रंगकर्मी परिवार मे आपका स्वागत है। सदस्यता और राय के लिये हमें मेल करें- humrangkarmi@gmail.com

Website templates

Saturday, December 19, 2009

देश के साथ विश्वासघात

केंद्र सरकार के पूर्व रेल मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव ने 2004 से 2008 तक भारतीय रेल को हजारों करोड़ रुपये के मुनाफे में दिखाया थातब प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने बड़े जोर-शोर से लालू प्रसाद के अर्थ शास्त्र के प्रशंसा के गीत गए थे । रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के समय प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह थे और आज भी प्रधानमंत्री वह हैं और रेल मंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने संसद में श्वेत पत्र पेश कर पूर्व कार्यकाल प्रधानमंत्री के समय के घोटाले को संसद के अन्दर बेनकाब कर रही हैंयह भी हो सकता है कि भविष्य में आने वाला रेल मंत्री सुश्री ममता बनर्जी की पोल खोलने के लिए श्वेत पत्र लायेकबिनेट के फैसले सामूहिक होते हैंयदि यह सब बाजीगरी हुई है तो प्रधानमंत्री के ऊपर कोई भी जिम्मेदारी नियत है की नहींकांग्रेस पार्टी कि सरकार के प्रधानमंत्री रहे पी वी नरसिम्हाराव, बाबरी मस्जिद का ध्वंस होता रहा और वह मूकदर्शक बने रहेवही स्तिथि वर्तमान प्रधानमंत्री की है कि घोटाले दर घोटाले होते रहे उनको मौन ही रहना हैऐसे बेबस प्रधानमंत्रियों से क्या देश प्रगति कर सकता हैइस तरह से देश के साथ विश्वासघात हो रहा हैश्री लालू प्रसाद यादव कुछ को कुछ संसद जीता लाये होते तो क्या ममता बनर्जी रेलवे का श्वेत पत्र जारी करती क्योंकि वह भी कबिनेट मंत्री होतेइन वर्तमान राज़नीतज्ञों का दोहरा चरित्र है जब तक कुर्सी नहीं मिलती है तब तक इनसे बड़ा देश प्रेमी कोई नहीं हैकुर्सी आयी की बजट तक में हेरा-फेरी करने लगते हैं
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Friday, December 18, 2009

लो क सं घ र्ष !: हमारे देशभक्त

भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ट अधिकारी श्री मनोज अग्रवाल दिल्ली विकास प्राधिकरण में उच्च पद पर पदासीन हैं मनोज अग्रवाल के यहाँ सी.बी.आई ने छापा डाला तो 2.75 लाख रुपये उन्होंने ने अपनी छत से नीचे फेंक दिए । विभिन्न जगहों कि छापामारी के पश्चात लगभग 1 अरब रुपये से ज्यादा की परसम्पत्तियाँ प्रकाश में आई हैं और पांच बैंक लाकरों का खुलना अभी बाकी है । उत्तर प्रदेश आई.ए.एस एसोसिएसन ने अपने वहां पांच महाभ्रष्टों को चिन्हित करने का कार्य किया था तब यह मामला प्रकाश में आया की वरिष्ट नौकरशाहों को सेवा अवधि में जितना वेतन भत्ता व सुविधाएं मिलती हैं उससे हजारों गुना ज्यादा उनकी परिसंपत्तियां है और एक-आध प्रशासनिक अफसर को छोड़ कर सभी अपनी देश भक्ति में लगे हुए हैं । यह तथ्य आने के बाद आई.ए.एस एसोसिएसन ने महाभ्रष्टों के चयन का कार्य बंद कर दिया । केंद्र सरकार को चलाने के लिए विभिन्न प्रकार के नौकरशाह नियुक्त होते हैं । जिनके दिशा निर्देशों व सोच पर केंद्र सरकार संचालित होती है। वास्तविक देश की प्रगति इन्ही के हाथों तय होती है । हमारे ये नौकरशाह देश को राष्ट्रभक्त, देशभक्ति, नैतिकता, कानून, न्याय, लोकतंत्र का पाठ विभिन्न समारोहों में मुख्य अतिथि या अतिथि बनकर पढ़ाते रहते हैं और उनके अनुकरणीय आचरण को देख कर जनता भी इन्ही चीजों का अनुसरण करती रहती है। अब सवाल यह उठता है कि देशद्रोही, गद्दारी बेचारा क्या करे ? ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने दुनिया की जनता को गुलाम बनाने के लिए गुलाम देशों में प्रशासनिक सेवाओं का तंत्र निर्मित किया था और आज भी नौकरशाहों का न चरित्र ही बदला है न ही साम्राज्यवादी सोच इस कारण इन लोगों से भारतीय जन गण का भला नहीं होने वाला है । सुमन loksangharsha.blogspot.com

