Monday, September 7, 2009
लो क सं घ र्ष !: भारत के विभाजन की सच्चाई से हम कब तक मुँह चुराएँगे?
देश की आजादी के 62 साल बाद भी एक कडुवा सच बराबर उभर कर ना जाने क्यों देश के सामने आ ही जाता है कि देश के विभाजन का जिम्मेदार क्या केवल मुहम्मद अली जिनाह ही थे, जिन्होंने मुसलमानों को बरग़ला कर देश से अलग एक राष्ट्र बनाने के लिए अहम भूमिका अदा की?
दो कौमी नजरिए के बानी कहे जाने वाले अपने-जमाने के दिग्गज कांग्रेसी मुहम्मद अली जिनाह ने किन हालात में पाकिस्तान बनाने की सोंची? और वह कौम जो उनकी वेशभूषा व भाषा से उन्हें कभी भी मुस्लिम लीडर के तौर पर कुबूल नहीं करती थी, आखिर क्या जादू उन्होंने किया कि पूरी कौम उनकी एक आवाज पर अपना घर बार, पूर्वजों की चैखट छोड़कर पलायन करने पर उतारू हो गई?
नब्बे के दशक के प्रारम्भ में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक शोर सा देश में मचा कि मौलाना आजाद द्वारा लिखित सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’’ के वह पृष्ठ जो उन्होंने अपनी मृत्यु के 50 वर्ष बाद खोलने को कहे थे और जो राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है खोलकर पढ़े जाएं। पहले कांग्रेसी सरकार इसे टालती रही परन्तु जब सदन तक में यह मामला भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने जोर-शोर से उठाया तो उन पृष्ठों को खोला गया। पृष्ठ खुलने पर उन शक्तियों को बहुत निराशा हुई जो यह आशा मौलाना आजाद जैसे निर्भीक वक्ता व लेखक से लगाए बैठे थे कि उन्होंने अवश्य देश के विभाजन के अस्ल जिम्मेदारों के बारे में कुछ लिखा होगा। पृष्ठों में मौलाना ने विभाजन के जिम्मेदारों में जिनाह की राजनीतिक अभिलाषाओं पर यदि एक ओर कटाक्ष किया था तो वहीं दूसरी ओर लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भी नहीं बख्शा था।
आजकल फिर यह मुद्दा गर्मा गया है। कारण भाजपा के वरिष्ठ लीडर जसवंत सिंह की पुस्तक ‘‘जिन्ना भारत विभाजन के आइने में’’ के अंदर मुहम्मद अली जिनाह की धर्मनिरपेक्ष छवि का महिमा मण्डन किया जाना और उन्हें उपमहाद्वीप की एक बड़ी राजनीतिक शख्सियत करार देना है। जसवंत सिंह की पुस्तक पर भाजपा से लेकर संघ व कांग्रेसी पंक्तियों से तीखी प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गयी हैं। इसी प्रकार भाजपा के एक और वयोवृद्ध लीडर लालकृष्ण आडवाणी जब अपने जन्म स्थान सिंध प्रान्त (पाकिस्तान) गये थे तो वहाँ क़ायदे आजम मुहम्मद अली जिनाह की मजार पर श्रृद्धांजलि देते समय उन्होंने जिनाह के उस भाषण की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी जो आजाद पाकिस्तान की असेम्बली में उन्होंने पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान बनाने की वकालत के लिए दिया था। आडवाणी की जिनाह के प्रति यह प्रशंसा भी उन्हें भारी पड़ी और काफी दिनों तक उन्हें इस बाबत अपनी पार्टी से लेकर पार्टी की पैतृक संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सफाई देनी पड़ी।
बात चाहे आडवाणी द्वारा कही गई हो या जसवंत सिंह द्वारा, दोनों ने ही सच बात जिनाह के बारे में कही है क्योंकि जिनाह कभी भी अपने व्यक्तित्व के आधार पर मुस्लिम कट्टर पंथी लीडर नहीं कहे जा सकते। उनके अंदर एक जिद्दी व महात्वाकांक्षी राजनेता के गुण अवश्य थे।
देश के विभाजन के अहम पहलुओं पर देश के सुप्रसिद्ध इतिहासकार, गांधी वादी विचारक, समाजसेवी एवं पूर्व राज्यपाल उड़ीसा स्व0 विश्वम्भरनाथ पाण्डेय ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व कोलकाता से प्रकाशित उर्दू दैनिक आजाद-हिन्द को दिये गये साक्षात्कार में भली भांति खुलकर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत है उस साक्षात्कार का हिन्दी रूपान्तरणः-
प्रश्न-पाण्डेय जी, आज स्वतंत्रता और विभाजन को आधी शताब्दी बीत चुकी है। आज हमारे सम्मुख जो भारत है क्या स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में इसी भारत की परिकल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी? या स्वतंत्र भारत का कोई अन्य स्वरुप आपके मस्तिष्क में था?
पाण्डेय जी-देखिये! स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जनता को स्वतंत्र भारत के अनेक रूप उस समय के नेताओं ने दिखलाये थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू ने जो रूप भारत की स्वतंत्रता का पेश किया था वह आशा वादी स्वरूप था, जिसमें आशाओं से भरे भारत की परिकल्पना का छाया चित्र था। महात्मा गांधी ने जो रूप स्वतंत्र भारत का जनता के सम्मुख रखा था वह इसके बिल्कुल विपरीत था। उन्होंने जनता को बताया था कि अभी जो स्वतंत्रता हमें मिली है वह मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता है। जब तक हमें सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो जाती, यह स्वतंत्रता लंगड़ी स्वतंत्रता कहलायेगी। दूसरी मुख्य बात जो गाँधी जी ने कही थी वह यह थी कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हमने जो लड़ाई लड़ी थी उसमें हम अपने शत्रु को पहचानते थे, परन्तु सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष अपने देश वासियों के विरूद्ध होगा, और ऐसे छुपे हुए शत्रुओं से संघर्ष करना स्वतंत्रता संग्राम से अधिक कठिन होगा। गांधी जी सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति बहुत अधिक आशा वादी नहीं थे। पं0 नेहरू का स्वतंत्र भारत का स्वरूप,
गांधी जी के विचारों से भिन्न था, जो कि नई उमंगों व आशाओं से भरा हुआ था। पं0 नेहरू का मानना था कि स्वतंत्र भारत का भविष्य बहुत उज्ज्वल होगा और जनता को बहुत कुछ प्राप्त होगा, परन्तु गांधी जी इस बात से सहमत नही थे उनकी दूरदर्शिता भविष्य के संकटों का पूर्वाभास कर रही थी। इसलिए गांधी जी कहा करते थे कि हमें जनता को ऐसे आशावादी स्वतंत्र भारत का सपना नहीं दिखाना चाहिए जो बाद में उसे हम न दे पायें।
प्रश्न-ऐसा कहा जाता है कि मो0 अली जिनाह ने मुस्लिम हितों को ध्यान में रखकर मुसलमानों के लिए
अधिक से अधिक अधिकार व राजनैतिक लाभ अर्जित करने के लिए ‘‘मुस्लिम कार्ड’’ खेला था, परन्तु बाद में ऐसे हालात बन गये कि जिनाह को पाकिस्तान की स्थापना के बारे में गम्भीरता से विचार करना पड़ा ऐसे हालात पैदा करने का दोष कांग्रेस के उस समय के ब्राह्मण वादी राजनैतिक नेताओं पर लगाया जाता है। यह कहाँ तक उचित है?
