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Sunday, May 15, 2011

अमरीका की तानाशाही और इराक का दर्द है “द लॉस्ट सेल्यूट”

इराकी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी का जूता आज तक लोग नही भूले हैं। दरअसल वो जूता इतना खास बन गया था कि दुनिया के कौने कौने मे उस जूते के चर्चे आम हो गये। इराकी जनता के गुस्से का इज़हार करने के लिये अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर फेंका गया वो जूता भारत मे भी कई लोगों के लिये प्रेरणा बन गया।

पूरी दुनिया के लोग आज तक ये जानने को उत्सुक रहते हैं कि आखिर मुंतज़िर अल ज़ैदी को जूता फेंकने की ज़रुरत क्यों पड़ी? इसी बात को ध्यान मे रखकर जाने-माने फिल्म निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने इस संवेदनशील विषय को लोगों के सामने रखने के लिये रंगमंच की दुनिया में कदम रख दिये।

महेश भट्ट ने मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब द लॉस्ट सेल्यूट टू प्रेसीडेन्ट बुश पर आधारित एक नाटक की रचना कर डाली। शनिवार और रविवार की शाम राजधानी दिल्ली के श्रीराम सेन्टर में महेश भट्ट के नाटक द लॉस्ट सेल्यूट का मंचन किया गया। नाटक मे दर्शाया गया कि किस तरह से अमरीका ने शान्ति के नाम पर छोटे से मगर सम्पन्न राष्ट्र इराक को बर्बाद किया। किस तरह से आंतक और जैविक हथियारों के बहाने बगदाद शहर पर आग बरसाई गयी। किस तरह से अमरीकी सेना ने मासूम बच्चों और औरतों पर कहर बरपाया। यहां तक कि इराक में अस्पतालों को जंग के दौरान बमों के हवाले कर दिया गया। ये नाटक उस आम आदमी की कहानी है जो अपनी आँखों से अपने घर, शहर और वतन की बर्बादी देखता है और जब उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है तो वो कुछ कर गुज़रने की ठान लेता है। दरअसल ये नाटक अमरीका की तानाशाही को लोगों के सामने रखता है जो किसी भी मुल्क पर किसी भी बहाने से हमला करने की फिराक मे रहता है। या फिर ये कहें कि दुनिया भर के मुल्कों को डराने की कोशिश करता रहता है। ताकि वो अपनी जायज़ और नाजायज़ नीतियों को दुनिया पर थोप सके।

अस्मिता थियेटर ग्रुप के कलाकारों ने करीब एक घण्टे की इस प्रस्तुति में दर्शकों के सामने मुंतज़िर अल ज़ैदी की पूरी कहानी बंया की। अभिनय की अगर बात की जाये तो नाटक का मुख्य किरदार महेश भट्ट की अगली फिल्म में बतौर नायक एन्ट्री करने वाले इमरान जाहिद ने अदा किया। पूरे नाटक की जान मुंतज़िर अल ज़ैदी का ये किरदार ही था। लेकिन इमरान जाहिद यहां अपने अभिनय की छाप नही छोड़ पाये। नाटक मे कई जगहों पर अन्य किरदार इमरान पर हावी दिखाई दिये। आवाज़ और अभिनय के मामले में इमरान अपने किरदार मे आत्म विश्वास भरने मे नाकाम रहे तो नाटक के सूत्रधार की शक्ल मे विरेन बसोया ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। जार्ज वी बुश का किरदार निभाने वाले ईश्वाक सिंह ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया। इन दोनों की संवाद अदायगी काबिल-ए-तारीफ थी। शिल्पी मारवाह ने अपने छोटे पर सशक्त किरदार को जीवंत बनाने का सफल प्रयास किया। इसके अलावा राहुल खन्ना, हिमांशु, सूरज सिंह, गौरव मिश्रा, पंकज दत्ता, शिव चौहान, रंजीत चौहान और मलय गर्ग ने  संवाददाताओं की भूमिका मे अपनी आवाज़ को दूर तक पंहुचाया।

