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Wednesday, January 2, 2008

बाबुल

नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहते पर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहते इसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने में जहाँ तेरे संग बिताए सारे पल है रहते होठों पर सजाई हँसी,ताकि तू ना रोए इन आखरी लम्हों को,हम रखेंगे संजोए आज अपनी लाड़ली की कर रहे हो बिदाई क्या एक ही दिन मे, हो गयी हू इतनी पराई जानू मेरे जैसा तेरा भी मन भर आया चाहती सदा तू बना रहे मेरा साया वादा करती हूँ निभाउंगी तेरे संस्कार तेरे सारे सपनो को दूँगी में आकार कैसी रीत है ये,के जाना तेरा बंधन तोड़के क्या रह पाउंगी बाबुल, मैं तेरा दामन छोड़के.

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