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Sunday, November 30, 2008

दे जाना चाहता हूँ तुम्हे

ऊब और उदासी से भरी इस दुनिया में पांच हंसते हुए सालों के लिए देना तो चाहता था तुम्हे बहुत कुछ प्रकृति का सारा सौंदर्य शब्दों का सारा वैभव और भावों की सारी गहराई लेकिन कुछ भी नहीं बच्चा मेरे पास तुम्हे देने के लिए फूलों के पत्तों तक अब नहीं पहुंचती ओस और पहुँच भी जाए किसी तरह बिलकुल नहीं लगती मोतियों सी समंदर है तो अभी भी उतने ही अद्भुत और उद्दाम पर हर लहर लिख दी गयी है किसी और के नाम पह्दों के विशाल सीने पर अब कविता नहीं विज्ञापनों के जिंगल सजे हैं खेतों में अब नहीं उगते स्वप्न और न बंदूकें ... बस बिखरी हैं यहाँ-वहां नीली पद चुकीं लाशें सच मनो इस सपनीले बाज़ार में नहीं बचा कोई दृश्य इतना मनोहारी जिसे दे सकूँ तुम्हारी मासूम आँखों को नहीं बचा कोई भी स्पर्श इतना पवित्र जिसे दे सकूँ तुम्हे पहचान की तरह बस समझौतों और समर्पण के इस अँधेरे समय में जितना भी बचा है संघर्षों का उजाला समेटकर भर लेना चाहता हूँ अपनी कविता में और दे जाना चाहता हूँ तुम्हे उम्मीद की तरह जिसकी शक्ल मुझे बिलकुल तुम्हारी आँखों सी लगती है

अशोक कुमार पाण्डेय

http://asuvidha.blogspot.com

Saturday, November 29, 2008

चुनावी हवा बह रही है ...

राजनीत की रसोई में नित बनते नए पकवान चुनावी हवा बह रही है सुनो नेताओं के गुणगान सुनो नेताओं के गुणगान जो लगे हैं देश को बांटने गली गली में घूम रहे हैं सिर्फ़ वोटरों को आंकने कह सुलभ कविराय आज सुनलो सारे उम्मीदवार सीधे नरक में जाओगे जो चुनोगे जाती-धर्म की दीवार ॥ सुलभ पत्र - Hindi Kavita Blog

शहीद हूँ मैं .....

दोस्तों , मेरी ये नज़्म , उन सारे शहीदों को मेरी श्रद्दांजलि है , जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर , मुंबई को आतंक से मुक्त कराया. मैं उन सब को शत- शत बार नमन करता हूँ. उनकी कुर्बानी हमारे लिए है . शहीद हूँ मैं ..... मेरे देशवाशियों जब कभी आप खुलकर हंसोंगे , तो मेरे परिवार को याद कर लेना ... जो अब कभी नही हँसेंगे... जब आप शाम के अपने घर लौटें ,और अपने अपनों को इन्तजार करते हुए देखे, तो मेरे परिवार को याद कर लेना ... जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे.. जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं तो मेरे परिवार को याद कर लेना ... जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे. जब आप अपने बच्चो के साथ खेले , तो मेरे परिवार को याद कर लेना ... मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी जब आप सकून से सोयें तो मेरे परिवार को याद कर लेना ... वो अब भी जागते है ... मेरे देशवाशियों ; शहीद हूँ मैं , मुझे भी कभी याद कर लेना .. आपका परिवार आज जिंदा है ; क्योंकि , आज मैं नही हूँ....

यह कैसी बहस?

