present writer, whose immediate family is approximately 50 per cent south Asian and 50 per cent Chinese, may be better placed than most commentators to offer an unbiased view. In this regard, I offer the following informal, impressionistic and totally arbitrary list of comparisons: * Roads in Chinese cities get you where you are going; roads in Indian cities are often interrupted by bullocks, demonstrations or encampments. * In China, business visitors need a translator; in India, officials and business people are dazzlingly fluent in English. * Chinese hotels have a slick talent for fleecing guests; Indian hotels are friendlier but noticeably less efficient. * In China, officials know how their system works; Indian executives have more of a feel for how the world works. * Buildings are thrown up in China seemingly overnight; in India, they often take years to creep into place. * China’s bureaucracy seems more efficient than India’s on the surface, but is more mysterious and labyrinthine once you get under the skin. * In China, you feel your freedom is limited by government power; in India, you feel it is limited by corruption. * In China, people are nihilistic, unable to shape their own society; in India, people come across as empowered by the ballot box. * People in China come across as anxious and restless; in India, people are happier, comforted by religion and ritual. * Huge swathes of China are locked in a timeless, rural way of life; in this respect, India is exactly the same. It is impossible to referee this particular prize-fight: the variables are too many and too diverse. There are a number of commentators who say India’s rate of economic growth will overtake China’s as soon as 2008; there are at least an equal number who say that China’s will remain ahead indefinitely. Although I live in China, I cannot help but notice one intriguing factor: there’s a clear link between creativity and societal freedom. India has both, in large measure; China has neither. A case in point: only in humourless China could a pop record have been released entitled: “When I Grow Up I Want to be a Peasant.” It wasn't a hit.

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