नाटक का संगीत और गायन पक्ष कमज़ोर दिखाई दिया। जिसकी ज़िम्मेदारी संगीता गौर को दी गयी थी। पार्श्व संगीत की कमी तो नाटक में शुरु से ही दिख रही थी जबकि पार्श्व संगीत के लिये नाटक मे काफी गुंजाइश थी। कोरस ने गीतों के साथ कोई न्याय नही किया। यहां तक अभिनेताओं और कोरस के बीच तालमेल की कमी लगातार दर्शकों को खलती रही। कई जगहों पर गीतों मे कोरस खुद ही भटक गया। यहां तक फैज़ अहमद, साहिर लुधियानवी और हबीब जलीब के जनगीत दर्शकों को समझ मे ही नही आये।

नाटक के निर्देशक अरविन्द गौर लगातार कई सालों से रंगमंच कर रहे हैं। अरविन्द सामाजिक और रानीतिक नाटकों के लिये जाने जाते हैं। इसलिये उनके निर्देशन मे इस नाटक से उम्मीदें ज़्यादा थी। एक माह की रिहर्सल के बाद भी वो मुख्य किरदार निभाने वाले इमरान ज़ाहिद को पूरी तरह तैयार नही कर पाये। जबकि अन्य किरदार दर्शकों पर छाप छोड़ने मे कामयाब रहे।

नाटक की स्क्रिप्ट और संवाद दर्शकों को पसन्द आये। लखनऊ के राजेश कुमार  मुंतज़िर अल ज़ैदी की किताब से ली गयी कहानी को नाटक बनाने मे सफल दिखाई दिये। मैकअप पक्ष को श्रीकान्त वर्मा ने संवारा। नाटक मे लाइटिंग पक्ष भी अच्छा रहा।

मंचन के दौरान खासतौर पर इराकी टीवी पत्रकार मुंतज़िर अल ज़ैदी दिल्ली आये थे। उन्होने नाटक देखने के बाद कहा कि इस नाटक को देखकर उनकी वो सारी यादें ताज़ा हो गयी जो उनके साथ गुज़रा। उन्होने गांधी जी की सराहना करते हुये कहा कि ये देश बहुत सौभाग्यशाली है क्योंकि गांधी जी यहां रहा करते थे। जिन्होने उन्हे भी सच के लिये लड़ने की प्रेरणा दी।

नाटक के निर्माता महेश भट्ट ने कहा कि हम सभी को अन्याय के खिलाफ चुप रहने के बजाय आवाज़ उठानी चाहिये। जब तक हम आवाज़ बुलन्द नही करेगें तब तक हमारी सुनवाई नही होगी। सब साथ आईये और अपने हक के लिये, सच के लिये आवाज़ बुलन्द किजीये।

इस दौरान अभिनेत्री पूजा भट्ट, सांसद जया प्रदा, अभिनेता डीनो मारियो, सन्दीप कपूर आदि मौजूद रहे।

Wednesday, May 11, 2011

सेना के युद्धाभ्यास से राजस्थान का रेगिस्तान गौरवान्वित हो गया। अपने देश की सेना का युद्ध कौशल देख रेगिस्तानी मिट्टी का कण कण उत्साहित है। वह अपने सैनिकों का माथा चूम रहा है। माथे पर तिलक लगा रहा है। हजारों सैनिक इस रेगिस्तानी मिट्टी तो अपने पैरो से रोंद रहे है। मगर मिट्टी है कि इसको अपना अहोभाग जान हर सैनिक के चरण स्पर्श कर रही है। क्योंकि जो मिट्टी आज वहाँ है उसको फिर मौका नहीं मिलेगा अपने इन जांबाजों के चरण छूने का। उसे तो उड़ जाना है। आँधी बनकर। मीडिया इस अभ्यास से रेगिस्तान के थर्राने की बात करता है। कोई थर्राए तो तब ना जब कोई दुश्मन हो। यहाँ तो अपनी सेना अपना क्षमता दिखा रही है। बता रही है, चिंता मत करो, किसी से मत डरो। सेना देश की सुरक्षा बहुत अच्छी तरह से कर सकती है। तो फिर यह थर्राने की नहीं गौरवान्वित होने की बात है। आओ रेगिस्तान की मिट्टी के साथ हमभी गर्व करे अपनी सेना पर। उनको बधाई दें,उनके रण कौशल के लिए। जयहिंद ।

