Do you know that according to RTE, all children between the ages of 6 and 14 shall have the right to free and compulsoryelementary education at a neighborhood school. There is no direct (school fees) or indirect cost (uniforms, textbooks, mid-day meals, transportation) to be borne by the child or the parents to obtain ...elementary education. The government will provide schooling free-of-costuntil a child’s elementary education is completed.” Share this with your friends and family. for more detail Please log on to- www.thirkanthengo.blogspot.com
Friday, November 12, 2010
Do You Know?
Do you know that according to RTE, all children between the ages of 6 and 14 shall have the right to free and compulsoryelementary education at a neighborhood school. There is no direct (school fees) or indirect cost (uniforms, textbooks, mid-day meals, transportation) to be borne by the child or the parents to obtain ...elementary education. The government will provide schooling free-of-costuntil a child’s elementary education is completed.” Share this with your friends and family. for more detail Please log on to- www.thirkanthengo.blogspot.com
Friday, October 22, 2010
Tuesday, September 21, 2010
युवा दखल: हाथ जोड़कर एक अपील
हाथ जोड़कर एक अपील
24 तारीख़ को बाबरी मस्ज़िद विवाद का हाईकोर्ट से फैसला आना है।
तय है कि यह एक समुदाय के पक्ष में होगा तो दूसरे के ख़िलाफ़। ऐसे में पूरी संभावना है कि लोकतंत्र में विश्वास न रखने वाली ताक़तें 'धर्म के ख़तरे में होने' का नारा लगा कर जनसमुदाय को भड़काने तथा हमारा सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करेंगी। फ़ैसला आने से पहले ही इसके आसार नज़र आने लगे हैं।
दो दिन बाद … यानि 27 सितम्बर को भगत सिंह का जन्मदिन है। आप जानते हैं कि पंजाब में उस वक़्त फैले दंगों के बीच भगत सिंह ने 'सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज़' लेख में सांप्रदायिक ताक़तों को ललकारते हुए कहा था कि दंगो की आड़ में नेता अपना खेल खेलते हैं और असली मर्ज़ यानि कि विषमता पर कोई बात नहीं होती।
इन दंगो ने हमसे पहले भी अनगिनत अपने और हमारा आपसी प्रेम छीना है। आईये आज मिलकर ठंढे दिमाग़ से यह प्रण करें कि अगर ऐसा महौल बनाने की कोशिश होती है तो हम इसकी मुखालफ़त करेंगे…और कुछ नहीं तो हम इसमें शामिल नहीं होंगे।
ग्वालियर में हमने इस आशय के एस एम एस व्यापक पैमाने पर किये हैं। आप सबसे भी हमारी अपील इसी संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की है।
आईये भगत सिंह को याद करें और सांप्रदायिक ताक़तों को बर्बाद करें। यह एक ख़ुशहाल देश बनाने में हमारा
सबसे बड़ा योगदान होगा।

हमने इस साल भगत सिंह के जन्मदिन को 'क़ौमी एकता दिवस' के रूप में मनाने का भी फैसला किया है।
Thursday, August 26, 2010
दर्द आम आदमी का
संवेदनशील कवि की दो लाइन से बात आरम्भ करते हैं-प्रश्नोत्तर चलते रहे,जीवन में चिरकाल,विक्रम मेरी जिन्दगी,वक्त बना वेताल। ये पंक्तियां देश के आम आदमी को समर्पित हैं। उस आदमी को जिसे मैं तब से जानता हूँ जब से अखबार पढना शुरू किया था। आम आदमी!मतलब,जो किसी को नहीं जानता हो और कोई खास आदमी उसको ना पहचानता हो। अपने काम से काम रखने को मजबूर। ना साधो से लेना न माधो का देना। पीपली लाइव के नत्था से भी गया गुजरा। इसी फिल्म के उस लोकल पत्रकार से भी गया बीता। जिसकी मरने के बाद भी पहचान नहीं होती। देश के न्यूज़ चैनल्स में तो यह लापता है, हाँ कभी कभार प्रिंट मीडिया के किसी कौने में जरुर इसके बारे में पढ़ने को मिल जाता है। इन दिनों ऐसे ही एक आम आदमी से साक्षात मिलने का मौका मिला। जिस पर एक कवि की ये लाइन एक दाम फिट है--एक जाए तो दूसरी मुश्किल आए तुरंत,ख़त्म नहीं होता यहां इस कतार का अंत।