Tuesday, December 15, 2009

लो क सं घ र्ष !: गंगा ही नहीं हमारा जीवन ही प्रदूषित कर दिया गया है

मानव सभ्यता नदियों के किनारे जन्मी है, पली है और बढ़ी है पानी के बगैर हम रह नहीं सकते हैंविश्व में बड़े-बड़े शहर और आबादी समुद्र के किनारे है या नदियों के किनारे पर स्तिथ है । कभी भी जल के श्रोत्रों को कोई गन्दा नहीं करता था लेकिन जब पूँजीवाद ने अपने विचारों के तहत मुनाफा को जीवन दर्शन बना दिया है, तब से हर चीज बिकाऊ हो गयी है जल श्रोत्रों को भी गन्दा करने का काम उद्योगपतियों, इजारेदार पूंजीपतियों ने मुनाफे में अत्यधिक वृद्धि के लिए गन्दा कर दिया हैहमारा जनपद बाराबंकी जमुरिया नदी के किनारे पर था और अब जमुरिया नाले के किनारे हैजनपद मुख्यालय के पास एक शुगर मिल स्थापित होती है जिसका सारा गन्दा पानी जमुरिया में गिरना शुरू होता है और फिर तीन और कारखाने लगते हैं जिनका सारा कूड़ा-कचरा जमुरिया में गिरकर नाले में तब्दील कर दिया हैनगर नियोजकों ने जो पूंजीवादी मानसिकता से ग्रसित हैंउन लोगो ने शहर के सम्पूर्ण गंदे पानी को जमुरिया नदी में डाल कर उसको मरणासन्न कर डाला हैनहरों, बड़ी सड़कों, रेलवे लाइनों ने जमुरिया नदी में आने वाले पानी को भी रोककर उसके प्रवाह को समाप्त कर दिया हैब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अँधाधुंध तरीके से जंगलो की कटाई कर जमुरिया नदी को उथली कर दिया थावन विभाग ने कागज पर इतने पेड़ लगा दिए हैं की जनपद में कोई भी जगह पेड़ लगने से अछूती नहीं रह गयी हैजमुरिया में मछली से लेकर विभिन्न जीव जंतुओं का विनाश भी मुनाफे के चक्कर में हुआ हैजहर डाल कर पानी को विषाक्त कर मछलियां मारी गयी जिससे पानी कि सफाई का कार्य भी स्वत: बंद हो गयागंगा गौमुख से निकल कर बंगाल कि खाड़ी तक जाती है जिसमें हजारों नदियाँ , उपनदियाँ मिलती हैंजमुरिया नदी के साथ जो कार्य हुआ वही गंगा के साथ हुआ हैजमुरिया नदी भी से गंगा बनती हैजब हमारी मां या बाप या प्राणरक्षक गंगा हो या जमुरिया उसको पहले साम्राज्यवाद ने बर्बाद किया और अब हमारे उद्योगपति, पूंजीपति और नगर नियोजक हमारी नदियों को समाप्त करने पर तुले हैंयह लोग यह चाहते हैं की पानी के ऊपर उनका सम्पूर्ण अधिपत्य हो जाए और कम से कम 20 रुपये लीटर पानी हम बेचेंआज जरूरत इस बात की है कि इन पूंजीवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों उनके द्वारा उत्पन्न नगर नियोजकों के खिलाफ जन आन्दोलन नहीं चलाया जाता है तो हमारी गंगा बचेगी हमारी जमुरियासुमन loksangharsha.blogspot.com

लो क सं घ र्ष !: ‘‘आस्तीन के सांप और दूध पिलाने वाले’’

अब हैं हमारे जनप्रतिनिधि महान जो करते हैं राजनीति जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की। पर लागू नहीं होता कोई कानून, न लगता है NSA, न लगता है मकोका। आखिर जनता और रियाया है इन्ही के खिलवाड़ की चीज। क्यूं नही लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर? न्हीं लगवायेंगे! क्योंकि हमाम में सब हैं नंगे। क्या राष्ट्रीय! क्या क्षेत्रीय! इन्होंने ही तो पाला था भस्मासुर पंजाब का, जिसने मरवाये, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं अनेक, जिनकी तादात हजारों में नहीं लाखों में थी। यही हाल कश्मीर, आसाम, मणिपुर का अभी भी है। मरे जा रहे हैं रोज अनेक, कभी गोलियों से, कभी बारूद के धमाकों से, उड़ते हैं चीथड़े, खून के लोथड़े, इंसानी अंगों के और इंसानियत के भी। मरते हैं रोज वर्दी वाले या बिना वर्दी के, हैं तो सब ही भारत मां के सपूत। फिर ऐसा क्यूं होता है? वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा। आखिर क्यूं चलवाते हैं, प्रदर्शनकारी भीड़ पर गोली? आखिर क्यों करवाते हैं, फर्जी एन्काउन्टरों में सतत् हत्यायें? आखिर क्यूं छीनते हैं, जीवित रहने का नैसर्गिक संवैधानिक अधिकार? कानून व्यवस्था के बहाने, फर्जी क्राइम रिकार्ड