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Friday, September 25, 2009

लो क सं घ र्ष !: तोरे पाकिस्तान का का हाल है ?

"काहे भइया , तोरे पकिस्तान का का हाल है ?" "वह तो बन रहा है ।" " काहे न बनिहे , भैय्या , तूँ कहि रइयो तो जरूर बनिये। बाकी ई गंगौली पकिस्तान में जा रहे कि हिंदुस्तान में रइहे ?" "ई तो हिन्दुस्तान में रहेगी । पकिस्तान में तो सूबा सरहद , पंजाब , सिंध और बंगाल होगा ; और कोशिश कर रहे हम लोग की मुस्लिम यूनिवर्सिटी भी पकिस्तान में हो जाए ।" " गंगौली के वास्ते ना न करियो कोशिश ?" "गंगौली का क्या सवाल है ?" "सवाल न है त हम्में पकिस्तान बनने या न बनने से का ?" " एक इस्लामी हुकूमत बन जाएगी ।" " कहीं इस्लामू है कि हुकुमतै बन जहिए । ऐ भाई, बाप-दादा की कबर हियाँ है, चौक इमामबाडा हियाँ है , खेती-बाडी हियाँ है । हम कौनो बुरबक है की तोरे पकिस्तान जिंदाबाद में फंस जाएँ ।" " अंग्रेजो के जाने के बाद यहाँ हिन्दुओं का राज होगा ।" " हाँ-हाँ , त हुए बा । तू त ऐसा हिंदू कही रहियो जैसे हिन्दुवा सब भुआऊँ है कि काट लीहयन । अरे, ठाकुर कुंवरपाल सिंह त हिन्दुवे रहे। झिंगुरिया हिंदू है। ऐ भाई, ओ परसरमुआ हिंदुए न है की जब शहर में सुन्नी लोग हरमजदगी कीहन कि हम हजरत अली का ताबूत न उठे देंगे , कहो को कि ऊ में शिआ लोग तबर्रा पढ़त है त परसरमुआ उधम मचा दीहन कि ई ताबूत उट्ठी और ऊ ताबूत उठा । तोरे जिन्ना साहब हमारा ताबूत उठवाये न आए !" डॉक्टर राही मासूम रजा के 'आधा गाँव' से

1 comment:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आधा गाँव कालजयी रचना है.
अच्छा लगा.
धन्यवाद.

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