आम आदमी ने अपना कर्म करके कुछ रकम जोड़ी, पांच सात तोला सोना बनाया। सोचा, घर जाऊंगा ले जाऊंगा। परिवार के काम आयेंगे। बहिन की शादी में परेशानी कम होगी। घर जाने से पहले ही चोर इस माल को ले उड़ा। थाने में गया, परन्तु मुकदमा कौन दर्ज करे? चलो किसी तरह हो गया तो चोर के बारे में बताने,उसे पकड़ने की जिम्मेदारी भी इसी की। घर में इतना सामान क्यों रखा? इस बारे में जो सुनना पड़ा वह अलग से। मोहल्ले वालों ने बता दिया। इस बेचारे ने समझा दिया। पुलिस पुलिस है, समझे समझे,ना समझे ना समझे। बेचारा आम आदमी क्या कर सकता है। जिस पर शक है वह मौज में है। इसी मौज में वह वहां चला जायेगा जिस प्रदेश का वह रहने वाला है। आम आदमी अब भी कुछ नहीं कर पा रहा बाद में भी कुछ नहीं कर पायेगा।
पेट काट कर सरकारी कालोनी में भूखंड लिया। सोचा मकान बना लूँ। बैंक आम आदमी के लिए होता है। यह सोचकर वह वहां चला गया उधार लेने। किसी ने एक लाख उधार पर साढ़े तीन हजार मांगे किसी ने तीन हजार। कोई जानता नहीं था इसीलिए किसी ने उसकी सूनी नहीं, मानी नहीं। यह रकम देनी पड़ी। लेकिन मकान का निर्माण इतनी आसानी से तो शुरू नहीं हो सकता ऐसे आदमी नक्शा बनना पड़ेगा। वह पास होगा। तब कहीं जाकर आदमी मकान की नीव भर सकता है। सरकारी कालोनी थी। कब्ज़ा पत्र लिया था। वह गुम हो गया नक्शा पास करवाने की जो फाइल ऑफिस में थी वह ऑफिस वालों से इधर उधर हो गई। सरकारी,गैर सरकारी जितनी फीस लगती है उससे डबल फीस देनी पड़ी। अब यह क्या जाने की किस काम के कितने दाम लगते हैं। कई दिन तक घर ऑफिस के बीच परेड होती रही, काम नहीं हुआ। होता भी कैसे आम आदमी जो ठहरा। उस पर आवाज ऐसी मरी मरी जैसे कोई जबरदस्ती बुलवा रहा हो। यह तो उसकी कई दिनों की कहानी है। टटोले तो अन्दर और भी दर्द हो सकते हैं। मगर हमें क्या पड़ी है। ऐसे आदमी का पक्ष लेने की जिसको कोई नहीं जानता। उस से जान पहचान करके भी क्या फायदा! देश में पता नहीं ऐसे कितने प्राणी है जो इस प्रकार से अपने दिन कटते हैं। इसके लिए तो यही कहना पड़ेगा--कैसे तय कर पायेगा, वो राहें दुशवार,लिए सफ़र के वास्ते, जिसने पाँव उधार। नारायण नारायण।
Monday, August 16, 2010
पीपली लाइव
आजादी की ६३वी सालगिरह,सावन की बरसात,दोस्त के साथ, चले गए पीपली लाइव देखने। सालों बाद किसी फिल्म को थियेटर में देखने का मन बना था। बनना ही था। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इसकी इतनी बल्ले बल्ले की कि हमें ऐसा लगा अगर पीपली को नहीं देखा तो हमारा जीना ही बेकार हो जायेगा। लोग ताने मार मार के हमें जिन्दा ही मार देंगे। अंत देखकर यही सोचा कि क्यों आ गये इसे देखने। सब कुछ ठीक था। मीडिया जो असल में करता है वह तो फिल्म में जानदार शानदार और दमदार तरीके से दिखाया गया है। लेकिन आखिर में मीडिया को क्या हो जाता है। वह ऐसा तो नहीं है कि उसे पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था नहीं लोकल पत्रकार है। पोस्ट मार्टम के दौरान भी पहचान नहीं हुई कि मरने वाला नत्था नहीं है। जबकि दोनों के पहनावे, बदन की बनावट में काफी अंतर था। इससे भी कमाल तो ये कि "नत्था" की लाश को ख़बरों में दिखाने से पहले ही मीडिया छूमंतर हो गया। ऐसा होता नहीं है। मुझे तो लगता है यह फिल्म किसान की स्थिति पर नहीं मीडिया के प्रति दिल में छिपी कोई भड़ास निकालने के लिए है। इसमें कोई शक नहीं कि लोकल लेवल की किसी बात का बतंगड़ इसी प्रकार बनता है। मगर ये नहीं होता कि किसी को पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था था या कोई ओर। जिस तमन्ना से फिल्म देखने और दिखाने ले गए थे वह पूरी नहीं हुई। लेकिन फिर भी दो घंटे तक दर्शक इस उम्मीद के साथ थियेटर में बैठा रहता है कि कुछ होगा और फिल्म ख़त्म हो जाती है। समस्या के साथ समाधान भी होता हो अच्छा होता।
Saturday, August 14, 2010
एक पौधा आज़ादी का......