के नाम सिर्फ और सिर्फ फर्जी आंकड़ेबाजी के लिए, जनता को ही बेवकूफ बना झूठी वाहवाही के लिए। जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाने के लिए, छोड़ते रहते हैं शिगूफों पर शिगूफे, ताकि आये ही न ध्यान, रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और महंगाई का। हमारे ही प्रतिनिधि, मुखिया सरकार के, चलवाते हैं बाकायदा अभियान, भरते हैं जेलें गरीब गुरबा जनता से, फर्जी मुकदमें तो है बपौती, पुलिस और प्रशासन की। क्या इस अमानवीयता के बिना कानून व्यवस्था रह जाएगी अधूरी। खड़ा है इस भ्रष्टाचार की नींव पर, घूस के रूपयों का बहुत बड़ा साम्राज्य। दबी जा रही है अदालतें ढाई करोड़ मुकदमों के बोझ से, बेगुनाह साबित होने में लग जाते हैं चार-छः साल। फिर भी छीना ही जाता रहता है जनता का, सामान्य जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार होती रहेंगी सतत् हत्यायें मानवता की फर्जी एन्काउन्टरों में। क्यूं बढ़ावा देते रहते हैं झूठी बहादुरी को? तमगे और आउट आॅफ टर्न प्रमोशन देकर। आखिर क्यूं करवाते रहते हैं सतत्, संविधान की हत्या? जबकि संविधान से ही पाते हैं, ताकत और शासन का अधिकार। फिर क्यूं रख देते हैं संविधान को, सजाकर सिर्फ अलमारी में? जहन से निकाल ही क्यूं देते हैं, संविधान और जनता को? फिर भी देते फिरते हैं संविधान की दुहाई। जनता को सिर्फ बेवकूफ बनाने की खातिर। जबकि खुद ही नहीं करते संविधान का पालन, करते हैं राजनीति - जाति, धर्म, क्षेत्रवाद और हत्या की। आखिर ऐसा क्यूं है? वर्दी वाला मरा तो इंसान मरा, बिना वर्दी के मरा तो कुत्ता मरा। बागी भी तो हैं इंसान और भारत मां के ही सपूत। पर उनके मन में है एक आग, उस आग को ही क्यूं ठंडा नहीं करते? पानी क्यूं नहीं डालते उस पर? इंसान क्यूं मारते हैं? क्यूं बनाते हैं, नीति दमनकारी? आखिर जानबूझकर क्यूं करते हैं नीतिगत गलती? वह आग पैदा तो आप ही करते हैं, आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार की विष बेल पर। आखिर क्यूं पिला रहे हैं दूध आस्तीन के सांपों को? क्या राज्य की कुर्सी राष्ट्र से ज्यादा जरूरी है? एक राज्य में कुर्सी न मिले तो क्या कम रह जाता रूतबा राष्ट्र में? इंदिरा का बलिदान क्या कम है समझने के लिए? क्यूं नहीं करते स्वच्छ पारदर्शी राजनीति? क्या तब पेट न भरेगा या रोटी पड़ जाएगी कम? जिन्ना ने मरवाया था बीस लाख, ठाकरे और राज मरवायेंगे करोड़ों। जिन्ना ने करवाया था देश के दो टुकड़े, प्रान्त में छिपे जिन्ना करवायेंगे अनेक। फिर क्यूं नहीं लगवाते रोक, जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की राजनीति पर? नजर बन्द करें इन भस्मासुरों को या डालें काल कोठरियों में। इन्हें पूरी तरह काट दें समाज और देश दुनिया से। संेसर काटें इनकी जहरीली वाणी का, नहीं घुलेगा जहर समाज में नहीं लगेगी आग। अभियान7 चलाना है तो चलाएं इनके ही खिलाफ, और शासन तन्त्र में आकण्ठ व्याप्त भ्रष्टाचार के ही खिलाफ। जो है राष्ट्रद्रोह से भी बढ़कर राष्ट्र के जन-जन के प्रति अपराध, यही है असली अपराधी समाज के। ताज में कसाब से निपटाया ब्लैक कैट बार्डर के दुश्मनों से तो निपट सकते हैं तोप और बुलेट से पर, आस्तीन के सापों से निपटेंगे कैसे? माहिर पुलिस रोज करती है फर्जी मुठभेड़ मरते हैं अनेक क्या है कोई व्यवस्था देश में? जो इन भस्मासुरों से करे वास्तविक मुठभेड़। क्यूं बढ़ने और पकने ही दें ऐसे फोड़ों को? जो बन जाएं नासूर रिसने लगे मवाद और खून। शुरू में ही क्यूं नहीं नश्तर से देते चीर, ऐसे गम्भीरतम मामलों में? कहां खो गयी है विशेषता राष्ट्र की? कुछ बताएंगे विधि-विशेषज्ञ, कुछ करेंगे, हमारे विद्वान न्यायाधीश। इतने बड़े देश में एक अरब की आबादी में। जूझ रहा है निहत्था सिर्फ एक खिलाड़ी महान। क्या है कोई ‘‘जांबाज मानुस’’ जो करे मुठभेड़, अन्त करे इन भस्मासुरों का आस्तीन के सांपों का।। - महेन्द्र द्विवेदी

