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Sunday, November 30, 2008

दे जाना चाहता हूँ तुम्हे

ऊब और उदासी से भरी इस दुनिया में पांच हंसते हुए सालों के लिए देना तो चाहता था तुम्हे बहुत कुछ प्रकृति का सारा सौंदर्य शब्दों का सारा वैभव और भावों की सारी गहराई लेकिन कुछ भी नहीं बच्चा मेरे पास तुम्हे देने के लिए फूलों के पत्तों तक अब नहीं पहुंचती ओस और पहुँच भी जाए किसी तरह बिलकुल नहीं लगती मोतियों सी समंदर है तो अभी भी उतने ही अद्भुत और उद्दाम पर हर लहर लिख दी गयी है किसी और के नाम पह्दों के विशाल सीने पर अब कविता नहीं विज्ञापनों के जिंगल सजे हैं खेतों में अब नहीं उगते स्वप्न और न बंदूकें ... बस बिखरी हैं यहाँ-वहां नीली पद चुकीं लाशें सच मनो इस सपनीले बाज़ार में नहीं बचा कोई दृश्य इतना मनोहारी जिसे दे सकूँ तुम्हारी मासूम आँखों को नहीं बचा कोई भी स्पर्श इतना पवित्र जिसे दे सकूँ तुम्हे पहचान की तरह बस समझौतों और समर्पण के इस अँधेरे समय में जितना भी बचा है संघर्षों का उजाला समेटकर भर लेना चाहता हूँ अपनी कविता में और दे जाना चाहता हूँ तुम्हे उम्मीद की तरह जिसकी शक्ल मुझे बिलकुल तुम्हारी आँखों सी लगती है

अशोक कुमार पाण्डेय

http://asuvidha.blogspot.com

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