आज़ादी का जश्न हम सब मना रहे हैं। लेकिन आज़ादी के मायने क्या हैं इस पर हम सब को सोचना चाहिये। हमें आज़ादी तो मिली पर उसके साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी आयीं। क्या हमने उन ज़िम्मेदारियों के प्रति ईमानदारी दिखाई? अगर नही तो आज फिर मौका है उस ज़िम्मेदारी को निभाने का...... “थिरकन” सभी देशवासियों से अपील करती है कि हम सब देश की प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझे और आज़ादी के जश्न को सार्थक बनाते हुये एक पेड़ या पौधा अपने घर या आस-पास कहीं भी ज़रुर लगायें। ताकि हमारे पर्यावरण को भी प्रदुषण से आज़ादी मिल सके और हमारा कल भी प्रदुषण से आज़ाद हो। जय हिन्द।
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Monday, July 12, 2010
कल रात को स्टार न्यूज़ पर एक परिचर्चा हो रही थी। विषय, विषय तो ऑक्टोपस बाबा के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता था। उसमे कई ज्योतिषविद ,तर्क शास्त्री और वैज्ञानिक भाग ले रहे थे। चैनल का खेल संपादक उसका संचालन कर रहा था। सबकी अपनी अपनी राय, तर्क,कुतर्क थे। इसमें एक बात बड़ी जोरदार थी। जैसे ही संचालक किसी ज्योतिषाचार्य को अपनी बात कहने के लिए माइक देता, स्टूडियो में काम करने वाला एक बड़ा पत्रकार [ शायद ] आकर जबरदस्ती उससे माइक लेकर अपनी बात कहने लगता। बात भी पूरी गुस्से में कहता। एक बार नहीं ऐसा बार बार हुआ। परिचर्चा का संचालन करने वाला उसको बुलाता या नहीं वह आ जाता। ज्योतिषाचार्य अपनी बात शुरू भी नहीं कर पाते कि वह टपक पड़ता। संचालक भी उसको ऐसा करने से रोक नहीं रहा था। जब चैनल ने उनको बुलाया है, अपनी बात कहने के लिए तो उनको अपना कथन पूरा ना करने देना कहाँ की सभ्यता है। फिर ऐसे कार्यकर्म में तथाकथित नास्तिकों को हिन्दू धर्म, देवी देवताओं, उनसे जुड़ी मान्यताओं को गाली निकालने का खुला मौका मिल जाता है या ये कहें कि दिया जाता है।। गलत को गलत कहना बुरी बात नहीं लेकिन केवल अपनी ही बात को सच साबित करने के लिए जोर से बोलना, दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कौनसा वैज्ञानिक तथ्य है। चैनलों पर बैठ कर हिन्दुओं, देवी-देवताओं को अपमानित करने वाले इस प्रकार से किसी और धर्म के बारे में एक शब्द भी बोल कर दिखाएँ। चैनल से लेकर सरकार तक की जड़ें हिल जाएँगी। बात कहने वालों का चैनल से बाहर आना मुश्किल हो जायेगा। आप सच्चें हैं, आपका तर्क वैज्ञानिक कसौटी पर खरा है। मगर चैनल वाले ने जिस को बुला रखा है वह भी तो कुछ ज्ञान रखता होगा। मेरी इस पोस्ट से भी ऐसे नास्तिकों के पेट में मरोड़ उठेगी। चलो ठीक है पेट साफ हो जायेगा। ऐसी वार्ता संचालन करने वालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्टाफ को कोई बन्दा यूँ किसी की बात को ना काटे। अगर उसको बुलाना मज़बूरी है तो उसको भी परिचर्चा में शामिल कर लो। जिस से बीच बीच में माइक छीन कर वह किसी का अपमान ना कर सके। तर्क शास्त्रियों पर भी किसी धर्म की निंदा करने पर रोक होनी चाहिए। आप समालोचना करो, तर्क से अपने कथन की सार्थकता सिद्ध करो, ये क्या कि जब कोई बस ना चले तो आपे से बाहर होकर किसी का अपमान करना शुरू कर दो। ताकि दूसरा कोई जवाब ही न दे सके। नारायण,नारायण।
Monday, June 21, 2010
यूपी पुलिस- हम नही सुधरेंगें
हमारे देश के पर्यटन स्थलों पर लाखों की संख्या मे पर्यटक आते हैं और देश में पर्यटन का सबसे बड़ा केन्द्र होता है आगरा, जहां दुनियाभर के लोग बेपनाह मोहब्बत की अनमोल निशानी ताजमहल का दीदार करते हैं। आगरा शहर को अगर देश में पर्यटन की राजधानी कहा जाये तो कुछ ग़लत नही होगा। क्योंकि हर साल सबसे ज़्यादा पर्यटक इसी शहर में आते हैं। हमारे देश की रवायत है कि मेहमान भगवान के समान होता है। इसीलिये यहां कहा भी जाता है “अतिथि देवोः भवः”। लेकिन आये दिन पर्यटकों और खासकर विदेशी मेहमानों के साथ कोई ना कोई हादसा होने की ख़बरें आती रहती हैं। आगरा में पर्यटकों के साथ होने वाले हादसों की भी एक लम्बी फेहरिस्त है। इन सब हादसों के पीछे सबसे बड़ा सबब