Sunday, December 13, 2009

लो क सं घ र्ष !: लड़ो वोट की चोट दो

यह लोकतंत्र है मजबूत और सुदृढ़ लोकतंत्र। इसको और सुदृढ़ बनाने के लिए वोट का हथियार उठाना बहुत जरूरी है। हम आये दिन रोते हैं रोना अपनी गरीबी का, अपनी कमजोरी का, साधन विहीनता का, बेरोजगारी का, जमाखोरी का, महंगाई का, गुंडागर्दी का, गुंडाराज का, माफिया राज का, चोरी-डकैती का, घूसखोरी का, सरकारी कामों में कमीशन का और लूट का - कहां तक गिनाऊं, गिनाना आसान नहीं है। कुछ ने कहा दाल में काला है, कुछ ने कहा पूरी दाल काली है। सच है जिसने जो भी कहा पर इसका इलाज, शायद लाइलाज है यह मर्ज। अभी चन्द दिनों पहले बात हो रही थी एक अधिकारी से जो मुझसे बोले एक मामले जनहित याचिका करने के लिए, मैंने कहा अगर वो याचिका मैं करता हूं तो वह जनहित याचिका न होकर मेरी स्वहित याचिका बनकर रह जायेगी क्योंकि उसमें लोग मुझे हितबद्ध व्यक्ति समझकर निशाना मुझ पर साधेगें इसलिए मैंने इसके लिए नाम सुझाया सामाजिक हितों को रखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता का। जाने-माने कार्यकर्ता हैं वो नाम लेते ही बोले- अच्छा आप संदीप पाण्डे को बता रहे हैं, जो सभी अधिकारियों को भ्रष्ट बताते हैं। भ्रष्टाचार हम करते नहीं बल्कि वह तो हमारी मजबूरी है। हम अपने वेतन में कैसे चला पायेंगे अपनी जिंदगी, गिनाना शुरू किया हर चीज की महंगाई का। मैंने उनको समर्थन देते हुए कहा-हम देश के लगभग सब लोग बेईमान हैं। अपने को बेईमान बताते हुए उन्होंने खुशी से मुझे बेईमान होना मान लिया। मैंने बात फिर आगे बढ़ाई, हां, हम सब बेईमान हैं लेकिन ईमानदार है वह व्यक्ति जिसको बेईमानी का मौका नहीं मिलता। वह बोले आपने तो मेरी बात कह दी, लेकिन मैंने उनकी बात में एक बात और जोड़ी, लेकिन यह तो सिद्धान्त है और हर सिद्धान्त का अपवाद भी होता है अगर कोई ईमानदार है तो अपवाद स्वरूप। लगता है मैं बहक गया अपनी बात कहते-कहते विषय से हट गया, विषय तो सिर्फ इस वक्त है-लोकतंत्र में वोट की चोट का। हमने तो लोकतंत्र को भी राजशाही में बदल रखा है। राजा का बेटा राजा, उसका बेटा राजकुमार, आगे चलकर राजा। आजकल मीडिया ने एक राजकुमार को बहुत ही बढ़ा रखा है, खबरों में चढ़ा रखा है। कभी खबर आती है-राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया, कभी खबर आयी-राजकुमार ने दलित के घर में रात बितायी। राजकुमार ने दलित के साथ भोजन किया दस रूपये का, दलित के घर तक पहुंचने का खर्च आया, लाख में, दलित के घर तक चलकर सोने में खर्च आया, लाखों का और कुल मिलाकर राजकुमार पर प्रतिदिन खर्च आता है लगभग करोड़ का। फिर छोटे राजकुंवर पीछे क्यों रहें उन्होंने भी सिर उठाया, साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया, साम्प्रदायिकता की सीढ़ी पर चढ़कर आकाश छूने का प्रयास किया, वो अलग बात है धराशायी रहे। इस लोकतंत्र ने बहुत सारे छोटे-छोटे राजा पैदा किये हैं जिनके अपने-अपने राज हैं, अपना-अपना ताल्लुका है और अपने दरबारी हैं। गोण्डा के गजेटियर में पढ़ा है कि अली खान के बेटे शेखान खान ने अपने बाप को मारकर उनका सिर मुगल दरबार में पेश किया जो अजमेर गेट पर लटकाया गया और मुगल शासक ने शेखान खान को खुश होकर खान-ए-आजम मसनत अली का खिताब देकर उसे जमींदारी का अधिकार दिया। यही हाल आज के लोकतांत्रिक राजशाही में है-भाई-भाई से लड़ता है, बाप-बेटे से लड़ता है, चाचा-भतीजे से लड़ता है, भतीजा-चाचा से लड़ता है। कोटा और परमिट तक के लिए हम नेताओं की चापलूसी करते हैं, उस चापलूसी में चाहे हमें उनका हथियार ही क्यों न बनना पड़े और हमें हथियार बनाकर लोकतंत्र के ये राजा आगे बढ़ते हैं और वंशवाद फल-फूल रहा है और हम चाटुकारिता करके ही अपने को बहुत बड़ा आदमी मान बैठते हैं। कभी कहते हैं भइया ने मुझे पहचान लिया, नेता जी ने मुझे नाम लेकर बुलाया, देखो कितनी अच्छी याददाश्त है, मंत्री जी ने सभा मेरे नाम का ऐलान किया बहुत मानते हैं मुझे, कहां जाते हैं किसी के घर नेताजी हमारे घर आये थे, सिक्योरिटी के साथ चलते हैं, बहुत बड़े आदमी हैं, देखो सिक्योरिटी छोड़कर और उसे चकमा देकर मेरे घर पहुंच गये, लेकिन यह नहीं सोचा सिक्योरिटी किससे हम जिसके प्रतिनिधि हैं उसके डर से सिक्योरिटी या फिर जिसके प्रतिनिधि हैं उसको डराने के लिए सिक्योरिटी, जितनी बड़ी फोर्स चलेगी जिसके साथ, उतना ही बड़ा स्टेटस माना जाएगा उसका, यह मान्यता दे रखी है हमारे समाज ने। इन मान्यताओं को समाप्त करना होगा, लोकतंत्र में रहकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए लोकतंत्र में भागीदार बनना बहुत जरूरी है, अगर हम हर काम में यही सोचेगें कि लोकतंत्र सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, लोकतंत्र में कामयाबी बेईमानों की है, भ्रष्ट लोगों की है, झूठों और धोखेबाजों की है, बेईमानों और दगाबाजांे की है तो हम अपने साथ छल करते रहेगें इसलिए आवश्यक है इन मान्यताओं पर उठाराघात करने की। आइए, समझिए-समझाइए, मिलिये-मिलाइये लोकतंत्र में वोट की कीमत का सही इस्तेमाल कीजिए और देश की पूंजी पर कुण्डली मारकर बैठे लोगों को शिकस्त देने के लिए, देश की सम्पत्ति को लूटने वालों के लिए एक हो जाइये, मिलकर लड़इये ओर लोकतंत्र के हत्यारों को राजा बनने से देश को बचाने के लिए वोट का चोट दीजिए। मुहम्मद शुऐब एडवोकेट

Monday, December 7, 2009

वेश्यावृति त्यागने वाली युवतियों की शादी

डेरा सच्चा सौदा [सिरसा,हरियाणा]के संत गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा द्वारा वेश्यावृति त्याग कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने वाली युवतियों के कल्याण के लिए चलाई गई मुहिम में १०११ युवक वेश्यावृति त्यागने वाली युवतियों से शादी करने को तैयार हैं। इन युवतियों को अपनी बहिन,बेटी बनाने के लिए ९४ तथा ९ परिवार उनके बच्चों को गोद लेने के लिए आगे आए हैं। गुरु जी ने इन युवकों को भक्त योद्धाओं की संज्ञा दी है। वेश्यावृति के अभिशाप से मुक्त होने वाली युवतियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए तीन चरण निर्धारित किए गए हैं। पहले चरण में देश के विभिन्न भागों में टीमे भेजी गई हैं। जो वेश्यावृति के अभिशाप से मुक्त होने की इच्छुक महिलाओं को लेकर आएगी। दूसरे चरण में इन युवतियों की चिकित्सीय जाँच व उपचार की व्यवस्था की जाएगी। पूर्ण रूप से स्वस्थ युवती की ही शादी करवाई जाएगी। अगर किसी युवती में एड्स जैसी बीमारी के लक्षण दिखाई दिए तो उसके उपचार के सभी प्रबंध किए जायेंगे। यह जानकारी डेरा के प्रवक्ता डॉ०पवन इंसा ने दी। ---दैनिक प्रशांत ज्योति, श्रीगंगानगर से साभार।

