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Monday, August 17, 2009

लो क सं घ र्ष !: निर्जीव बीज यदि है तो...

निर्जीव बीज यदि है तो- अंकुर कैसे उग आता? लघु या विशाल संबोधन यह समझ नही मैं पाता॥ हो समष्टि , स्वर्ग, पाताल या दिग-दिगन्त के पट में। है एक शक्ति तो निश्चित, अनवरत प्रवासी घट में॥ प्रतिपल जीवन समझाता, है डोर किसी के कर में। रोदन या हास वही तो, देता प्रत्येक अधर में॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

Sunday, August 16, 2009

लो क सं घ र्ष !: जगती की अंगनाई में...

जगती की अंगनाई में, क्यों धूप बिखर जाती है। तारों की चूनर ओढे, क्यों निशा संवर जाती है ? अभिशाप यहाँ पर क्या है, वरदान कहूं मैं किसको। दूजे का दुःख अपना ले, है समय यहाँ पर किसको॥ रसधार यहाँ पर क्या है ? विषधर कहेंगे किसको ? क्षण -क्षण परिवर्तित होता, संसार कहेंगे किसको ? डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"

स्वाइन फ्लू हाय स्वाइन फ्लू

देश भर में मीडिया ने स्वाइन फ्लू का इस कद्र आतंक मचा रखा है कि लोग डरे और सहमे हुए हैं। देश के नामी गिरामी डॉक्टर भी चुप्पी साधे इन चैनलों के यस मैन बने हुए है। डॉक्टर जानते हैं कि यह स्वाइन फ्लू और कुछ नहीं केवल जुकाम का ही एक रूप है। लेकिन क्या मजाल कि कोई एन चैनल वालों के खिलाफ बोले। स्वाइन फ्लू की एक मौत से देश भर में हंगामा मचा देने वाले मीडिया ने कभी इस बात की पड़ताल कि है क्या कि निमोनिया से हर रोज कितने लोग मरते हैं। अगर डॉक्टर की माने तो स्वाइन फ्लू से अधिक मौत तो निमोनिया से होती है। निमोनिया ही क्यूँ ,कैंसर की बात कर लो। श्रीगंगानगर इलाके में ना जाने कितने लोग कैंसर से दम तोड़ चुके हैं और कितने ही अपनी बारी का इंतजार कर रहें हैं। मेरे ससुराल में दो साल में तीन मौत कैंसर से हुई हैं। न्यूज़ चैनल्स को या खबरें नहीं मिलती,या उनकी नजर खबरों पर हैं नहीं,या फ़िर वे खबरे देना नहीं चाहते। ऐसा लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से मल्टी नेशनल कंपनियों ने ऐसा जाल बुना है कि सब चैनल स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गये। मल्टी नेशनल वालों को इस से भोले भाले चैनल और कहाँ मिलेंगें। कुछ ही दिनों में अरबों खरबों का कारोबार करके अपने घर बैठ जायेंगें। उसके बाद ना तो स्वाइन होगा न फ्लू। कितने अफ़सोस की बात है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, जो चिकित्सकों की सबसे बड़ी और जानी मानी संस्था है, वह भी इस बारे में कुछ नहीं बोल रही। जबकि उनके पास तो प्रमाण सहित सब कुछ होगा। नेताओं की तो कुछ ना पूछो, उनको तो वोट बैंक से मतलब है। किंतु डॉक्टर तो सच्चाई का बयान कर ही सकते हैंशायद उनको लगता होगा कि नक्कार खाने में उनकी बात सुनेगा कौन। इस स्वाइन फ्लू ने ना कितने लोगों का धंधा एक दम से चमका दिया होगा।यूँ तो हम अपने आपको इक्कीसवीं सदी में बतातें है और काम करते हैं ऐसे जैसे हमने अपना दिमाग किसी मल्टी नेशनल कंपनी के यहाँ गिरवी रख दिया हो। उसके बाद वही देखेंगे,सुनेंगें,करेंगें जो वे कहेंगें। क्योंकि उनकी हाँ में हाँ मिलने में ही वारे न्यारे है। जय हो स्वाइन फ्लू की। भाड़ में जाए अन्य बीमारी, उनसे तो हर रोज़ लोग मरते हैं।

Saturday, August 15, 2009

लो क सं घ र्ष !: तुम्हारी नजरो में हमने देखा....