Tuesday, May 3, 2011

श्रीगंगानगरविनाबा बस्ती मे,सिंधियों के मंदिर के थोड़ा आगे। सुबह एक घर के सामने टांय टांय करते तोतों को देख हैरत हो सकती है। कई दर्जन तोते एक साथ। हमें नहीं बताया गया होता तो हमें भी हैरानी होती। परंतु हम तो आए ही इसलिए थे की उन तोतों को देख सकें। जिस मकान के सामने तोते आए थे वह है आयकर अधिकारी अशोक किंगर का। किंगर दंपती चबूतरे पर बैठे थे ओर तोते ले रहे थे अपना दाना पानी। किंगर दंपती सुबह सुबह सबसे पहले इन तोतों से ही मिलते हैं। साढ़े पाँच बजे तोतों के लिए मूँगफली के दाने रख दिये जाते हैं। तोते आ चुके हैं। पहले एक तोता आएगा। दाना चुगेगा। बिजली की तार पर जा बैठेगा। उसके बाद भीड़ मे से आठ आठ,दस-दस तोते बारी बारी से आते हैं। चुग्गा लेते हैं। जा बैठते हैं। कोई हाय तौबा नहीं। लड़ाई नहीं। लगभग एक घंटे तक तोतों का यह सह भोज चलता है। किंगर दंपती अपनी दिनचर्या मे व्यस्त हो जाते हैं और तोते उड़ जाते हैं कल फिर आने के लिए। यह कर्म लंबे समय से चल रहा है। किसी समय अशोक किंगर कबूतरों के लिए ज्वार डालने जाया करते थे। जहां जाते थे वहाँ कुछ मनमाफिक नहीं लगा तो घर की चारदीवारी पर इंतजाम किया। एक दिन किसी ने मूँगफली के दानों के बारे मे बताया। वहाँ रखे। कई दिन तो पाँच सात तोते ही आए। फिर इनकी संख्या बढ़ती चली गई। अब तो कभी कभी सौ तोते भी वहाँ दिखाई पड़ जाते हैं। जब किंगर दंपती यहाँ नहीं होते तो तोतों के भोजन की ज़िम्मेदारी किसी को सौंप का जाते हैं। एक बार शुरू हुआ यह सिलसिला जारी है। संभव है आईटीओ के रूप मे श्री किंगर की पहचान कुछ अलग प्रकार की हो परंतु पक्षियों के प्रति ऐसा प्रेम बहुत कम देखने को मिलता है। श्रीगंगानगर मे जहां जहां पक्षियों के लिए ज्वार,बाजरा डाला जाता है वहाँ इतनी संख्या में कोई पक्षी दिखाई नहीं दिया। एक घर मे इतनी संख्या मे तोतों का आना बहुत बड़ी बात है। ऐसा ही दृश्य मरघट मे देखने को मिला था। सुबह और दोपहर के बीच का समय था। किसी के अंतिम संस्कार मे शामिल होने गया था। एक आदमी छोटा सा थैला लेकर छत पर गया। पीछे मैं भी। उसके छत पर पहुँचते ही बड़ी संख्या मे कौए वहाँ मंडराने लगे। उसने थैले मे रोटी निकाली और कौए को डाली । कुछ ही क्षणों मे वहाँ और कौए आ गए। काफी देर तक वहाँ कौए भोजन करते रहे। ये दोनों कभी किसी अखबार मे नहीं गए अपनी खबर छपवाने। उनको तो यह पढ़कर मालूम होगा कि हमारे तोतों,कौए की खबर आई है। पहले एक शेर फिर एसएमएस। आ मेरे यार फिर इक बार गले लग जा,फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। राजेश अरोड़ा का एसएमएसअध्यापकहिन्दी की पहली साइलेंट फिल्म

Saturday, April 23, 2011

ये ख़ामोशी के राज हम जानतेहैं यूँ चुप रहने के अंदाज हम जानते हैं, यकीन नहीं आता तो अपने दिल से पूछ लो आप से बेहतर आप को हम जानते हैं। ------ एक एसएमएस राजू ग्रोवर का।

