संवाद थम जाता है माँ के साथ,
जब छूट जाता है बचपन का आँगन
चिठ्ठियों का अंतराल लंबे से लंबा होता चला जाता है
और सब सिमट जाता है एक वाक्य में,
“ कैसी हो माँ “ ?
माँ का जवाब उससे भी संक्षिप्त,
“ठीक” ।
पर उसकी आँखें बोलती हैं,
उसकी उदासी कह जाती है कितना कुछ ,
उसका दर्द सिमट आता है चेहेरे की झुर्रियों में
जब होता है अहसास उसको अपने फालतू हो जाने का ।
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Monday, September 12, 2011
Tuesday, March 8, 2011
कैसे मान लूँ ?
कैसे मान लूँ
कि हमारे बीच
कुछ हुआ न था ।
कैसे जान लूँ
कि तब जो हुआ
वह हुआ न था ।
मेरा तुम्हारा मिलना
दिलों का जुडना
हुआ न था ।
बिछडते हुए
जल्द लौटने का वादा
तुमने किया न था ।
आज एयरपोर्ट पर
पत्नी और बच्चे के साथ
तुम्हारा मिलना
यही आज का सच है
तो कल कुछ भी
हुआ न था ।
कि हमारे बीच
कुछ हुआ न था ।
कैसे जान लूँ
कि तब जो हुआ
वह हुआ न था ।
मेरा तुम्हारा मिलना
दिलों का जुडना
हुआ न था ।
बिछडते हुए
जल्द लौटने का वादा
तुमने किया न था ।
आज एयरपोर्ट पर
पत्नी और बच्चे के साथ
तुम्हारा मिलना
यही आज का सच है
तो कल कुछ भी
हुआ न था ।
Sunday, February 27, 2011
सौ अफसाने ,सौ बहाने
बेशक, शहर की
चर्चाओं में
तेरे-मेरे
सौ अफसाने हैं,
पर मिलने
के
भी
तो
मेरी जां
सौ बहाने हैं।
Wednesday, June 17, 2009
तुम क्या आये
तुम क्या आये ये बहारें आईं,
तुम चले आये तो,
अब छंट ही गई तनहाई ।
हम इतने दिन
तुम्हारी राह देखते ही रहे,
ओर आज देखो
अचानक बजी है शहनाई ।
हम अपने आप से
क्यूं यूं शरमाते हैं,
इन आँखों में बसी है
तुम्हारी परछाई ।
अब तलक जो
चुपचाप सी थी ये ऋत,
आज मुस्कुराती सी
लेने लगी है अंगडाई ।
फूल खिलते हैं, देखो,
पंछी चहके जाते हैं
किसकी खातिर
महकती है यहाँ अंगनाई ।
अब न जाने की
बात करना, न दूर जाना कभी,
वरना हम ही नही
जमाना कहेगा हरजाई ।
Tuesday, June 2, 2009
तुम्हारे बिना जिंदगी...
तुम्हारे बिना जिंदगी यू कटी-
कि जैसे दिया ज्योति के बिन जले।
स्वप्न साकार दर्शन से होने लगे-
निमंत्रण मौन अधर देने लगे,
मन के दर्पण में मूरत बसी इस तरह,
कोरे सपनो में भी रंग भरने लगे,
छोड़ मझधार में ख़ुद किनारे लगे
बोझ सांसो तले रात दिन यूँ चले
जैसे मंजिल बिना कोई राही चले- ।
साँस की राह पर प्यार चलता रहा,
रूप की चांदिनी में वो बढ़ता रहा।
नैन की नैन से बात होती रही ,
प्रेम व्यापार में मन ये बिकता रहा।
आंसुओं के तले पीर दुल्हन बनी
वो सुहगिनि मिली यू मिलन के बिन-
जैसे मोती के बिना सीप कोई मिले
-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही '
Thursday, May 7, 2009
अपनी प्रीत
नीला आकाश,
नीला सागर,
कितना गहन ।
हवा सा बहता,
पारे सा फिसलता,
चंचल मन ।
फूलों की खुशबू सी,
छुपाये न छुपे
ये अपनी प्रीत ।
ये ना माने,
ना पहचाने,
दुनिया की रीत ।
पर तन मन को
दे जाती है
कितनी उजास ।
मानना ही पडेगा
तुमको भी
कि ये है खास ।
Saturday, March 14, 2009
फैसला जान के रहिये ।
अब इस बेरुखी को क्या कहिये
वो हैं क्यूं चुप, जरा पता करिये
हमनें अब किया है ऐसा क्या
खफा खफा से आप क्यूं रहिये ।
हम न समझे न कुछ उन्होने कहा
ऐसे हालात हैं कि क्या करिये
गलतफहमी का शिकार है दोनों
चुप की दीवार तोड के रहिये ।
बिना गलती के सजा क्यूं काटें
जो भी है खुल के बात तो करिये
पार इस रहें या हों उस पार
फैसला आज जान के रहिये
Wednesday, March 4, 2009
तुम जो कहो.......