एक ब्लॉग पर टिप्पणियों के माध्यम से यह बहस चल रही है कि आतंकियों की गोलियों का शिकार बने एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे शहीद कहलाने का हक रखते हैं या नहीं? पूरी बहस महज बौद्धिकता के प्रदशॆन के लिए मौत के बाद किसी के चरित्रहनन जैसा ही है? शहीद नरकगामी नहीं होते..पर टिप्पणियों को देखकर लगता है, जैसे खुद को प्रबुद्ध साबित करने के लिए कुछ लोग, मर चुके कुछ लोगों की चीर-फाड़ में लगे हों। करकरे क्या किसी भी आदमी के अतीत के सभी पन्ने सुनहरे ही नहीं होते। कुछ पन्नों पर काली स्याही से लिखी कुछ इबारतें भी होती हैं। टिप्पणियां करनेवाले भी अपने अंदर टटोलकर देखें तो एेसा ही पाएंगे। घर बैठकर जुगाली करना बहुत आसान होता है। आतंकी हमले के बीच सिफॆ छुपने की बात सोचने वाले लोग ही किसी की मौत पर अफसोस प्रकट करने की बजाय तंज कर सकते हैं। वरना इतना तो सच है ही कि हेमंत करकरे हमले के बाद तुरंत अपने दायित्वों का निवॆहन करने निकल पड़े थे। ड्राइंगरूम में अलसाए हुए टीवी नहीं देख रहे थे। साध्वी की गिरफ्तारी जायज है या नाजायज यह अदालत के सिवा कोई और कैसे तय कर सकता है? यह गलत भी हो तो केवल साध्वी को गिरफ्तार भर कर लेने से उनका शहीद कहलाने का हक नहीं छिन जाता। वैसे तो आत्मप्रचार के लिए जानबूझकर किसी की मौत पर मजमा लगाना ही जायज नहीं माना जा सकता। कोई शहीद कहा जाएगा या नहीं यह तो बाद की बात है। अपनी संस्कृति और परंपरा तो यही कहती है कि हम किसी की मौत के बाद उसके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचते और कहते हैं। कम से कम इस परंपरा का ख्याल तो रखा ही जाना चाहिए। वैसे भी इस पूरी बहस से नुकसान भले ही हो, किसी का भला होते तो नहीं दिखता।

आतंकंवेशन

क्या कारण है , आतंकवाद का ? अज्ञानता ,धर्मान्धता या फिर अन्याय !! क्या कारण है उनके निर्भीक होने का ? क्योंकि जान देके ही हो सकती है, उनकी आय !! उनके लिए जीना मरने से दुस्कर क्यों है ? क्योंकि उन्हें लगता है , कि उन्हें नहीं मिल सकता है न्याय !! आतंकवाद के पीछे बर्बाद राष्ट्र हैं , और उनके शासक राजनीती खेल रहें हैं !! इन राष्ट्रों के नागरिक पैदा होने पर रो रहें है , और एक रोटी के लिए खून कि होली खेल रहें हैं !! बिहार बंगाल का आतंक नक्श्ली है , बाहर का आतंक ही असली है , यह मानदंड दोहरा है , हमारी आंखों पर मोतियाबिंद धरा है !! घर के हालत शासनकर्ताओं मत बिगड़ने , जो अमेरिका ने जग में किया महारास्ट्र को भारत में न करने दो!! आतंकवाद के अंत कि अब एक ही गुंजाईश है , हर कोई खुश रहे जहाँ में , सबके पास कुछ खोने को हो; अल्लाह -ताला से यही गुजारिश है !! सोचता हूँ ,ऊपरवाला मुझे सुन रहा होगा , कदम सही बढ़ाना होगा तभी सब ठीक होगा !! ~विनयतोष मिश्रा