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष
मुर्ख अशिक्षित धनपशुओं की, मंडप में लगती बोली। सुंदर शिक्षित बालाओ की, डोली में जलती होली ॥
यह लोकतंत्र है
भरी बाजार दुशासन खींचै, विवश द्रोपती की साड़ी। निशदिन सीता हरण होय, औ पुलिस मस्त पीकर ताडी॥
यह लोकतंत्र है
जनता के रक्षक लगे हुए है, हत्या लूट डकैती में। गुंडागर्दी, अपहरण, फिरौती, शामिल इनकी ड्यूटी में ॥
यह लोकतंत्र है
माननीयों की कृपा हो तो, डकैत की भी चांदी है। माफिया, मिलावटखोर, चोर , नेता, चमचे कट्टाधारी ॥
यह लोकतंत्र है
अधिकारी और माफिया मिल , अरबो का राशन खाय रहे। असहाय गरीब मरें भूखे, चोरकटवे मौज उडाय रहे ॥
यह लोकतंत्र है
गरम मसाला खोया नकली नकली तेल , दवा नकली सुअर की चर्बी से देशी घी, नकली दूध, दही नकली ॥
यह लोकतंत्र है
बिना दूध देशी घी खोया, माया राज की माया। गैया भैसी के बिना दूध, बुधवा मुस्काया ॥ यह लोकतंत्र है रक्षा का जिन पर भार, लिप्त है हत्या रिश्वतखोरी में । थाने में धुत्त दरोगा जी, मातहत वसूली चोरी में॥ यह लोकतंत्र है सत्य अहिंसा की धरती पर राक्षस नंगे नाच रहे। साधू भेष में छिपे भेडिये, बैठे गीता बांच रहे॥ यह लोकतंत्र है घर-घर बस्ती में आग लगाते, स्वयं ही पहरेदार यहाँ। अबलाओं की हत्या करवाते, धर्म के ठेकेदार यहाँ॥ यह लोकतंत्र है रहने को विवश है शिविरों में, लाखो बच्चे व नारी नर। अपने देश शहर में अपने, अपने ही घर में बेघर॥ यह लोकतंत्र है अब वे देश के शत्रु जिनका, देश के लिए बहा रक्त। अंग्रेजो के स्वमिभक्तो, चाटुकार सब देश भक्त॥ यह लोकतंत्र है जलता धू-धू गुजरात कभी, तो महाराष्ट्र आसाम कभी। जल रहा उडीसा , सुलग रहा, सिंगूर-नंदीग्राम अभी ॥ यह लोकतंत्र है मजदूर किसानो के सीने पर, चलती सत्ता की गोली। मनमोहन प्योर मौन देखते, खूनी बंगाली होली॥ यह लोकतंत्र है गोरस की दूकान गली में, मदिरालय चौराहे पर। जग में सच की हार देख, मैं खड़ा आवाक दोराहे पर॥ यह लोकतंत्र है -मोहम्मद जमील शास्त्री

लो क सं घ र्ष !: आयोग एक दवा और एक मर्ज भी!

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हमारा देश कई प्रधान देश है। कृषि प्रधान तो था ही। क्रिकेट प्रधान तो है ही। होते होते देश अब आयोग प्रधान भी हो गया है। देश की आने और जाने वाली सरकार भी करें तो क्या करेंे। बिना आयोग के सरकारे नहीं चला करती। नई सरकार का नये आयोग गठन किए बिना गुजारा नहीं। वो सरकार ही क्या जो अपने कार्यकाल में आयोग का योगासन न करे। कितने आयोगों का गठन हो चुका! उनका हमारे लोंकतंत्र में क्या योगदान है इसका योग यहां पर किया जा रहा है।

आयोग बेराजगारी दूर करने का साधन। आयोग की इस देश को बहुत आवश्यकता है। सरकार किसी गंभीर,पेचीदगीभरी मुद्दे पर स्वेच्छा से या अनिच्छा से आयोग का गठन करती है। वो आयोग का गठन कर एक तरह से बेरोजगारी कम करती है। आयोग रिटायर व्यक्ति को काम देता है। सेवानिवृत्त होने के बाद खाली बैठना बेराजगारी नहीं तो क्या है! आप इसे बेराजगारी न माने तो अर्धबेरोजगारी तो है ही। अब आप इसे मानने से इंकार न करीएगा। करीएगा तो करीएगा। हम तो सेवानिवृत्त अधिकारी को बेराजगार ही कहेंगे।

आयोग अवकाश की पुन:प्रात्ति का एक फरमान। आयोग का गठन कर सरकार कई पुराने घुटे उच्च अवकाश प्राप्त अधिकारियों जिन्हें अनुभवी और दक्ष भी कहा जाता है, रख कर उनका अवकाश समाप्त करती है। आयोग में अवकाश प्राप्त पुराने घुटे हुए उच्च अवकाश प्राप्त अधिकारी ही क्यों! वो अपने घरों में बैठे-बैठे क्या करते। जब बैठना ही है तो आयोग में ही बैठे।

आयोग किसी व्वनप्राश से कम नहीं है। बल्कि सवाया ही बैठेगा। आयोग कें बैठने के नाम से कितने क्रब में पांव लटकाए अधिकारी उठ कर बैठ जाते है। सरकार कहती है सच सबके सामने लाया जाएगा। यह कहकर सत्यवादी हरिश्चंद्र का खिताब अपने नाम करती है। वही विपक्ष भी खुश उनको एक नया मुद्दा मिला। जनता भी इस आस में खुश कि न्याय होगा। यानी सब खुश यानी सबकी सेहत दुरूरत।

आयोग एक रामबाण। प्रजातंत्र के व्याधि को भेदने के लिए आयोग एक रामबाण है। किसी ज्वलंत मुद्दे की हवा निकालने, किसी अप्रिय स्थिती को टालने के लिए,वर्तमान में सच्चाई से फिलहाल बचने के लिए, बैठा दो आयोग। सब सेंटल हो जाएगा।

आयोग एक कछुआ। कई आयोग देश में बैठे तो बैठे रह गए। कुछ हिम्मत करके चले,भले ही मंथर गति से, तो मंजिल तक नहीं पहुंचे। कुछ ऐसे-तैसे पहुंचे तो उनकी रफट को सरकार ने पढ़ा ही नहीं। कुछ रपटों को जैसे-तैसे सरकार ने पढ़ा तो उन पर अमल किया नहीं। कुछ रपटों पर अमल करना चाहा मगर रपट कुछ जमी नहीं। कुल मिलाकर प्रजातंत्र को धीरे-धीरे परिपक्व कर रहा है आयोग।

