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Sunday, September 18, 2011

श्रीगंगानगर-सनातन धर्म,संस्कृति में पुत्र की चाहना इसीलिए की जाती है ताकि पिता उसके कंधे पर अंतिम सफर पूरा करे। शायद यही मोक्ष होता होगा। दोनों का। लेकिन तब कोई क्या करे जब पुत्र के होते भी ऐसा ना हो। पुत्र भी कैसा। पूरी तरह सक्षम। खुद भी चिकित्सक पत्नी भी। खुद शिक्षक था। तीन बेटी,एक बेटा। सभी खूब पढे लिखे। ईश्वर जाने किसका कसूर था? माता-पिता बेटी के यहाँ रहने लगे। पुत्र,उसके परिवार से कोई संवाद नहीं। उसने बहिनों से भी कोई संपर्क नहीं रखा। बुजुर्ग पिता ने बेटी के घर अंतिम सांस ली। बेटा नहीं आया। उसी के शहर से वह व्यक्ति आ पहुंचा जो उनको पिता तुल्य मानता था। सूचना मिलने के बावजूद बेटा कंधा देने नहीं आया।किसको अभागा कहेंगे?पिता को या इकलौते पुत्र को! पुत्र वधू को क्या कहें!जो इस मौके पर सास को धीरज बंधाने के लिए उसके पास ना बैठी हो। कैसी विडम्बना है समाज की। जिस बेटी के घर का पानी भी माता पिता पर बोझ समझा जाता है उसी बेटी के घर सभी अंतिम कर्म पूरे हुए। सालों पहले क्या गुजरी होगी माता पिता पर जब उन्होने बेटी के घर रहने का फैसला किया होगा! हैरानी है इतने सालों में बेटा-बहू को कभी समाज में शर्म महसूस नहीं हुई।समाज ने टोका नहीं। बच्चों ने दादा-दादी के बारे में पूछा नहीं या बताया नहीं। रिश्तेदारों ने समझाया नहीं। खून के रिश्ते ऐसे टूटे कि पड़ोसियों जैसे संबंध भी नहीं रहे,बाप-बेटे में। भाई बहिन में। कोई बात ही ऐसी होगी जो अपनों से बड़ी हो गई और पिता को बेटे के बजाए बेटी के घर रहना अधिक सुकून देने वाला लगा। समझ से परे है कि किसको पत्थर दिल कहें।संवेदना शून्य कौन है? माता-पिता या संतान। धन्य है वो माता पिता जिसने ऐसे बेटे को जन्म दिया। जिसने अपने सास ससुर की अपने माता-पिता की तरह सेवा की। आज के दौर में जब बड़े से बड़े मकान भी माता-पिता के लिए छोटा पड़ जाता है। फर्नीचर से लक दक कमरे खाली पड़े रहेंगे, परंतु माता पिता को अपने पास रखने में शान बिगड़ जाती है। अडजस्टमेंट खराब हो जाता है। कुत्ते को चिकित्सक के पास ले जाने में गौरव का अनुभव किया जाता है। बुजुर्ग माता-पिता के साथ जाने में शर्म आती है। उस समाज में कोई सास ससुर के लिए सालों कुछ करता है। उनको ठाठ से रखता है।तो यह कोई छोटी बात नहीं है। ये तो वक्त ही तय करेगा कि समाज ऐसे बेटे,दामाद को क्या नाम देगा! किसी की पहचान उजागर करना गरिमापूर्ण नहीं है।मगर बात एकदम सच। लेखक भी शामिल था अंतिम यात्रा में। किसी ने कहा है-सारी उम्र गुजारी यों ही,रिश्तों की तुरपाई में,दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता,बाकी सब बेमानी लिख।

Monday, September 12, 2011

फालतू

संवाद थम जाता है माँ के साथ,
जब छूट जाता है बचपन का आँगन
चिठ्ठियों का अंतराल लंबे से लंबा होता चला जाता है
और सब सिमट जाता है एक वाक्य में,
“ कैसी हो माँ “ ?
माँ का जवाब उससे भी संक्षिप्त,
“ठीक” ।
पर उसकी आँखें बोलती हैं,
उसकी उदासी कह जाती है कितना कुछ ,
उसका दर्द सिमट आता है चेहेरे की झुर्रियों में
जब होता है अहसास उसको अपने फालतू हो जाने का ।