पाण्डेय जी-जिनाह का यह विचार था कि हम यह आवाज उठा रहे हैं, यह नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान होगी, परन्तु जिनाह को पाकिस्तान की स्थापना में जिन शक्तियों से सहायता मिली वह न तो मुस्लिम लीगी थे और न ही पाकिस्तान नवाज। उस समय देश के सभी समाचार पत्रों ने पूरे-पूरे पृष्ठ एक सम्प्रदाय विशेष के विरोध में रंग दिये थे। विरोधी धारणा इतनी बढ़ गयी थी कि जनता को यह बात सच लगने लगी और वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि दो कौमी
विचारधारा में दम है। खुद जिनाह को अपनी बात पर विश्वास नहीं था कि उनकी यह छोटी सी सोच एक विशालकाय आन्दोलन का रूप ले लेगी। परन्तु अचानक पता नहीं क्या हुआ कि पूरी कौम एकदम जाग उठी और पाकिस्तान की स्थापना की सोंच ने जन्म ले लिया। यद्यपि उस समय तक पाकिस्तान का कोई प्रत्यक्ष स्वरूप जनता के सामने नहीं था। जिनाह से कई अवसरों पर यह प्रश्न पूछा गया कि पाकिस्तान के बारे में कुछ तो बतायें। पं0 नेहरू तो अपने स्वतंत्र भारत का स्वरूप पेश कर चुके हैं, आपका पाकिस्तान कैसा होगा? स्वतंत्र पाकिस्तान में अफगानों का भविष्य कैसा होगा? किसानों की स्थिति क्या होगी? इन सभी प्रश्नों का सही उत्तर जिनाह पेश करने में सदैव असमर्थ रहे। वह केवल इतना कहते थे कि इन सभी प्रश्नों का उत्तर पाकिस्तान की स्थापना के उपरान्त तलाश लिया जायेगा। उन्होंने वास्तव में अपनी जनता से कोई वायदा नहीं किया था कि पाकिस्तान का स्वरूप कैसा होगा।
प्रश्न-क्या सर माउन्टवेटेन ने पं0 नेहरू व सरदार पटेल को विभाजन के लिए तैयार कर लिया था?
पाण्डेय जी-जी हाँ यह बात सही है कि पं0 नेहरू और सरदार पटेल को माउन्टवेटेन ने विभाजन के लिए महात्मा गांधी से पहले ही राजी कर लिया था। गांधी जी से तो बाद में बात हुई थी। गांधी जी के राजी होने का कारण यह था कि वह अब और अधिक संघर्ष नहीं करना चाहते थे और वह भी अपने लोगों से।
प्रश्न-जो नेता, उदाहरणार्थ मौलाना अबुल कलाम आजाद व बादशाह खान स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन का विरोध कर रहे थे, उनकों गांधी जी के इस वक्तव्य से बहुत ढांढस बँधा था कि देश का विभाजन ‘‘केवल मेरी लाश पर होगा’’ परन्तु बाद में गांधी जी को विभाजन के पक्ष में हथियार डालना क्या इन नेताओं के साथ धोखा नहीं था?
पाण्डेय जी- बादशाह खान के साथ तो धोखा हुआ था और उनको सदैव इस बात की शिकायत भी रही। वह यह कहते नहीं थकते थे कि आपने तो हमको भेड़ियों के आगे छोड़ दिया हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। पठानों ने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में जिस प्रकार अपनी कुर्बानियाँ पेश कीं उसका बदला आपने इस प्रकार दिया? बादशाह खान को यदि यह शिकायत हमसे थी तो यह कोई गलत भी नहीं थी। जहाँ तक मौलाना आजाद का प्रश्न है तो उनको भी देश का विभाजन पसन्द नहीं था, परन्तु मौलाना भी इस मामले में एक हद तक ही सीमित रहे, और उनका विभाजन के प्रति विरोध कोई आन्दोलन का रूप न ले सका और ना ही वह स्वयं को किसी संघर्ष का भागीदार ही बना सके।
प्रश्न-क्या कांग्रेस में कोई ऐसी टोली थी जो मुसलमानों को पार्टी में शामिल नहीं देखना चाहती थी? क्या उनमें लाला लाजपतराय, सरदार बल्लभ भाई पटेल और किशन लाल गोखले थे?
पाण्डेयजी-देखियें! ईमानदारी की बात यह है कि जिनाह गोखले को बहुत सम्मान देते थे। हाँ लाला लाजपत राय के सम्बन्ध में यह कह सकते हैं कि उनके विचार हिन्दुत्व के पक्षधर थे। बल्लभ भाई के कोई स्पष्ट विचार इस बाबत कभी सामने नहीं आये। गांधी जी ने अन्तिम दिनों में विभाजन रोकने का अथक प्रयास किया। जब नेतृत्व का मुद्दा तेज होता गया कि स्वतंत्र भारत का नेता कौन होगा-पटेल या नेहरू? उस समय स्थिति यह थी कि नेहरू की संगठन पर उतनी पकड़ नहीं थी जितनी पटेल की, जो संगठन से भली भांति जुड़े हुए थे। यदि ईमानदारी से देखा जाये तो बल्लभ भाई का पलड़ा नेहरू से बहुत भारी पड़ रहा था। नेहरू उनके सामने कहीं टिक नहीं पाते, परन्तु गांधी जी यह बात समझते थे कि पटेल की राजनीति एक कट्टर पंथी व रूढ़िवादी धार्मिक विचारधारा पर केन्द्रित है जो राष्ट्र के लिए आगे चलकर घातक सिद्ध हो सकती है। गंाधी जी को नेतृत्व की इस लड़ाई की कितनी चिंता थी इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी मृत्यु से मात्र दो घण्टे पूर्व गांधी जी ने सरदार पटेल को बुलाकर उन्हें अच्छी प्रकार समझाबुझाकर उनसे यह वायदा ले लिया था कि वह नेतृत्व पर से अपना अधिकार त्याग कर नेहरू का समर्थन करेंगें। मैं समझता हूँ कि गांधी जी ने देश के लिए चलते-चलते यह एक बहुत बड़ा कार्य किया था। वरना देश की राजनैतिक स्थिति किस प्रकार का रूप लेती इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
गांधी जी ने जिनाह हाउस में बल्लभ भाई पटेल, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद व मौलाना आजाद के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा था कि वह लोग सरकार में भागीदार न कर, जूनियर व दूसरी श्रेणी के नेताओं को आगे करें और स्वयं उन्हें बाहर से निर्देशित करें जैसा 1937ई0 में कई राज्यों की प्रदेश सरकारों के गठन के दौरान किया गया था। इसका अभिप्राय यह था कि शासक सत्ता संभालने के बाद चूंकि जनता से दूर हो जाता है। इस प्रकार संगठन में अनुभवी लोगों की उपस्थिति से जनता व सरकार के बीच सामन्जस्य बना रहेगा। परन्तु अफसोस! किसी ने गांधी जी की बात नहीं मानी। तर्क यह दिया गया कि सत्ता संभालने और जनता की समस्याओं के निवारण की सामथ्र्य दूसरी श्रेणी के नेताओं के पास नहीं है। जनता अभी से कठिनाइयों में पड़ जायेगी। यदि यूँ कहा जाये तो ठीक रहेगा कि स्वतंत्रता संग्राम की लम्बी लड़ाई लड़ने के पश्चात
अधिकतर नेता थक चुके थे। वह अब और लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे। सबकी यही धारणा थी कि जो मिलता है वह ले लो। शायद इसी थकन ने उन्हें विभाजन का कडु़वा घूंट भी हलक के नीचे उतारने पर बाध्य कर दिया।
प्रश्न-गांधी जी ने एक समय विभाजन रोकने के उद्देश्य से जिनाह को प्रधानमंत्री पद का निमंत्रण दे डाला था परन्तु कांग्रेसियों ने इस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध किया। गांधी अकेले पड़ गये। यहाँ पर यदि यह कहा जाय तो बेजा न होगा कि गांधी का प्रयोग सत्ता के लोभी कांग्रेसियों ने एक समय तक ही किया अन्तिम निर्णयों में उनको अलग थलक कर दिया गया?