लो क सं घ र्ष !: धन्य हैं हमारी खुफिया एजेंसियां

हमारी खुफिया एजेंसियां 26 जनवरी , 15 अगस्त, 6 दिसम्बर जैसे मौकों पर व आतंकी मामलों में मीडिया के माध्यम से मालूम होता है की वो काफ़ी सक्रिय हैं और देश चलाने का सारा भार उन्ही के ऊपर हैखुफिया एजेंसियों की बातें और उनकी खुफिया सूचनाएं बराबर अखबार में पढने इलेक्ट्रोनिक माध्यम से सुनने को मिलती हैंछुटभैया नेता रोज प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है और छपने पर अखबार खरीद कर जगह-जगह किसी किसी बहाने लोगो को पढवाता रहता है और उसी तरह खुफिया एजेंसियां मीडिया में अपने समाचार प्रकाशित करवाती रहती हैं। खुफिया सूचनाओं का अखबारों में प्रकाशित होना क्या इस बात का धोतक नही है कि जान बूझ कर वह प्रकाशित करवाई जाती हैं और उन सूचनाओ में कोई गोपनीयता नही हैअक्सर विशिष्ट अवसरों से पहले तमाम तरह की कार्यवाहियां मीडिया के माध्यम से मालूम होती हैं जो समाज में सनसनी भय फैलाने का कार्य करती हैं अंत में वो सारी की सारी सूचनाएं ग़लत साबित होती हैंनागरिक उस विशिष्ट अवसर से पहले इन सूचनाओ से भयभीत रहते हैं जबकि खुफिया जानकारियों का गोपनीय रहना आवश्यक होता है और किसी घटना होने के पूर्व उन अपराधियों को पकड़ कर घटना को रोकने का कार्य होना चाहिए लेकिन हमारी खुफिया तंत्र का कार्य घटना हो जाने के पश्चात् शुरू होता हैभारतीय कानूनों के तहत सबूतों को बयानों को अंतर्गत धारा 161 सी आर पी सी के तहत केस ड़ायरी में दर्ज किया जाता हैउस केस ड़ायरी को विपक्षी अधिवक्ता देख सकता है पढ़ सकता हैछोटी से लेकर बड़ी घटनाओं तक सारे सबूतों बयानों को प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से जनता को बताया जाता हैइस तरह का कृत्य भी अपराध है जिसको हमारा खुफिया तंत्र पुलिस तंत्र रोज करता हैखुफिया सूचनाओ का कोई महत्त्व नही रह जाता हैइन दोनों विभागों की समीक्षा ईमानदारी से करने की जरूरत है अन्यथा इन दोनों विभागों का कोई मतलब नही रह जाएगाअगर खुफिया तंत्र इतनी छोटी सी बात को समझ पाने में असमर्थ है तो धन्य है हमारे देश की खुफिया एजेंसियां
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Sunday, December 6, 2009

लो क सं घ र्ष !: कलंक दिवस है आज

6 दिसम्बर 1992 को नियोजित तरीके से अयोध्या में बाबरी मस्जिद को तोड़ डाला गया थाभारतीय संविधान के अनुसार देश धर्म निरपेक्ष है और सभी को अपना धर्म मानने उपासना करने का संवैधानिक अधिकार हैदेश के अन्दर एक छोटा सा तबका जो पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद से संचालित होता था और अब अमेरिकन साम्राज्यवाद से संचालित होता है। साम्राज्यवादियों के इशारे पर देश कि एकता और अखंडता को कमजोर करने की नियत से यह प्रलाप करता है कि वह देश का यह स्वरूप बदल कर एक ऐसे धार्मिक राष्ट्र के रूप में तब्दील कर देना चाहता है कि जिससे वर्तमान देश का स्वरूप ही बचा रहेऐसे तत्वों ने देश के अन्दर गृहयुद्ध करवाने के लिए बाबरी मस्जिद विवाद खड़ा किया था। देश धार्मिक विवाद में फंसा रहे और उसकी प्रगति रुकी रहे जिससे देश साम्राज्यवादी ताकतों के सामने खड़ा न हो सके । इस विवाद से आज तक मुक्ति नही मिल पायी है और हम आर्थिक रूप से भी कमजोर हुए है और हमारी प्रगति बाधित हुई है । देश का वर्तमान स्वरूप 15 अगस्त 1947 को अस्तित्व में आया था जो चीजें जिस स्तिथि में थी उसको संविधान और कानून के दायरे में ही रखकर ही हल किया जा सकता है किंतु, 6 दिसम्बर की घटना ने देश में एक मजबूत सरकार होने का जो भ्रम था उसको तोड़ दियायदि उन्मादियों और दंगाइयों को राज्य द्वारा कहीं कहीं से संरक्षण प्राप्त होता तो यह घटना नही घटतीराज्य का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप है जब उसकी उदारता या संलिप्प्ता के कारण इस तरह की घटनाएं होती हैं तो संविधान, न्यायव्यवस्था, पुरानी विरासत सब कुछ टूटता है मिलती सिर्फ़ बर्बादी हैराजनीतिक दलों ने क्षणिक फायदे के लिए दोनों तरफ़ से आग में घी डालने का कार्य किया है ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित हो सके6 दिसम्बर को इस देश में रहने वाले अधिकांश लोगो का विश्वाश टूटा था इसलिए यह दिन देश के लिए कलंक दिवस है और जो लोग शौर्य दिवस की बात करते हैं, वह लोग मुखौटाधारी हैंमुखौटाधारी इसलिए हैं कि जब जहाँ जैसा स्वार्थ आता है उसी के अनुसार वो बोलने लगते हैकभी वह कहते हैं कि बाबरी मस्जिद थी, कभी वह कहते हैं राम मन्दिरशौर्य दिवस के नाम पर जो जहर बोया गया है उसका विष कितने समय में समाप्त होगा यह कहना मुश्किल है। हजारो नीलकंठ हार जायेंगे उस जहर को समाप्त करने में। उस दिन देश हारा था, अराजक ,उन्मादी और देशद्रोही जीते थे । उन्ही का शौर्य दिवस है , हम हारे थे इसलिए कलंक दिवस है ।
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Saturday, December 5, 2009