आयोग एक नाव। जब-जब सरकार भंवर में होती है तो वो आयोग नाम की नाव चलाती है। वो नाव अपनी रपट के पतवार से सरकार को सुविधाजनक स्थिती में खे कर ले आता है। जिस रपट से वो सरकार का बेड़ा पार लगाता है उस रपट को मानने या न मानने की सुविधा सरकार के पास होती है।

आयोग सरकार का एक सेफटी वाल्व है। जिसका वाल्व समय समय पर सरकार के राजनैतिक नफे नुकसान के हिसाब से फैलता सिकुड़ता है। जिससे लोगों का आक्रोश निकल जाता है और सचाई कही वाल्व में अटक जाती है। उसका कुछ अंश लटकता हुआ दिखता है कुछ अंश छुपा रहता है। सरकार सेफ रहती है। क्योंकि सचाई कितना दिखना है कितना उघाड़ना है, ये सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है।

आयोग एक चिमटा। सरकार जिसको पकड़कर सच को झाड कर उठाती है। नगं हाथों से पकड़ेगी तो उसके हाथ जलने का खतरा बना रहता हैं। कमब्ख्त सच ऐसी ही चीज है। वो इस चिमटे से अपने चूल्हे की आग को दूसरे के चूल्हे में डाल सकती है। दूसरे चूल्हे की आग से अपने चूल्हें की आग भी जला सकती है।

आयोग एक खेल। गंभीर मुद्दों पर खेला जाने वाला एक छुपा हुआ खेल। जिसे सरकार और विपक्ष एक दूसरे के साथ खेलते है। जब सतारूढ़ दल गठित करता है तो विपक्ष आयोग पर और उसकी रपट पर सवाल खडे क़रता है। विपक्ष जब सरकार में आती है वो गर किसी आयोग का गठन करती है तो विपक्ष जो कभी सरकार थी, वो आयोग और उसकी रपट पर सवाल उठाता है।आयोग-आयोग का खेल सरकारपक्ष-विपक्षी दल संजीदा हो खेल-खेल में खेलते रहते है!

आयोग एक फुकनी। सरकार जिससे जनता के करोड़ों रूपये उस सच को जानने में फुकती है।जिसे जनता पहले से एक दमड़ी खर्च किए बिना ही जानती और समझती है।

आयोग एक ड्रा टेस्ट मैच। जनता प्रतीक्षारत। देखे क्या परिणाम आता है! परिणाम आने पर ही तो पता चलेगा कौन सही कौन गलत ! अवव्ल रिजल्ट तो आता नहीं। रिजल्ट आता भी है तो पता चलता है कि सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया। अक्सर परिणाम की ड्रा वाली परिणिती होती है। न खेलते हुए भी हारा कौन! प्रतीक्षारत जनता क्योंकि वो प्रतीक्षारत है।

आयोग एक अजीब-सी कशमश। गठित करो तो मुसीबत न करो तो मुसीबत। रपट आए तो बवाला न आए तो बवाला। कार्यकाल बढाओ तो सवाल। समय से पहले भंग करो तो सवाल। कुल मिलाकर आयोग सबको खुश न करना वाला सबको कुछ न कुछ देने वाला कोई अजब-सा सरकारी शह है।

आयोग एक ठण्ड़ा बस्ता। जिसमें तत्कालीन आक्रोश जो उबाल मारता है, को डाला जाता है। जबतक इसमें से कुछ निकलता है तबतक सब जानने का जोश ठण्ड़ा पड़ जाता है। क्या हुआ था! क्यों हुआ था! क्या निकला है! क्या आया है! जो होना था सो हो गया में बदल जाता है।

आयोग एक औजार। जिसमें सत्तारूढ़ दल का सेनापति अपने तेज से रपट में धार लगाता है। उसकी रपट को कोई अपनी तलवार बनाता है तो कोई अपनी ढाल बनता है। उसकी रपट कुछके विश्लेषण का धुरा बनेगी तो कुछके बहसों को सिरा बनेगी।

आयोग एक पहल। आयोग किसी सच को सामने लाने के लिए एक पहल है। जो एक पहल बन शुरू होती है और एक पहेली बन खत्म होती है।

अनूप मणि त्रिपाठी

09956789394

लोकसंघर्ष पत्रिका में जल्द प्रकाशित

स्वाधीनता दिवस और हमारी विदेश नीति

सन 62 का चीन लिखूं या आज 62वां हिन्दुस्तान लिखूं. सन सैतालिस से धोखा खाते कितना पाकिस्तान लिखूं. हिंदी-चीनी भाई-भाई, कह कर पीठ में छुरा घोपा अरुणाचल पर अतिक्रमण या कश्मीर में कब्रिस्तान लिखूं. (रंगकर्मी के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई) - सुलभ

Friday, August 14, 2009

लो क सं घ र्ष !: वंशी की मधुरिम तानें...