Monday, April 18, 2011

आज कुछ समय पहले ही पता लगा कि फेसबुक पर भी कुछ लोगों का एक ग्रुप है। इस ग्रुप को वह इन्सान पसंद नहीं आता जो इनके लिखे पर आलोचनात्मक टिप्पणी करे। इनमे से एक साहब ने फोन करके अपनी इस भावना से अवगत भी करवाया। ये चाहते थे कि मैं { माफ़ी, मैं लिखने के लिए} वही लिखूं जिसको वो पसंद करे। या जिसको पढ़ कर वे खुश हो जाएं। फेसबुक पर सब लोग अपने भाव लिखते हैं। शब्द,फोटो,वीडियो,टिप्पणी भाव व्यक्त करने का तरीका है। एक पोस्ट पर टिप्पणी की तो उनको पसंद नहीं आई। जबकि मैंने साथ में लिखा था, सॉरी। मैंने अपनी बात कही तो उनको बुरा लगा। अगर आप अपनी या अपने ग्रुप वाले किसी दोस्त की पोस्ट पर आलोचनात्मक टिप्पणी हजम नहीं कर सकते तो फिर ऐसी जगह पर लिखते ही क्यों हैं? मेरे भाव का मकसद किसी का दिल दुखाना नहीं होता। लेकिन यह भी संभव नहीं कि वही लिखा जाये जो उनको पसंद हो। अब मुझे कुछ पसंद नहीं तो इसका ये मतलब नहीं कि मैं फोन करके लिखने वाले से सवाल जवाब करूँ। चलो इसी बहाने लोगों के असली चेहरे तो सामने आये। क्योंकि फेसबुक पर जो थे वे कुछ और थे। आलोचना ना सहन करने वाले निंदा भी गाली देने की स्टाइल में करते हैं। भगवान मुझे हिम्मत देना ऐसे लोगों के फोन सुनने की और फेसबुक पर इनकी गालियाँ पढने की।

Saturday, April 16, 2011

यूसुफ़ अन्सारी को ड़ॉ. अम्बेड़कर सम्मान

मुम्बई। अम्बेड़कर जयन्ती के मौके पर गुरुवार की रात मुम्बई मे आयोजित एक भव्य समारोह में देश के जाने-माने टीवी पत्रकार यूसुफ़ अन्सारी, फिल्म अभिनेता धमेन्द्र, और अभिनेत्री एंव सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी को ड़ॉ. भीमराव अम्बेड़कर अवार्ड़ से सम्मानित किया गया। इनके अलावा कई फिल्मी कलाकारों को अलग-अलग श्रेणी मे अवार्ड़ से नवाज़ा गया।

मुम्बई मे गुरुवार की शाम ड़ॉ. अम्बेड़कर के नाम रही। महानगर के शमुखानन्द चन्द्रशेखर नरेन्द्र सरस्वती ऑडिटोरियम मे मशहूर बॉलीवुड़ पत्रिका पेज3 और महाराजा यशवंत राव होलकर प्रतिष्ठान ने ड़ॉ.भीवराव अम्बेड़कर सम्मान समारोह का आयोजन किया। इस भव्य समारोह मे देश की कई जानी मानी हस्तियां शामिल हुई। देश के जाने-माने टीवी पत्रकार एंव राजनीतिक विश्लेषक यूसुफ़ अन्सारी को अपनी ख़बरों और लेखों में समाज के पिछड़े, अतिपिछड़े, दबे, कुचले और निरक्षर वर्ग की आवाज़ उठाने के लिये इस प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया गया। दिल्ली से पुरुस्कार ग्रहण करने मुम्बई आये वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ़ अन्सारी ने कहा कि वो ये पुरुस्कार पाकर काफी उत्साहित हैं। उनका कहना था कि बाबा साहेब से ही उन्हे निचले तबके की आवाज़ उठाने की प्रेरणा मिली थी और वे तब तक ये काम करते रहेंगें जब तक सबसे पिछड़ा तबका समाज के मजबूत तबकों के बराबर आकर ना खड़ा हो जाये। उन्होने कहा कि बाबा साहेब के नाम पर सम्मान मिलना उनके लिये गर्व की बात है।

इस मौके पर जाने-माने फिल्म अभिनेता धमेन्द्र को बॉलीवुड़ मे उनके सराहनीय योगदान के लिये लाइफटाईम अचीवमेन्ट अवार्ड़ से नवाज़ा गया। साथ ही मशहूर अभिनेत्री एंव सामाजिक कार्यकर्ता शबाना आज़मी को सोशलवर्क में उनके सराहनीय योगदान के लिये इस पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। दोनों कलाकारों ने आयोजकों की सरहाना करते हुये बाबा साहेब के बताये मार्ग का अनुसरण करने की बात कही। इनके अलावा इस मौके पर मशहूर गायिका आशा भौंसले, फिल्म अभिनेता विवेक ओबरॉय, गायिका अनुराधा पौड़वाल, गायक उदित नारायण, अभिनेत्री सलमा आगा, टीवी कलाकार अन्जन श्रीवास्तव, फिल्मकार इकबाल दुर्रानी और महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अनीस अहमद को भी सम्मानित किया गया।