पाण्डेय जी-वास्तव में कांग्रेस कोई ऐसी राजनैतिक पार्टी तो थी नहीं जहाँ क्रमबद्ध नेतृत्व हो, वह एक ऐसी तहरीक थी जो लोगों को एक प्लेट फार्म पर तो ले आयी थी परन्तु विचाराधारा में विभिन्नता उपस्थित थी। गांधी जी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे तो कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी साथ चल रहा था जो 1925 में बनी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा के आधीन था और वह गांधी जी के विचारों का निरन्तर विरोध करता रहता था और अन्त में इसी वर्ग विशेष के प्रभाव में विभाजन का प्रस्ताव कांग्रेस को पारित करना पड़ा।
प्रश्न-कांग्रेस में स्वयं सेवक का प्रवक्ता कौन था? सरदार पटेल या कोई अन्य नेता?
पाण्डेय जी-सरदार बल्लभ भाई पटेल बड़ी हद तक संघ की आवाज थे, उनके सोंचने की शैली संघ की
विचारधारा से प्रभावित थी। कांग्रेस में पटेल के कद के बराबर अन्य नेता बौने थे। इस सांेच के कुछ नेता इस संसार से जल्दी प्रस्थान कर गये। लाला लाजपतराय 1930ई0 में चल बसे, परन्तु सरदार पटेल अन्तिम दौर तक रहे और स्वतंत्र भारत में 1950 में परलोक सिधारे। यहाँ एक बात और स्पष्ट करता चलूँ कि यदि सरदार पटेल को यह पता होता कि जिनाह एक ऐसी बीमारी से ग्रसित हैं जो उन्हें एक वर्ष से अधिक नहीं जीवित रहने देगी, तो शायद कोई और ही स्वरूप भारत वर्ष का हमारे सम्मुख होता।
प्रश्न-पाण्डेयजी! जिनाह का दो कौमी दृष्टिकोण किस हद तक सफल रहा?
पाण्डेय जी- दो राष्ट्र का दृष्टिकोण कभी भी सफल नहीं हो सका। इसका प्रचार देश के विभाजन के समय बड़ी हद तक हुआ परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि दो कौमी नजरिया पाकिस्तानी सरकार ने भी उस समय स्वतंत्रता के हासिल करने के पश्चात नकार दिया (इसका स्पष्ट प्रमाण कायदे आजम जिनाह की पाकिस्तान की स्वतंत्रता के बाद का वह भाषण है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान गणराज्य की बात कही जो
धर्मनिरपेक्ष होगा) वास्तव में दो कौमी दृष्टिकोण के पक्षधर यदि एक ओर पाकिस्तान की जमातें इस्लामी व मुस्लिम लीग थी तो दूसरी ओर भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इस बावत सक्रिय था। गांधी जी का दोनों कौमों का दिल जोड़ने का प्रयास विफल रहा। गांधी जी ने विभाजन के पश्चात ही दोनों कौमों को जोड़ने का असफल प्रयास किया। गांधी जी दोहरी राष्ट्रीयता के पक्षधर हो गये थे। वह चाहते थे कि पाकिस्तान बनने के बाद भी लोग वहाँ जाकर बसें। वह अपने कुछ साथियों के साथ पाकिस्तान जाकरबसना चाहते थे जिसमंे पं0 सुन्दर लाल भी थे परन्तु वह अवसर उन्हंे नसीब न हुआ।
प्रश्न-मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से जो आशाएं बांध रखी थी क्या वह पूरी हो सकीं?
पाण्डेय जी-यदि आप किसी का दिल तोड़कर कोई काम करें तो कभी सफल नहीं होंगे। पाकिस्तान की उत्पत्ति हजारों लाखों के दिलों को तोड़कर हुई थी जहाँ तक मैं समझता हूँ कि न तो पाकिस्तान ही बन पाया और न ही वहाँ की जनता पाकिस्तानी । आज भी पंजाबी, सिंधी, बल्लोचियों व अफगानियों में पाकिस्तानी बटे हुए हैं। आज उस राष्ट्र में हर किसी की पहचान अलग-अलग है। जो मुस्लिम लीग की आशाओं पर पानी फेरने का सबूत है।
प्रश्न-स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं व मुसलमानों को एक दूसरे के समीप लाने में मीडिया और समाचार पत्र अपना जो चरित्र निभा सकते थे क्या उसमें हमें सफलता मिली?
पाण्डेयजी-मीडिया का चरित्र बहुत अच्छा नहीं रहा और समाचार पत्र राष्ट्रीय एकता के विकास में अपना वह योगदान न दे सके, जैसा उन्हें देना चाहिए था। मीडिया पर सामंती शक्तियों का आधिपत्य है। चन्द छोटे-छोटे समाचार पत्र हैं जो धर्म निरपेक्षता व कौमी एकता के लिए कार्य कर रहे हैं, उनकी बात सुनने वालों की संख्या अधिक नहीं है।
प्रश्न-देश के विभाजन के बाद बाबरी मस्जिद कांड हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए क्या सबसे बड़ा धक्का सिद्ध हुआ है?
पाण्डेयजी- मैं ऐसा नहीं मानता। संघीय संस्थाओं ने यदि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया तो इसमें सामान्य हिन्दू सम्मिलित नहीं था। इसको साम्प्रदायिक या धार्मिक प्रश्न नहीं बनाया जाना चाहिए। केवल साम्प्रदायिक शक्तियाँ ऐसा चाहती है कि मस्जिद-मन्दिर प्रकरण साम्प्रदायिक व धार्मिक मुद्दे के रूप में सदैव जीवित रहें। आज देश पर सबसे बड़ा संकट साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता के साथ छुआ छूत की राजनीति ने भी देश को आज एक संकीर्ण अवस्था में ला खड़ा किया है। अब कोई भी निर्णय जाति पांति के आधार के अतिरिक्त हो ही नहीं पाता है, जो कि एक खतरनाक संकेत हैं। इसको पूर्णतया समाप्त करना अति आवश्यक है।
-तारिक खान
मोबाइल: 9455804309
Sunday, September 6, 2009
लो क सं घ र्ष !: मिलावट खोरों व जमाखोरों द्वारा सत्ता का संचालन
आजादी के बाद आज तक मिलावट करने वाले व आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कोई सक्षम कानून का निर्माण विधायिका ने नहीं किया। हद तो यहाँ तक हो गयी है कि मिलावट खोरों ने मानव रक्त में भी मिलावट कर पूरे इंसानी समाज से खेलना शुरू कर दिया है और सरकार के पास उनके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कोई सक्षम कानून नहीं है, जिससे उनको दण्डित किया जा सके। आज मिलावट खोरों के चलते अधिकांश आबादी को हृदय रोग, मधुमेह, किडनी, लीवर आदि गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं। हड्डियों से देसी घी बनाया जा रहा है। खाद्य पदार्थों में अखाद्य चीजों की भरपूर मिलावट की जा रही हैं। इस सम्बन्ध में न तो केन्द्र सरकार और ना ही प्रदेश सरकार कोई कारगर उपाय कर रही है। चीनी, खाद्य तेल, दालें तथा कुछ सब्जियों का बफर स्टाक करके जमाखोर बड़ी पूँजी के
माध्यम से कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं और मनमाने तरीके से जनता से ऊँचे दामों पर उपभोक्ता वस्तुएँ बेचते हैं। सरकार उन्हीं से संचालित हो रही है। जब वे चाहते ह,ैं आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम में अपनी इच्छानुसार संशोधन करवा लेते हैं। अपमिश्रत खाद्य पदार्थो ंकी प्रयोगशालाएं भी मिलावटखोर चलने नहीं देते और वहाँ से भी इच्छित निष्कर्ष लिखवाकर वाद कायम होने की नौबत ही नहीं आने देते हैं। जरूरत इस बात की है कि बहुसंख्यक आबादी के स्वास्थ्य के साथ खिलावाड़ बन्द होना चाहिए और इसके लिए कठोर कानून की आवश्यकता है।
-मुहम्मद शुऐब
-रणधीर सिंह ‘सुमन’
लो क सं घ र्ष !: अपने वजूद के लिए संघर्ष करता देश का जनमानस
देश में एक तरफ सूखे की स्थिति दूसरी तरफ बाढ़ के हालात इस कदर बिगड़ गये हैं कि बहुसंख्यक आबादी का अपने आप में जीविकोपार्जन करना मुश्किल हो गया है। मँहगाई के चलते दाल 90 रूपये किलो तक पहुँच गयी है। आम आदमी की थाली से भोजन गायब होता जा रहा है। बाढ़ और सूखे की वजह से मुख्य उत्पादक किसान और खेत मजदूर तबाह हो रहे हैं, स्थितियाँ विकट हैं। मुख्य विपक्षी दल भाजपा व सत्तारूढ़ दल कांग्रेस जिन्ना विवाद में उलझे हुए हैं जब पूँजीवादी संकट के चलते मेहनतकश जनता तबाह और बरबाद हो रही होती है तब ये पूँजीवादी दल इसी तरह के मुद्दे उछालकर जनता का ध्यान उनके क्रिया-कलापों की तरफ न जाये, इसी तरह की बहस छेड़ते रहते हैं। आज पूँजीवादी व्यवस्था को जनसंघर्ष के माध्यम से उखाड़ फेंकने की है और एक ऐसी व्यवस्था कायम करने की है जो टाटा बिरला और अम्बानियों से संचालित न हो क्योंकि ये इजारेदार पूँजीपति साम्राज्यवादी शक्तियों के ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं और इनका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन कर अपने आर्थिक साम्राज्य को बढावा देना है इसके लिए यह लोग सब कुछ करने के लिए तैयार हैं। मानवीय संवेदनाओं से रहित ये पूँजीवादी विदेशों का कचरा भी लाकर इस देश में बेचकर मुनाफा कमाने से बाज नहीं आते हैं।
-मुहम्मद शुऐब
-रणधीर सिंह ‘सुमन’
लो क सं घ र्ष !: आतंकवाद का हव्वा दिखाकर डराया जाता है हमें...