Wednesday, September 7, 2011

तेरी मीरा जरुर हो जाऊं।

सारी दुनियां से दूर हो जाऊं,तेरी आँखों का नूर हो जाऊं तेरी राधा बनू ,बनू ना बनू ,तेरी मीरा जरुर हो जाऊं।

Tuesday, September 6, 2011

दुर्गा मंदिर के चुनाव में जुगल डूमरा अध्यक्ष बने

श्रीगंगानगर-जिसने कभी श्री दुर्गामंदिर की चौखट पर धोक नहीं लगाई वह मंदिर में आया हुआ था। दुर्गा को प्रणाम करने के लिए नहीं,वोट डालने के लिए।जी हाँ यह सच है। दुर्गा मंदिर को संचालित करने वाली समिति में ऐसे ऐसे वोटर हैं जिनका कभी दुर्गा मंदिर में आना नहीं होता। ऐसे ही सदस्यों की लिस्ट पर रिसीवर तहसीलदार ने चुनाव करवाए। चुनाव में पूर्व पार्षद जुगल डूमरा अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने पूर्व पार्षद चन्द्र शेखर असीजा को हराया।उपाध्यक्ष पद पर वीरेंद्र विग निर्विरोध चुने गए। सचिव पद पर सुशील मल्होत्रा,कोषाध्यक्ष संदीप कटारिया विजयी हुए। मंदिर के चुनाव १५ साल बाद हुए। चुनाव के कारण मंदिर में खूब रौनक रही। ऐसे ऐसे इन्सान मंदिर में वोट डालने आये जिसने कभी मंदिर की सूरत भी नहीं देखी होगी। जिनका और जिनके पुरखों के इस मंदिर से कभी कोई लगाव नहीं रहा। लेकिन वोटों की राजनीति करने वालों ने उनके वोट बना रखे थे जो काम आ गए। दुर्गा मंदिर अरसे से आपसी विवादों का गढ़ रहा है। कई गुट होने के कारण मंदिर का उतना विकास नहीं हो पाया जितनी इसकी मान्यता है।चुनाव से पहले सर्व सम्मति के काफी प्रयास हुए भी मगर बात नहीं बनी।

हिन्दू बताकर मुस्लिम लड़की से शादी करवा दी

श्रीगंगानगर-मुस्लिम युवती को हिन्दू बताकर उसका विवाह जैन युवक से करवा दिया। भेद खुलने पर राजसमन्द के इस युवक ने मैरिज ब्यूरो संचालक सहित कई जनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है। कोतवाली थाना में दर्ज इस मुकदमे के अनुसार राजसमन्द जिले के रोहित पुत्र बाबूलाल जैन के साथ यह घटना हुई। पहले उसने पाली जिले के एक थाने में मुकदमा दर्ज करवाया था। चूँकि घटना श्रीगंगानगर की थी इसलिए वहां जाँच बंद कर दी गई। पाली के एसपी ने यह केस श्रीगंगानगर को प्रेषित कर दिया। रोहित ने बताया है कि उसकी शादी विनोबा बस्ती में संचालित मैरिज ब्यूरो के संचालक जागर सिंह व कुलजीत कौर ने कुछ समय पहले कसाइयों का मोहल्ला मस्जिद के पास की एक युवती सीमा से करवाई। रोहित के परिवार को यह बताया गया कि सीमा मूंदड़ा परिवार से है। उसके पिता का नाम रामजी लाल मूंदड़ा बताया गया। शादी के लिए रोहित से तीन लाख तीस हजार रूपये लिए गए। कुछ समय बाद रोहित को पता चला कि सीमा का असली नाम शकीना है। उसके पिता का नाम सलीम खान और माँ का नाम खातून बीबी है। थाना में जागर सिंह,कुलजीत कौर,सीमा उर्फ़ शकीना,रामजीलाल उर्फ़ सलीम व खातून बीबी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है।
मैं तुझ में ऐसी रमी,ज्यों चन्दन में नीर तेरे मेरे बीच में,खुशबू की जंजीर। -डॉ रमा सिंह