लो क सं घ र्ष !: पुलिस पर कब्ज़ा करने की नई रणनीति

टेलिकॉम कंपनियों ने अपने मुनाफे के लिए आबादी क्षेत्र में नियमो-उपनियमों का उल्लंघन मोबाइल टावर लगा कर रखा हैजिससे अधिकांश जनता का जीना दूभर हो गया हैटेलिकॉम कंपनियों ने लोगो की छतों पर मोबाइल टावर लगा रखे हैंमोबाइल टावर को संचालित करने के लिए बड़े-बड़े जनरेटर छत पर रखे हैंजनरेटर चलने से उत्पन्न कंपन से पड़ोसियों के मकान चिटक रहे हैंशोर से आबादी क्षेत्र में रहने वाले लोगो को काफ़ी असुविधा होती हैमोबाइल टावर क्षेत्र में तरंगो से लगातार बन रहे बादल से मानव जीवन के ऊपर क्या प्रभाव पड़ेगा यह आने वाला समय ही बताएगामोबाइल टावर के कारण जगह-जगह विवाद उत्पन्न हो रहे हैं जिनसे निपटने के लिए टेलिकॉम कंपनियों ने पुलिस विभाग को अपने कब्जे में करने के लिए उत्तर प्रदेश शासन को प्रस्ताव दिया है कि प्रदेश के 15 सौ थानों में पुलिस लाइन्स में मोबाइल टावर लगाने के लिए किराए पर दे दिए जाएँयह उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा हैनागरिको से विवाद होने पर पुलिस टेलिकॉम कंपनियों की तरफ़ ही होती है और यदि वह पुलिस विभाग के किरायेदार हो जाएँ तो मालिक और किरायेदार मिलकर नागरिको का जीना दूभर कर देंगेटेलिकॉम कंपनियों ने बहुत सोच समझ कर पुलिस विभाग पर कब्ज़ा करने की रणनीति अपनाई हैटेलिकॉम कंपनियां जनता से तरह तरह के लोक लुभावन वादे करती हैं जो वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से ठगी के कोटि अपराध होता हैएक छोटा सा बिन्दु लगा कर बहुत ही महीन शब्दों में लिखा होता है कि कुछ शर्तें लागू हैं जिनको उपभोक्ता ध्यान नही दे पाता है और ठगा जाता हैइस तरह से टेलिकॉम कंपनियां अपने अपराधों में पुलिस के नजदीक रहकर छिपाना चाहती हैं
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Friday, December 4, 2009

लो क सं घ र्ष !: लोकतंत्र जिसका गुन अमेरिका गाता है

अमेरिका ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई को चेताविनी दी है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अच्छे काम- काज के नतीजे जाहिर करो अन्यथा उनकी जगह कोई और लेगाअमेरिका जिसके पास पूरी दुनिया में लोकतंत्र कायम करने का ठेका है वह अब लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकारों के नेताओं को यह बताएगा कि तुम्हारा काम काज ठीक नही हैतुम्हारी जगह पर हम दूसरे व्यक्ति को नेता नियुक्त करेंगेजनता द्वारा किसी भी चुनी गई सरकार को हटाने का हक़ जनता को ही होता है लेकिन साम्राज्यवादियों के अगुआ अमेरिका ने पूरी दुनिया के अधिकांश राष्ट्राध्यक्षों को अपना नौकर समझ रखा है और धीरे-धीरे वह जनता को भी गुलाम समझने लगा हैअमेरिकां साम्राज्यवादी दुनिया में लोगों को लोकतंत्र का सपना दिखाते हैं और उसके बहाने वह उस देश को गुलाम बनने कि रणनीति बनाते हैंअफगानिस्तान में हामिद करजई कि सरकार उनकी पिट्ठू सरकार है ही और अब जब अफगान समस्या का समाधान नही कर पा रहे हैं तो हामिद करजई को चेतावनी दे रहे हैंअमेरिकी लोकतंत्र का मतलब यह है कि उस देश को येन-प्रकारेण किसी भी तरह से गुलाम बनाओ और उसकी प्राकृतिक सम्पदा को लूटोजब उनका पिट्ठू गुलाम अमेरिकी गुलामी को और आगे बढ़ा पाने में असमर्थ हो जाता है तब प्रयोग करो और फेंको की नीति अपनाते हैंयही अमेरिकां का लोकतंत्र है, जिसका गुन वह गाता हैं
सुमन loksangharsha.blogspot.com

