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Thursday, March 29, 2012

Kumari Selja inaugurated 2nd Haryana Contemporary Art Exhibition

New Delhi, Kumari Selja, Hon’ble Union Culture Minister inaugurated at 2nd Haryana Contemporary Art Exhibition, the biggest ever showcase of modern & contemporary art traditions of Haryana by lighting the ceremonial lamp at Lalit Kala Akademi, Rabindra Bhawan on March 23. This exhibition has been organised by HIFA (Haryana Institute of Fine Arts) in collaboration with MINISTRY OF CULTURE.
A number of prominent personalities including Sh. Suresh Kumar Goel, Director General, ICCR (Indian Council for Cultural Relations), Maj. Gen. (Retd.) L.K. Gupta, Chairman, INTACH (Indian National Trust for Art & cultural Heritage), Mrs. Tasneem Mehta, Vice Chairman, INTACH (Indian National Trust for Art & cultural Heritage), Mrs. Amal Allana, Chairperson, NSD (National School of Darama), Ms. Uma Sharma, Kathak Danseuse & Ustad Aslam Sabri, Famous Qwwal were present to grace the occasion. On this occasion eight talented artists were also awarded, who have been selected for award in the competition category by the jury under the chairmanship of the then acting chairman of Lalit Kala Akademi Shri. K.R. Subbanna. The award carries a cash prize of Rs. 31000/- alongwith personal diploma & angvastram for five (5) artists namely Shri. Kashinath Das (Painting), Kumari Renu Dhiman (Photography), Shri Pawan Kumar (Sculpture), Shri Rakesh Bani (Graphics) and Shri Satwant Singh (Drawing). In addition to these five (5) above mentioned artists, three (3) artists namely Rahul Dhiman (Graphics), Shrimati Renuka Sondhi Gulati (Sculpture) and Kumari Shivani Parmar (Painting) will receive Hon’ble Mention Award and Rs. 11000/- cash prize alongwith personal diploma & angvastram. The 2nd Haryana Contemporary Art Exhibition is primarily divided into three categories- Competition Category, Non-Competition Category and Invited Artists Category. The works of established artists belonging to state of Haryana and a number of veteran artists have been displayed at this show and these artists include Shri O.P. Sharma, Jai Zarotia, J.K. Chhilar, Kavita Jaiswal, Ashok Lavasa, Jagdish Chander, Dr. Ram Viranjan, Kalicharan Gupta, Viren Tanwar and Roop Chand. Another interesting feature of this show will be the showcasing of works of two hundred (200) artists on a large LED Screen. This exhibition is sponsored by Ministry of Culture, G.O.I. and the Media partner is F.M. Rainbow India 102.6 Mhz. In the absence of Lalit Kala Akademi in Haryana, the artists were disheartened and facing a number of obstacles in the progress of their creative endeavours. On the one hand, this exhibition will provide a suitable platform to the Haryana based artists at national level and on the other hand, it will provide interaction between artists who are feeling neglected in their own state. HIFA firmly believes that this exhibition will be a milestone in the progress of Haryana’s artistic journey. During this prestigious show, seventy-six artists belonging to Haryana will proudly display their works in the category of Drawing, Painting, Sculpture, Graphic, Photography, Installation and Multi-media.

Sunday, October 23, 2011

दिवाली

दीप सज्जित स्वच्छ गृह सब फूल माला से सजे
नव सुवसना नारी नर सब आज स्वागत में भजे
धूप, चंदन, पुष्पमाला करें पूजन लक्ष्मी का
मलिनता और द्वेष ईर्षा आज के दिन सब त्यजें ।

नाना विविध पकवान से श्री भोग को अर्पित करें
प्रसाद ये फिर स्नेह पूर्वक साथ साथ ग्रहण करें
नमन मन से करें, विनती, देवि से समृध्दी की
घर द्वार आंगन नगर देश सब धान्य औ धन से भरे ।