Friday, April 15, 2011

" कृपया यहाँ अपना ज्ञान मत बांटोयहाँ सब के सब ज्ञानी है। " अरे! अरे! गुस्सा मत करोये मेरा किया धरा नहीं हैमैंने कहीं पढ़ायहाँ छाप दियावैसे सुना है कि ज्ञान तो बांटने से बढ़ता हैपर..... ज्ञानियों में ज्ञान बाँटना......... । चुप्प रहना ही सेहत के लिए ठीक है

Wednesday, April 13, 2011

श्रीगंगानगर में दो पुलिस वालों को मुलजिम पकड़ने पर सम्मानित किया एस पी ने। .... समझ नहीं आया कि इन्होने तो वही किया जो इनका काम है। फिर ये सम्मान किस बात का। ........ हाँ , आजकल पुलिस मुलजिम पकड़ती नहीं ना!

Tuesday, April 12, 2011

जब कोई छोटा बड़ा सपना हकीकत बन कर सामने जाता है तब अपनों पर निगाह कम ही पड़ती हैविश्वास नहीं तो आस पास देख लो

Saturday, April 9, 2011

--- चुटकी--- पता नहीं क्या बात हुई हुजूर, सबके नेता रहे, हमारे अन्ना से दूर

हिन्दूस्तान में अन्ना हजारे के पक्ष में चली आंधी से सरकार थोड़ी डगमगाई। आज वह हो जायेगा जो अन्ना चाहते हैं। इस आन्दोलन से जुड़े लोग खुशियाँ मनाएंगे। एक दो दिन में अन्ना को भूल कर आई पी एल में खो जायेंगे। यही होता आया है इस देश में। आजादी मिली। हम सोचने लगे ,अब सब अपने आप ठीक हो जायेगा। क्या हुआ? कई दश पहले " हाय महंगाई..हाय महंगाई " वाला गीत आज भी सटीक है। गोपी फिल्म का गाना " चोर उचक्के नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगे...जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जायेगा..... " देश के वर्तमान हालत की तस्वीर बयान करता है। लोकतंत्र। कहने मात्र से लोकतंत्र नहीं आ जाता। देखने में तो भारत में जनता की,जनता के लिए जनता द्वारा चुनी हुई सरकारे ही आई हैं। किन्तु लोकतंत्र नहीं आया। भैंस बेशक किसी की रही मगर लेकर वही गया जिसके हाथ में लाठी थी। कहीं ऐसा ही हाल इस आन्दोलन का ना हो जाये। इसलिए अन्ना हजारे के आन्दोलन से जुड़े हर आदमी को सजग ,सचेत रहना है। जो कुछ चार दिनों में जंतर,मंतर पर हुआ उसका डर सरकार को बना रहे। मकसद जन लोकपाल विधेयक नहीं ,करप्शन मुक्त भारत है। विधेयक पहली सीढ़ी है। इसके बन जाने से ही करप्शन ख़तम नहीं हो गया। होगा भी नहीं। अभी तो केवल शुरुआत है। देश में माहौल बना है। आम आदमी के अन्दर करप्शन के प्रति विरोध,आक्रोश मुखर हुआ है। वह सड़क पर उतरा है। यह सब कुछ बना रहना चाहिए। बस यह चिंगारी बुझे नहीं। ऊपर राख दिखे तो दिखे। कुरेदो तो चिंगारी नजर आनी चाहिए जो फूंक मारते ही शोला बन जाने का जज्बा अपने अन्दर समेटे हो, सहेजे हो। वरना सब कुछ जीरो।