Friday, November 28, 2008

काले कपोत

किसी शांतिदूत की सुरक्षित हथेलियों में उन्मुक्त आकाश की अनंत ऊँचाइयों की निस्सीम उडान को आतुर शरारती बच्चों से चहचहाते धवल कपोत नही हैं ये न किसी दमयंती का संदेशा लिए नल की तलाश में भटकते धूसर प्रेमपाखी किसी उदास भग्नावशेष के अन्तःपुर की शमशानी शान्ति में जीवन बिखेरते पखेरू भी नही न किसी बुजुर्ग गिर्हथिन के स्नेहिल दाने चुगते चुरगुन मंदिरों के शिखरों से मस्जिदों के कंगूरों तक उड़ते निशंक शायरों की आंखों के तारे बेमज़हब परिंदे भी नही ये भयाकुल शहर के घायल चिकित्सागृह की मृत्युशैया सी दग्ध हरीतिमा पर निःशक्त परों के सहारे पड़े निःशब्द विदीर्ण ह्रदय के डूबते स्पंदनों में अँधेरी आंखों से ताकते आसमान गाते कोई खामोश शोकगीत बारूद की भभकती गंध में लिपटे ये काले कपोत ! कहाँ -कहाँ से पहुंचे थे यहाँ बचते बचाते बल्लीमारन की छतों से बामियान के बुद्ध का सहारा छिन जाने के बाद गोधरा की उस अभागी आग से निकलबडौदा की बेस्ट बेकरी की छतों से हो बेघर एहसान जाफरी के आँगन से झुलसे हुए पंखों से उस हस्पताल के प्रांगन में ढूँढते एक सुरक्षित सहारा शिकारी आएगा - जाल बिछायेगा - नहीं फंसेंगे का अरण्यरोदन करते तलाश रहें हो ज्यों प्रलय में नीरू की डोंगी पर किसी डोंगी में नहीं बची जगह उनके लिए या शायद डोंगी ही नहीं बची कोई उड़ते - चुगते- चहचहाते - जीवन बिखेरते उजाले प्रतीकों का समय नहीं है यह हर तरफ बस निःशब्द- निष्पंद- निराश काले कपोत ! ( यह कविता अहेमदाबाद के हास्पीटल में हुए विश्फोटों के बाद लिखी थी ... फिर एक हादसा... कवि और कर भी क्या सकता है.... या कर सकता है ? )

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कितनी अजीब बात है

कितनी अजीब बात है , बॉम्बे में धमाके न हुए जैसे सब को अपने अपने ब्लॉग पर लिखने का सामान मिल गया और इस में हम भी शामिल है ,इस बात से इनकार नही कोई आक्रोश करता है ,कोई हमदर्दी ,कोई शहीदों पर ताने कसता है ,कोई सरकार को गाली देता है क्या है ये सब ? सब को हक़ है अपने ब्लॉग पर अपने विचार रखने का मगर खुदा के लिए किसी शहीद का मजाक न बनाये हो सके उसके घर जाके सांत्वना दे कुछ निधि जमा करिएँ जिससे के उनके घरवालों को मदत मिले ली होगी किसी शहीद ने रिश्वत अ नही भी ,वो लाख बुरा इंसान सही ,मगर वो आज खून से धुला है अपनी जान दी है उसने देश के लिए हम सब के लिए हम में तो हिम्मत नही है न की गोली चलाये या गोली का सामना करे फिर जो ये कर सके उसका आदर तो हो

भारत और आतंकवाद

कभी घुसपैठ तो कभी जेहाद और आतंकवाद लगे हैं सबके सब करने भारत को बरबाद भारत को बरबाद रोज हो रहा ख़ूनी खेल ढुलमुल विदेश नीति की देखो रेलमपेल कह सुलभ कविराय क्षमादान अब त्यागो समय रहते आतंकवाद को जड़ से मिटादो

आज मेरा देश जल रहा है , कोई तो मेरे देश को बचा ले....