सुख शांति का साम्राज्य हो पर देश हित तत्पर रहें
हमें असावध देख बैरी ना कोई खटपट करे
मजबूत हों सैनिक हमारे, नागरिक भी सशक्त हों
यही इच्छा करें और इसको कर्म से सुफल करे ।

सभी ब्लॉगर बंधु भगिनियों को दिवाली की अनेक शुभ कामनाएँ ।

Sunday, September 18, 2011

श्रीगंगानगर-सनातन धर्म,संस्कृति में पुत्र की चाहना इसीलिए की जाती है ताकि पिता उसके कंधे पर अंतिम सफर पूरा करे। शायद यही मोक्ष होता होगा। दोनों का। लेकिन तब कोई क्या करे जब पुत्र के होते भी ऐसा ना हो। पुत्र भी कैसा। पूरी तरह सक्षम। खुद भी चिकित्सक पत्नी भी। खुद शिक्षक था। तीन बेटी,एक बेटा। सभी खूब पढे लिखे। ईश्वर जाने किसका कसूर था? माता-पिता बेटी के यहाँ रहने लगे। पुत्र,उसके परिवार से कोई संवाद नहीं। उसने बहिनों से भी कोई संपर्क नहीं रखा। बुजुर्ग पिता ने बेटी के घर अंतिम सांस ली। बेटा नहीं आया। उसी के शहर से वह व्यक्ति आ पहुंचा जो उनको पिता तुल्य मानता था। सूचना मिलने के बावजूद बेटा कंधा देने नहीं आया।किसको अभागा कहेंगे?पिता को या इकलौते पुत्र को! पुत्र वधू को क्या कहें!जो इस मौके पर सास को धीरज बंधाने के लिए उसके पास ना बैठी हो। कैसी विडम्बना है समाज की। जिस बेटी के घर का पानी भी माता पिता पर बोझ समझा जाता है उसी बेटी के घर सभी अंतिम कर्म पूरे हुए। सालों पहले क्या गुजरी होगी माता पिता पर जब उन्होने बेटी के घर रहने का फैसला किया होगा! हैरानी है इतने सालों में बेटा-बहू को कभी समाज में शर्म महसूस नहीं हुई।समाज ने टोका नहीं। बच्चों ने दादा-दादी के बारे में पूछा नहीं या बताया नहीं। रिश्तेदारों ने समझाया नहीं। खून के रिश्ते ऐसे टूटे कि पड़ोसियों जैसे संबंध भी नहीं रहे,बाप-बेटे में। भाई बहिन में। कोई बात ही ऐसी होगी जो अपनों से बड़ी हो गई और पिता को बेटे के बजाए बेटी के घर रहना अधिक सुकून देने वाला लगा। समझ से परे है कि किसको पत्थर दिल कहें।संवेदना शून्य कौन है? माता-पिता या संतान। धन्य है वो माता पिता जिसने ऐसे बेटे को जन्म दिया। जिसने अपने सास ससुर की अपने माता-पिता की तरह सेवा की। आज के दौर में जब बड़े से बड़े मकान भी माता-पिता के लिए छोटा पड़ जाता है। फर्नीचर से लक दक कमरे खाली पड़े रहेंगे, परंतु माता पिता को अपने पास रखने में शान बिगड़ जाती है। अडजस्टमेंट खराब हो जाता है। कुत्ते को चिकित्सक के पास ले जाने में गौरव का अनुभव किया जाता है। बुजुर्ग माता-पिता के साथ जाने में शर्म आती है। उस समाज में कोई सास ससुर के लिए सालों कुछ करता है। उनको ठाठ से रखता है।तो यह कोई छोटी बात नहीं है। ये तो वक्त ही तय करेगा कि समाज ऐसे बेटे,दामाद को क्या नाम देगा! किसी की पहचान उजागर करना गरिमापूर्ण नहीं है।मगर बात एकदम सच। लेखक भी शामिल था अंतिम यात्रा में। किसी ने कहा है-सारी उम्र गुजारी यों ही,रिश्तों की तुरपाई में,दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता,बाकी सब बेमानी लिख।

