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Friday, August 15, 2008
ऱाखी
इस राखी को ग्रहण लगा आतंक-वाद का
पुकारती हैं माँएं बहने और कुछ भाई
याद करो उस वादे को निभाओ उसको
रक्षा करने की शपथ जो कभी तुमने खाई ।
रहो सतर्क हमेशा अपने आसपास से
रख्खो नजर कि इसकी उसकी मनषा क्या है
कौन है अपना और कौन पराया बनकर
ध्वंस की लीला का ही सपना देख रहा है ।
पूछो सवाल इस चुने हुए जन-प्रतिनिधि से
क्या उसके ही क्षेत्र से है ये हैवानी
कोई नही कुछ कर सकता है अगर
अपने ही घरवालों ने की आनाकानी ।
अगर बचाना है घर अपना, सतर्क तो हम सबको रहना ही होगा
और चुनाव से पहले इन उम्मीद वारों का कोई तो फैसला हमें ही करना होगा ।
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