आज सुबह देखा तो मुबई की घटनाओ ने दिल दहला दिया . मुझे ये बात समझ नही आती है कि कोई भी आतंकवादी , हमारे जैसा सामर्थ्यवान देश में कैसे बार - बार चले आतें है , शायद दुनिया में भारत ही अकेला ऐसा देश है जो इतना सामर्थ्यवान होने के बावजूद इन हमलों को रोक नही पाता है. अच्छा ,एक बात और ..; अगर बाहर के आतंकवादी हमलों से हमारा पेट नही भरता , जो आपस में ही धर्म, भाषा, जाती , इत्यादि के नाम पर लड़ लेते है . और इन सारी बातों में सिर्फ़ बेक़सूर लोग मरते है ... मेरा देश अब पूरी तरह से banana country बन गया है ... किसी को क्या दोष दे... ...आईये दोस्तों मेरे साथ प्रार्थना करें... आज मेरा देश जल रहा है , कोई तो मेरे देश को बचा ले. कौन है ये ? कोई हिंदू ,कोई मुस्लिम, कोई सिख या कोई ईसाई ; क्या इनका कोई चेहरा भी है ? क्या ये इंसान है .... क्यों ये मेरे देश की हत्या करतें है , क्यों ये मेरी माँ का सीना छलनी करतें है .. हे प्रभु ; कोई कृष्ण ,कोई बुद्ध ,कोई नानक , कोई ईसा ; पैगम्बर बन कर मेरे देश आ जाए .. मेरे देश को जलने से बचाए . मेरे देश को मरने से बचाए.. आओं दोस्तों , मिल कर हम सब, इंसानियत का धर्म आपस में फैलाएं मिल कर हम सब मेरे देश को बचाएँ ... मेरे देश को बचाएँ

"दोषी कौन"

"दोषी कौन" मैं ताज ..... भारत की गरिमा शानो शौकत की मिसाल शिल्प की अद्भुत कला आकाश की ऊँचाइयों को चूमती मेरी इमारतें , शान्ति का प्रतीक ... आज आंसुओं से सराबोर हूँ मेरा सीना छलनी जिस्म यहाँ वहां बिखरा पढा आग की लपटों मे तडपता हुआ, आवाक मूक दर्शक बन अपनी तबाही देख रहा हूँ व्यथित हूँ व्याकुल हूँ आक्रोशित हूँ मुझे कितने मासूम निर्दोष लोगों की कब्रगाह बना दिया गया... मेरी आग में जुल्स्ती तडपती, रूहें उनका करुण रुदन , क्या किसी को सुनाई नही पढ़ता.. क्या दोष था मेरा .... क्या दोष था इन जीवित आत्माओं का ... अगर नही, तो फ़िर दोषी कौन.... दोषी कौन, दोषी कौन, दोषी कौन?????

Thursday, November 27, 2008

इश्क की लत

कहते है आदते बदली जा सकती है जो कोई जिद्द पे उतर आए ये नामुमकिन है एक बार गर किसी को इश्क की लत लग जाऐ

सबसे बुरे दिन

सबसे बुरे दिन नहीं थे वे जब घर के नाम पर चौकी थी एक छह बाई चार की बमुश्किलन समा पाते थे जिसमे दो जिस्म लेकिन मन चातक सा उड़ता रहता था अबाध! बुरे नहीं वे दिन भी जब ज़रूरतों ने कर दिया था इतना मजबूर कि लटपटा जाती थी जबान बार बार और वे भी नहीं जब दोस्तों की चाय में दूध की जगह मिलानी होती थी मजबूरियां कतई बुरे नहीं थे वे दिन जब नहीं थी दरवाजे पर कोई नेमप्लेट और नेमप्लेटों वाले तमाम दरवाजे बन्द थे हमारे लिये इतने बुरे तो खैर नहीं हैं ये भी दिन तमाम समझौतों और मजबूरियों के बावजूद आ ही जाती है सात-आठ घण्टों की गहरी नींद और नींद में वही अजीब अजीब सपने सुबह अखबार पढ़कर अब भी खीजता है मन और फाइलों पर टिप्पणियाँ लिखकर ऊबी कलम अब भी हुलस कर लिखती है कविता। बुरे होंगे वे दिन अगर रहना पड़ा सुविधाओं के जंगल में निपट अकेला दोस्तों की शक्लें हो गई बिल्कुल ग्राहकों सीं नेमप्लेट के आतंक में दुबक गया मेरा नाम नींद सपनों की जगह गोलियों की हो गई गुलाम और कविता लिखी गई फाईलों की टिप्पणियांे सी। बहुत बुरे होंगे वे दिन जब रात की होगी बिल्कुल देह जैसी और उम्मीद की चेकबुक जैसी वि’वास होगा किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विज्ञापन खुशी घर का कोई नया सामान और समझौते मजबूरी नहीं बन जायेंगे आदत। लेकिन सबसे बुरे होंगे वे दिन जब आने लगेगें इन दिनों के सपने!

