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Saturday, February 9, 2008

खुदा बचाये

मुझको बुला के घर में पूछें वो आप क्या हैं
कोई मुझे बताये ये दुआ, सलाम क्या है ।

मैने तो अपना मान कर जाने की की थी जुर्रत
बेगाना वो बना कर पूछें कि नाम क्या है ।

मै सोच कर गया था होगी मेहमाँ नवाज़ी
अनजान बन वो पूछे मुझसे कि काम क्या है ।

इस बेरुखी ने उनके किया दिल को कितना घायल
मेरा दिल ही मुझसे पूछे उनका पयाम क्या है ।

उफ़ दोस्ती से ऐसे बेज़ार हो गये हम
उनसे खुदा बचाये जिन्हे कत्ले आम क्या है ।

2 comments:

Keerti Vaidya said...

very nice

Amit said...

बहुत ख़ूब लिखा है आपने। इर्शाद।

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