Tuesday, July 19, 2011

दुख्तक

रात गहरी और काली
मेरे राहों की तरह
कहीं कुछ सूझता ही नही ।

इस शहर में मौत का तांडव
कब हो जायेगा
कोई जानता ही नही ।

हम निकम्मे, बेईमान
किस को हम दोषी कहें
सब हमारा ही किया धरा ।

जिस जनता की रगों में
खून बहता ही नही
उसका जीना मरना क्या ।

छटपटाती जिंदगी
और बेरहम ये मौत भी
आज शरमिंदा है ।

मोटी चमडी, काले चश्मे
उजले लिबास, काली करतूतें
हमारे नेता हैं ये ।

Wednesday, June 8, 2011

रंगमंच की दुनिया में अमर हो गये हबीब तनवीर

रंगमंच की दुनिया में मशहूर नाट्यकर्मी हबीब तनवीर का नाम हमेशा याद रखा जायेगा। उन्होने भारतीय रंगमंच को आगे ही नही बढ़ाया बल्कि उसे एक नई दिशा भी प्रदान की। आज भले ही हबीब तनवीर इस दुनिया में न हों लेकिन उनकी कला और यादें सभी के जहन में ताजा हैंउनके कई शागिर्द आज भी अपने उस्ताद की कमी को महसूस करते हैं

तनवीर के साथ लगभग दो दशक तक सक्रिय रूप से जुड़े रहे नाट्य कलाकार अनूप त्रिवेदी भी उनके ऐसे ही एक शागिर्द हैं। अनूप त्रिवेदी कहते हैं कि उनके जैसा कोई दूसरा नाट्यकर्मी नहीं हो सकतावह मेरे गुरु थे और मैंने अभिनय की बारीकियां उन्हीं से सीखींनाट्य जगत के दिग्गज तनवीर का जन्म एक सितंबर, 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआनागपुर के मॉरिस कॉलेज और अलीगढ़ मुस्लिम विविद्यालय से पढ़ाई करने वाले तनवीर ने नुक्कड़-नाटक के जरिए अपनी एक अलग पहचान कायम की थी

त्रिवेदी के मुताबिक तनवीर की रग-रग में थियेटर के लिए प्यार थाकुछ लोग उन्हें नुक्कड़-नाटकों तक ही सीमित करते हैं लेकिन उनका योगदान बहुत बड़ा थावह कला के सच्चे पुजारी थेउन्होंने मेरे जैसे सैकड़ों युवकों को प्रेरणा दी

वह 1945 में मुंबई पहुंचे और आकाशवाणी में नौकरी करने लगेयहीं से उन्होंने फिल्मों में गीत लिखने शुरू किए और कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया माया नगरी में रहकर वह कई नाट्य मंडलियों से जुड़ेबाद में तनवीर दिल्ली आकर सक्रिय रूप से थियेटर से जुड़ गएइसके बाद बतौर नाट्यकर्मी उनका जो सफर शुरू हुआ वह बेमिसाल रहामध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल उनकी कर्मस्थली साबित हुई

हबीब के साथ काम कर चुके नाट्य कलाकार और लेखक निसार अहमद बतातें हैं कि एक नाट्यकर्मी के तौर पूरी दुनिया हबीब तनवीर को जानती है। बहुत से लोग उनकी शख्सियत के कायल हैं। उनके भीतर गज़ब की सादगी थीउनके साथ काम करने के अनुभव को कभी नहीं भूलाया नही जा सकता

तनवीर ने अपने लंबे करियर में कई नाटकों का निर्माण और निर्देशन कियाउनका सबसे मशहूर नाटक चरणदास चोररहाइसका निर्माण वर्ष 1975 में हुआ थाअंगेजी समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्सने इस नाटक को आज़ादी के बाद की 60 सर्वश्रेष्ठ कृतियों में शुमार किया था। तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और पद्म भूषण से भी नवाजा गयावर्ष 1972 से 1978 तक वह राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहेनाट्य कला के इस सरताज ने आठ जून 2009 को अंतिम सांस ली

रंगमंच की इतिहास में हबीब तनवीर का नाम हमेशा याद किया जायेगा।

Sunday, May 15, 2011

अमरीका की तानाशाही और इराक का दर्द है “द लॉस्ट सेल्यूट”

इराकी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी का जूता आज तक लोग नही भूले हैं। दरअसल वो जूता इतना खास बन गया था कि दुनिया के कौने कौने मे उस जूते के चर्चे आम हो गये। इराकी जनता के गुस्से का इज़हार करने के लिये अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर फेंका गया वो जूता भारत मे भी कई लोगों के लिये प्रेरणा बन गया।

