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Thursday, December 27, 2007
आज सुबह
कितने दिनों बाद आज
सांझ के बादल छंटे
ज़िन्दगी, झरोखे से हंसी
इठला मासूम खुशियां
हथेलियों में सजी संवरी
भोर के अंगना से
चुन खुशनुमा पल
धड़कने कुछ गुनगुनायी
औंस की ज़मी पे थिरक
आज, सुबह कुछ ऐसे गुजरी
कीर्ती वैद्य
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