वंशी की मधुरिम तानें है कौन छेड़ता मन में ? कुछ स्नेह-सुधा बरसता है कौन व्यष्टि के मन में ? रे कौन चमक जाता है, निर्भय सूखे सावन में। सागर का खारा पानी , अमृत बन जाता घन में॥ किसमें ऐसी गति है जो, सबमें गतिमयता भरता। मानव-मानस दर्पण में, है कौन अल्च्छित रहता ॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"

लो क सं घ र्ष !: यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष बगुले मोती चुने, गिद्ध कौऐ बादाम चबाये रहे। राजहंस दाने को तरसे, गधे कलाकंद खाय रहे ॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
सत्य हरिश्चंद रिक्शा खीचें, लखनऊ और कलकत्ता में। हत्यारे, माफिया ,गिरहकट , चोर लुटेरे सत्ता में॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
अपराधी , नेता, डकैत,मिल बना रहे गठबंधन । धूर्त ,दलाल , स्वार्थी चमचे, करते वंदन अभिनन्दन॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
नेता बहुरूपिये दिखावें , चमत्कार नित खेल खेल में। अरबो का घोटाला कर, घुमैं जहाज मुफ्त रेल में॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
निरपराधी सडैं जेल में, अपराधी मंत्रालय में। पीडितो को गुंडे बलशाली, धमकावें न्यायलय में॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
परदादा का था कत्ल हुआ, लड़ रहा मुकदमा परपोता। हत्यारे स्वर्ग सिधार गए, अब बैठ के बुद्धू क्या रोता ॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
सदाचार पर भाषण देते, माथा टेक शिवालय में। नशा निवारण मंत्री जी की, रात कटे मदिरालय में ॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
शोषण , बेकारी ,मँहगाई , बस- ट्रेन डकैती घोटाले। हिंसक प्रदर्शन आगजनी , विस्फोट से जीवन के लाले॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
लाखो भूखे नंगे बच्चे, सोते है फुटपाथों पर । ठिठुर-ठिठुर सर्दी से मरना, लिखा है उनके माथो पर॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
बिजली के दर्शन हुए नही, लाखो गावों विद्यालय में । पर ए .सी चलती झमाझम , मंत्री जी के शौचालय में॥
यह लोकतंत्र है, यह प्रजातंत्र है ॥
-मोहम्मद जमील शास्त्री

Tuesday, August 4, 2009

एक मंदिर, जहां मुस्लिम भी करते हैं पूजा

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में भगवान शंकर का एक ऐसा मंदिर है जहां के भक्तजनों में मुस्लिम भी शामिल हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग यहां न सिर्फ प्रार्थना में भाग लेते हैं बल्कि हर त्योहार पर बढ़-चढ़कर दान भी देते हैं। रामपुर के बमभरुआ गांव में यह पातालेश्वर मंदिर स्थित है। इस गांव की आबादी 3,500 है लेकिन इनमें 95 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं। खास बात यह है कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान बने इस मंदिर के लिए गांव के ही एक मुस्लिम नागरिक रजा अली खान ने अपनी जमीन दान की थी। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलजुलकर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसी गांव के निवासी और किसान नेता हबीब अहमद (60) ने कहा, "हम अपने यहां इस मंदिर को लेकर गौरवान्वित और सम्मानित महसूस करते हैं जो सामाजिक सौहार्द और भाईचारा फैलाता है।" इस मंदिर में होने वाली ‘आरती’ और दूसरे रिवाजों में भी मुस्लिम समुदाय के लोग शिरकत करते हैं। यह लोग भी हिंदू भक्तजनों की तरह कतार में खड़े होकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस इलाके में एक मेडिकल स्टोर चलाने वाले गुड्डू खान का कहते हैं, "यह मंदिर असलियत में गंगा-जमुना तहजीब को रेखांकित करता है।" इस मंदिर में भगवान शंकर की चार फुट ऊंची मूर्ति और शिवलिंग है। यहां हर सुबह हिंदू और मुस्लिम मिलकर मंदिर की सफाई करते हैं। इसके बाद ही यहां पूजा आरम्भ होती है। यहां हर हिंदू पर्व पर मुस्लिम समुदाय के लोग भंडारे यानी गरीबों को भोजन कराने के लिए चंदा इकट्ठा करते हैं। गांव के निवासी रईस अहमद कहते हैं, "मुस्लिम भक्त भंडारे के लिए दान देते हैं। कुछ लोग नगदी देते हैं तो कुछ अनाज, फल और सब्जियां देते हैं।" रईस का कहना है कि मुस्लिम समुदाय द्वारा आयोजित भंडारे में सिर्फ गांव के लोग ही नहीं बल्कि आसपास के गांवों में रहने वाले सभी धर्मो के लोग शिरकत करते हैं। (इंडो-एशियन न्यूज सर्विस)