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Wednesday, November 26, 2008

परायों के घर

कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई; सपनो की आंखो से देखा तो, तुम थी, मुझसे मेरी नज्में मांग रही थी, उन नज्मों को, जिन्हें संभाल रखा था, मैंने तुम्हारे लिए, एक उम्र भर के लिए ... आज कही खो गई थी, वक्त के धूल भरे रास्तों में ...... शायद उन्ही रास्तों में .. जिन पर चल कर तुम यहाँ आई हो.... क्या किसी ने तुम्हे बताया नहीं कि, परायों के घर भीगी आंखों से नहीं जाते..... विजय कुमार M : 09849746500 E : vksappatti@rediffmail.com B : www.poemsofvijay.blogspot.com

Tuesday, November 25, 2008

घोटाला हो रहा है

घोटाला हो रहा है !
बैंकों में रहने वाला पैसा तकिये के अन्दर काला हो रहा है . 
रातों में भी चलने वाले कारखानो पर ताला हो रहा है .
अब नथ्थू हलवाई विदेशी शर्मा जी का साला हो रहा है 
पता नहीं पहले हुआ था या अब कुछ घोटाला हो रहा है ! 
बेरोजगार बिना रोजगार के जबरन उद्योगपति हो गए 
जो सच्चे कर्मों से उद्योगपति हुए थे वह रोडपति हो गए  
भाग्य को धन से बड़ा मान अमीर गरीबों के दम्पति हो गए 
शेयर के चक्कर में सपनों में जीने वाले दुर्गति को गए  
एक बार फिर से कापित्लिस्म का मुंह कला हो रहा है 
पता नहीं पहले हुआ था या अब कुछ घोटाला हो रहा है!
 
आज कर्ज में डूबा है हर बुढ्ढा हर बच्चा 
बड़े कारोबारी भी खा गए हैं गच्चा  
फिर से सुनने मैं आया स!दा जीवन सच्चा 
उद्योगपति बेरोजगार को लगने लगा उचक्का  
सपनों में भी सपनों पर ताला हो रहा है  
पता नहीं पहले हुआ था या अब कुछ घोटाला हो रहा है ! 
~विनयतोष मिश्रा