है पुलिस की लापरवाही या फिर कहीये कि पैसे के लालच मे की गयी लापरवाही। शहर मे आने वाले पर्यटकों की सुरक्षा का जिम्मा शहर की पुलिस का है। लेकिन गाहे बगाहे पुलिस पर भी अंगुलिया उठती रहती हैं। इन दिनों आगरा में पर्यटकों को लेकर आने वाले वाहन पुलिस की अवैध कमाई का ज़रिया बने हुये हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उन वाहनों की है जिनका रजिस्ट्रेशन दिल्ली या आस-पास के राज्यों का है। आगरा की ट्रेफिक पुलिस हो या सिविल पुलिस जिसे मौका मिलता है वो हाथ साफ कर लेता है। पर्यटकों की सुरक्षा का दम भरने वाली पुलिस के हालात ये हो गये हैं कि उन्हे बाहर से आने वाले वाहन केवल सोने का अण्ड़ा देने वाली मुर्गी नज़र आते हैं। फिर चाहे उसमें कोई भी सवार हो, पर्यटक या फिर आगरावासी। राष्ट्रीय राजमार्ग से शहर मे दाखिल होने वाले चौराहों और रास्तों पर सुबह से ही पुलिस वाले तैनात रहते हैं। वहां लगने वाले जाम से उन्हे कोई मतलब नही लेकिन अगर कोई बाहर का वाहन बिना ‘एन्ट्री’ दिये बिना निकल जाये तो मुश्किल है। वसूली का सबसे बड़ा ठिकाना है सिकन्दरा चौराहा और उसके बाद वॉटरवर्क्स चौराहा। इसके अलावा शहर के प्रतापपुरा चौराहा और फतेहाबाद रोड़ भी पुलिस की अवैध कमाई के बड़े केन्द्र साबित हो रहें हैं। हालात इस कदर खराब हो चुकें हैं कि पुलिस ने बाहर से आने वाले इन वाहनों के लिये पैसे तय कर दिये हैं। इण्ड़िका या फिर किसी भी छोटी गाड़ी के लिये पांच सौ रुपये तय हैं। अगर पैसा नही मिला तो गाड़ी शहर मे नही जा सकती। भले ही उसके काग़ज़ात पूरे हों। पैसे लेकर बाकायदा एक कार्ड़ पर एन्ट्री की जाती है। फिर चाहे वो वाहन आगरा में कहीं भी घूमता रहे। वसूली की इस सारी कवायद के पीछे पुलिस वालों की दलील ये है कि चौराहे पर तैनाती के लिये दरोगा को हर दिन के हज़ारों रुपये ऊपर देने पड़ते हैं। रही सिपाही की बात को उसे अच्छे ‘एन्ट्री’ प्वॉइन्ट पर तैनाती के लिये हर माह एक मोटी रकम देनी पड़ती है। अब जब ऊपर तक इतना जाता है तो कुछ कमाने के लिये भी तो होना चाहिये। बस इसी फीक्र मे बेचारे पुलिस वाले धूप हो या छांव, आंधी या तूफान हर हाल मे कमाई का साधन ढूड़ते रहते हैं। पुलिस और वाहन चालकों या स्वामियों के बीच कई बार बात गाली गलौच से बढ़कर हाथापाई तक पंहुच जाती है। लेकिन कुछ दिन दिखावे के लिये सबकुछ ठीक रहता है पर फिर वही वसूली कार्यक्रम शुरु हो जाता है। सबसे अहम बात ये है कि सारी कहानी पुलिस के आलाधिकारियों को पता होती है। लेकिन वो इन मामलों पर चुप्पी साधे रहते हैं। वजह है कि इस कमाई का एक हिस्सा ऊपर वालों को भी तो जाता है इसलिये लाख शिकायत करने के बावजूद किसी पुलिस वाले के खिलाफ कोई कार्यवाही नही होती। आला अधिकारियों से जब इस बारे मे बात की जाती है तो वो अनजान बन जाते हैं। उन्हे तो पता ही नही होता कि किस चौराहे पर क्या हो रहा है। बस अपने कारिन्दो को देखने की बात दोहराते हैं। एक रोना सरकार का रोया जाता है कि सरकार के कामों से अधिकारियों को फुरसत कहां कि वो देख सकें कि किस चौराहे पर क्या हो रहा है। इस पूरे मामले के दौरान सबसे बुरा असर पड़ता है गाड़ी मे बैठे पर्यटक पर जो ये सारा माजरा समझ नही पाता। कई बार पुलिसवाले पर्यटकों के सामने ही वाहन चालक से वसूली के लिये मार पिटाई शुरु कर देतें हैं। जिसे देखकर पर्यटक सहम जाते हैं और खासकर विदेशी पर्यटक तो हैरान रह जाते हैं कि यहां कि पुलिस किस तरह से किसी बेगुनाह को पैसे के लिये मारने पीटने पर आ जाती है। उनकी नज़रों मे पूरे भारत को लेकर सजाया गया ख्वाब और यहां की सभ्यता को लेकर सुनी कहानियां पल मे झूठी हो जाती हैं। बहरहाल केन्द्र और राज्य सरकार दुनियाभर के पर्यटकों की आमद का इन्तज़ार कर रही है। कॉमन वेल्थ गेम्स सर पर हैं। लाखों पर्यटकों के भारत आने की उम्मीद भी है। ऐसे में दिल्ली के बाद पर्यटकों की सबसे ज़्यादा आमद आगरा में होगी। लेकिन अवैध वसूली में नम्बर वन का खिताब पा चुकी आगरा पुलिस पर्यटकों की हिफाजत का ख्याल रखेगी या फिर अपनी जेब का, ये सवाल अब सामने खड़ा दिखाई दे रहा है ?
