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Friday, December 28, 2007

जंग लगी जम्हूरियत

घर नया खरीदा है, रोशनी नहीं हैं यारों, वतन हो चुका आजाद, हर शख्स यहाँ लुटेरा है यारों। बदनसीबी, गरीबी से शिकस्त होती है हर बार, गरीब हो तुम गरीबी में ही रहो यारों । कल सुना है की पटरी पर कोई शख्स कटा है, दुनियावी जहमतों से वो आजाद हो गया यारों । इन इंसानों की निगाहों में कुछ कमीनापन सा दिखता है, घर में बहन बेटी हो तो सम्हालों यारों । हिंद को बदलनें की बात कर रहे थे जो हरामखोर, विदेशी सरज़मीं पर घर खरीद लिया है यारों । परदा किये हुए अपनी माँ को देखा है हर बार, सड़ चुकी जो परम्पराऐं, बदलो नया वक्त है यारों । नलों में पानी, खंबों में बिजली, पेट मे खाना नहीं, सटीक देश है, गुजारिश है, जहां मिले नेता, सालों को पटक पटक के मारो यारों । अनुराग अमिताभ

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