Monday, September 12, 2011

फालतू

संवाद थम जाता है माँ के साथ,
जब छूट जाता है बचपन का आँगन
चिठ्ठियों का अंतराल लंबे से लंबा होता चला जाता है
और सब सिमट जाता है एक वाक्य में,
“ कैसी हो माँ “ ?
माँ का जवाब उससे भी संक्षिप्त,
“ठीक” ।
पर उसकी आँखें बोलती हैं,
उसकी उदासी कह जाती है कितना कुछ ,
उसका दर्द सिमट आता है चेहेरे की झुर्रियों में
जब होता है अहसास उसको अपने फालतू हो जाने का ।

Wednesday, September 7, 2011

तेरी मीरा जरुर हो जाऊं।

सारी दुनियां से दूर हो जाऊं,तेरी आँखों का नूर हो जाऊं तेरी राधा बनू ,बनू ना बनू ,तेरी मीरा जरुर हो जाऊं।

Tuesday, September 6, 2011

दुर्गा मंदिर के चुनाव में जुगल डूमरा अध्यक्ष बने

श्रीगंगानगर-जिसने कभी श्री दुर्गामंदिर की चौखट पर धोक नहीं लगाई वह मंदिर में आया हुआ था। दुर्गा को प्रणाम करने के लिए नहीं,वोट डालने के लिए।जी हाँ यह सच है। दुर्गा मंदिर को संचालित करने वाली समिति में ऐसे ऐसे वोटर हैं जिनका कभी दुर्गा मंदिर में आना नहीं होता। ऐसे ही सदस्यों की लिस्ट पर रिसीवर तहसीलदार ने चुनाव करवाए। चुनाव में पूर्व पार्षद जुगल डूमरा अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने पूर्व पार्षद चन्द्र शेखर असीजा को हराया।उपाध्यक्ष पद पर वीरेंद्र विग निर्विरोध चुने गए। सचिव पद पर सुशील मल्होत्रा,कोषाध्यक्ष संदीप कटारिया विजयी हुए। मंदिर के चुनाव १५ साल बाद हुए। चुनाव के कारण मंदिर में खूब रौनक रही। ऐसे ऐसे इन्सान मंदिर में वोट डालने आये जिसने कभी मंदिर की सूरत भी नहीं देखी होगी। जिनका और जिनके पुरखों के इस मंदिर से कभी कोई लगाव नहीं रहा। लेकिन वोटों की राजनीति करने वालों ने उनके वोट बना रखे थे जो काम आ गए। दुर्गा मंदिर अरसे से आपसी विवादों का गढ़ रहा है। कई गुट होने के कारण मंदिर का उतना विकास नहीं हो पाया जितनी इसकी मान्यता है।चुनाव से पहले सर्व सम्मति के काफी प्रयास हुए भी मगर बात नहीं बनी।