Saturday, May 15, 2010
कुछ पाने के लिए
ठीक है कुछ पाने के लिए
कुछ ना कुछ
खोना ही पड़ता है,
मगर ये नहीं जानता था कि
मैं, कुछ पाने के लिए
इतना कुछ खो दूंगा कि
मेरे पास कुछ और पाने के लिए
कुछ भी तो नहीं बचेगा,
और मैं थोडा सा कुछ
पाने के लिए
अपना सब कुछ खोकर
उनके चेहरों को पढता हुआ
जो मेरे पास कुछ पाने की
आस लिए आये हैं,
लेकिन मैं उनको कुछ देने की बजाए
अपनी शर्मसार पलकों को झुका
उनके सामने से
एक ओर चला जाता हूँ
किसी और से
कुछ पाने के लिए।
Tuesday, May 4, 2010
लिखना भी लड़ाई का हिस्सा है!
पुस्तक लोकार्पण और परिचर्चा की रिपोर्ट
प्रस्तुतकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय पर ५:२५ AM![]() |
| पुस्तक लोकार्पण का दृश्य |
समाजवाद मानव की मुक्ति का महाआख्यान है। पूंजीवाद की आलोचना का आधार सिर्फ़ उसकी आर्थिक प्रणाली नहीं बल्कि उसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम भी हैं। इसने समाज को अमानवीय बना दिया है। औरतों, दलितों और ग़रीबों की ज़िन्दगी इस व्यवस्था में लगातार बद्तर हुई है। सांस्कृतिक क्षेत्र को इसने इतना प्रदूषित कर दिया है कि मनुष्य की प्राकृतिक प्रतिभा का विकास इसके अंतर्गत असंभव है। इसीलिये व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक आमूलचूल लड़ाई लड़े बिना इन मुद्दों पर अलग-अलग लड़ाईयां नहीं लड़ी जा सकतीं। आज ज़रूरत मार्क्सवाद की गतिमान व्याख्या तथा नई सामाजार्थिक हक़ीक़त के बरक्स इसे लागू किये जाने की है। अशोक की किताब मार्क्स – जीवन और विचार इस लड़ाई का ही एक हिस्सा है जो नये पाठकों और युवा पीढ़ी का मार्क्स से आलोचनात्मक परिचय कराती है। मई दिवस के अवसर पर ग्वालियर में युवा संवाद द्वारा आयोजित परिचर्चा ‘हमारे समय में समाजवाद’ में हिस्सेदारी करते हुए जाने-माने संस्कृतिकर्मी प्रो शम्सुल इस्लाम ने कही।
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| कमल नयन काबरा जी |
परिचर्चा में हिस्सेदारी करते हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने कहा कि आज़ादी के बाद से ही विकास का जो माडल अपनाया गया वह व्यापक आबादी नहीं बल्कि एक सीमित वर्ग के हाथों में सत्ता तथा अर्थतंत्र के नियंत्रण को संकेन्द्रित करने वाला था। जिसे समाजवाद कहा गया वह वस्तुतः राज्य पूंजीवाद था। गांवों और शहरों के ग़रीबों की संख्या में लगातार वृद्धि होती रही। समाजवाद का मतलब है एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सत्ता वास्तविक अर्थों में जनता के हाथ में रहे। आज रूस या चीन की कार्बन कापी नहीं हो सकती और नयी समाजवादी व्यवस्था को आज की सच्चाईयों के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा। भूमण्डलीकरण के नाम पर जो प्रपंच रचा गया है अशोक उसे‘शोषण के अभयारण्य’ में बख़ूबी खोलते हैं।
कार्यक्रम का आरंभ शम्सुल इस्लाम, गैरी तथा अन्य साथियों द्वारा गाये गये गीत ‘लाल झण्डा ले के हम आगे बढ़ते जायेंगे' से हुआ। इस अवसर पर युवा कवि, लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की हाल ही में प्रकाशित दो किताबों, ‘मार्क्स – जीवन और विचार’ तथा ‘शोषण के अभयारण्य – भूमण्डलीकरण के दुष्प्रभाव और विकल्प का सवाल’का लोकार्पण अथिति द्वय और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश दीक्षित द्वारा किया गया। पुस्तक परिचय देते हुए युवा कहानीकार जितेन्द्र विसारिया ने इसे मार्क्सवाद को समझने की ज़रूरी किताब बताया, वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी डा मधुमास खरे ने कहा कि यह छोटी सी किताब प्रगति प्रकाशन से छपने वाली उन किताबों की याद दिलाती है जिन्हें पढ़कर हमारी पीढ़ी ने मार्क्सवाद सीखा। अशोक ने कम्यूनिस्ट आंदोलनत का संक्षिप्त इतिहास लिखकर एक बड़ी ज़रूरत को पूरा किया है। युवा संवाद के संयोजक अजय गुलाटी ने कहा कि ये एक सक्रिय कार्यकर्ता की किताबें हैं जिन्हें आम जनता के लिये पूरी संबद्धता के साथ लिखा गया है। शोषण के अभयारण्य