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Thursday, September 3, 2009

लो क सं घ र्ष !: या सुंदर केवल आशा...

आशा का सम्बल सुंदर, या सुंदर केवल आशा । विभ्रमित विश्व में पल-पल , लघु जीवन की प्रत्याशा॥ रंग मंच का मर्म कर्म है, कहीं यवनिका पतन नही । अभिनय है सीमा रेखा, कहीं विमोहित नयन नही॥ सत् भी विश्व असत भी है, पाप पुण्य ही हेतु बना। कर्म मुक्ति पाथेय यहाँ, स्वर्ग नर्क का सेतु बना ॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

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