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Wednesday, December 31, 2008
कम्बल
तेरी यादों का कम्बल लपेट कर घुमती है वो आज कल
गुलाबी ठण्ड को इससे बढ़िया गर्माहट भला मिलती और कही
Wednesday, December 3, 2008
युही
वादा - ऐ - रस्म उन्हें निभानी आती भी होगी या नही
या हम रूठना और वो मनाना इस खेल के नियम बनेंगे
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जिहाद के नाम पर भटक जाते मासूम मन
उन्हें भी नही पता उनका नाम आतंकवाद है
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तकिये के निचे एक डायरी और कलम रखी हुई
जब तेरी याद आती है कविता लिख लेती हूँ
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