तुम जो कहो
उसे प्रकाशित कर दूँ
अपने सर्वस्व को
तुम पर न्योछावर कर दूँ
अपनी समस्त ऊर्जा को
विश्रित कर दूँ
तुम जो कहो
अपने स्पर्श से
तुझे उष्मित कर दूँ
तेरे दर्द को ओढ़कर
ख़ुद को
धन्य कर दूँ
तुम जो कहो
तुझ पर जीवन
अर्पण कर दूँ
तेरे चेहरे का गुलाल
और लाल कर दूँ
दमकते सूरज को
निहाल कर दूँ
तुम जो कहो
दिन हो या रात
धुप हो या छांव
तेरे कदमों में
सर रख दूँ
तुम जो कहो
Saturday, February 28, 2009
"झील को दर्पण बना"
"झील को दर्पण बना"
रात के स्वर्णिम पहर में
झील को दर्पण बना
चाँद जब बादलो से निकल
श्रृंगार करता होगा
चांदनी का ओढ़ आँचल
धरा भी इतराती तो होगी...
मस्त पवन की अंगडाई
दरख्तों के झुरमुट में छिप कर
परिधान बदल बदल
मन को गुदगुदाती तो होगी.....
नदिया पुरे वेग मे बह
किनारों से टकरा टकरा
दीवाने दिल के धड़कने का
सबब सुनाती तो होगी .....
खामोशी की आगोश मे रात
जब पहरों में ढलती होगी
ओस की बूँदें दूब के बदन पे
फिसल लजाती तो होगी ......
दूर बजती किसी बंसी की धुन
पायल की रुनझुन और सरगम
अनजानी सी कोई आहट आकर
Sunday, February 15, 2009
मिलन का क्षण
अनबुझ प्यास
प्रेम की आस
मिलन का क्षण ।
प्यासी धरती
कहीं दरकी
तृषार्त मन ।
बादल घनघोर
छाये चहुँ और
आया सावन ।
बूंदें टपटप
बने धार अब
भीगे तनमन ।
तृप्त हुई देह
मन मे भरा नेह
प्रमुदित आनन
Wednesday, February 4, 2009
"एहसास"
Tuesday, January 27, 2009
माँ
माँ
जैसे दूध पे जमे मलाई, वैसे घर में होती माँ
जैसे बहती हो पुरवाई , वैसी ठंडक देती माँ ।
जैसे सर्दी की हो धूप, वैसे अच्छी लगती माँ
जैसे झम झम बरसे बारिश, वैसे प्यार लुटाती माँ ।
कभी कभी तो तेज़ धूप सी गुस्सा करती माँ
और उमस भरी दोपहरी सी, गुपचुप रहती माँ ।
पर जब हम बादल से घुमडें आसपास पास
बारिश की पहली बूंदें, आँखों छलकाती माँ ।
कभी हमें गंभीर बनीं बातें समझाती माँ
रात को लेकिन उढा के चादर, माथा चूमती माँ ।
Tuesday, December 16, 2008
"द्रष्टि"
Friday, December 12, 2008
"मौन का उपवास"
Wednesday, December 10, 2008
" मायाजाल"
" मायाजाल"
ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे,
यथार्थ को दरकिनार कर
कुछ स्वप्नों ने सांसे भरी...
छलावों की हवाएं बहती रही
बहकावे अपनी चाल चलते रहे,
कायदों को सुला , उल्लंघन ने
जाग्रत हो अंगडाई ली..
द्रढ़निश्चयता का उपहास कर
संकल्प मायाजाल में उलझते रहे,
ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे..


Tuesday, December 9, 2008
२६ नवंबर,2008
मस्त संगीत
रोशनी मध्दम
जिव्हा की तृप्ती
माहौल में
एक अजीब सी
लहराती मस्ती
अचानक चलती
गोलियाँ सन् सन्
जिंदगी सस्ती
आँखों के सामने
मृत्यु का तांडव
करवाते दानव
फटते बम
धुआँ और आग
चीखें पुकारतीं
यह घमासान
फिर हैं भी दौडते
कुछ इन्सान
रखते हैं
लोगों को सुरक्षित
जान पर खेल कर
और वे शूर वीर
वे जाँ-बांज
आते हैं दौड कर
लगे रहते हैं
जब तक न खत्म
होता आतंक
जीवट से लडते हैं
सीमित साधनों से,
प्राण खोते हुए
अंत में लहराते हैं
मुस्कुराते हुए
जीत का तिरंगा
नसीबों वाले
बच जाने वाले
शुक्र मनाते हैं
यह आतंक
तो हुआ खत्म
पर आगे क्या ?
Saturday, December 6, 2008
तुम बिन
'तुम बिन"
हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,
साजों मे भी अब तार नही..
बिखरी हुई रचनाएँ हैं सारी,
शब्दों मे भी वो सार नही...
जज्बातों का उल्लेख करूं क्या ,
भावों मे मिलता करार नही...
तुम अनजानी अभिलाषा मेरी,
क्यूँ सुनते मेरी पुकार नही ...
हर राह पे जैसे पदचाप तुम्हारी ,
रोकूँ कैसे अधिकार नही ...
तर्ष्णा प्यासी एक नज़र को तेरी,
Thursday, December 4, 2008
शब्दों की वादियाँ"
Thursday, November 20, 2008
Monday, November 17, 2008
"कतरा कतरा"
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