हिन्दू बताकर मुस्लिम लड़की से शादी करवा दी

श्रीगंगानगर-मुस्लिम युवती को हिन्दू बताकर उसका विवाह जैन युवक से करवा दिया। भेद खुलने पर राजसमन्द के इस युवक ने मैरिज ब्यूरो संचालक सहित कई जनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है। कोतवाली थाना में दर्ज इस मुकदमे के अनुसार राजसमन्द जिले के रोहित पुत्र बाबूलाल जैन के साथ यह घटना हुई। पहले उसने पाली जिले के एक थाने में मुकदमा दर्ज करवाया था। चूँकि घटना श्रीगंगानगर की थी इसलिए वहां जाँच बंद कर दी गई। पाली के एसपी ने यह केस श्रीगंगानगर को प्रेषित कर दिया। रोहित ने बताया है कि उसकी शादी विनोबा बस्ती में संचालित मैरिज ब्यूरो के संचालक जागर सिंह व कुलजीत कौर ने कुछ समय पहले कसाइयों का मोहल्ला मस्जिद के पास की एक युवती सीमा से करवाई। रोहित के परिवार को यह बताया गया कि सीमा मूंदड़ा परिवार से है। उसके पिता का नाम रामजी लाल मूंदड़ा बताया गया। शादी के लिए रोहित से तीन लाख तीस हजार रूपये लिए गए। कुछ समय बाद रोहित को पता चला कि सीमा का असली नाम शकीना है। उसके पिता का नाम सलीम खान और माँ का नाम खातून बीबी है। थाना में जागर सिंह,कुलजीत कौर,सीमा उर्फ़ शकीना,रामजीलाल उर्फ़ सलीम व खातून बीबी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है।
मैं तुझ में ऐसी रमी,ज्यों चन्दन में नीर तेरे मेरे बीच में,खुशबू की जंजीर। -डॉ रमा सिंह

Tuesday, July 19, 2011

दुख्तक

रात गहरी और काली
मेरे राहों की तरह
कहीं कुछ सूझता ही नही ।

इस शहर में मौत का तांडव
कब हो जायेगा
कोई जानता ही नही ।

हम निकम्मे, बेईमान
किस को हम दोषी कहें
सब हमारा ही किया धरा ।

जिस जनता की रगों में
खून बहता ही नही
उसका जीना मरना क्या ।

छटपटाती जिंदगी
और बेरहम ये मौत भी
आज शरमिंदा है ।

मोटी चमडी, काले चश्मे
उजले लिबास, काली करतूतें
हमारे नेता हैं ये ।

Wednesday, June 8, 2011

रंगमंच की दुनिया में अमर हो गये हबीब तनवीर

रंगमंच की दुनिया में मशहूर नाट्यकर्मी हबीब तनवीर का नाम हमेशा याद रखा जायेगा। उन्होने भारतीय रंगमंच को आगे ही नही बढ़ाया बल्कि उसे एक नई दिशा भी प्रदान की। आज भले ही हबीब तनवीर इस दुनिया में न हों लेकिन उनकी कला और यादें सभी के जहन में ताजा हैं। उनके कई शागिर्द आज भी अपने उस्ताद की कमी को महसूस करते हैं।

तनवीर के साथ लगभग दो दशक तक सक्रिय रूप से जुड़े रहे नाट्य कलाकार अनूप त्रिवेदी भी उनके ऐसे ही एक शागिर्द हैं। अनूप त्रिवेदी कहते हैं कि उनके जैसा कोई दूसरा नाट्यकर्मी नहीं हो सकता। वह मेरे गुरु थे और मैंने अभिनय की बारीकियां उन्हीं से सीखीं। नाट्य जगत के दिग्गज तनवीर का जन्म एक सितंबर, 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ। नागपुर के मॉरिस कॉलेज और अलीगढ़ मुस्लिम विविद्यालय से पढ़ाई करने वाले तनवीर ने नुक्कड़-नाटक के जरिए अपनी एक अलग पहचान कायम की थी।

त्रिवेदी के मुताबिक तनवीर की रग-रग में थियेटर के लिए प्यार था। कुछ लोग उन्हें नुक्कड़-नाटकों तक ही सीमित करते हैं लेकिन उनका योगदान बहुत बड़ा था। वह कला के सच्चे पुजारी थे। उन्होंने मेरे जैसे सैकड़ों युवकों को प्रेरणा दी।

वह 1945 में मुंबई पहुंचे और आकाशवाणी में नौकरी करने लगे। यहीं से उन्होंने फिल्मों में गीत लिखने शुरू किए और कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया। माया नगरी में रहकर वह कई नाट्य मंडलियों से जुड़े। बाद में तनवीर दिल्ली आकर सक्रिय रूप से थियेटर से जुड़ गए। इसके बाद बतौर नाट्यकर्मी उनका जो सफर शुरू हुआ वह बेमिसाल रहा। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल उनकी कर्मस्थली साबित हुई।

