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Tuesday, December 9, 2008
२६ नवंबर,2008
मस्त संगीत
रोशनी मध्दम
जिव्हा की तृप्ती
माहौल में
एक अजीब सी
लहराती मस्ती
अचानक चलती
गोलियाँ सन् सन्
जिंदगी सस्ती
आँखों के सामने
मृत्यु का तांडव
करवाते दानव
फटते बम
धुआँ और आग
चीखें पुकारतीं
यह घमासान
फिर हैं भी दौडते
कुछ इन्सान
रखते हैं
लोगों को सुरक्षित
जान पर खेल कर
और वे शूर वीर
वे जाँ-बांज
आते हैं दौड कर
लगे रहते हैं
जब तक न खत्म
होता आतंक
जीवट से लडते हैं
सीमित साधनों से,
प्राण खोते हुए
अंत में लहराते हैं
मुस्कुराते हुए
जीत का तिरंगा
नसीबों वाले
बच जाने वाले
शुक्र मनाते हैं
यह आतंक
तो हुआ खत्म
पर आगे क्या ?
Friday, August 15, 2008
ऱाखी
इस राखी को ग्रहण लगा आतंक-वाद का
पुकारती हैं माँएं बहने और कुछ भाई
याद करो उस वादे को निभाओ उसको
रक्षा करने की शपथ जो कभी तुमने खाई ।
रहो सतर्क हमेशा अपने आसपास से
रख्खो नजर कि इसकी उसकी मनषा क्या है
कौन है अपना और कौन पराया बनकर
ध्वंस की लीला का ही सपना देख रहा है ।
पूछो सवाल इस चुने हुए जन-प्रतिनिधि से
क्या उसके ही क्षेत्र से है ये हैवानी
कोई नही कुछ कर सकता है अगर
अपने ही घरवालों ने की आनाकानी ।
अगर बचाना है घर अपना, सतर्क तो हम सबको रहना ही होगा
और चुनाव से पहले इन उम्मीद वारों का कोई तो फैसला हमें ही करना होगा ।
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