Thursday, July 23, 2009

हमको तो बाबाओं ने डरा दिया

कई दिनों से हमारे घर के एक कमरे में घुसते ही मैं डर जाता हूँ। ऐसे लगता है जैसे न्यूज़ चैनल्स के अन्दर बैठे विभिन्न प्रकार के पंडित,ज्ञानी,ध्यानी,ज्योतिषी बाहर निकल कर हमें बुरी नजर से बचाने के लिए नए नए अनुष्ठान शुरू करवा देंगे। एक दो आदर्शवादी चैनल को छोड़ कर, हर कोई इन बाबाओं के माध्यम से धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को डराने में लगा हुआ था। घर में जितने सदस्य उतनी राशियां। उनके अनुसार या तो किसी के लिए भी ग्रहण मंगलकारी नहीं और किसी की गणना के अनुसार सभी की पो बारह। अब जिसके लिए ग्रहण मंगलकारी नहीं उसका दिन तो हो गया ख़राब। वह तो उपाए के चक्कर में कई सौ रुपयों पर पानी फेर देगा। जिसके लिए ग्रहण चमत्कारी फायदा देने वाला है, वह कोई काम क्यूँ करने लगा। दोनों ही गए काम से। ना तो बाबाओं का कुछ कुछ बिगड़ा ना न्यूज़ चैनल के संचालकों का। हिन्दूस्तान में ग्रहण पहली बार लगा है क्या? सुना है हिन्दूस्तान तो पुरातन है। यहाँ तो सदियों से ग्रह -नक्षत्रों की खोज,उनके बारे में गहरी से गहरी बात जानने,समझने का काम चलता रहता है। घर के बड़े बुजुर्ग जानते हैं कि ग्रहण के समय क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उनको यह सीख न्यूज़ चैनल देख कर नहीं मिली। यह तो हमारे संस्कार हैं। पता नहीं ग्रहण के पीछे लग कर न्यूज़ चैनल वाले क्या संदेश देना चाहते हैं। इसमे कोई शक नहीं कि लोगों में उत्सुकता होती है हर बात को जानने की, उसको निकट से देखने की। किंतु इसका ये मतलब तो नहीं कि उसकी ज्ञान वृद्धि में सहायक होने वाली जिज्ञासा को डर में बदल दिया जाए,उसकी उत्सुकता को आशंका ग्रहण लगा दें। हम तो इतने ज्ञानी नहीं, मगर जो हैं वे तो जानते हैं कि मीडिया का काम लोगों का ज्ञान बढ़ाना,उनको सूचना देना,घटनाओं से अवगत करवाने के साथ साथ उनको जागरूक करना है। यहाँ तो आजकल कुछ और ही हो रहा है। ज्योतिषी,वास्तु एक्सपर्ट,बाबा अपनी दुकान इन न्यूज़ चैनल के माध्यम से चलाते है। जो इनके संपर्क में आते हैं उनका तो मालूम नहीं, हाँ ये जरुर फल फूल रहें हैं। ग्रहण ने सभी खबरों में ग्रहण लगा दिया। देश के कितने हिस्सों में लोग किस प्रकार जी रहें हैं?उनकी जिंदगी पर लगा महंगाई का ग्रहण ना तो उनको जीने दे रहा है ना मरने। कितने ही बड़े इलाके में पानी ना होने के कारण खेती संकट में पड़ी है। खेती नहीं हुई तो इन इलाकों की अर्थ व्यवस्था चौपट हो सकती है। उसके बाद वहां होगा अराजकता का राज। भूखे लोग क्या करेंगें? सरकार अपने अधिकारियों ,मंत्रियों,सांसदों,विधायकों का पेट और घर भरेगी या इनका? खैर फिलहाल तो आप और हम ग्रहण और उसका असर देखेंगें। आख़िर ऐसा ग्रहण हमको इस जिंदगी में दुबारा तो देखने को मिलने से रहा।

Friday, July 17, 2009

एक हिन्दुस्तानिकी ललकार, फिर एक बार !