हबीब के साथ काम कर चुके नाट्य कलाकार और लेखक निसार अहमद बतातें हैं कि एक नाट्यकर्मी के तौर पूरी दुनिया हबीब तनवीर को जानती है। बहुत से लोग उनकी शख्सियत के कायल हैं। उनके भीतर गज़ब की सादगी थी। उनके साथ काम करने के अनुभव को कभी नहीं भूलाया नही जा सकता।

तनवीर ने अपने लंबे करियर में कई नाटकों का निर्माण और निर्देशन किया। उनका सबसे मशहूर नाटक ‘चरणदास चोर’ रहा। इसका निर्माण वर्ष 1975 में हुआ था। अंगेजी समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इस नाटक को आज़ादी के बाद की 60 सर्वश्रेष्ठ कृतियों में शुमार किया था। तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और पद्म भूषण से भी नवाजा गया। वर्ष 1972 से 1978 तक वह राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। नाट्य कला के इस सरताज ने आठ जून 2009 को अंतिम सांस ली।

रंगमंच की इतिहास में हबीब तनवीर का नाम हमेशा याद किया जायेगा।

Sunday, May 15, 2011

अमरीका की तानाशाही और इराक का दर्द है “द लॉस्ट सेल्यूट”

इराकी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी का जूता आज तक लोग नही भूले हैं। दरअसल वो जूता इतना खास बन गया था कि दुनिया के कौने कौने मे उस जूते के चर्चे आम हो गये। इराकी जनता के गुस्से का इज़हार करने के लिये अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर फेंका गया वो जूता भारत मे भी कई लोगों के लिये प्रेरणा बन गया।

पूरी दुनिया के लोग आज तक ये जानने को उत्सुक रहते हैं कि आखिर मुंतज़िर अल ज़ैदी को जूता फेंकने की ज़रुरत क्यों पड़ी? इसी बात को ध्यान मे रखकर जाने-माने फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने इस संवेदनशील विषय को लोगों के सामने रखने के लिये रंगमंच की दुनिया में कदम रख दिये।

महेश भट्ट ने मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब द लॉस्ट सेल्यूट टू प्रेसीडेन्ट बुश पर आधारित एक नाटक की रचना कर डाली। शनिवार और रविवार की शाम राजधानी दिल्ली के श्रीराम सेन्टर में महेश भट्ट के नाटक द लॉस्ट सेल्यूट का मंचन किया गया। नाटक मे दर्शाया गया कि किस तरह से अमरीका ने शान्ति के नाम पर छोटे से मगर सम्पन्न राष्ट्र इराक को बर्बाद किया। किस तरह से आंतक और जैविक हथियारों के बहाने बगदाद शहर पर आग बरसाई गयी। किस तरह से अमरीकी सेना ने मासूम बच्चों और औरतों पर कहर बरपाया। यहां तक कि इराक में अस्पतालों को जंग के दौरान बमों के हवाले कर दिया गया। ये नाटक उस आम आदमी की कहानी है जो अपनी आँखों से अपने घर, शहर और वतन की बर्बादी देखता है और जब उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है तो वो कुछ कर गुज़रने की ठान लेता है। दरअसल ये नाटक अमरीका की तानाशाही को लोगों के सामने रखता है जो किसी भी मुल्क पर किसी भी बहाने से हमला करने की फिराक मे रहता है। या फिर ये कहें कि दुनिया भर के मुल्कों को डराने की कोशिश करता रहता है। ताकि वो अपनी जायज़ और नाजायज़ नीतियों को दुनिया पर थोप सके।

