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Thursday, January 3, 2008

रंग्कर्म और रंगकर्मी

यूं तो मैं "रंगकर्मी" से काफ़ी समय से जुड़ा हुआ हूं पर आज पहली बार आप सभी बुद्धीजीवियों के बीच में कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूं. क्यूंकि मैं ये समझता हूं कि मैं चाहे और कुछ भी हूं एक अच्छा लेखक तो नहीं ही हूं. रंगकर्म....पहली बार ये शब्द सुना था जनवरी 1998 में जब मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ रंकर्मियों से परिचित कराया (परवेज़ भी उन्हीं में से एक थे). इन सब से मिलकर बहुत अच्छा लगा...अच्छा इसलिये नहीं लगा क्यूंकि ये लोग नाटक करते हैं बल्कि इसलिये कि "ये" लोग सिर्फ़ नाटक नहीं करते....वो शायद इसलिये क्यूंकि मैं सिर्फ़ रंगकर्मियों से नहीं बल्कि "भारतीय जन नाट्य संघ - इप्टा" के क्रन्तिकारियों से मिल रहा था. बिना एक भी दिन गंवाये, मैं भी इस आनदोलन का हिस्सा बन गया. और ये उस पहली मुलक़ात का ही असर है कि दस साल बाद भी "रंगकर्म" का मतलब मेरे लिये आन्दोलन ही है और रंगकर्मी, क्रन्तिकारी. वैसे रंगकर्म तो हमारे देश में बिना किसी मक़सद के भी होता है....ख़ैर छोड़िये! पहली पोस्ट है इसलिये ज़्यादा नहीं लिखूंगा...लेकिन हां एक जनगीत तो बनता है...आख़िर "रंगकर्मी" पर हूं.... this used to be one of my favorites.... एक हमारी और एक उनकी, मुल्क़ में हैं आवाज़ें दो, अब तुम पर है कौनसी तुम आवाज़ सुनो तुम क्या मानो. हम कहते हैं जात धर्म से इन्सां की पहचान ग़लत, वो कहते हैं सारे इन्सां एक हैं ये ऐलान ग़लत, हम कहते हैं नफ़रत का जो हुक़्म दे वो फ़रमान ग़लत, वो कहते हैं ये माने तो सारा हिन्दोस्तान ग़लत. हम कहते हैं भूल के नफ़रत प्यार की कोई बात करो, वो कहते हैं ख़ून ख़राबा होता है तो होने दो. एक हमारी और एक उनकी, मुल्क़ में हैं आवाज़ें दो, अब तुम पर है कौनसी तुम आवाज़ सुनो तुम क्या मानो. हम कहते हैं इन्सानों में इन्सानों से प्यार रहे, वो कहते हैं हाथों में त्रिशूल रहे तलवार रहे, हम कहते हैं बेघर बेदर लोगों को आबाद करो, वो कहते हैं भूले बिसरे मन्दिर मस्जिद याद करो. हम कहते हैं रामराज में जैसा हुआ था वैसा हो, वो कहते हैं ख़ून ख़राबा होता है तो होने दो. एक हमारी और एक उनकी, मुल्क़ में हैं आवाज़ें दो, अब तुम पर है कौनसी तुम आवाज़ सुनो तुम क्या मानो. अब तुम पर है कौनसी तुम आवाज़ सुनो तुम क्या मानो. अब तुम पर है कौनसी तुम आवाज़ सुनो तुम क्या मानो. धन्यवाद गौरव!

3 comments:

अंकित माथुर said...

प्रयास काफ़ी जानदार है, लिखते रहो,
बुद्धिजीवी कोई नही, और सभी हैं।
पहल करना ही अपने आप में एक
सराहनीय कदम है।

गौरव शर्मा said...

अभिप्रेरण के लिये धन्यवाद अंकित.

Parvez Sagar said...

प्रिय मित्र आपकी पोस्ट देखकर प्रसन्नता हुई... उम्मीद है आप इसी तरह से रंगकर्मी से जुड़े लोगों का ज्ञानवर्धन करते रहेगें। इसी विश्वास के साथ.....
तुम्हारा परवेज़ सागर

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