पूरी दुनिया के लोग आज तक ये जानने को उत्सुक रहते हैं कि आखिर मुंतज़िर अल ज़ैदी को जूता फेंकने की ज़रुरत क्यों पड़ी? इसी बात को ध्यान मे रखकर जाने-माने फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने इस संवेदनशील विषय को लोगों के सामने रखने के लिये रंगमंच की दुनिया में कदम रख दिये।

महेश भट्ट ने मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब द लॉस्ट सेल्यूट टू प्रेसीडेन्ट बुश पर आधारित एक नाटक की रचना कर डाली। शनिवार और रविवार की शाम राजधानी दिल्ली के श्रीराम सेन्टर में महेश भट्ट के नाटक द लॉस्ट सेल्यूट का मंचन किया गया। नाटक मे दर्शाया गया कि किस तरह से अमरीका ने शान्ति के नाम पर छोटे से मगर सम्पन्न राष्ट्र इराक को बर्बाद किया। किस तरह से आंतक और जैविक हथियारों के बहाने बगदाद शहर पर आग बरसाई गयी। किस तरह से अमरीकी सेना ने मासूम बच्चों और औरतों पर कहर बरपाया। यहां तक कि इराक में अस्पतालों को जंग के दौरान बमों के हवाले कर दिया गया। ये नाटक उस आम आदमी की कहानी है जो अपनी आँखों से अपने घर, शहर और वतन की बर्बादी देखता है और जब उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है तो वो कुछ कर गुज़रने की ठान लेता है। दरअसल ये नाटक अमरीका की तानाशाही को लोगों के सामने रखता है जो किसी भी मुल्क पर किसी भी बहाने से हमला करने की फिराक मे रहता है। या फिर ये कहें कि दुनिया भर के मुल्कों को डराने की कोशिश करता रहता है। ताकि वो अपनी जायज़ और नाजायज़ नीतियों को दुनिया पर थोप सके।

अस्मिता थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने करीब एक घण्टे की इस प्रस्तुति में दर्शकों के सामने मुंतज़िर अल ज़ैदी की पूरी कहानी बंया की। अभिनय की अगर बात की जाये तो नाटक का मुख्य किरदार महेश भट्ट की अगली फिल्म में बतौर नायक एन्ट्री करने वाले इमरान जाहिद ने अदा किया। पूरे नाटक की जान मुंतज़िर अल ज़ैदी का ये किरदार ही था। लेकिन इमरान जाहिद यहां अपने अभिनय की छाप नही छोड़ पाये। नाटक मे कई जगहों पर अन्य किरदार इमरान पर हावी दिखाई दिये। आवाज़ और अभिनय के मामले में इमरान अपने किरदार मे आत्म विश्वास भरने मे नाकाम रहे तो नाटक के सूत्रधार की शक्ल मे विरेन बसोया ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। जार्ज वी बुश का किरदार निभाने वाले ईश्वाक सिंह ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया। इन दोनों की संवाद अदायगी काबिल-ए-तारीफ थी। शिल्पी मारवाह ने अपने छोटे पर सशक्त किरदार को जीवंत बनाने का सफल प्रयास किया। इसके अलावा राहुल खन्ना, हिमांशु, सूरज सिंह, गौरव मिश्रा, पंकज दत्ता, शिव चौहान, रंजीत चौहान और मलय गर्ग ने  संवाददाताओं की भूमिका मे अपनी आवाज़ को दूर तक पंहुचाया।

नाटक का संगीत और गायन पक्ष कमज़ोर दिखाई दिया। जिसकी ज़िम्मेदारी संगीता गौर को दी गयी थी। पार्श्व संगीत की कमी तो नाटक में शुरु से ही दिख रही थी जबकि पार्श्व संगीत के लिये नाटक मे काफी गुंजाइश थी। कोरस ने गीतों के साथ कोई न्याय नही किया। यहां तक अभिनेताओं और कोरस के बीच तालमेल की कमी लगातार दर्शकों को खलती रही। कई जगहों पर गीतों मे कोरस खुद ही भटक गया। यहां तक फैज़ अहमद, साहिर लुधियानवी और हबीब जलीब के जनगीत दर्शकों को समझ मे ही नही आये।