प्रसन्नता की बात है कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर होने वाले प्रायोजित कार्यक्रम इस बार नहीं हुए। पूर्व वर्षों की भाँति गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कुछ एजन्सियों द्वारा कथित आतंकवादियों की पकड़-धकड़ व एनकाउन्टर जैसे कार्यक्रम नहीं हुए, इसका मुख्य कारण यह है कि अमेरिकन साम्राज्यवादियों व उनके सहयोगी इसराइल ने मुम्बई आतंकी घटना को अंजाम देकर देश में पहली बार अपने नेटवर्क को प्रारम्भ किया और उसके बाद केन्द्र सरकार से जो चाहते थे वे सहूलियतंे ले लीं। साम्राज्यवादियों का नज़रिया देश को अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम बनाकर उसका हर तरीके से शोषण करना है। साम्राज्यवादियों के विकास का मुख्य आधार उपनिवेशक लूट है। जिसको वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से करते हैं। पाकिस्तान, बाँग्लादेश सहित हमारे देश भारत को प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश पुर्तगाली फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने कब्जा कर उपनिवेशित लूट कर अपने अपने देशों को समृद्ध बनाया था। जिसके कारण हमारे देश में बुद्धिजीवी वर्ग में गुलाम मानसिकता वाले व्यक्तियों की संख्या प्रचुर मात्रा में है जो अमेरिकन साम्राज्यवाद द्वारा किये गये हर कार्य को जायज ठहराने का प्रयत्न करते हैं उसी कड़ी मंे आतंकवाद एक मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है, कुछ सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी प्रोन्नति, आर्थिक लाभ, प्रचार व अत्याधुनिक साज व सामान को प्राप्त करने के लिये बेगुनाह लोगों को आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी दिखाकर अपने शौर्य पुण्यों को बयां करते हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तथा समाज के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इस तरीके की घटनाओं की जांच से जो परिणाम आये हैं उससे उनकी कलई खुली है लेकिन उनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं क्योंकि उन्हें साम्राज्यवादियों की लूट में अपना हिस्सा मिलता नजर आ रहा है।
-मुहम्मद शुऐब
-रणधीर सिंह ‘सुमन’
Saturday, September 5, 2009
लो क सं घ र्ष !: मणि यानी कमांडोज की गोली का टारगेट
मणि यानी रत्न होता है। मणिपुर का मतलब रत्नों का नगर है। पर लगता है इन शब्दों का यह अर्थ डिक्शनरी में ही होता है। मणिपुर के वाशिंदो के लिए मणि का अर्थ बहुत अलग है। या कह सकते हैं कई शब्द! जैसे हत्या, बलात्कार, जेल, भूख और किसी भी तरह के दमन को सहने वाला, यानी मणि है, और इन्हीं मणियों से मिलकर बनता है मणिपुर। क्या ख़ूब नाज़ होगा मणिपुरियों को अपने मणि होने पर? अपने देश की सेना, अपने राज्य की पुलिस के कमांडोज की बंदूक से छूटी गोली जब उनके पेट, सीने और कनपटी में उतरती होगी, तब वे मरने में कितना सुकून महसूस करते होंगे? यह मणिपुर का ही कोई बंदा ठीक से बयाँ कर सकता है, हम शेष भारतीय तो दूर बैठे महसूस ही कर सकते हैं। आज मणिपुर में मणि कमांडोज की गोली का टारगेट है। वाह..... रत्न की क्या इज्ज़त है!
मणिपुर में राज्य और केन्द्र सरकार के खूंखार सैनिक और कमांडोज शांति का प्रयास कर रहें हैं। एक पुलिस अधिकारीे की इस बात से समझ में आता है कि वे किस तरह के प्रयास कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी कहता है-‘या तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें या फिर कुछ करने का फै़सला करें। सच्चाई ये है कि पिछले दो साल में हम और भी तेज़ी से जवाबी हमले कर रहे हैं। पंजाब में देखिए समस्या कैसे दूर हुई। उनके प्रयास और सोचने के ढंग से लगता है कि भविष्य में मणिपुर मात्र बूढ़ों का राज्य रह जायेगा, क्योंकि सैनिक और कमांडोज एक-एक कर हर जवान स्त्री पुरूष को ख़त्म कर देंगे।
मणिपुर में शांति स्थापित करने के प्रयास का लम्बा इतिहास है। सन 2000 की बात है, असम राइफल के बहादुर जवानों ने दस मणियों को धूल चटा दीं, और भला वे क्यों न चटाते धूल? सरकार उन्हें तनख्वाह ही इस बात की देती है। इनमें 18 बरस का एक युवक भी था, जिसे देश की सरकार ने 1988 में राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार प्राप्त इस युवक को धूल चटाने पर, शायद उन्हें सरकार ने शूरवीर पुरस्कार दिया हो! लेकिन इस जघन्य हत्याकांड के खिलाफ कई मणियों के मग़ज़ की कोशिकाएं सुन्न पड़ गई। एक मानवाधिकार कार्यकत्री 28 बरस की इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठ गयी। मारे गये लोगों के परिवारों को न्याय मिले और काला काननू (1958 का आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) हटाया जाये जैसी इरोम की माँगे हैं।
अब इरोम कोई महात्मा गाँधी तो हैं नहीं जिसके भूख हडताल पर बैठने से देश में हड़कम्प मच जाये। राज करने वाले भी गोरे अंग्रेज नहीं, जो गाँधी की भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए काले कानून को रद्द करने पर विचार करें, अब देश जिन काले अंग्रेजों के हाथ में है, वे इतने बेशर्म और पत्थर हृदय हैं कि उन्हें इरोम जैसी कितनी ही महिलाओं के भूख हड़ताल पर बैठने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि (सन 2000 से 09) अब तक इरोम की भूख हड़ताल जारी है। उसे सरकार के लोगों द्वारा जब नाक में नली डालकर तरल भोजन दिया जा रहा है। सरकार जबरन और ज़्यादती करने में ही हुनरमंद है। सोचने की बात है कि लम्बे समय से भूखी इरोम के शरीर में कितना कुछ बदल गया होगा। उसकी हड्डियाँ भीतर ही भीतर गल रही होगीं। उसकी आँतें शायद अब रोटी पचाने लायक भी न बची हों। लेकिन सरकार अड़ी (जिद) पड़ी है कि काला कानून नहीं हटायेगी। है न, गोरों से ज़्यादा क्रूर काले अंग्रेज?