बेजुबानों पर कहर का भी प्रचार

-डॉ. उत्तमा, असिस्टेंट प्रोफेसर (पेंटिंग), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी। क दिन से उद्वेलित थी, परेशान थी। बकरीद के अगले दिन सुबह उठी तो समाचार पत्र में ऊंट की बलि की खबर देख ली। उद्वेलित इसलिये थी कि कुछ लोग कैसे सार्वजनिक रूप से एक जीव की हत्या कर सकते हैं? एक आदमी को मार डालना जेल भिजवा सकता है, हत्यारे को फांसी हो सकती है तो एक बेजुबान को मार डालने की इस देश में कोई सजा नहीं? उन्मादी भीड़ लोगों को मार दे तो दंगाई कहलाती है लेकिन यदि एक जानवर को मार दे तो कुछ नहीं, कोई सजा नहीं? परेशानी यह थी कि कैसे कोई इस घटना का महिमामंडन कर सकता था? एक ही दिन में तीन स्थानों पर ऊंटों की बलि कैसे इतनी जोर-शोर से उछाली जा सकती है, आखिर हम जैसे लोग भी तो हैं दुनिया में। मैं मानती हूं कि उन्हें कुर्बानी का हक है लेकिन खुलेआम और उसका इतना प्रचार??? अभी एक दिन मैं इंटरनेट पर एक सर्वे पढ़ रही थी जिसमें उल्लेख था कि इंडोनेशिया में मीट की खपत कम हो गई है और बड़ी संख्या में लोग शाकाहार को पसंद करने लगे हैं। दक्षिण कोरिया में कुत्तों की हत्या रोकने के लिए दुनियाभर में एक अभियान चल रहा है। एक आनलाइन पिटीशन पर ही तीन लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया में बीस लाख के आसपास कुत्ते बर्बरतापूर्वक मार दिए जाते हैं। हम वहीं के वहीं हैं। बचपन में मैंने एक सुअर तो मरते देख लिया था तो कई दिन खाना नहीं खाया बल्कि लगातार रोने पर मम्मी की कई बार डांट जरूर पड़ी थी। दीपावली के दिन छत पर दीप सजा रही थी कि तभी कुछ लोगों की आवाजें सुनीं। एक सुअर भी चीख रहा था। सुअर भाग रहा था। लोग पांच तरफ से उसे घेरे हुए थे। सुअर चिल्ला रहा था, इधर मैं भी चीख रही थी। लगा यह कैसे संभव है, सार्वजनिक रूप से हत्या? कोई कैसे किसी को इस तरह मार सकता है? क्या मजा आता है उन्हें? यहां महज पेट के लिए यह कुकर्म हो रहा था। करीब तीन साल की थी तब नानी के गांव गई। एक पुजारी ने कुछ लोगों के साथ तीतर को मार गिराया। मैं तीन दिन तक बुखार में रही। मैं उस पुजारी को बाबा कहती थी, घटना के बाद इतनी डर गई कि बड़ी होने तक गांव गई ही नहीं। गई तब पुजारी मर चुका था, नहीं तो खूब खरी-खोटी सुनाती। वह उस धर्म से जुड़े़ थे, जो इसका प्रबल विरोधी है। उन्हें यह कतई हक नहीं था। दूसरा, उन्होंने मेरे सामने क्यों मारा? मुझसे हट जाने के लिए कह देते। छोटी थी, आसानी से बहल जाती शायद। सच कहूं तो उन्हें खरी-खोटी सुनाने ही गई थी वहां। एक ऊंट की पैर की चोट को मैंने काफी देर तक सहलाया था। तमाम कुत्तों को खाना खिलाया और एक को देर रात नाली से निकालकर बचाया भी था। यह गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत पर चलने वाला देश है। नेमिनाथ भी जैन धर्म के भगवान इसलिये हो गए कि उन्होंने जीव हत्या के विरुद्ध अपना सब-कुछ त्याग दिया। उनका विवाह था। वह दूल्हे बने थे कि तभी पिंजरे में बंद जानवरों को देख लिया जिन्हें रात्रि भोज के लिए काटा जाना था। सोचने लगे कि मेरी शादी के लिए इतनी बलि। दुल्हन सजी-धजी बैठी रही और वो वैरागी हो गए। एक बेजुबान की हत्या होती है और आसपास के लोग इतने प्रसन्न होते हैं। नजारा ऐसा होता है जैसे बुराई के प्रतीक रावण को अच्छाई के हिमायती घेर रहे हैं। घोर निंदनीय है यह। तमाम लोग मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते होंगे तो रखें। मैं संवेदनशील हूं और तमाम लोग मुझ जैसे हैं। हमें यह अच्छा नहीं लगता। हम दुखी होते हैं, घंटों रोते हैं। एक बेजुबान दम तोड़ रहा होता है। यह कहां की मानवता है? कोई कुछ नहीं कर सकता तो इतना ही संभव हो जाए कि यह बलियां सार्वजनिक रूप से न हों औऱ यदि यह भी न हो पाए तो हम प्रचारित ही नहीं करें। किसी के धर्म का मामला है तो उन्हें ही करने दें क्योंकि उनका धर्म बेशक बलि की हिमायत करता है लेकिन प्रचार तो हम अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं। http://kalajagat.blogspot.com/

Thursday, December 3, 2009

लो क सं घ र्ष !: हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नही है ?

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा मानने से इनकार कर दिया है और उन्होंने कहा है की हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नही है अपितु सरकारी भाषा हैयह बात शिव सेना, मनसे के अतिरिक्त किसी अन्य ने कही होती तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ , भाजपा सहित उनखे तनखैया पत्रकारों का हिन्दी प्रेम जाग्रत होकर एक उन्माद पैदा करने का कार्य कर रहे होते चूँकि, मामला उन्ही लोगों से सम्बंधित है , इसलिए उनका हिन्दी प्रेम नदारद हैहमारा पहले से ही सुस्पष्ट विचार है की ऐसे तत्व विघटनकारी तत्व हैं जो देश की एकता और अखंडता को कभी धर्म के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर नष्ट करना चाहते हैंआज जरूरत इस बात की है कि ऐसे तत्वों को चिन्हित किया जाना आवश्यक है
सुमन loksangharsha.blogspot.com

Wednesday, December 2, 2009

भारत को कूड़ा घर बनाया

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत को कूड़ा घर बनाया। साम्राज्यवादी देशों ने सोमालिया में अपने वहां का कूड़ा डालना शुरू कर दिया जिससे पूरे देश में संक्रामक बीमारियाँ फ़ैल गयीं, जिससे काफ़ी लोग मरे। जैव विविधता भी नष्ट हो गई , पूरे देश में भुखमरी की स्तिथि में आज वहां के लोग समुद्री डाकू बन गए हैं। उसी तरह लन्दन म्यूनिसिपिल कार्पोरेशन का उन्नीस कंटेनर कूड़ा दिल्ली के निकट दादरी में पकड़ा गया है । विकसित देश अपने यहाँ के इलेक्ट्रोनिक कचरे से लेकर अन्य कचरों को भारत में भेजकर इस देश को कूड़ा घर बना देना चाहते हैं और इस देश को सोमालिया जैसा कर देना चाहते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि साम्राज्यवादी शक्तियों का कदम कदम पर अगर मुंहतोड़ जवाब नही दिया जाएगा तो यह लोग अपने शैतानी हरकतों से हमारे देश को बरबाद कर देंगे ।
सुमन loksangharsha.blogspot.com
---- चुटकी---- मधु कोड़ा बेहिसाब जोड़ा, नीयत ख़राब थी इसलिए यह भी लगा थोड़ा।

Tuesday, December 1, 2009

लो क सं घ र्ष !: हम क्या खायें ?