नाटक के निर्देशक अरविन्द गौर लगातार कई सालों से रंगमंच कर रहे हैं। अरविन्द सामाजिक और रानीतिक नाटकों के लिये जाने जाते हैं। इसलिये उनके निर्देशन मे इस नाटक से उम्मीदें ज़्यादा थी। एक माह की रिहर्सल के बाद भी वो मुख्य किरदार निभाने वाले इमरान ज़ाहिद को पूरी तरह तैयार नही कर पाये। जबकि अन्य किरदार दर्शकों पर छाप छोड़ने मे कामयाब रहे।

नाटक की स्क्रिप्ट और संवाद दर्शकों को पसन्द आये। लखनऊ के राजेश कुमार  मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब से ली गयी कहानी को नाटक बनाने मे सफल दिखाई दिये। मैकअप पक्ष को श्रीकान्त वर्मा ने संवारा। नाटक मे लाइटिंग पक्ष भी अच्छा रहा।

मंचन के दौरान खासतौर पर इराकी टीवी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी दिल्ली आये थे। उन्होने नाटक देखने के बाद कहा कि इस नाटक को देखकर उनकी वो सारी यादें ताज़ा हो गयी जो उनके साथ गुज़रा। उन्होने गांधी जी की सराहना करते हुये कहा कि ये देश बहुत सौभाग्यशाली है क्योंकि गांधी जी यहां रहा करते थे। जिन्होने उन्हे भी सच के लिये लड़ने की प्रेरणा दी।

नाटक के निर्माता महेश भट्ट ने कहा कि हम सभी को अन्याय के खिलाफ चुप रहने के बजाय आवाज़ उठानी चाहिये। जब तक हम आवाज़ बुलन्द नही करेगें तब तक हमारी सुनवाई नही होगी। सब साथ आईये और अपने हक के लिये, सच के लिये आवाज़ बुलन्द किजीये।

इस दौरान अभिनेत्री पूजा भट्ट, सांसद जया प्रदा, अभिनेता डीनो मारियो, सन्दीप कपूर आदि मौजूद रहे।

Wednesday, May 11, 2011

सेना के युद्धाभ्यास से राजस्थान का रेगिस्तान गौरवान्वित हो गया। अपने देश की सेना का युद्ध कौशल देख रेगिस्तानी मिट्टी का कण कण उत्साहित है। वह अपने सैनिकों का माथा चूम रहा है। माथे पर तिलक लगा रहा है। हजारों सैनिक इस रेगिस्तानी मिट्टी तो अपने पैरो से रोंद रहे है। मगर मिट्टी है कि इसको अपना अहोभाग जान हर सैनिक के चरण स्पर्श कर रही है। क्योंकि जो मिट्टी आज वहाँ है उसको फिर मौका नहीं मिलेगा अपने इन जांबाजों के चरण छूने का। उसे तो उड़ जाना है। आँधी बनकर। मीडिया इस अभ्यास से रेगिस्तान के थर्राने की बात करता है। कोई थर्राए तो तब ना जब कोई दुश्मन हो। यहाँ तो अपनी सेना अपना क्षमता दिखा रही है। बता रही है, चिंता मत करो, किसी से मत डरो। सेना देश की सुरक्षा बहुत अच्छी तरह से कर सकती है। तो फिर यह थर्राने की नहीं गौरवान्वित होने की बात है। आओ रेगिस्तान की मिट्टी के साथ हमभी गर्व करे अपनी सेना पर। उनको बधाई दें,उनके रण कौशल के लिए। जयहिंद ।