दूरुह माने जाने वाले विषय अर्थशास्त्र पर इतने रोचक तरीके से बात करती है कि इसे कोई भी पढ़कर अपनी अर्थव्यवस्था को समझ सकता है। लेखकीय वक्तव्य में अशोक पाण्डेय ने कहा कि किताब दरअसल बस वैसी ही होती है जैसा उसे पाठक समझता है। लिखना मेरे लिये इस लड़ाई का ही हिस्सा है और अगर ये किताबें उसमें कोई भूमिका निभा पायें तभी इनकी सार्थकता है। समाजवाद मेरे लिये एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें मौज़ूदा व्यवस्था से अधिक शांति हो, अधिक समृद्धि हो, अधिक लोकतंत्र और अधिक समानता। मुझे नहीं लगता कि उसकी लड़ाई आज पुराने तरीकों या फिर हिंसात्मक आंदोलनों से लड़ी जा सकती है।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रकाश दीक्षित ने कहा कि अशोक का जुझारुपन और उसकी बैचैनी इन किताबों में साफ़ महसूस की जा सकती है। इसीलिये ये किताबें रोचक हैं और आपसे लगातार सवाल करती हैं। आज बाज़ार ने मध्य वर्ग को पूरी तरह भ्रष्ट बना दिया है और जो अधिकार संघर्षों के बाद हासिल हुए थे वे अब छीन लिये गये हैं। आज इस लड़ाई के लिये और अधिक प्रतिबद्ध संघर्ष की ज़रूरत है।
कार्यक्रम में साहित्यकार वक़ार सिद्दीकी, पवन करण, प्रदीप चौबे, ज़हीर क़ुरैशी, मुस्तफ़ा ख़ान, सत्यकेतु सांकृत, जी के सक्सेना, संतोष निगम, पारितोष मालवीय, इण्डियन लायर्स एसोसियेशन के गुरुदत्त शर्मा, अशोक शर्मा, मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव यूनियन के राजीव श्रीवास्तव, गुक्टु के ओ पी तिवारी, एस के तिवारी, डी के जैन, जे एस अलोरिया सी पी आई के सतीश गोविला, स्त्री अधिकार संगठन की किरण, बेबी चौहान, पत्रकार राकेश अचल सहित शहर के तमाम बुद्धिजीवी, ट्रेडयूनियन कर्मियों, छात्रों तथा आम जनों ने बड़ी संख्या में भागीदारी की। संचालन अशोक चौहान ने किया और आभार प्रदर्शन फिरोज़ ख़ान ने।
Sunday, April 18, 2010
जनपक्ष: ये शिक्षा का बाज़ार है!
ये शिक्षा का बाज़ार है!
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| धरने के दौरान एक पोस्टर |
गोरखपुर: उच्च शिक्षा की खस्ताहाल स्थिति
उच्च शिक्षा किसी भी सभ्य समाज के लिए एक जरूरी शर्त होती है। साहित्य संस्कृति, कला और राजनीति के विभिन्न पक्षों पर गंभीर चिन्तन का काम उच्च शिक्षित व्यक्ति ही कर सकता है। लेकिन आज पूरे देश के पैमाने पर उच्च शिक्षा की जो हालात है वह काफी निराशाजनक प्रतीत होती है। उच्च शिक्षा की हाल जानने के लिए अगर हम उ0 प्र0 के पूर्वी इलाके की तरफ रूख करें तो हमें उच्च शिक्षा की दुर्दशापूर्ण स्थिति का सहज ही अंदाजा लग सकता है। दी0द0उ0 गोरखपुर विश्वविद्यालय पूर्वांचल में उच्च का एक बड़ा केन्द्र माना जाता है। इससे सम्बद्ध लगभग 245 महाविद्यालय हैं। जिसमें आधे से अधिक स्ववित्तपोषित एवं वित्तविहीन योजना के अन्तर्गत हैं। ये सभी कालेेज पूर्वी उ0प्र0 में उच्च शिक्षा की खस्ताहाल स्थिति को सुधारने के लिए कुछ स्वघोषित समाजसेवी, ठेकेदारों, राजनेताओं द्वारा संचालित किए जाते है। इन महाविद्यालयों में किसी भी तरह के मानकों का पालन जरूरी नहीं समझा जाता है विश्वविद्यालय द्वारा अच्छी खासी रकम लेकर इन्हें स्थायी मान्यता भी प्रदान कर दी जाती है। और हद तो तब हो जाती है जब इनके प्रबंधक उन कालेजों के विश्वविद्यालय से नियुक्त प्राध्यापकों से अध्यापन तक नहीं करवाते। अनुमोदित शिक्षकों को न्यूनतम् वेतन तक नही देतेे बल्कि वे पढ़ाई करवाना ही नही चाहते है। अनुमोदित शिक्षक जिन्हे लगभग बारह हजार रू0 तनख्वाह मिलनी चाहिए थी वे अपनी डाक्टरेड की उपाधि लिए सामाजिक अपमान का दंश झेलने को मजबूर हैं। उन्ही के बराबर योग्यता वाले वित्तपोषित कालेजों के शिक्षक 80-90 हजार रू0 प्रतिमाह पाते हैं और वहीं उनसे अधिक मेहनत से पढ़ाने वाले लोग भूखमरी के शिकार होते है। हाईकोर्ट के सर्विस बेंच ने- 129-11-2-2010 को दिये अपने 9.5.2000 के निर्णय में शासनादेश के अनुसार यूजीसी को न्यूनतम वेतनमान नियमित रूप से शिक्षकों को दिये जाने की अनिवार्यता बताया है। इसके लिए उसने राज्य सरकारों एवं विश्वविद्यालय को निर्देशित भी किया किंतु उसका भी कोई प्रभाव उच्च शिक्षा के धंधेबाजो पर नही है।