अस्मिता थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने करीब एक घण्टे की इस प्रस्तुति में दर्शकों के सामने मुंतज़िर अल ज़ैदी की पूरी कहानी बंया की। अभिनय की अगर बात की जाये तो नाटक का मुख्य किरदार महेश भट्ट की अगली फिल्म में बतौर नायक एन्ट्री करने वाले इमरान जाहिद ने अदा किया। पूरे नाटक की जान मुंतज़िर अल ज़ैदी का ये किरदार ही था। लेकिन इमरान जाहिद यहां अपने अभिनय की छाप नही छोड़ पाये। नाटक मे कई जगहों पर अन्य किरदार इमरान पर हावी दिखाई दिये। आवाज़ और अभिनय के मामले में इमरान अपने किरदार मे आत्म विश्वास भरने मे नाकाम रहे तो नाटक के सूत्रधार की शक्ल मे विरेन बसोया ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। जार्ज वी बुश का किरदार निभाने वाले ईश्वाक सिंह ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया। इन दोनों की संवाद अदायगी काबिल-ए-तारीफ थी। शिल्पी मारवाह ने अपने छोटे पर सशक्त किरदार को जीवंत बनाने का सफल प्रयास किया। इसके अलावा राहुल खन्ना, हिमांशु, सूरज सिंह, गौरव मिश्रा, पंकज दत्ता, शिव चौहान, रंजीत चौहान और मलय गर्ग ने  संवाददाताओं की भूमिका मे अपनी आवाज़ को दूर तक पंहुचाया।

नाटक का संगीत और गायन पक्ष कमज़ोर दिखाई दिया। जिसकी ज़िम्मेदारी संगीता गौर को दी गयी थी। पार्श्व संगीत की कमी तो नाटक में शुरु से ही दिख रही थी जबकि पार्श्व संगीत के लिये नाटक मे काफी गुंजाइश थी। कोरस ने गीतों के साथ कोई न्याय नही किया। यहां तक अभिनेताओं और कोरस के बीच तालमेल की कमी लगातार दर्शकों को खलती रही। कई जगहों पर गीतों मे कोरस खुद ही भटक गया। यहां तक फैज़ अहमद, साहिर लुधियानवी और हबीब जलीब के जनगीत दर्शकों को समझ मे ही नही आये।

नाटक के निर्देशक अरविन्द गौर लगातार कई सालों से रंगमंच कर रहे हैं। अरविन्द सामाजिक और रानीतिक नाटकों के लिये जाने जाते हैं। इसलिये उनके निर्देशन मे इस नाटक से उम्मीदें ज़्यादा थी। एक माह की रिहर्सल के बाद भी वो मुख्य किरदार निभाने वाले इमरान ज़ाहिद को पूरी तरह तैयार नही कर पाये। जबकि अन्य किरदार दर्शकों पर छाप छोड़ने मे कामयाब रहे।

नाटक की स्क्रिप्ट और संवाद दर्शकों को पसन्द आये। लखनऊ के राजेश कुमार  मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब से ली गयी कहानी को नाटक बनाने मे सफल दिखाई दिये। मैकअप पक्ष को श्रीकान्त वर्मा ने संवारा। नाटक मे लाइटिंग पक्ष भी अच्छा रहा।

मंचन के दौरान खासतौर पर इराकी टीवी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी दिल्ली आये थे। उन्होने नाटक देखने के बाद कहा कि इस नाटक को देखकर उनकी वो सारी यादें ताज़ा हो गयी जो उनके साथ गुज़रा। उन्होने गांधी जी की सराहना करते हुये कहा कि ये देश बहुत सौभाग्यशाली है क्योंकि गांधी जी यहां रहा करते थे। जिन्होने उन्हे भी सच के लिये लड़ने की प्रेरणा दी।

नाटक के निर्माता महेश भट्ट ने कहा कि हम सभी को अन्याय के खिलाफ चुप रहने के बजाय आवाज़ उठानी चाहिये। जब तक हम आवाज़ बुलन्द नही करेगें तब तक हमारी सुनवाई नही होगी। सब साथ आईये और अपने हक के लिये, सच के लिये आवाज़ बुलन्द किजीये।