यह तथ्य बहुत कम लोग जानते होंगे और पढ़ी लिखी खाती-पीती नयी पीढ़ी तो शायद बिल्कुल ही नहीं जानती होगी! खाते-पीते वर्ग की नयी पीढ़ी डिस्कोथेक, हुक्का बार, वाइन बार, मल्टीप्लेक्स, माॅल में अपना समय इतना खर्च करती है कि इतिहास, साहित्य और संस्कृति जैसे विषयों को पढ़ने और जानने के लिए उसके पास वक्त़ का टोटा पड़ जाता है। उनके पास वक्त से भी बड़ा जो टोटा है, वह है जानने की इच्छा का, संस्कार का। बापड़ों को? ऐसा संस्कार ही न मिला कि उनका रूझान इन विषयों के प्रति हो। दूसरी तरफ़ जो अनपढ़ और गरीब पीढ़ी है, वह तो उदर पूर्ति के पाटों के बीच ही पिस कर रह जाती है। सदा ही गोरे और काले दोनों अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियाँ यही तो चाहती रही हैं।
यहाँ यह बताना ठीक ही होगा कि जब 1947 में गोरे अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया। मणिपुर के महाराजा ने मणिपुर को संवैधानिक राजतंत्र घोषित किया। उन्होंने अपनी संसद के लिए चुनाव भी करवाए। लेकिन शायद दिल्ली ने महाराजा पर ऐसा दबाव बनाया कि मणिपुर का भारत (1949) में विलय करने केे सिवा कोई चारा नहीं बचा था। विलय के बाद मणिपुर को सबसे निचले स्टेट का यानी सी ग्रेड राज्य का दर्जा दिया गया। फिर 1963 में केन्द्र शासित प्रदेश और फिर 1972 में राज्य का दर्जा दिया गया। लेकिन भारत सरकार का मणिपुर के साथ जो बर्ताव था, वह मणिपुर के चेतना से लबरेज़ लोगों से देखा नहीं गया। 1964 में ऐसे ही लोगों ने भारत सरकार के ख़िलाफ़ बगावत का बिगुल फँूक दिया। उन्होंने यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नाम से भूमिगत आंदोलन की शुरूआत कर दी। फिर 70 के दशक में पी.एल.ए., प्रीपाक, के.सी.पी. और के.वाई.के.एल. जैसे दूसरे संगठन भी बने। राष्ट्रवाद को लेकर सबकी अपनी-अपनी धारणाएँ थीं, लेकिन वे लड़ रहे थे, मणिपुर की आज़ादी के लिए। इन्हीं सब आंदोलनों को कुचलने के लिए मणिपुर में (1958 का आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पाॅवर एक्ट) काला क़ानून लागू किया था, जो आज तक ज़ारी है।
मणिपुर में सबसे ज़्यादा विरोध का उफान 2004 में देखने को मिला। कुछ समय के लिए पूरे देश का ध्यान मणिपुर की ओर आकर्षित हुआ। 2004 में असम रायफल्स के जवानों ने अपनी वीरता का झंडा कुछ इस अंदाज़ से गाड़ा कि देश का हर जागरूक और संवेदनशील तबका थू...थू... करे बिना न रह सका। मामला यूँ था कि एक रात असम रायफल्स के जवान 32 बरस की थांग्जम मनोरमा को उसके घर से उठा ले गये। वे इसलिए नहीं उठा ले गये थे कि मनोरमा ने कहीं बम फोड़ दिया था या कुछ और गंभीर अपराध कर दिया था, बल्कि उसके साथ जबरदस्ती करने को ले गये थे और सामूहिक रूप से की भी। बलात्कार के बाद मनोरमा की हत्या कर लाश फेंक दी गयी। इस घटना ने मणिपुरी महिलाओं के मान-सम्मान की
धज्जियाँ बिखेर दीं। पूरा मणिपुर सड़क पर उतर आया। महिलाओं ने मणिपुर की राजधानी इंफाल में भारतीय सेना के कार्यालय के सामने नग्न होकर विरोध जताया और नारा दिया इंडियन आर्मी रेप अस।
इस घटना से केवल मणिपुर सरकार की ही नहीं, केन्द्र सरकार की भी देश भर में थू... थू... होने लगी। तब अगस्त 2004 में केन्द्र सरकार को इंफाल नगर पालिका क्षेत्र से (ए.एफ.एस.पी.ए.) काला कानून हटाने को बाध्य होना पड़ा। मणिपुर में सेना का हस्तक्षेप कम हुआ और सेना की जगह मणिपुर पुलिस कमांडोज (एम.पी.सी.) ने ले ली। एम.पी.सी. राज्य के इंफाल पूर्व, इंफाल पश्चिम, थाउबल और बिष्णुपर जिलों में तैनात हैं। इनकी तैनाती ऐसी ही है जैसे नागनाथ को हटाया और सांपनाथ को तैनात किया गया हो।
इस बल का गठन 1979 में त्वरित कार्यवाही बल के रूप में किया गया था। इस बल के बारे में राज्य के पूर्व महानिरीक्षक थांग्जम करूणमाया सिंह का कहना है कि एम.पी.सी. के जवानों को ख़ास आप्रेशन्स के लिए प्रशिक्षित किया गया है और उन्हें तभी गोली चलाने का निर्देश है जब उन पर गोलीबारी हो रही हो। उन्हें महिलाओं, बूढ़ों और बच्चों का ध्यान रखने को कहा जाता है। लेकिन 23 जुलाई 2009 की सुबह करीब साढे़ दस बजे ख्वैरम्बंड बाज़ार में तलाशी अभियान के दौरान जो घटना घटी, वह पूरी तरह से उक्त कथन का मखौल उड़ाती है।
2008 में इस बल ने कुल सत्ताइस बार नाम कमाया, पर ये मुठभेड़ और उत्पीड़न के मामले इसने सुनसान जगहों में निपटाये थे। पर बल के कमांडोज और नेतृत्व करने वालों को शायद लगा कि उनका नाम कम हुआ। शायद उन्हें वह कहावत याद आयी कि जंगल में मोर नाचा, किसने देखा। तब शायद उन्होंने अपने अचूक निशाने का हुनर बीच चैराहे पर दिखाने को सोचा होगा। शायद इस सोच का सफल और चर्चित परिणाम-रबीना देवी, संजीत चोंग्खम और एक गर्भवती स्त्री के शव हैं। कमांडोज की सूझबूझ और दूरदर्शिता तो देखिए, उस गर्भवती महिला के बच्चे को पेट ही में मारकर, जन्म लेकर बच्चे की पी.एल.ए. के संगठन से किसी भी रूप में जुड़ने की संभावनाओं को पूर्णतः समाप्त कर दिया। कमांडोज ने मणिपुर राज्य विधान सभा से लगभग 500 मीटर की दूरी पर यह कारनामा कर दिखाया, ताकि विधान सभा में बैठने वाले मंत्री गोलियों की आवाज़ सुन सकें और जाँबाज कमांडोज के लिए उचित पुरस्कारों के प्रस्ताव तुरंत पारित करवा सकें।
कमांडोज का यह दावा सही है कि संजीत पहले पी.एल.ए. से जुड़ा हुआ था, इस आरोप के कारण संजीत को सन् 2000 में हिरासत में लिया था और फिर छोड़ दिया था। फिर 2006 में संजीत अपनी तबीयत खराब रहने की वजह से पी.एल.ए. से अलग हो गया था। 2007 में संजीत को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत फिर से हिरासत में लिया और 2008 में छोड़ दिया था। कमांडोज उसे बार-बार पकड़ते, बंद करते और फिर छोड़ देते थे। कोई तो वजह थी, जिसकी वजह से उसे छोड़ना पड़ता था। शायद सिद्ध नहीं होता था कि संजीत का पी.एल.ए. से सम्बन्ध हैं या कुछ और बात थी। क्या था यह तो वही जानते होंगे, लेकिन उसे बार-बार छोड़ना पड़ जाता था। वह अपने परिवार के साथ खरई कोंग्पाल सजोर लीकेई में रहते हुए एक निजी अस्पताल में अटेंडेंट की नौकरी करता था, यह बात वहाँ सब जानते थे।
‘तहलका’ पत्रिका में छपी तस्वीरों में से किसी में भी वह कमांडोज के साथ झूमाझटकी करता, भागता या गोली चलाता नजर नहीं आ रहा है। पुलिस कमांडोज उसे घेरे खड़े हैं। फिर उसे खींचते और
धकियाते एक फार्मेसी के स्टोर रूम की तरफ ले जाते नजर आ रहे हैं। थोड़ी देर बाद उसकी लाश को घसीट कर बाहर लाते हैं। उन तस्वीरों और संपूर्ण घटनाक्रम को जानने के बाद तो ऐसा ही लगता है कि कमांडोज ने मनमाने ढंग से सब्जी वाली रबीना देवी, गर्भवती स्त्री और संजीत की हत्या कर दी। वास्तविकता क्या है यह कोई ईमानदार एजेंसी की जाँच रिपोर्ट से पता चलेगा! पर इस बात से जाँबाज कमांडोज का नाम पूरे देश में हो ही गया। इससे राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की इस समझ का भी पता चलता है कि वे अपने अधीनस्थ काम करने वाली सरकारी एजेंसियों को किस तरह से प्रशिक्षित करती हैं। सवाल यह है कि अपने हक के लिए लड़ने वालों से निपटने का यही क्या एक मात्र तरीका है?