245 के लगभग संख्या में दी0द0उ0 गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में छात्रों का प्रवेश पूरे सत्र भर चलता रहता है। निर्धारित सीटों से कई गुना अधिक प्रवेश लेने की इन्हें पर्याप्त छूट है। शिक्षक विहीन इन कालेजों में भारी संख्या में ग्रामीण युवा उच्च शिक्षा लेने के लिए दाखिला लेते है। ये छात्र वर्ष भर कालेजों से दूर रहते है। प्रबंध तंत्र इन छात्रों से पैसे लेकर पास करवाने का ठेका लेता है और परीक्षा के समय भाड़े के मास्टरों द्वारा नकल करवाकर अच्छे अंकों से पास करवा दिया जाता है। यह सब कुछ विश्वविद्यालय प्रसाशन के संज्ञान में किया जाता है।
कुछ तो कालेज ऐसे भी है जिन के पास मान्यता ही नही है और प्रवेश ले चुके हैं अभी पिछले दिनों 17 महाविद्यालय ऐसे पाये गये जिनके पास स्थायी मान्यता ही नही है बी.एड. कालेजों की हाल तो और भी बुरी है। प्रबंधतंत्र द्वारा मनमानी फीस वसूलने के बाद अनेक ऐसे कालेज प्रकाश में आये है जिनके पास एन.सी.ई.टी. से मान्यता ही नही है। इन कालेजों में प्रवेश ले चुके छात्र अब इस लिए परेशान हैं कि उनकी वार्षिक परीक्षा ही नही हो रही है। सैकड़ों की ंख्या में छात्र-छात्राएं कुलपति से लेकर कमिश्नर तक का प्रतिदिन चक्कर लगा रहे है तथा धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन इन छात्रों की समस्याओं को सुनने वाला कोई नही है। पूर्वांचल के बेेटे-बेटियों के भविष्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ के खिलाफ बोलने वाला कोई नही है। यहाँ के अधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधि तक इन शिक्षा माफियाओं के खिलाफ बोलने को तैयार नही हैं इनका एक प्रमुख कारण यह भी है कि अधिकांश प्रबंधक खुद जनप्रतिनिधि है या फिर कोई बड़ा ठेकेदार, बाहुबली आदि। इनके खिलाफ न तो कुलपति कोई कार्यवाही करते है और नही प्रदेश सरकार ही।
पूर्वांचल में उच्च शिक्षा को इस दुर्दशा पूर्ण स्थिति से आजिज आकर विगत वर्ष इन कालेजों में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने ‘स्ववित्तपोषित- वित्तविहीन महाविद्यालय शिक्षक एसोसिएसन’ के बैनर तले एकत्रित होकर यह तय किया कि अगर प्रबंधकों द्वारा घूस देने पर उनका काम विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कर दिया जाता है तो हम शिक्षक भी अपने वेतन तथा अन्य मांगों के समाधान के लिए कुलपति को घूस देेंगे। इसके लिये इन शिक्षकों ने पूरे महानगर में जुलूस निकालकर भिक्षाटन किया था। शिक्षको के इस प्रतिरोधात्मक कार्यवाही के बाद भी विश्वविद्यालय और प्रदेश सरकार को शर्म तक नही आयी कि वे इन शिक्षा माफियाओं के विरूद्ध कोई भी कार्यवाही करें।
देवरिया जिले में रमाशंकर कृषक महाविद्यालय, मईल एक ऐसा कालेज है जहाँ के सारे अनुमोदित शिक्षक विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखकर दे चुके है िकवे उक्त कालेज में अध्यापन कार्य नहीं कर रहें हैं क्योंकि वहाँ वेतन के रूप में कोई धनराशि दी ही नही जाती। विद्यवविद्यालय एवं महाविद्यालयों के स्थायी शिक्षक वेतन के स्तर को देखकर प्रमुदित है; शिक्षा का स्तर देखने की उन्हे फुर्सत ही नही रह गई है। बल्कि प्रबंधकों की सेवा एवं बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं। ऐसे मे यह सवाल उठता है कि पिछले वर्षो से उक्त कालेज में अध्यापन कार्य कौन कर रहा है? तथा परीक्षा मे कक्ष निरीक्षक की भूमिका में कौन हैं? जबकि सभी प्राध्यापकों ने कालेज छोड़ दिया है। 4000 से अधिक छात्रों का प्रवेश लेने वाले इस महाविद्यालय में सीटों से कई गुना अधिक प्रवेश किया गया है। अनेक बार लिखित शिकायत के बाद भी विश्वविद्यालय द्वारा वहाँ खुलेआम नकल करवाया जा रहा है। राजभवन एवं उच्च शिक्षा सचिव ने भी इस मामलेे को गंभीरता से लेते हुए विवि प्रसाशन को पत्र लिखा था लेकिन विश्वविद्यालय ने उक्त निर्देश को दबाकर उक्त कालेज को स्थायी मान्यता दे दी हैै ।
