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Monday, December 1, 2008

शेखी बघारतें हैं

---- चुटकी---- वो हमें जब चाहें घर में घुसकर मारते हैं, और फ़िर हम लुटी पिटी हालत में अपनी बहादुरी की शेखी बघारतें हैं। ---- इस बात पर हँसी आती है, कि पाटिल में शर्म और नैतिकता अभी बाकी है।

2 comments:

Udan Tashtari said...

शैखी बघारने के सिवा हमें आता ही क्या है?

therajniti said...

मुस्लमान कभी हिंदू के साथ नही रह सकते. गाँधी जी मन्दिर में बैठ कर कुरान पड़ते थे और क्या उन्हें हिम्मत थी की मस्जिद में बैठ कर गीता पड़ सके. मुसलमानों ने अंग्रेजो को भागने में जो किया उसके बदले पाकिस्तान लिया. हमें क्या मिला? एक और पाकिस्तान बनेगा २५ साल में ही.

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