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Wednesday, February 20, 2008

उमड़-घुमड़

कुछ उमड़ता घुम्ड़ता आया खोल पट, छुआ शीतल स्पर्श इक मधुर स्वर गुंजन, किसी अभिलाषा का स्पंदन गगरी से छलकी नमकीन बूंदे भर आँचल, चुगती तारे जोड़ यादे, पिघलती राते खींच बादल, कुम्हलाती बाते......... कीर्ती वैद्य

4 comments:

satyandra said...

aap bahut achha likhti hain ... bahut sundar

Keerti Vaidya said...

shukriya satyandra Ji

mehek said...

gagarise chalki namkin bunde,taray chugna,bahut khubsurat keerti.awesomee.

pramod kumar kush 'tanha' said...

Hamesha ki tarah khoobsoorat .

p k kush'tanha'

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