बात मणिपुर की तो है ही, पर अकेले मणिपुर की ही नहीं है। आज देश के कई हिस्सों में अपनी अलग-अलग माँगों और अधिकारों के लिए लड़ने वाले किसान, मजदूर, आदिवासी, दलितों को सरकार गोली की भाषा से ही समझा रही है।
इस सरकार और इस व्यवस्था से कुछ विनम्र सवाल है कि क्या सरकारी आतंकवाद कभी थमेगा? कभी सरकार और उसके अधीनस्थ काम करने वाली एजेंसियों को यह समझ में आयेगा कि वे सब शोषण करने और आमजन को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि उसके हर अधिकार को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करने के लिए चुने और नियुक्त किये जाते हैं? क्या यह सरकार आमजन के मन में यह भरोसा पैदा कर सकती है कि वह साम्राज्यवादी ताकतों की अंगुली के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली नहीं है? क्या देश के सभी हिस्सों से भूख, भय, बेरोज़गारी, शोषण, दमन जैसी समस्याओं को खदेड़कर देश में शांति और सद्भाव का माहौल तैयार करने का विश्वास पैदा कर सकती है?
क्या सरकार के पास ऐसा कोई रास्ता है जिससे लोगों के सवालों और समस्याओं के हल खोजे जा सकें? बात केवल राज्य और देश की सरकारों की नहीं हैं, बल्कि क्या इस पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था के ही पास ऐसा कोई रास्ता है? अगर नहीं, तो फिर अकेली सरकार नहीं, इस पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की जरूरत है। यह काम जितना जल्दी होगा, सुकून उतना नज़दीक होगा।
-सत्यनारायण पटेल
मो0 09826091605
Friday, September 4, 2009
लो क सं घ र्ष !: आखिर इस पुलिस का चेहरा कब बदलेगा
कालाढूंगी में सन्नाटा पसरा हुआ है। चारों तरफ खाकी वर्दीधारी घूम रहे हैं। क्षेत्र में धारा 144 लगी है लेकिन माहौल कफ्र्यू जैसा है। नौजवान घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं या उनके मां-बाप ने डर के मारे उन्हें क्षेत्र से बाहर भेज दिया है। हर किसी की जुबां पर एक ही चर्चा है कि अब क्या होगा। पुलिसकर्मी की हत्या व थाने पर आगजनी के जुर्म में कौन-कौन धरा जाएगा। क्षेत्र में पुलिस की दबिशें जारी हैं, खुफिया विभाग के लोग सादी वर्दी में अपराधियों को सूंघ रहे हैं। जनता की ‘मित्र पुलिस’ जनता की शत्रु का रोद्र रूप धारण कर चुकी है। क्षेत्र का प्रत्येक निवासी पुलिस का अपराधी है, वह कभी भी धरा जा सकता है। पुलिस ने बहीखाता खोल लिया है जिसमें 15 लोग नामजद हैं व अन्य 400 का नाम इस बहीखाते में लिखा जाना बाकी है। गांव में दबिश देने 2-4 पुलिस वाले नहीं जाते, दबिश देते समय पुलिस वालों की संख्या 200 तक भी होती है, उनका मकसद जनता में दशहत पैदा करना है। छुटभैय्ये नेता अपने आकाओं से अपना नाम पुलिस के मुकदमें में आने से बचाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। खाकी के आगे जनता बेबस, असहाय नजर आ रही है। 23 अगस्त की पूर्वाह्न का समय बीत चुका है जब जनता ने भावावेश में आकर कुछ समय के लिए सब कुछ अपने हाथ में ले लिया था। अब खाकी ने अपने राज और रूतबे को फिर से कायम कर लिया है। अशोक कुमार, आई.जी. पुलिस ने जनता की दो नस्लें परिभाषित की हैं, एक पुलिस से लड़ने वाली, दूसरी पुलिस को बचाने वाली। पुलिस से लड़ने वालों को दण्डित किया जायेगा, पुलिस को बचाने वालों को पुरूष्कृत।
लोग खुलकर नहीं बोल रहे हैं कानाफूसी कर रहे हैं कि बलवन्त की हत्या नीरज ने नहीं की, तो फिर किसने की, बरबस ही यह सवाल कौंध जाता है। इसका उत्तर ग्रामीण कुछ इस प्रकार बयां करते हैं।
कोटाबाग के ब्लाक प्रमुख बलवन्त सिंह ने 22 अगस्त की रात में बसपा नेता नीरज तिवारी की एक रेस्टोरेन्ट में पिटाई कर दी। पिटाई के बाद नीरज तिवारी भागकर थाना कालाढूंगी पहुंचा, कुछ ही देर बाद बलवन्त भी एक पत्रकार के साथ कालाढूंगी थाने में पहुंच गया। बलवन्त वहां पुलिस से भी गाली-गलौच करने लगा। ग्रामीणों का कहना है कि जिस गोली से बलवंत की हत्या हुई वह पुलिस की थी और उसकी हत्या थाने के बाहर नहीं थाने के भीतर के कमरे में हुयी है। हत्या के बाद पुलिस ने बलवन्त की लाश को बाहर डलवा दिया और खून के निशान साफ करवा दिये। इस दौरान थाने की बत्ती बुझा दी गयी।
मारे गये भाजपा नेता बलवन्त सिंह पर कुल 19 मुकदमें लगे थे तथा बसपा नेता नीरज तिवारी पर 2 मुकदमें चल रहे हैं।
ग्रामीण बताते हैं अगले दिन सुबह जब बलवन्त की बहन इंद्रा, अपने परिजनों व ग्रामीणों के साथ हत्या की जानकारी लेने कोतवाली पहुंची तो बहन इन्द्रा को बलवन्त की चप्पलें कोतवाली परिसर के भीतर पड़ी दिखाई दीं। बलवन्त के परिजनों ने जब इस पर पुलिस के सामने सन्देह व्यक्त किया तो खाकी ने इसका जवाब उन्हें पिटाई से दिया। इससे मामला बिगड़ गया, जनाक्रोश भड़क उठा व जनता बेकाबू हो गयी और फिर वह सब कुछ हुआ जिसके लिये न तो क्षेत्र की जनता तैयार थी और न ही पुलिस। कालाढूंगी थाना फूंक दिया गया। दर्जनों वाहन जला दिये गये, पुलिसकर्मी भागते-छिपते नजर आए।
इसी दौरान नैनीताल के एस.एस.पी. मोहन बंग्याल, डी.एम. शैलेेष बगौली, सी.ओ. मुकेश चैहान पुलिस टीम व बज्र वाहन साथ लेकर कालाढूंगी पहुंचे। आक्रोशित जनता को देखकर डी.एम., एस.एस.पी., सी.ओ. व पुलिस के कुछ सिपाही मौके से भाग खड़े हुये। उसी काफिले में शामिल पूरन लाल व 4-5 अन्य सिपाही पब्लिक के बीच फंस गये जिनकी जनता ने पिटाई कर दी। इसी बीच किसी ने पूरन लाल के सर पर पत्थर दे मारा जिससे पूरन लाल की मौत हो गयी।
22 व 23 अगस्त का घटनाक्रम पुलिस प्रशासन की कार्यवाही पर कई तरह के सवाल खड़े करता है। पहला यह कि बलवन्त की हत्या थाने के भीतर हुयी है तो इस बात को स्वीकार करने में आई.जी. को तीन दिन का समय क्यों लग गया। इससे अंदेशा होता है कि क्षेत्र के ग्रामीण इस मामले में जो कुछ बोल रहे हैं कहीं वह सच तो नहीं है। दूसरी बात पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके से भागने के बजाय भीड़ को समझाने का प्रयास क्यों नहीं किया, क्या उनकी अपने स्टाफ के प्रति यही जबाबदेही है कि वह उन्हें छोड़कर मौके से भाग खड़े हों। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या कालाढूंगी की घटना उत्तराखण्ड की या देश की अनोखी घटना है।