Tuesday, May 3, 2011

श्रीगंगानगरविनाबा बस्ती मे,सिंधियों के मंदिर के थोड़ा आगे। सुबह एक घर के सामने टांय टांय करते तोतों को देख हैरत हो सकती है। कई दर्जन तोते एक साथ। हमें नहीं बताया गया होता तो हमें भी हैरानी होती। परंतु हम तो आए ही इसलिए थे की उन तोतों को देख सकें। जिस मकान के सामने तोते आए थे वह है आयकर अधिकारी अशोक किंगर का। किंगर दंपती चबूतरे पर बैठे थे ओर तोते ले रहे थे अपना दाना पानी। किंगर दंपती सुबह सुबह सबसे पहले इन तोतों से ही मिलते हैं। साढ़े पाँच बजे तोतों के लिए मूँगफली के दाने रख दिये जाते हैं। तोते आ चुके हैं। पहले एक तोता आएगा। दाना चुगेगा। बिजली की तार पर जा बैठेगा। उसके बाद भीड़ मे से आठ आठ,दस-दस तोते बारी बारी से आते हैं। चुग्गा लेते हैं। जा बैठते हैं। कोई हाय तौबा नहीं। लड़ाई नहीं। लगभग एक घंटे तक तोतों का यह सह भोज चलता है। किंगर दंपती अपनी दिनचर्या मे व्यस्त हो जाते हैं और तोते उड़ जाते हैं कल फिर आने के लिए। यह कर्म लंबे समय से चल रहा है। किसी समय अशोक किंगर कबूतरों के लिए ज्वार डालने जाया करते थे। जहां जाते थे वहाँ कुछ मनमाफिक नहीं लगा तो घर की चारदीवारी पर इंतजाम किया। एक दिन किसी ने मूँगफली के दानों के बारे मे बताया। वहाँ रखे। कई दिन तो पाँच सात तोते ही आए। फिर इनकी संख्या बढ़ती चली गई। अब तो कभी कभी सौ तोते भी वहाँ दिखाई पड़ जाते हैं। जब किंगर दंपती यहाँ नहीं होते तो तोतों के भोजन की ज़िम्मेदारी किसी को सौंप का जाते हैं। एक बार शुरू हुआ यह सिलसिला जारी है। संभव है आईटीओ के रूप मे श्री किंगर की पहचान कुछ अलग प्रकार की हो परंतु पक्षियों के प्रति ऐसा प्रेम बहुत कम देखने को मिलता है। श्रीगंगानगर मे जहां जहां पक्षियों के लिए ज्वार,बाजरा डाला जाता है वहाँ इतनी संख्या में कोई पक्षी दिखाई नहीं दिया। एक घर मे इतनी संख्या मे तोतों का आना बहुत बड़ी बात है। ऐसा ही दृश्य मरघट मे देखने को मिला था। सुबह और दोपहर के बीच का समय था। किसी के अंतिम संस्कार मे शामिल होने गया था। एक आदमी छोटा सा थैला लेकर छत पर गया। पीछे मैं भी। उसके छत पर पहुँचते ही बड़ी संख्या मे कौए वहाँ मंडराने लगे। उसने थैले मे रोटी निकाली और कौए को डाली । कुछ ही क्षणों मे वहाँ और कौए आ गए। काफी देर तक वहाँ कौए भोजन करते रहे। ये दोनों कभी किसी अखबार मे नहीं गए अपनी खबर छपवाने। उनको तो यह पढ़कर मालूम होगा कि हमारे तोतों,कौए की खबर आई है। पहले एक शेर फिर एसएमएस। आ मेरे यार फिर इक बार गले लग जा,फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। राजेश अरोड़ा का एसएमएसअध्यापकहिन्दी की पहली साइलेंट फिल्म

Saturday, April 23, 2011

ये ख़ामोशी के राज हम जानतेहैं यूँ चुप रहने के अंदाज हम जानते हैं, यकीन नहीं आता तो अपने दिल से पूछ लो आप से बेहतर आप को हम जानते हैं। ------ एक एसएमएस राजू ग्रोवर का।

Monday, April 18, 2011

आज कुछ समय पहले ही पता लगा कि फेसबुक पर भी कुछ लोगों का एक ग्रुप है। इस ग्रुप को वह इन्सान पसंद नहीं आता जो इनके लिखे पर आलोचनात्मक टिप्पणी करे। इनमे से एक साहब ने फोन करके अपनी इस भावना से अवगत भी करवाया। ये चाहते थे कि मैं { माफ़ी, मैं लिखने के लिए} वही लिखूं जिसको वो पसंद करे। या जिसको पढ़ कर वे खुश हो जाएं। फेसबुक पर सब लोग अपने भाव लिखते हैं। शब्द,फोटो,वीडियो,टिप्पणी भाव व्यक्त करने का तरीका है। एक पोस्ट पर टिप्पणी की तो उनको पसंद नहीं आई। जबकि मैंने साथ में लिखा था, सॉरी। मैंने अपनी बात कही तो उनको बुरा लगा। अगर आप अपनी या अपने ग्रुप वाले किसी दोस्त की पोस्ट पर आलोचनात्मक टिप्पणी हजम नहीं कर सकते तो फिर ऐसी जगह पर लिखते ही क्यों हैं? मेरे भाव का मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं होता। लेकिन यह भी संभव नहीं कि वही लिखा जाये जो उनको पसंद हो। अब मुझे कुछ पसंद नहीं तो इसका ये मतलब नहीं कि मैं फोन करके लिखने वाले से सवाल जवाब करूँ। चलो इसी बहाने लोगों के असली चेहरे तो सामने आये। क्योंकि फेसबुक पर जो थे वे कुछ और थे। आलोचना ना सहन करने वाले निंदा भी गाली देने की स्टाइल में करते हैं। भगवान मुझे हिम्मत देना ऐसे लोगों के फोन सुनने की और फेसबुक पर इनकी गालियाँ पढने की।

