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Thursday, February 14, 2008

बाज़ार बनती पत्रकारिता

"तुम हर कीमत पर सच को लोगों तक पहुँचाना, सच सच और कोवल सच, सच के सिवा कुछ नहीं,अगर उस सच से कभी तुम्हे समझौता करना पड़े, अपनी आत्मा से समझौता, तो मरना श्रेयस्कर समझना बजाय झुकने के।" समय बदला और साथ ही पत्रकारिता भी और उसकी मांग भी अब जनाब आप भरे बाज़ार में खड़े है जहाँ हर चीज़ बिकती है। ईमान भी और इंसान भी। शायद एक बिज़नेस मैन के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन एक पत्रकार के लिए इससे हेय शायद ही कुछ हो। ऊपर लिखी पंक्तियां श्री गणेश शंकर विद्यार्थी की हैं, एक पत्रकार की । समय आ गया है चयन आपको करना है कि हमारा न्यूज़ सेन्स राखी सावंत को न्यूज़ मानता है या एक अरब की जनसंख्या वाले देश में सड़कों पर रहने वाले हज़ारों भूखे बच्चों को जिन्हे एक व़क्त की रोटी भी नसीब नहीं।

7 comments:

Sunjay Banerjee said...

Kya bat hai kya khoob likha hai,
Good keepit up & do keep writing on the blog.

Sunjay Banerjee

Mrs. Asha Joglekar said...

सच और केवल सच लिखा है आपने । पत्रकारिता भी अब बाजा़र में खडी है जो सबसे ज्यादा दाम दे उसके लिये और उसका कहा लिखेंगे । आपको बधाई कि आपने यह सच सामने रखा ।

Mrs. Asha Joglekar said...

सच और केवल सच लिखा है आपने । पत्रकारिता भी अब बाजा़र में खडी है जो सबसे ज्यादा दाम दे उसके लिये और उसका कहा लिखेंगे । आपको बधाई कि आपने यह सच सामने रखा ।

Keerti Vaidya said...

supereb....ek acha aritcle jo hum sab par ek tamacha hai.....likhti rahey hamesha

Parvez Sagar said...

अपने लेख के माध्यम से एक गम्भीर सवाल उठाया है आपने जिसका जवाब वाकई उलझा हुआ है। पत्रकारिता अब मिशन ना होकर पूरी तरह से व्यवसायिक हो चुकी है। हम चाहकर भी इसको बदल नही सकते हां पर कोशिश ज़रुर कर सकते हैं और इस कोशिश को हम सब जारी रखेगें।..... एक उम्मीद के साथ कि वो सुबह कभी तो आयेगी।

Reetesh Gupta said...

अच्छा लगा पढ़कर ...सोचने को मजबूर करता आपका लेख...

shuklapurnendu said...

गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रताप उन दिनों कानपुर से निकला करती थी। आज़ादी आन्दोलन का दौर था। खास बात यह भी है की शहीद ऐ आज़म भगत सिंह ने भी प्रताप में काम किया था। वो दौर पत्रकारिता को profession नही मिशन समझता था। अख़बार निकालने वाले और उसमें काम करने वाले मुनाफे और मोटी तनख्वाह के लिए नही बल्कि एक उद्देश्य के लिए काम कर रहे थे। उद्देश्य था स्वतंत्रता आन्दोलन को और धार प्रदान करना। बर्तानिया हुकूमत किस तरह से भारत को लूट खसोट का अड्डा समझ कर अपनी सरकार चला रही है ,इन विचारों को लोगों के बीच ले जाना। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है की उस समय भारतीय पूंजीपति आज़ादी आन्दोलन को हर तरह से सहयोग कर रहा था। क्यूंकि भारतीय पूंजीपतियों का व्यापार ब्रिटिश शासन मे फल फूल नही सकता था। इसलिए स्वशासन उनके मुनाफे को बढ़ाने के लिए जरूरी था । पर आज़ादी मिलने के बाद उनका चरित्र badal गया । क्यूंकि आज़ादी के पीछे उनकी mansha कुछ और ही थी। हमारी सरकार ने tathakathit samajwaad की aad लेकर पूंजीपतियों को बढ़ने का मौका दिया । हमारी आज़ादी नए botal में purani sharab रही। goron के bajay हमारे कहे jane वालों ने ही शोषण करना शुरू कर दिया। इस नए माहौल में लोग vikshubdh होकर kahin bagawat न शुरू कर दे इसलिए unhe sanskriti (ku) की ghutti pilana जरूरी हो गया। bazar भी लोगों की aadat को अपने mutabik dhalne पर amada हो गया। देश नही pahle अपना सोचो , आप bhala to jag bhala , vyaktiwadi सोच को लोगों के दिल dimag में bhar दिया गया। sunami में आपको chanda bhejne पर आप की देश bhakti barkarar है ,kargil में javanon की tareef में tv channelon पर sms भेजना ही अपनी देश bhakti pradarshit करने के लिए kafi है।
लेकिन बीते कई saalon मे हम अपनी naitik girawat के karnon की खोज करें अगर हमने कह दिया की इसके zimmedar to हम ख़ुद ही हैं to आपकी wahwahi है आप समझदार करार दिए जायेंगे.अगर kahin आपने इसके लिए पूरी व्यवस्था को zimmedar thahraya to आप मूर्ख भी करार दिए ja सकते हैं।
वो कौन से karan थे जब लोग अपना सब कुछ छोड़ कर एक उद्देश्य के लिए पूरा jeewan kurban करने की राह पर badhe चले आ रहे थे। क्या आज़ादी मिलने के साथ ही वो karan khatm हो गए । javab है नही ।
गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में हिंदू muslim dangon के बीच unhe samjhane निकल पड़े । हम pahle इंसान हैं बाद में हिंदू muslim । पर dharmandh लोगों को उनकी बात समझ नही आई । उन dangon में मारे जाने वालों में गणेश शंकर विद्यार्थी भी shamil हो गए। sampradayikta की aag आज भी जल रही है। गणेश शंकर balidan हो गए और आज भी dangon को होता देख लगता है हमने उनके balidan को व्यर्थ jane दिया है।
"आज़ादी का matlab है मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत और किसी भी तरह के शोषण का अंत " भगत सिंह कहा करते थे । पर शोषण badastoor jari है।
आज़ादी की ladai में हमने अपना दुश्मन pahchan लिया था। पर hame अब अपना दुश्मन pahchanne मे दिक्कत आ रही है। मुझे to लगता है हमारा दुश्मन poonjiwad है। जिसका उद्देश्य munafa kamana है यही उसकी naitikta है। और उसके kanoon ,उसकी sanskriti सब कुछ उसकी raksha के लिए उसके मुनाफे के लिए।
vyaktiwadi suvidhabhogi सोच रखते हुए , munafa khoron के नौकर (patrakar) bankar अगर हम सोचते हैं की हम गणेश शंकर विद्यार्थी की dikhayi राह पर चल सकेंगे , to या to हम बहुत bhole या फ़िर nire मूर्ख या aatmmodit makkar

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