Monday, November 24, 2008

इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं

मालेगांव धमाके की जांच कर रही एटीएस बड़ी जल्दबाजी में है। रोज-रोज नए-नए खुलासे कर रही है। ऐसा जताया जा रहा है जैसे एटीएस बड़ी समझदारी के साथ गुत्थी सुलझाती जा रही है। हर खुलासे को मीडिया मैं जोर-शोर से उछाला जा रहा है। एटीएस और मीडिया की भी भाषा इन खुलासों को लेकर ऐसी ही होती है, जैसे ki बिना मुकदमा चलाए, बिना अदालत ka फैसला आए- निर्णय सुना दिया गया हो। एटीएस ने जिसकa नाम भर ले लिया वह अपराधी। समझ में नहीं आता ki एटीएस खुलासा करने ke मामले में इतनी जल्दबाजी क्यों बरत रही है? हो सकता है, एटीएस जो खुलासे कर रही है-सच हों। उसke पास सुबूत हों, तथ्य हों। पर इन तथ्यों और सुबूतों को अदालत में परखा जाना तो अभी बाकी है। अदालत में यह तय होना अभी बाकी है ki क्या वास्तव में ये सारे लोग आतंकी हरकतों यानी धमाको में लिप्त हैं, जिनका नाम एटीएस ले रही है। lekin इससे पहले ही पूरी दुनिया में यह संदेश जा chuka है ki भारत में हिंदुओं ने भी आतंकवादी संगठन बना लिया है। इस आतंकी संगठन से जुड़े लोग धमाके कर रहे हैं। ऐसा है या नहीं, इसके पक्ष-विपक्ष में तमाम तर्क दिए जा रहे हैं। इन बातों को छोड़ दें तो जब तक अदालत ka फैसला आएगा पूरी दुनिया में यह बात स्थापित हो चुकी होगी िक भारत के हिंदू जवाबी आतंकी कार्रवाई कर रहे हैं। मान लिया जाए िक अदालत एटीएस द्वारा बताए जा रहे सभी आरोपियों को निर्दोष मान ले, तब क्या यह स्थापना खत्म की जा सकेगी? क्या तब हिंदू आतंकवादी शब्द, जिसे मीडिया में जोर-शोर से उछाला जा रहा है, खत्म हो जाएगा? या यह धब्बा तब भी बना रहेगा। इसके उलट यह मान लें िक अदालत में साबित हो जाता है िक एटीएस ·के द्वारा बताए गए और गिरफ्तार सभी लोग धमाकों में शामिल रहे हैं। तब भी कुछ सवाल हैं-क्या गिरफ्तार kiye गए पुरोहित, साध्वी, दयानंद जैसे चंद लोग पूरे हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर हिंदू आतंकवादी क्यों, सिर्फ अपराधी या आतंकवादी क्यों नहीं? हां, यही आपत्ति मुस्लिम आतंकवादी कहने पर भी लागू होना चाहिए। और ऐसी आपत्तियां पूरे विश्व में जोर-शोर से उठती भी रहती हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है ki जब कश्मीर के मुस्लिम युवक kiसी आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं तो समझदार माने/कहे जाने वाले लोग उसे भटके हुए चंद युवकों की कार्रवाई बताते हैं। आश्चर्य होता है ki वही समझदार लोग हिंदू आतंकवादी शब्द पर आपत्ति नहीं करते। एटीएस की थ्योरी सही भी हो तो यहां तो सचमुच चंद भटके हुए लोग हैं। एक जमाना था जब भारत में होने वाली हर आतंकी कार्रवाई के लिए पड़ोसी देश को जिम्मेदार ठहराया जाता था। बात-बात पर उसे आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश कहा जाता था। हिंदू आतंकवादी शब्द को आज जिस जोर-शोर से प्रचारित kiya जा रहा है, कल को कोई भी पड़ोसी देश अपने यहां होने वाली आतंकी गतिविधियों के लिए हमें जिम्मेदार ठहराने लगे, तो क्या होगा? हमें सोचना ही होगा ki हमारी अभी ki जल्दबाजी के ऐसे भी परिणाम हो सकते हैं। खासकर मीडिया, अदालत के फैसले के पहले ही फतवा जारी करने की अपनी आदत से बाज आए। िकसी भी जांच एजेंसी की बातों को नतीजे जैसा प्रचारित करने की मीडिया की आदत पर रोक तो लगनी ही चाहिए। अन्यथा होता यह है ki आरोप को ही, जांच एजेंसी की बातों के आधार पर खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख-चीखकर सत्य और तथ्य ka रूप दे देता है। दुखद तो यह भी है ki मीडिया में आरोपों की बात जितनी जोर-शोर से आती है, अदालत में आरोप खारिज होने पर मीडिया की आवाज उतनी ही धीमी होती है। इतनी धीमी ki अधिसंख्य लोग तो उसे सुन भी नहीं पाते।

सुरक्षा अस्त्र

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