इसका जवाब है नहीं। देश में शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब देश में जनता का आक्रोश सरकारों के जनविरोधी रवैयों के कारण पुलिस अथवा सुरक्षा बलों के खिलाफ न फूटता हो। उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा रचा गया रामपुर तिराहा काण्ड, खटीमा, मसूरी काण्ड क्या उत्तराखण्ड की जनता कभी भूल सकती है जब पुलिस ने दर्जनों आंदोलनकारियों की कुर्बानी ले ली थी। मां-बहनों की इज्जत से खिलवाड़ किया था। कालाढूंगी की घटना क्या वर्ष 2001 में रामनगर में पुलिस कस्टडी में हुयी मौत के बाद शहर में मचे बबाल से अलग है या दो वर्ष पूर्व बेतालघाट में पुलिस उत्पीड़न से आक्रोशित जनसमूह द्वारा इंस्पेक्टर का मुंह काला कर देने की घटना से अलग।
यह सभी घटनाएं चीख-चीखकर एक बात कह रही हैं, वह यह कि देश की पुलिस आजादी के 62 वर्षों बाद भी लगभग वैसी ही है जैसी ब्रिटिशकालीन गुलाम भारत में थी। देश में अंग्रेजों के बनाए कानून आज भी राज करते हैं। लार्ड मैकाले द्वारा बनायी गयी भारतीय दण्ड संहिता 1860, पुलिस अधिनियम 1861, पुलिस अधिनियम 1888, पुलिस द्रोह अधिनियम 1922 इत्यादि देश के कानून की किताबों में आज भी मौजूद है। अंगेेजों ने भारत में पुलिस का ढांचा अपने लूट के साम्राज्य को कायम करने व देश की जनता का उत्पीड़न करने के लिये कायम किया था। आजादी के बाद सत्ताधारी पंूजीपतियों की पार्टी कांग्रेस ने उसी ब्रिटिशकालीन ढांचे को कुछ फेरबदल करके गोद ले लिया। बिडम्बना यह कि देश में एक के बाद एक सरकारें बदलती गयी परन्तु ढांचे में कोई भी बुनियादी बदलाव नहीं हुआ, इसे बदलने की राजनैतिक इच्छा शक्ति किसी भी सरकार ने नहीं दिखाई।
कालाढूंगी में उपजे असंतोष का कारण मात्र बलवन्त सिंह की हत्या नहीं था। इस असंतोष के पीछे वे सभी कारण मौजूद हैं जिसे देश की जनता रोज व रोज अपनी जिन्दगी में झेलती है। थाने जाने के नाम पर आज भी आम आदमी थर्रा जाता है। कमजोरों का उत्पीड़न, ताकतवरों-धनवानों का सहयोग देश की पुलिस का गुण है। फर्जी मुकदमें, फर्जी एनकाउन्टर, अवैध वसूली, जनान्दोलनों का निर्मम दमन, देश की पुलिस का चेहरा है। कानूनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर लोगों से मारपीट, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल, अवैध हिरासत में रखना, गाली-गलौच पुलिस की कार्यशैली है।
कुछ लोगों का कहना कि कालाढूंगी में पुलिस ने ढील दे दी, उसे सख्ती बरतनी चाहिये थी। सवाल यह है कि क्या वहां पर खून की नदियां बहा देनी चाहिये थी। पुलिस की गोली से घायल दो लोगों का मामला इस शोरगुल में कहीं दब गया है। शासक वर्ग का एक हिस्सा इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए पुलिस को और ज्यादा दमनात्मक रूख अपनाने की बात कह रहा है। हमेशा सत्ताधारी ऐसे ही सोचते हैं, वह कभी अपनी गलती नहीं मानते, वे सोचते हैं कि दमन करके, कानून का भय दिखाकर वे सब कुछ ठीक कर लेंगे। परन्तु लोकतन्त्र में ऐसा सम्भव नहीं है।
इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिये दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, देश के कानूनी ढांचे में आमूल-चूल बदलाव लाने की जरुरत है जिसका दम इस देश की राजनैतिक पार्टियों में नहीं है। अब जनता को ही संगठित होकर पहल करनी होगी।
मुनीष कुमार
संपादक- ‘नागरिक’
हिन्दी, पाक्षिक समाचार पत्र
मोबाइल नं. 09837474340
Thursday, September 3, 2009
लो क सं घ र्ष !: या सुंदर केवल आशा...
आशा का सम्बल सुंदर,
या सुंदर केवल आशा ।
विभ्रमित विश्व में पल-पल ,
लघु जीवन की प्रत्याशा॥
रंग मंच का मर्म कर्म है,
कहीं यवनिका पतन नही ।
अभिनय है सीमा रेखा,
कहीं विमोहित नयन नही॥
सत् भी विश्व असत भी है,
पाप पुण्य ही हेतु बना।
कर्म मुक्ति पाथेय यहाँ,
स्वर्ग नर्क का सेतु बना ॥
डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'Wednesday, September 2, 2009
अच्छी बात,बुरी बात
कोई भी अपनी पत्नी से पूछे कि वह आपके बारे में चार-पाँच अच्छी बात,आदत बताए। पत्नी सोचती रहेगी और आप उसके मुहं की तरफ़ देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकेंगें। अब आप उससे कोई पाँच बुरी बात,बुरी आदत बताने को कहो। आपको अपनी हकीकत पता चल जायेगी। [ हमें तो पता चल चुकी है।] इसी प्रकार भाई से बहिन की,बहिन से भाई की। एक दोस्त से दूसरे के बारे में, छात्र-छात्रा से टीचर के लिए,टीचर से स्टूडेंट्स के लिए पूछा जा सकता है। बड़ी स्तर पर हम देश के बारे में यह बात पूछ सकते हैं। कोई भी किसी के बारे में अच्छी बात,आदत बताने से पहले सोचेगा,चिंतन करेगा। वही बुरी बात एक पल में बिना रुके बता देगा। चलो उदाहरण देकर बताता हूँ।
वैज्ञानिक के० संथानम ने भारत द्वारा किए गए परमाणु विस्फोट पर सवालिया निशान लगा दिया। इस से ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। एक निरक्षर परिवार भी अपने घर की कमजोरी को बाहर उजागर नहीं करता। यहाँ देश के जाने माने लोग हिंदुस्तान को "मेरा भारत महान" बनाने में लगे हुए है। देश के दुश्मनों के लिए इस से बढ़िया ख़बर और क्या हो सकती है। एक नेता जिन्ना की तारीफ करता है,एक वैज्ञानिक परमाणु विस्फोट की सफलता पर सवालिया निशान लगाता है। इसे भाई चारा तो कह ही सकते हैं।
अब परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व मुखिया होमी नुसरवानजी सेठना जी भी संथानम जी के साथ भाई चारा दिखाते हुए कह रहें हैं कि १९९८ का परमाणु परीक्षण विफल हो गया था। श्री सेठना तो ये भी कहतें है कि प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक ऐ पी जे अब्दुल कलाम विस्फोटकों के दोहन और विकास के बारे में कुछ नहीं जानते।
इन महान लोगों की बात कितनी सच है वही जानें। लेकिन क्या यह सब बोलना देश के हित में है? ये तो बहुत ऊँचे स्तर पर अपनी बात मजबूती से रख सकते हैं। सरकार बड़े बड़े वैज्ञानिकों को उनके साथ लगाकर सच्चाई का पता लगा सकती है। उनके इस प्रकार से करने की क्या जरुरत पड़ी?