Thursday, April 7, 2011

वर्ल्ड कप से बढ़कर है अन्ना हजारे का आन्दोलन

हिन्दूस्तान के १२१ करोड़ लोगों में से उन को छोड़ दो जिनको किसी बात की समझ नहीं हैइनमे बच्चे और वे इन्सान शामिल हैं जिन्हें अपने अलावा किसी से कोई मतलब नहींइसके बाद जो बचे उन्होंने क्रिकेट के लिए अपना बहुत समय दियाभारत वर्ल्ड कप जीते , ये प्रार्थना कीजीतने के बाद खुशियाँ मनाईपटाखे छोड़ेमिठाइयाँ बांटीसड़कों पर डांस कियादेर रात तक ख़ुशी से किलकारियां मारते हुए हुए गलियों में घूमेदूसरे दिन तक यही सब कुछ चलता रहाचलना भी चाहिए थासब के भाव थेभारत की इज्जत का सवाल थाकप ना मिलता तो संसार में नाक कट जातीपूरा देश एक हो गयाभारत अखंड नजर आने लगागली,सड़क, छोटे से कौने से भी यही आवाज सुने दी"विजयी भव "। ये कोई स्थाई नहींआज कप हमारे पास हैकल किसी और का होगाकल,मतलब कुछ दिन पहले तक किसी अन्य का थाकिन्तु हिन्दूस्तान था,है और रहेगाकप उतना मान सम्मान हिन्दूस्तान दुनियां में नहीं दिला सकता जितनी ईमानदारी, सच्चाई,मजबूती दिला सकती हैयह सब पाने के लिए भी मैच हो रहा हैअफ़सोस कि इसमें किसी अन्य देश कि टीम नहींदोनों तरफ अपने ही हैंएक तरफ हैं सामाजिक कार्यकर्त्ता अन्ना हजारे और दूसरी ओर भ्रष्ट सिस्टमउसके चलाने वाले नेता,अफसरअन्ना हजारे के साथ देश के हर कौने से हर वर्ग जुड़ रहा हैलोग दिल्ली के जंतर मंतर पहुँच रहे हैंजो नहीं जा पा रहे वे अपने स्तर अन्ना के साथ खड़े दिखते हैं। " हम अन्ना के साथ हैंआप ! अगर आप भी साथ हैं तो ये सन्देश दूर तक भेजोक्योंकि भारत को महान बनाना है। " ये एस एम एस बड़ी संख्या में भेजे जा रहे हैं आगे से आगे, बहुत दूर तकब्लॉग हो या फेसबुकअन्ना के समर्थन में भरे पड़ें हैंहर कोई अन्ना की ही बात कर रहा हैकोई उनसे मिला नहीं लेकिन उनके साथ हैंकिसी को कोई व्यक्तिगत फायदा होने वाला नहीं ,परन्तु अनेकानेक जागरूक जेब से पैसा खर्च कर अभियान के साथ जुड़े हुए हैंइनको अन्ना हजारे या उनके किसी सहयोगी ने ऐसा करने को नहीं कहाइन पर किसी का किसी किस्म के दवाब का भी सवाल नहीं हैफिर भी लागे हैं देश को करप्शन से मुक्त करवाने के अभियान में अन्ना हजारे के साथक्रिकेट की बात पुरानी हो गईअब हर न्यूज़ चैनल पर अन्ना हजारे उनका आन्दोलन हैमहात्मा गाँधी के अनशन के बारे में केवल सुना थासुना कि किस प्रकार गाँधी के अनशन से सरकार हिल जाती थीजन जन गाँधी की भाषा बोलने लगताआज इसको देख लियाकोई फर्क नहींसब कुछ वैसा ही है बस पात्र बदल गएतब देश को विदेशियों से आजाद करवाना थाआज उन अपनों से जो कण कण में करप्शन चाहते हैंइस आजादी के बिना वो आजादी बेकार हो रही है,अधूरी है जिसके लिए गाँधी जी ने अनशन किया थाअगर तब गाँधी जी जरुरी थे तो आज अन्ना हजारे उनसे भी अधिक जरुरी हैंक्योंकि जो पूरा नहीं वह किस काम का
सबको प्यारे अन्ना हजारे। ---- अन्ना हजारे के समर्थन में कल श्रीगंगानगर में धरना दिया जायेगा। समय रहेगा सुबह ११ बजे।