Saturday, April 16, 2011

यूसुफ़ अन्सारी को ड़ॉ. अम्बेड़कर सम्मान

मुम्बई। अम्बेड़कर जयन्ती के मौके पर गुरुवार की रात मुम्बई मे आयोजित एक भव्य समारोह में देश के जाने-माने टीवी पत्रकार यूसुफ़ अन्सारी, फिल्म अभिनेता धमेन्द्र, और अभिनेत्री एंव सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी को ड़ॉ. भीमराव अम्बेड़कर अवार्ड़ से सम्मानित किया गया। इनके अलावा कई फिल्मी कलाकारों को अलग-अलग श्रेणी मे अवार्ड़ से नवाज़ा गया।

मुम्बई मे गुरुवार की शाम ड़ॉ. अम्बेड़कर के नाम रही। महानगर के शमुखानन्द चन्द्रशेखर नरेन्द्र सरस्वती ऑडिटोरियम मे मशहूर बॉलीवुड़ पत्रिका पेज3 और महाराजा यशवंत राव होलकर प्रतिष्ठान ने ड़ॉ.भीवराव अम्बेड़कर सम्मान समारोह का आयोजन किया। इस भव्य समारोह मे देश की कई जानी मानी हस्तियां शामिल हुई। देश के जाने-माने टीवी पत्रकार एंव राजनीतिक विश्लेषक यूसुफ़ अन्सारी को अपनी ख़बरों और लेखों में समाज के पिछड़े, अतिपिछड़े, दबे, कुचले और निरक्षर वर्ग की आवाज़ उठाने के लिये इस प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया गया। दिल्ली से पुरुस्कार ग्रहण करने मुम्बई आये वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ़ अन्सारी ने कहा कि वो ये पुरुस्कार पाकर काफी उत्साहित हैं। उनका कहना था कि बाबा साहेब से ही उन्हे निचले तबके की आवाज़ उठाने की प्रेरणा मिली थी और वे तब तक ये काम करते रहेंगें जब तक सबसे पिछड़ा तबका समाज के मजबूत तबकों के बराबर आकर ना खड़ा हो जाये। उन्होने कहा कि बाबा साहेब के नाम पर सम्मान मिलना उनके लिये गर्व की बात है।

इस मौके पर जाने-माने फिल्म अभिनेता धमेन्द्र को बॉलीवुड़ मे उनके सराहनीय योगदान के लिये लाइफटाईम अचीवमेन्ट अवार्ड़ से नवाज़ा गया। साथ ही मशहूर अभिनेत्री एंव सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी को सोशलवर्क में उनके सराहनीय योगदान के लिये इस पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। दोनों कलाकारों ने आयोजकों की सरहाना करते हुये बाबा साहेब के बताये मार्ग का अनुसरण करने की बात कही। इनके अलावा इस मौके पर मशहूर गायिका आशा भौंसले, फिल्म अभिनेता विवेक ओबरॉय, गायिका अनुराधा पौड़वाल, गायक उदित नारायण, अभिनेत्री सलमा आगा, टीवी कलाकार अन्जन श्रीवास्तव, फिल्मकार इकबाल दुर्रानी और महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अनीस अहमद को भी सम्मानित किया गया।

Friday, April 15, 2011

" कृपया यहाँ अपना ज्ञान मत बांटोयहाँ सब के सब ज्ञानी है। " अरे! अरे! गुस्सा मत करोये मेरा किया धरा नहीं हैमैंने कहीं पढ़ायहाँ छाप दियावैसे सुना है कि ज्ञान तो बांटने से बढ़ता हैपर..... ज्ञानियों में ज्ञान बाँटना......... । चुप्प रहना ही सेहत के लिए ठीक है

सुरक्षा अस्त्र

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