कुछ अरसा पहले लिखी गई कवितायें, यहाँ पेश कर रही हूँ। एक ऑनलाइन चर्चामे भाग लेते हुए, जवाब के तौरपर ये लिख दी गयीं थीं। इनमे न कोई संपादन है न, न इन्हें पहले किसी कापी मे लिखा गया था...कापीमे लिखा, लेकिन पोस्ट कर देनेके बाद। एक श्रृंखला के तौरपे सादर हुई थीं, जिस क्रम मे उत्तर दिए थे, उसी क्रम मे यहाँ इन्हें पेश कर रही हूँ। मुझे ये समयकी माँग, दरकार लग रही है। १)किस नतीजेपे पोहोंचे? बुतपरस्तीसे हमें गिला, सजदेसे हमें शिकवा, ज़िंदगीके चार दिन मिले, वोभी तय करनेमे गुज़ारे ! आख़िर किस नतीजेपे पोहोंचे? ज़िंदगीके चार दिन मिले... फ़सादोंमे ना हिंदू मरे ना मुसलमाँ ही मरे, वो तो इंसान थे जो मरे! उन्हें तो मौतने बचाया वरना ज़िंदगी, ज़िंदगी है, क्या हश्र कर रही है हमारा,हम जो बच गए? ज़िंदगीके चार दिन मिले... देखती हमारीही आँखें, ख़ुद हमाराही तमाशा, बनती हैं खुदही तमाशाई हमारेही सामने ....! खुलती नही अपनी आँखें, हैं ये जबकि बंद होनेपे! ज़िंदगीके चार दिन मिले, सिर्फ़ चार दिन मिले..! २) खता किसने की? खता किसने की? इलज़ाम किसपे लगे? सज़ा किसको मिली? गडे मुर्दोंको गडाही छोडो, लोगों, थोडा तो आगे बढो ! छोडो, शिकवोंको पीछे छोडो, लोगों , आगे बढो, आगे बढो ! क्या मर गए सब इन्सां ? बच गए सिर्फ़ हिंदू या मुसलमाँ ? किसने हमें तकसीम किया? किसने हमें गुमराह किया? आओ, इसी वक़्त मिटाओ, दूरियाँ और ना बढाओ ! चलो हाथ मिलाओ, आगे बढो, लोगों , आगे बढो ! सब मिलके नयी दुनिया फिर एकबार बसाओ ! प्यारा-सा हिन्दोस्ताँ यारों दोबारा बनाओ ! सर मेरा हाज़िर हो , झेलने उट्ठे खंजरको, वतन पे आँच क्यों हो? बढो, लोगों आगे बढो! हमारी अर्थीभी जब उठे, कहनेवाले ये न कहें, ये हिंदू बिदा ले रहा, इधर देखो, इधर देखो ना कहें मुसलमाँ जा रहा, कोई इधर देखो, ज़रा इधर देखो, लोगों, आगे बढो, आगे बढो ! हरसूँ एकही आवाज़ हो एकही आवाज़मे कहो, एक इन्सां जा रहा, देखो, गीता पढो, या न पढो, कोई फ़र्क नही, फ़ातेहा भी , पढो, या ना पढो, लोगों, आगे बढो, वंदे मातरम की आवाज़को इसतरहा बुलंद करो के मुर्दाभी सुन सके, मय्यत मे सुकूँ पा सके! बेहराभी सुन सके, तुम इस तरहाँ गाओ आगे बढो, लोगों आगे बढो! कोई रहे ना रहे, पर ये गीत अमर रहे, भारत सलामत रहे भारती सलामत रहें, मेरी साँसें लेलो, पर दुआ करो, मेरी दुआ क़ुबूल हो, इसलिए दुआ करो ! तुम ऐसा कुछ करो, लोगों आगे बढो, आगे बढो!! ३)एक ललकार माँ की ! उठाये तो सही, मेरे घरकी तरफ़ अपनी बद नज़र कोई, इन हाथोंमे गर खनकते कंगन सजे, तो ये तलवारसेभी, तारीख़ गवाह है, हर वक़्त वाकिफ़ रहे ! इशारा समझो इसे या ऐलाने जंग सही, सजा काजलभी मेरी, इन आँखोमे , फिरभी, याद रहे, अंगारेभी ये जमके बरसातीं रहीं जब, जब ज़रूरत पड़ी आवाज़ खामोशीकी सुनायी, तुम्हें देती जो नही, तो फिर ललकार ही सुनो, पर कान खोलके इंसानियत के दुश्मनों हदमे रहो अपनी ! चूड़ियाँ टूटी कभी, पर मेरी कलाई नही, सीता सावित्री हुई, तो साथ चान्दबीबी, झाँसीकी रानीभी बनी, अबला मानते हो मुझे, आती है लबपे हँसी!! मुझसे बढ़के है सबला कोई? लाजसे गर झुकी, चंचल चितवन मेरी, मत समझो मुझे, नज़र आता नही ! मेरे आशियाँ मे रहे, और छेद करे है, कोई थालीमे मेरी , हरगिज़ बर्दाश्त नही!! खानेमे नमक के बदले मिला सकती हूँ विषभी! कहना है तो कह लो, तुम मुझे चंचल हिरनी, भूल ना जाना, हूँ बन सकती, दहाड़ने वाली शेरनीभी ! जिस आवाज़ने लोरी, गा गा के सुनायी, मैं हूँ वो माँ भी, संतानको सताओ तो सही, चीरके रख दूँगी, लहुलुहान सीने कई !! छुपके वार करते हो, तुमसे बढ़के डरपोक दुनियामे है दूसरा कोई?