इस दौरान अभिनेत्री पूजा भट्ट, सांसद जया प्रदा, अभिनेता डीनो मारियो, सन्दीप कपूर आदि मौजूद रहे।

Wednesday, May 11, 2011

सेना के युद्धाभ्यास से राजस्थान का रेगिस्तान गौरवान्वित हो गया। अपने देश की सेना का युद्ध कौशल देख रेगिस्तानी मिट्टी का कण कण उत्साहित है। वह अपने सैनिकों का माथा चूम रहा है। माथे पर तिलक लगा रहा है। हजारों सैनिक इस रेगिस्तानी मिट्टी तो अपने पैरो से रोंद रहे है। मगर मिट्टी है कि इसको अपना अहोभाग जान हर सैनिक के चरण स्पर्श कर रही है। क्योंकि जो मिट्टी आज वहाँ है उसको फिर मौका नहीं मिलेगा अपने इन जांबाजों के चरण छूने का। उसे तो उड़ जाना है। आँधी बनकर। मीडिया इस अभ्यास से रेगिस्तान के थर्राने की बात करता है। कोई थर्राए तो तब ना जब कोई दुश्मन हो। यहाँ तो अपनी सेना अपना क्षमता दिखा रही है। बता रही है, चिंता मत करो, किसी से मत डरो। सेना देश की सुरक्षा बहुत अच्छी तरह से कर सकती है। तो फिर यह थर्राने की नहीं गौरवान्वित होने की बात है। आओ रेगिस्तान की मिट्टी के साथ हमभी गर्व करे अपनी सेना पर। उनको बधाई दें,उनके रण कौशल के लिए। जयहिंद ।

Tuesday, May 3, 2011

श्रीगंगानगर—विनाबा बस्ती मे,सिंधियों के मंदिर के थोड़ा आगे। सुबह एक घर के सामने टांय टांय करते तोतों को देख हैरत हो सकती है। कई दर्जन तोते एक साथ। हमें नहीं बताया गया होता तो हमें भी हैरानी होती। परंतु हम तो आए ही इसलिए थे की उन तोतों को देख सकें। जिस मकान के सामने तोते आए थे वह है आयकर अधिकारी अशोक किंगर का। किंगर दंपती चबूतरे पर बैठे थे ओर तोते ले रहे थे अपना दाना पानी। किंगर दंपती सुबह सुबह सबसे पहले इन तोतों से ही मिलते हैं। साढ़े पाँच बजे तोतों के लिए मूँगफली के दाने रख दिये जाते हैं। तोते आ चुके हैं। पहले एक तोता आएगा। दाना चुगेगा। बिजली की तार पर जा बैठेगा। उसके बाद भीड़ मे से आठ –आठ,दस-दस तोते बारी बारी से आते हैं। चुग्गा लेते हैं। जा बैठते हैं। कोई हाय तौबा नहीं। लड़ाई नहीं। लगभग एक घंटे तक तोतों का यह सह भोज चलता है। किंगर दंपती अपनी दिनचर्या मे व्यस्त हो जाते हैं और तोते उड़ जाते हैं कल फिर आने के लिए। यह कर्म लंबे समय से चल रहा है। किसी समय अशोक किंगर कबूतरों के लिए ज्वार डालने जाया करते थे। जहां जाते थे वहाँ कुछ मनमाफिक नहीं लगा तो घर की चारदीवारी पर इंतजाम किया। एक दिन किसी ने मूँगफली के दानों के बारे मे बताया। वहाँ रखे। कई दिन तो पाँच सात तोते ही आए। फिर इनकी संख्या बढ़ती चली गई। अब तो कभी कभी सौ तोते भी वहाँ दिखाई पड़ जाते हैं। जब किंगर दंपती यहाँ नहीं होते तो तोतों के भोजन की ज़िम्मेदारी किसी को सौंप का जाते हैं। एक बार शुरू हुआ यह सिलसिला जारी है। संभव है आईटीओ के रूप मे श्री किंगर की पहचान कुछ अलग प्रकार की हो परंतु पक्षियों के प्रति ऐसा प्रेम बहुत कम देखने को मिलता है। श्रीगंगानगर मे जहां जहां पक्षियों के लिए ज्वार,बाजरा डाला जाता है वहाँ इतनी संख्या में कोई पक्षी दिखाई नहीं दिया। एक घर मे इतनी संख्या मे तोतों का आना बहुत बड़ी बात है। ऐसा ही दृश्य मरघट मे देखने को मिला था। सुबह और दोपहर के बीच का समय था। किसी के अंतिम संस्कार मे शामिल होने गया था। एक आदमी छोटा सा थैला लेकर छत पर गया। पीछे मैं भी। उसके छत पर पहुँचते ही बड़ी संख्या मे कौए वहाँ मंडराने लगे। उसने थैले मे रोटी निकाली और कौए को डाली । कुछ ही क्षणों मे वहाँ और कौए आ गए। काफी देर तक वहाँ कौए भोजन करते रहे। ये दोनों कभी किसी अखबार मे नहीं गए अपनी खबर छपवाने। उनको तो यह पढ़कर मालूम होगा कि हमारे तोतों,कौए की खबर आई है। पहले एक शेर फिर एसएमएस। आ मेरे यार फिर इक बार गले लग जा,फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। राजेश अरोड़ा का एसएमएस—अध्यापक—हिन्दी की पहली साइलेंट फिल्म

