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Thursday, May 7, 2009

अपनी प्रीत

नीला आकाश, नीला सागर, कितना गहन । हवा सा बहता, पारे सा फिसलता, चंचल मन । फूलों की खुशबू सी, छुपाये न छुपे ये अपनी प्रीत । ये ना माने, ना पहचाने, दुनिया की रीत । पर तन मन को दे जाती है कितनी उजास । मानना ही पडेगा तुमको भी कि ये है खास ।

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