शासन-प्रशासन तथा शिक्षा माफियाओं द्वारा उच्च शिक्षा के साथ एवं आम छात्रों के साथ हो रहे इस अपमानजनक कार्यवाही से आजिज आकर पूर्वांचज के इन कालेजों के शिक्षकों, छात्रों एवं सामाजिक संगठनों तथा कार्यकर्ताओं द्वारा इस साजिश के खिलाफ एक मजबूत जनान्दोलन खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम मंे मार्च माह के अंत से गोरखपुर कमिश्नर कार्यालय पर अनिश्चित कालीन धरना प्रदर्शन किया जा रहा है। लेकिन अभी तक विश्वविद्यालय प्रशासन, कमिश्नर तथा जनप्रतिनिधियों तक ने इस सामाजिक मुद्दे पर नजर डालने तक की कोई जरूरत नही समझी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं व शिक्षकों का यह आन्दोलन कालेजों के अलावा शिखा के निजीकरण की कार्यवाही तथा शिक्षा पर नवउदारवादी हमलों के विरूद्ध एक जनगोलबन्दी करने की ओर अग्रसर है। आन्दोलनकारियों का मानना है कि पूर्वांचल समेत देशभर में उच्च शिक्षा की जो बदत्तर स्थिति है उसके लिए सरकार की उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की नीतियां ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। ऐसे में इन सभी समस्याओं का स्थायी समाधान इन जनविरोधी नीतियों के खिलाफ खड़ा किये गए जनप्रतिरोध से ही किया जा सकता है। तभी हम एक उच्च शिक्षित युवा पीढ़ी के निर्माण के साथ-साथ एक सभ्य समाज का निर्माण कर सकते है
Wednesday, March 17, 2010
जनपक्ष: शलाका को तमाचे के लिये आभार!
केदार जी…सच मानिये इस एक पुरस्कार को लौटा के आपने हमें वह ख़ुशी दी है जो सारे संकलनों को कई-कई बार पढ़कर नहीं मिलती। पहले पुरुषोत्तम अग्रवालने जब इस पुरस्कार को न लेने की घोषणा की तो ग्वालियर का रहवासी होने पर फ़क्र हो आया था…अब आपके निर्णय के बाद मूलतः पूरबिहा होने पर भी फ़क्र हो रहा है। विमल कुमार , प्रियदर्शन,रेखा जैन, पंकज सिंह, गगन गिल सहित सात साहित्यकारों के भी यही निर्णय ले लेने पर साहित्य-संस्कृति ग्राम के (नान रजिस्टर्ड सही) नागरिक होने के नाते सर ऊंचा हो गया।
सच कहुं तो कृष्ण बलदेव बैद कभी मेरे प्रिय लेखक नहीं रहे। परंतु उनकी अपनी एक शैली है, एक विशिष्ट भाषा और अपनी एक सबलाईम स्टाईल। चीज़ों को देखने का उनका नज़रिया क्रांतिकारी भले न हो लेकिन आधुनिक तो है ही।
अब यह एक विडंबना ही है कि उन्हें परखने का काम एक घोषित भांड को दिया गया है। अब अश्लील चुटकुलों पर ठहाका लगाने वाले और अंग्रेज़ीदां राजनैतिक 'विद्वान' ( जिनके कहे हिंद स्वराज गांधी ने नहीं हाथरसी भांड ने लिखी थी) करेंगे तो उन्हें वह अश्लील और दोयम दर्ज़े के लगेंगे ही। सैमसंग से पुरस्कार लेने को आतुर हिन्दी बिरादरी के कलकतिया और दिल्लीवासी लेखकों को चुप रहकर उनकी हां में हां मिलाते देखना अब बुरा भी नहीं लगता। लेकिन जीवन भर रेडिकल विचारों का दामन थामे लोगों को उन्हीं से सम्मानित होते देख ज़रूर बुरा लग रहा था। अब इस निर्णय के बाद चैन आया है।
हम स्वागत करते हैं इन सब लेखकों का और इनका पुष्पहार-पैसा-प्रशस्तिपत्र के बिना हार्दिक सम्मान करते हैं
Sunday, March 14, 2010
Friday, March 12, 2010
बात तो कुछ भी ना थी
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बात तो, कभी भी
कुछ भी ना थी,
मैं तो बस यूँ ही
मुस्कुराता रहा,
अपनों को खुश
रखने के लिए
अपने गम
छिपाता रहा।
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मेरे अन्दर झांकने वाले
गुम हो गए दो नैन,
कौन सुनेगा,किसको सुनाऊं
कैसे मिले अब चैन।
Monday, March 1, 2010
रंगो का त्यौहार मुबारक
होली है भई होली है......
बुरा ना मानो होली है.......
रंग लगा दो होली है.....
ख़ुशियाँ मना लो होली है.....
गले मिल लो होली है......
शोर मचा लो होली है.....
मैं भी खेलनी होली है.....
मेरी तरफ से आप सभी को होली की शुभकामनाएं........
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