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Thursday, January 3, 2008

वही पलाश के फूल लाना तुम

वही पलाश के फूल लाना तुम चले जो कभी लहराती हवाये काया को मृदुसी छुकर जाये हमारी छुअन का आभास कराये हमारी याद दिल को सताए बिन बुलाये पास चले आना तुम जो हमारे प्यार के गवाह सदा है साथ वही पलाश के फूल लाना तुम | कभी जो बहारों का मौसम आये रंगो से सारी अवनी सज जाये हमारी ख़ुशबू का आभास जताए हमसे मिलन को तरसाए याद कर हमे यूही मुस्कुराना तुम जो हमारे साथ महके सदा है साथ वही पलाश के फूल लाना तुम | कभी जो पुकारे बेसुद घटाए प्यार की बुन्दो को बरसाए हमारी बाहो का आभास कराए हमारी तन्हाई और बढ़ाए प्यार की सुरीली मेहफ़ील सजाना तुम जो हमारे संग गाते सदा है साथ वही पलाश के फूल लाना तुम | कभी जो नभ पर चाँद आये अपनी शीतल चाँदनी बिखराये हमारे अक्स का आभास कराए हमे देखने जिया मचल जाये पलको में अपनी हमे बसाना तुम जो हमारे साथ रौशन सदा है साथ वही पलाश के फूल लाना तुम |

5 comments:

tulika singh said...

apki sari kavita maine padhi hai aap ke andar ke ahsas apki kavitao mai bakhubi dikhti hai plz aap humesha likhte rahiye . hume apki sari kavita pasand aayi .

mehek said...

tulikaji,hum apke tahe dil se hsukrasar hai,apne ne itna keh diya,hume sare jahan ki khushi mili.

अनुराग अमिताभ said...

वाह महक जी प्रेम की सात्विकता,को पलाश के साथ बाँधना,प्रियतमा से उम्मीद महज़ एक फूल की अपने आप में विरह की वेदना की अनूभति का नितांत सुँदर वर्णन है।
आपकी कविता पंत के मनोभावों का एक अवयस्क रूप है।
सुंदर अति सुँदर प्रयास।

अनुराग अमिताभ said...

मुझे अति प्रसन्नता है कि हिंदी काव्य जीवित है नौजवानों के रूधिर में
,तुलिका,समृति की परंपरा की अगली कडी के रूप में महक आपका वंदन अभिनंदन और आप से निवेदन की हिंदी की वेदना का अनुभव कर अपने काव्य को अधिकाधिक हिंदीं में उकेरें।

Keerti Vaidya said...

bhut khoob.....

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