Wednesday, July 15, 2009

लो क सं घ र्ष !: औसत का खेल

मुझे इस बात का जरा भी भान न था कि मैं अपने लिए एक मोटरसाइकल नहीं, एक नई मुसीबत मोल ले रहा हूं। खैर, जो होना था सो हो गया। यह हम जैसे आम आदमी का मूलमंत्र है। मोटरसाइकल मैंने अपनी सहुलियत के लिए ली थी। कही आने-जाने में आसानी होती। समय की बचत सो अलग। मोटरसाइकल पर बैठ कर मेरी गतिशीलता में वृद्धि होती। इन सब बातों को मद्देनजर रखते हुए, मैंने एक मोटसाइकल खरीदी। अभी उसे ले कर घर आता नहीं हूं कि मेरे पड़ोसी पूछ उठाते हैं,‘‘ कितने का एवरेज कंपनी वाले क्लेम कर रहे है।’’ पड़ोसी का मतलब गाड़ी के माइलेज से था। उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा,‘‘ कंपनी वाले जितना बताए उससे दस-बीस किलोमीटर कम मान कर चलना चाहिए, भाईसाहब।’’ पहले दिन से ही यह सवाल ‘ क्या एवरेज दे रही है!’ मेरे पीछे लग गया। मैं जहाँ जाता, यह सवाल मुझसे टकरा जाता। कभी सीधे-सीधे , तो कभी एक लंबी भूमिका के बाद। कभी यह मेरी गाड़ी के पीछे-पीछे आता, तो कभी मुझसे पहले ही पहुंच जाता। गाड़ी लेने के बाद शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब यह सवाल ‘ क्या एवरेज दे रही है ’ मुझ पर न दागा गया हो। मेरा जवाब सिर्फ इतना होता,‘‘पता नहीं’’। मेरा जवाब सुनकर लोग मुझ पर शक करते। जबकि मैं अपने जानिब उन्हें सही कहता । कुछ दिन बाद मेरी हालत यह हो गई, जैसे ही कोई ‘ क्या एवरेज दे रही है ’ पूछता, मुझे सांप सूंघ जाता। गाड़ी चलाने को मजा फुर्र हो जाता। नई-नई गाड़ी लाने के उत्साह के समंदर को, यह सवाल एक पल में खाली कर देता। आखिर,, मैंने ठान लिया कि गाड़ी का एवरेज पता करके छोडूंगा। फिर शुरू हुआ मेरा एवरेज पता लगाने का एक अंतहीन सिलसिला। जिसने मेरी मानसिक शांति को हर लिया। गाड़ी में कितना पेट्रोल है ! गाड़ी कितने किलोमीटर चली ! कल कितने का एवरेज दिया ! आज कितने का एवरेज है ! एक-एक बात का, मैं हिसाब रखने लगा। गाड़ी जब अधिक एवरेज देती, तो खुशी का ठिकाना न रहता। मगर अगले दिन का कम एवरेज मेरे कल की खुशी को ठिकाने लगा देता। एवरेज कम आने पर पेट्रोल की गुणवत्ता कभी मेरे निशाने पर होती, तो कभी शहर का टैªफिक। एवरेज कम आने के कारणों में भिन्नता हो सकती थी, मगर एवरेज अधिक आने का सारा श्रेय सिर्फ और सिर्फ मेरी गाड़ी चलाने की कुशलता को जाता। उन दिनों मेरी हालत देखकर आप मुझे एवरेज का मारा कह सकते थे। एवरेज यानी औसत। इस शब्द ने पहले कभी मेरा घ्यान नहीं खींचा था। मोटरसाइकिल लेने के बाद औसत को लेकर मैं बुरी तरह से उलझ गया। हालांकि मोटरसाइकिल से मेरा स्नेह बराबर बना रहा, मगर औसत ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उसके बारे में कुछ सोचूं। कुछ सवाल मेरे जहन में उठने लगे। मसलन, इसकी उत्पति कैसे हुई ! अविष्कारक कौन है ! औसत प्रचलन में कैसे आया ! औसत मुझे बड़ा ही चमत्कारी लगा, जब इसके विषय में मैं सोचने लगा। आखिर क्यों, नितिनियंता इस एक शब्द का काफी इस्तेमाल करते हैं। मैंने इसके उत्पति के बारे में कल्पना की; - बहुत समय पहले, किसी राज्य में एक राजा राज करता था। जो निरंकुश और विलासी था। प्रजा की भलाई छोड़, वो सुरा-सुंदरी में डूबा रहता। राज्य का सारा कार्यभार उसके कुछ चापलूस मंत्री चलाते । राजा की अकर्मण्यता और उदासीनता के चलते प्रजा की हालत दयनीय हो गई। जब स्थिति असहनीस हो गई, तब प्रजा ने विद्रोह कर दिया। उसने चारों तरफ से महल को घेर लिया। तब राजा ने घबराकर अपने मंत्रियों से अपातकालीन मंत्रणा की। राजा ने बदहवाशी में अपने मंत्रियों से कहा,‘‘ ऐसा कोई उपाय निकालो जिससे यह आसन्न संकट टल जाए। नहीं तो आज हम सब मारे जाएंगे। अगर प्रजा ने महल पर कब्जा करने की ठान ली, तो उसको हमारी सेना भी नहीं रोक पाएंगी।’’ तभी एक बूढा मंत्री मुस्कुराया। उसने कुछ सोच लिया था। वो राजा से बोला,‘‘ महाराज, आप चिंता न करें। मैंने एक ऐसा उपाय निकाला है कि प्रजा उल्टे पांव लौट जाएंगी।’’ राजा को सहसा विश्वास नहीं हुआ। परन्तु बूढे़ मंत्री के कहने पर, वो महल के बाहर आया। उसने देखा कि प्रजा नारे लगा रही, ‘ हम भूखे है हमंे रोटी दो !’ ‘हम नंगे है हमे कपडे़ दो !’ बूढ़ा मंत्री बोला, ‘‘भूखे हो तो रोटी खाओ। नंगे हो तो कपड़े मोल लो।’’ इस पर प्रजा चिल्लाई,‘‘ हम कहां से खरीदे ! हमारे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है।’’ तभी बूढ़े मंत्री ने एक कागज का टुकड़ा निकाला और बोला,‘‘झूठ बोलते हो तुम सब, यह देखो इस कागज पर स्पष्ट लिखा है कि राज्य के प्रत्येक व्यक्ति के पास दस सोने के मोहरे है।’’ प्रजा अचरज में पड़ गयी। भला ये कैसे हो सकता है ! बूढ़ा मंत्री न जाने क्या बक रहा है ! प्रजा अभी कुछ कहती कि बूढ़ा मंत्री बोला,‘‘ इघर देखो, अभी मैं तुम सब को कुछ दिखाता हूं।’’ तब उसने राजकोष में जमा कुल मोहरों में राज्य की समस्त प्रजा से भाग दे दिया। चमत्कार ! सबके हिस्से में दस-दस मोहरंे आ गई। हिस्सेदारों में मंत्रियों के साथ राजा भी शामिल था।‘‘ मगर वो मोहरें हमें नहीं दिखती ! वो मोहरें है कहां!’’ प्रजा ने बूढे़ मंत्री से कहा। ‘‘ तुम सब के दिखने न दिखने से क्या होता है ! कागज पर तो दिख रही है न! अब सारे यहां से भाग जाओ , नहीं तो हाथियों से कुचलवा दूंगा।’’ बूढ़ा मंत्री गरजा। कागज में तो सबके हिस्से दस-दस मोहरें दिख रही थी। यह देख, प्रजा भुनभुनाते हुए लौट गई। तब बूढे़ मंत्री ने राजा से कहा,‘‘ देखा, महाराज औसत का खेल !’’ इस प्रकार औसत ने प्रजा के अंसतोष को असंमजस में डाल दिया और राजा का सिंहासन सुरक्षित रखा। तभी से औसत प्रचलन में आ गया और आज भी औसत हमारे निति नियंताओं का प्रिय बनकर उनके गोद में बैठा हुआ हैं। अनूप मणि त्रिपाठी ई- 5003 , सेक्टर - 12 राजाजी पुरम,लखनऊ मो. न. 09956789394