मैं कोई डाक्टर नहीं कि आपको बताऊं कि आप क्या खायें? खाने के नाम पर शाकाहार या मांसाहार पर भी मैं बहस नहीं छेडूंगा, फिर भी मेरा सवाल यही होगा - हम क्या खायें? दाल महंगी, आलू महंगा, प्याज महंगी, लहसुन महंगा, तेल का दाम आसमान पर। गेहूं या चावल, आटा हो या मैदा कुछ भी तो सस्ता नहीं है। फिर वही सवाल - हम क्या खायें? यह सवाल केवल इसलिए कि हमारी आमदनी इतनी नहीं कि उस आमदनी में ठीक से खा भी सकें। अगर हम किसान हैं तो हमारे लिए डीजल महंगा, खाद महंगी, खेती के काम में आने वाले औजार महंगे, हमारी जो लागत खेती की पैदावार में आती है वह भी वापस नहीं मिल पाती, हमारी मेहनत का बदला तो बहुत दूर है। फिर नमक महंगा, साबुन महंगा, कपड़ा महंगा, रूई महंगी क्या पहने, क्या ओढ़ें, क्या बिछायें, सफाई के लिए कैसे धोयें, कैसे नहायें, सवाल हर तरफ महंगाई का। हम मजदूर हैं और खेतिहर मजदूर हैं तो कहना क्या? हमारे लिए खेतों में काम नहीं, काम है तो मजदूरी नहीं के बराबर, सरकार द्वारा काम देने का किया गया वादा, उस काम के बदले दाम की लूट अलग। एक ही सवाल - कैसे जीवित रहें? कुछ खबरें अखबार की सुर्खियां बनती रही हैं, गोबर से अनाज के दाने छानकर खाने के लिए लोग विवश। जगह-जगह किसान आत्महत्या कर रहे हैं, कारण एक ही है गरीबी और भुखमरी। भुखमरी- भुखमरी-भुखमरी, अखबारों की सुर्खियां बनती रहीं हैं इस तरह की खबरें कि कहीं पर किसान या मजदूर ने भूख से दम तोड़ा। ऐसे में एक उक्ति याद आती है-‘‘जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है (सिवाय जान के) और पाने के लिए खुला हुआ है सारा संसार’’ और यह उक्ति कभी-कभी और कहीं-कहीं नक्सलवाद का रूप ले लेती है। नक्सलवाद की उत्पत्ति केवल इतने से नहीं बल्कि इससे अधिक अति से हुई है। भूपति अपनी भूमि पर गरीब मजदूर से बेगार लेते रहे, बेगार से मना करने पर उनके साथ जुर्म और ज्यादती हुई, गरीबों को दबाने के लिए बिहार जैसे प्रदेश में बनबीर सेना का गठन हुआ, यह पहला संगठित अत्याचार का रूप था लेकिन हमारे देश या किसी प्रदेश की सरकार ने इस संगठित अत्याचार को रोकने का प्रयास नहीं किया और इसी तरह से अत्याचार का संगठित रूप देश के हर कोने में फैला। काॅर्पोरेट परिवार को किसानों से खेत छीनकर सस्ते दामों में दे दिया गया। हिस्सा लेकर सरकारी खजाने का मुंह उनके लिए खोल दिया गया और ऐन-केन-प्रकारेण अपनी लालच में राजनेताओं द्वारा भूपति और पूंजीपतियों की सहायता की गई और किसानों मजदूरों को भूख से तड़पकर दम तोड़ने पर मजबूर किया गया, कहीं उनके हाथ-पैर तोड़े गये, कहीं गोलियों से उन्हें भूना गया, कहीं उनकी बहन-बेटियों की अस्मत् लूटी गई-कब तक और कहां तक बर्दाशत करे, ये बेबस और मजबूर, किसान और मजदूर। गांव का ये हाल शहरों में भी दिन भर जान-तोड़ मेहनत करके गरीब अपने परिवार का लालन-पालन नहीं कर पाता। महंगाई की मार ने उसे भी तोड़कर रख दिया है। जिस वक्त खेत से फसल बाजार में आती है हर अनाज सस्ता होता है और किसानों को उसका सही दाम नहीं मिल पाता, जबकि यही अनाज जिस समय व्यापारी के पास पहुंचता है तो उसका दाम बढ़ जाता है। अरहर का दाम किसान को मिला 20 रूपये प्रति किलो और दाल का दाम पहुंच गया 120 रूपये प्रति किलो और यह दाल इस दाम पर बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध भी है। दाल मिल मालिकों को सही मुनाफा कमाने का अवसर देकर सरकार ने जन साधारण को अपने काउन्टर से 65 रूपये प्रति किलो अरहर की दाल बिकवाया फिर भी दोगुने से अधिक लाभ कमाया दाम मिल मालिकों ने और सरकार ने वाह-वाही लूटी। मिल मालिकों को दोगुना लाभ कमवाकर जनता तक कम दामों में दाल पहुंचाने की। यह तो मैंने सिर्फ एक दाल का जिक्र किया है लगभग सभी दालों का यही हाल है। गेहुं, चावल और तिलहन का भी हाल कुछ ऐसा ही है। आखिर क्या कारण है कि अधिक दाम पर हर माल पर्याप्त मात्रा में बाजार में उपलब्ध है लेकिन मुनासिब दाम पर कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं। कारण मात्र इतना है कि व्यापारी वर्ग सरकार चलाने वालों को सुविधा प्रदान कर खुद जनता को लूट रहा है - जमाखोरी करके। यह जमाखोरी ही महंगाई का असली कारण है जिस पर सरकार लगाम नहीं लगा रही है और महंगाई बढ़ाने में व्यापारी वर्ग और उद्योगपतियों की सहायता कर रही है। इस कारण ही सवाल उठता है - हम क्या खायें? मुहम्मद शुऐब एडवोकेट

सुरक्षा अस्त्र

Text selection Lock by Hindi Blog Tips