Saturday, April 23, 2011

ये ख़ामोशी के राज हम जानतेहैं यूँ चुप रहने के अंदाज हम जानते हैं, यकीन नहीं आता तो अपने दिल से पूछ लो आप से बेहतर आप को हम जानते हैं। ------ एक एसएमएस राजू ग्रोवर का।

Monday, April 18, 2011

आज कुछ समय पहले ही पता लगा कि फेसबुक पर भी कुछ लोगों का एक ग्रुप है। इस ग्रुप को वह इन्सान पसंद नहीं आता जो इनके लिखे पर आलोचनात्मक टिप्पणी करे। इनमे से एक साहब ने फोन करके अपनी इस भावना से अवगत भी करवाया। ये चाहते थे कि मैं { माफ़ी, मैं लिखने के लिए} वही लिखूं जिसको वो पसंद करे। या जिसको पढ़ कर वे खुश हो जाएं। फेसबुक पर सब लोग अपने भाव लिखते हैं। शब्द,फोटो,वीडियो,टिप्पणी भाव व्यक्त करने का तरीका है। एक पोस्ट पर टिप्पणी की तो उनको पसंद नहीं आई। जबकि मैंने साथ में लिखा था, सॉरी। मैंने अपनी बात कही तो उनको बुरा लगा। अगर आप अपनी या अपने ग्रुप वाले किसी दोस्त की पोस्ट पर आलोचनात्मक टिप्पणी हजम नहीं कर सकते तो फिर ऐसी जगह पर लिखते ही क्यों हैं? मेरे भाव का मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं होता। लेकिन यह भी संभव नहीं कि वही लिखा जाये जो उनको पसंद हो। अब मुझे कुछ पसंद नहीं तो इसका ये मतलब नहीं कि मैं फोन करके लिखने वाले से सवाल जवाब करूँ। चलो इसी बहाने लोगों के असली चेहरे तो सामने आये। क्योंकि फेसबुक पर जो थे वे कुछ और थे। आलोचना ना सहन करने वाले निंदा भी गाली देने की स्टाइल में करते हैं। भगवान मुझे हिम्मत देना ऐसे लोगों के फोन सुनने की और फेसबुक पर इनकी गालियाँ पढने की।

सुरक्षा अस्त्र

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