Monday, July 13, 2009

पत्रकारिता का नया स्टाइल

देश-विदेश के किसी और स्थान का तो मालूम नहीं लेकिन श्रीगंगानगर में पत्रकारिता का नया स्टाइल शुरू हो चुका है। स्टाइल अच्छा है या बुरा,सही है या ग़लत,गरिमा युक्त है या नहीं,इस बारे में टिप्पणी करने के लिए यह नहीं लिखा जा रहा। जब कहीं किसी नगर या महानगर में कोई फैशन आरम्भ होता है तो उसकी जानकारी दुनिया में पहुँच जाती है, पहुंचाई जाती है। बस, इसी मकसद से यह पोस्ट है। अरे नहीं भाई, हम पत्रकारिता को फैशन के समकक्ष नहीं रख रहे। हम तो केवल बता रहें हैं कि हमारे नगर में क्या हो रहा है। हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारे शहर में एक दर्जन अखबार निकलते हैं,पूरी शानो-शौकत के साथ। इसके साथ अब स्कूल,कॉलेज,हॉस्पिटल जैसे कारोबार से जुड़े लोगों ने भी अपने अपने साप्ताहिक,पाक्षिक,मासिक अख़बार निकालने शुरू कर दिए हैं। इन अख़बारों में अपने संस्थान की उपलब्धियों का जिक्र इन मालिकों द्वारा किया जाता है। मतलब अपने कारोबार के प्रचार का आसन तरीका। स्कूल वाले अपने स्कूल के बच्चों की पब्लिसिटी करेंगें। हॉस्पिटल संचालक डॉक्टर द्वारा किए इलाज की। बीजवाला अपने खेत या प्लांट में तैयार किए गए बीज के बारे में बतायेंगें। जिन के पास अख़बार को संभालने वाले व्यक्ति होते हैं वे अपने स्तर पर इसको तैयार करवाते हैं। अन्य किसी पत्रकार की पार्ट टाइम सेवा ले लेता है। हालाँकि इन अख़बारों को अन्य अख़बारों की भांति बेचा नहीं जाता। ये सम्भव है कि स्कूल संचालक अख़बार की कीमत,टोकन मनी, फीस के साथ ले लेते हों। ये अखबार बिक्री के लिए होते ही नहीं। हाँ, स्कूल का अखबार जब बच्चे के साथ घर आएगा तो अभिभावक उसको देखेंगें ही। बच्चे की फोटो होगी तो उसको अन्य को भी दिखाएंगें,बतायेंगें। अब,जब अखबार है तो उसके लिए वही सब ओपचारिकता पूरी करनी होती हैं जो बाकी अख़बार वाले करते हैं। जब,सब ओपचारिकता पूरी करनी हैं तो फ़िर वह कारोबारी अपनी महंगी,सस्ती कार पर भी प्रेस लिखने का "अधिकारी" तो हो ही गया। बेशक इस प्रेस का दुरूपयोग ना होता हो, लेकिन प्रेस तो प्रेस है भाई। श्रीगंगानगर में यह स्टाइल उसी प्रकार बढ़ रहा है जैसे शिक्षा और चिकत्सा का कारोबार।

Sunday, July 12, 2009

विलाप के बीच सम्मान की खुशी

पड़ौस में गम हो तो खुशी छिपानी पड़ती है। स्कूल में कोई हादसा हो जाए तो बच्चों की मासूमियत पर ब्रेक लग जाता है। गाँव में शोक हो तो घरों में चूल्हे नहीं जलते। नगर में बड़ी आपदा आ जाए तो सन्नाटा दिखेगा। यह सब किसी के डर,दवाब या दिखावे के लिए नहीं होता। यह हमारे संस्कार और परम्परा है। समस्त संसार हमारा ही कुटुम्ब है, हम तो इस अवधारणा को मानने वाले हैं। इसलिए यहाँ सबके दुःख सुख सांझे हैं। परन्तु सत्ता हाथ में आते ही कुछ लोग इस अवधारणा को ठोकर मार देते हैं। अपने आप को इश्वर के समकक्ष मान कर व्यवहार करने लगते हैं।श्रीगंगानगर,हनुमानगढ़ में आजकल बिजली और पानी के लिए त्राहि त्राहि मची हुई है। खेतों में खड़ी फसल बिन पानी के जल रही है। नगरों में बिजली के बिना कारोबार चौपट होने को है। कोई भी ऐसा वर्ग नहीं जो आज त्राहि माम,त्राहि माम ना कर रहा हो। त्राहि माम के इस विलाप को नजर अंदाज कर हमारे सांसद भरत राम मेघवाल अपने स्वागत सत्कार,सम्मान करवाने में व्यस्त हैं। एक एक दिन में गाँव से लेकर नगर तक कई सम्मान समारोह में वे फूल मालाएं पहन कर गदगद होते हैं।सम्मान पाने का अधिकार उनका हो सकता है। किंतु ऐसे वक्त में जब चारों ओर जनता हा हा कार कर रही हो, तब क्या यह सब करना और करवाना उचित है?सांसद महोदय, प्रोपर्टी और शेयर बाज़ार ने तो पहले ही लोगों की हालत बाद से बदतर कर रखी है। अगर खेती नहीं हुई तो खेती प्रधान इस इलाके में लोगों के पास कुछ नहीं बचेगा।

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