वैसे एक बात है, इस देश में,वह यह कि रिटायर होने के बाद हर कोई अपने विभाग की, देश की, व्यवस्था की आलोचना शरू कर देता है। उस से पहले वह सरकारी सुविधाएँ भोगता है। बात वही कि हम सब बुरी बात तो झट से बोल देते हैं।
लो क सं घ र्ष !: यह रीती-नीति जगपति की...
निर्मम नर्तन है गति का ,
है व्यर्थ आस ऋतुपति की ।
छलना भी मोहमयी है,
यह रीती-नीति जगपति की॥
आंसू का क्रम ही क्रम है,
यह सत्य शेष सब भ्रम है ।
वेदना बनी चिर संगिनी,
सुख का तो चलता क्रम है॥
उद्वेलित जीवन मग में,
बढ़ चलना धीरे-धीरे ।
प्रणय, मधुर, मुस्कान, मिलन,
भर लेना मोती-हीरे ॥
-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'
Tuesday, September 1, 2009
सबको लुभा रहा है आगरा का पेठा
बेपनाह मौहब्बत की अनमोल निशानी ताजमहल की वजह से आगरा शहर पूरी दुनिया मे जाना जाता है। ताजमहल की खूबसूरती इस शहर के लिये वरदान है। लेकिन आगरा मे एक ओर चीज़ है जिसकी मिठास यहां आने वालों को लबरेज़ कर देती है, वो है यहां का पेठा। यूँ तो पेठा महाराष्ट्र, चैन्नई और राजस्थान के कई शहरों मे भी बनता है। लेकिन आगरा का पेठा भारत ही नही बल्कि पूरी दुनिया में अपने स्वाद के लिये जाना जाता है। आगरा मे बनने वाले पेठे की इतनी किस्में है कि खाने वाले के लिये ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पेठा लिया जाये।
पेठे की शुरुआत आगरा मे मुगल काल मे हुई थी और तब से लेकर आज तक इसकी मिठास में कमी नही आयी। आगरा में रहने वाले लोगों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस पेठे के कारोबार से जुड़ा हुआ है। पेठा उघोग एसोसिएशन के मुताबिक आगरा में लगभग 10,000 लोग इस कारोबार का हिस्सा हैं। शहर के नूरी दरवाज़ा, गुड़ की मण्ड़ी, फुलट्टी बाज़ार और पेठा गली इलाके मे ये काम बहुतायत से होता है। यहां से पेठा देश के कोने-कोने मे भेजा जाता है। शहर मे पंछी पेठा, भीमसैन बैजनाथ पेठा और गोपालदास पेठा के नाम प्रमुख हैं। इनके द्वारा बनाये गये पेठे की मांग देशभर मे रहती है। पेठे बनाने के लिये कच्चे फल पेठे की ज़रुरत पड़ती है। इसे अंग्रेजी मे पम्पकिन कहते हैं। ये फल तरबूजे के आकार का होता है। एक फल का वजन एक किलो से तीस किलो तक होता है। सात-आठ किलो कच्चे फल से करीब पांच किलो पेठा तैयार हो जाता है। आगरा मे करीब 23 आढ़त व्यापारी हैं जो इस कच्चे फल की सप्लाई शहर मे करते हैं। हर सीजन मे इसकी खेती अलग इलाकों मे होती है। गर्मियों मे बरेली, सांकड़ा और कार्तिक के महीनें मे कानपुर, इटावा, औरेय्या और मैनपुरी जिलों मे इसकी खेती की जाती है।
आगरा मे हर रोज़ डेढ़ कुन्तल पेठा बनाने के लिये तकरीबन 100 किलो चीनी, 1200 लीटर पानी और 2 कुन्तल कोयले की खपत होती है। पहले केवल सादा पेठा बनाया जाता था। लेकिन अब इसकी कई किस्में बनने लगी हैं। जिसमें गिरी पेठा, केसर पेठा, अंगूरी पेठा, चैरी पेठा, रसबरी, चॉकलेट पेठा, गुलाब लड़डू, सैंड़विच पेठा और पान पेठा खास है। इनमें सबसे महंगा पान पेठा होता है जिसकी कीमत 180 से लेकर 220 रुपये प्रति किलो तक होती है। यह पेठा केवल एक-दो दिन रखा जा सकता है जबकि सादा पेठा 15 से 20 दिन तक रखा जा सकता है। पंछी पेठा के मैनेजर अखिलेश के मुताबिक खांड़ का पेठा केवल आगरा मे ही बनता है। यह काफी ठण्डा और पीलिया जैसे गम्भीर रोग के लिये फायदेमंद होता है। खांड से बना पेठा मांग पर विदेशों तक भेजा जाता है। उनके मुताबिक पेठे की सबसे बड़ी खासयित यह है कि इसमे किसी प्रकार की मिलावट नही होती।
बड़ी विदाई की तैयारी
--- चुटकी----
बीजेपी में
जोर शोर से
मिलने-मिलाने का
दौर जारी है,
लगता है
किसी बड़ी
विदाई की
तैयारी है।
लो क सं घ र्ष !: जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही.....
जन जीवन की वहां सुरक्षा , मात्र कल्पना,
भक्षक बन गया जहाँ रक्षक ही ॥
कहाँ मिले गंतव्य पथिक को
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही॥
कैसे हरा भरा उपवन हो कैसे कलि-कलि मुस्काए
कैसे कोयल मधुरस घोले कैसे कहो वसंत ऋतू आए ।
आग लगा दे जब उपवन का संरक्षक ही।
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही॥
अधरों पर मुस्कान हो कैसे , कैसे मिटे दुराशा मन की
कैसे सुख और शान्ति आए , कष्ट मिटे कैसे जन-जन की
हत्यारा बन गया जहाँ पर आरक्षक ही।
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही॥
हिंसा जहाँ पूज्य हो ,कैसे मानवता को प्राण मिले।
जीवन के इस महाशिविर से बोलो कैसे त्राण मिले॥
अन्धकार का ग्रास बन गया जब दीपक ही।
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही ॥
कैसे फिर किलकारी गूंजे, मुरझाया चेहरा मुस्काये।
भूख- प्यास- भय की तड़पन से मानव कैसे मुक्ति पाये॥
राज धर्म को भूल गया जब जन नायक ही।
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही ॥
मानवता का गला घोटकर लोकतंत्र की बलि चढाते।
धर्म के ठेकेदार- अहिंसा के शिक्षक ही ।
कैसे बचे अस्मिता बोलो , कैसे जीवन ही सुरक्षित
जहाँ लुटेरे साधू वेश में धरती पर फिरते हो हुलाषित ॥
बटमार बन गया भू का चिन्तक
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही॥
पग-पग पर जब जाल बिछे हो बाधिकों ने डेरे डालें हों ।
भेड़े वहां सुरक्षित कितनी जहाँ भेडिये रखवाले हों ॥
कैसे पहुंचे पार डुबो दे जब खेवक ही।
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही॥
-मोहम्मद जमील शास्त्री
Subscribe to:
Posts (Atom)