Sunday, April 3, 2011

श्रीगंगानगर-अब ठीक है। बेक़रार दिल को सुकून मिल गया। मन प्रसन्न है। आत्मा ख़ुशी के तराने गा रही है। हिन्दूस्तान क्रिकेट का बादशाह बन गया। सब चिंताएं समाप्त। कोई परेशानी नहीं। देश में क्रांति होगी। कप आ गया अब जो आपके सपने हैं सब पूरे हुए समझो। घोटाले नहीं होंगे। जो हो चुके उनके पैसे सरकारी खजाने में आ जायेंगे। नेता ईमानदार हो जायेंगे। करप्शन इतिहास बन जायेगा। देश में कानून का राज होगा। कानून भी सब के लिए बराबर। जाति,धर्म,अमीर,गरीब देख कर कोई भेद भाव नहीं। मंत्री भी सरकारी कर्मचारी,अफसर की तरह दफ्तरों में बैठेंगे। वे भी तो वेतन लेते हैं। जनता के काम कर्मचारी,अधिकारी,मंत्री अपना काम समझ कर तुरंत करेंगे। अब फैसले नहीं न्याय होगा। पीड़ित को न्याय के लिए इंतजार नहीं करना होगा। वह खुद उसकी चौखट पर आएगा। पुलिस दादागिरी छोड़कर प्रताड़ित का साथ देगी। खुद किसी को तंग परेशान नहीं करेगी। अपराधियों से अपनी मित्रता तोड़ देगी। सज्जन लोगों का साथ करेगी। थानों में सुनवाई होगी। ऊपर की कमाई नहीं होगी। फरियादी को भटकना नहीं पड़ेगा। नेता जनता के प्रति जवाबदेह होंगे। चुनाव में भले आदमी खड़े होंगे। कई भले लोगों में से सबसे भले को चुनना होगा। नगर पालिका से लेकर संसद तक में जनता के लिए काम होगा। हल्ला-गुल्ला,लड़ाई झगडा,मार-पीट, गाली-गलौच बिलकुल बंद। संवेदनशील अफसर फिल्ड में लगेंगे। काम के लिए सिफारिश की जरुरत ख़तम। सरकारी अस्पतालों में इलाज होगा। सभी उपकरण एकदम ठीक काम करके सही रिपोर्ट देंगे। दवाई सस्ती होगी। जेलों में सालों से बंद पड़े बंदियों की सुनवाई होगी। रसोई का सामान सस्ता होगा । भिखारी नहीं रहेंगी। सबको योग्यता के हिसाब से काम मिलेगा। कोई भूखा नहीं सोयेगा। सब के तन पर कपडे होंगे। बेघर के घर अपने होंगे। काला धन सब देश में आ जायेगा। वह देश,जनता की उन्नति के लिए खर्च होगा। हमारा प्रधानमंत्री मजबूर नहीं होगा। अफजल,कसाब को फंसी होगी। जम्मू-कश्मीर सच में हमारा होगा। जैसे बाकी राज्य। टैलेंट की कद्र होगी। आरक्षण नहीं रहेगा। न्यूज चैनलों पर खबर दिखाई जाएगी। कलयुग सतयुग में बदल जायेगा। दूध दही की नदियाँ बहने लगेगी।देश की सभी समस्याओं का अंत तुरंत हो जायेगा। अमेरिका की हुकूमत हिन्दूस्तान पर नहीं चलेगी। दुनिया हमारे इशारे पर चलेगी। क्योंकि हम विश्व विजेता हैं क्रिकेट के। क्या बकवास करते हो? ऐसा कुछ नहीं होने वाला! क्यों? किसने कहा? ना जाने किस किस बात से दुखी, हैरान,परेशान करोड़ों लोग रात भर से ख़ुशी में सराबोर होकर बेवजह थोड़ी नाच रहे हैं। माता पिता के जन्म दिन पर उनको बधाई दी हो या नहीं मगर अब जाने अनजाने सबको मुबारक बाद दे रहे हैं। जब सब खुश हैं। सभी में उमंग है। बधाई दे ले रहे हैं। मिठाइयाँ बाँट रही है। पटाखे चल रहे हैं। सभी छोटे बड़ों के चेहरों पर मुस्कान है। और तुम कह रहो हो कि वर्ल्ड कप जीतने के बावजूद जनता की किसी भी परेशानी, दुःख,तकलीफ पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वे सब की सब हमारी नियति है। हमारी तक़दीर है। इनको तो भोगना ही है। हम तो वर्ल्ड कप के बहाने कुछ क्षण के लिए इनको भूलना चाहते हैं इसलिए ख़ुशी दिखाकर अन्दर के दर्द छिपा रहे हैं। सच्चाई सबको पता है।

Thursday, March 31, 2011

श्रीगंगानगर-कमाल है,खेल खेल में भारत एकता के सूत्र में बंध गया। क्रिकेट ने वह कर दिखाया जो राजनेताओं की अपील,धर्मगुरुओं के उपदेश, टीचर्स की क्लास नहीं कर सकी। देश के कण कण से एक ही स्वर सुनाई दे रहा था, हम जीत गए। भारत विजयी हुआ। जाति,धर्म,समाज,पंथ सब गौण हो गए। रह गया तो भारत और उसकी पाक पर विजय का उल्लास। दिन के समय किसी काले पीले तूफान के कारण गहराती शाम का दृश्य तो याद है। लेकिन आधी रात को दिन जैसा मंजर पहली बार देखा। १९८३ में भी हमारी टीम रात को ही वर्ल्ड कप जीती थी। ऐसा कोलाहल तो तब भी नहीं दिखाई,सुनाई दिया। तीन दशक में क्रिकेट बादशाह होकर हम पर राज करने लगा। क्रिकेट खेलों का राजा हो गया। इसके आगे कोई नहीं ठहरता। क्रिकेट जन जन के दिलों में धड़कता है। वह उम्मीद है। जीवन है। जुनून है। कारोबार है। ग्लेमर है। उसकी जीत भारत के अलग अलग कारणों से परेशान जनता को खुश कर देती है चाहे कुछ देर के लिए ही सही। इससे अधिक और कोई खेल किसी को दे भी क्या सकता है। जो क्रिकेट दे रहा है, वह तो तमाम खेल मिल कर भी नहीं दे सकते। इसे क्रिकेट की महानता कहो या जनता का पागलपन,दीवानगी। क्रिकेट ऐसा ही रहेगा। अन्दर तक जोश भर देने वाला। सभी आवश्यक कामों को मैच के बाद तक टाल देने वाला। क्रिकेट मैच की जीत जनता के अन्दर नवजीवन का संचार करती है। हार मायूसी। खिलाडी हार के बाद उतने मायूस नहीं होते जितने लोग। क्रिकेट मैच ने कई घंटे तक सबको एक जगह रुकने के लिए मजबूर कर दिया।सरकार ने मैच देखने के आदेश नहीं दिए थे। कोई टोटका भी नहीं था कि मैच देखने से जीवन में खुशहाली आएगी। इसको देखने से कोई ईनाम भी नहीं मिलना था। इसके बावजूद सब व्यस्त थे। मैच के अंतिम क्षणों में जब भारत की जीत साफ दिखाई दी तो हल्ला गुल्ला शुरू हो गया। जैसे ही पाकिस्तान हारा भारत की जीत का उल्लास घरों के कमरों से लेकर सड़कों पर उतर आया। टीं,पीं,पों ,हुर्रे,हूउ...... के मस्ती भरे कोलाहल ने कई घंटे से पसरे सन्नाटे की गिल्लियां उड़ा दी। जो सड़क,गली सुनसान थी वहां पटाखों के शोर ने विजय के तराने गाए। गलियों में भारत माता की जय का उदघोष करती टोलियाँ घरों की चारदीवारी,बालकोनी में खड़े बच्चों को जोश दिला रही थी। फिर ना तो माता पिता की डांट की परवाह ना सुबह होने वाली परीक्षा की चिंता। सबके स्वर एक हो गए। विजय का उदघोष और तेज होकर वातावरण को आह्लादित करने लगा। कई घंटों से ठहरा हुआ भाव रूपी जल लहरें बन ख़ुशी से नृत्य करने लगा। क्रिकेट की अ,आ,इ ..... नहीं जानने वाला पूरे माहौल को अचरज से देख रहा था। उसके चेहरे पर ख़ुशी थी। ख़ुशी इस बात की कि वह जानता है कि यह भारत में ही संभव है जहाँ खेल खेल में अनेकता को एकता में बदला जा सकता है। क्रिकेट तो एक बहाना है। असल में यह हमारे संस्कार है। हमारी संस्कृति है। जिस पर युगों युगों से हमें गर्व है और हमेशा रहेगा।

सुरक्षा अस्त्र

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