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Saturday, September 19, 2009

लो क सं घ र्ष !: तृष्णा विराट आनंदित

तृष्णा विराट आनंदित, है नील व्योम सी फैली। मादक मोहक चिर संगिनी, ज्यों तामस वृत्ति विषैली॥ वह जननि पाप पुञ्जों की, फेनिल मणियों की माला । उन्मत भ्रमित औ चंचल, पाकर अंचल की हाला॥ छवि मधुर करे उन्मादित , सम्हालूँगा कहता जाए। तम के अनंत सागर में, मन डूबा सा उतराए॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"

Thursday, September 17, 2009

लो क सं घ र्ष !: सुन मानस स्वर का क्रंदन....

नव पिंगल पराग शतदल, आशा विराग अभिनन्दन। नीरवते कारा तोड़ो, सुन मानस स्वर का क्रंदन॥ माया दिनकर आच्छादित, अन्तस अवशेष तपोवन। मानो निर्धन काया का , अनुसरण अधीर प्रलोभन॥ ये उल्लास मौन आसक्ति भ्रम जीवन दीन अधीर। सुख वैभव प्रकृति त्यागे, मन चाहे कृतिमय नीर॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"
---- चुटकी---- सोनिया जी ऐसी क्या मज़बूरी है, जो शशि थरूर जरुरी है।

Wednesday, September 16, 2009

आप भी शामिल हों इस अभियान में ...

युवा संवाद ने प्रतिवर्ष की तरह इस साल भी भारतीय युवा की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक शहीद भगत सिंह की जन्मतिथि २७ सितम्बर को युवा दिवस के रूप में मना रहा है। इस के साथ ही हम उनके जन्म दिवस को युवा दिवस घोषित कराने तथा उनके लेखों को पाठ्यक्रम में शामिल कराने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान भी चला रहे हैं।

इस अवसर पर हमने '' भगत सिंह ने कहा'' शीर्षक से भगत सिंह के चार लेखों तथा एक पत्र का संकलन भी प्रकाशित किया है। इसमे शामिल लेख हैं - अछूत समस्या, धर्म और हमारा स्वाधीनता संग्राम, इंक़लाब जिंदाबाद का अर्थ तथा विद्यार्थी और राजनीति। साथ ही जेल से लाहौर के छात्र सम्मलेन को भेजा गया उनका पत्र भी इसमे शामिल किया गया है। इसका मूल्य रखा है ५ रूपये। आप इस अभियान में शामिल होना चाहें तो इसे मंगा सकते हैं।

साथ ही २७ तारीख को हम 'देश, देशभक्ति और भगत सिंह ' विषय पर एक खुली बहस का आयोजन कर रहे हैं जिसमे दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर संजय मुख्य वक्ता होंगे.

Tuesday, September 15, 2009

लो क सं घ र्ष !: मसीहाई प्रचारक के रूप में मुद्राराक्षस

अपने समकालीन रचनाकारों में मुद्राराक्षस प्रारम्भ से ही चर्चित रहे हैं। कभी अपनी विशिष्ट आदतों के कारण, कभी अपनी हरकतों के कारण तो कभी अपने विवादास्पद लेखन के कारण। अब से एक दशक पूर्व रचना प्रकाशन की दृष्टि से मुद्राराक्षस अपने समकालिक रचनाकारों से भले ही पीछे रहे हों, किन्तु आज की तारीख में वे अपने समकालिक ही नहीं बल्कि वर्तमान हिन्दी साहित्य के लेखकों के बीच रचना प्रकाशन की दृष्टि से और अपने बहुआयामी लेखन के जरिये राष्ट्रीय ही नहीं वरन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खासे महत्वपूर्ण हैं, जबकि इधर के दशकों में उनका कोई उपन्यास नहीं प्रकाशित हुआ है। वे अपनी कहानियों, आलोचना का समाजशास्त्र, कालातीत संस्मरण तथा धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ के जरिये लगातार चर्चा में हैं। सच पूछो तो वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य पर न तो उनके कद का कोई रचनाकार ठहरता है और न उनका कद्दावर ही। यदि हमें दो चार रचनाकारों के नाम लेने ही हों यथा नामवर सिंह तो वे केवल हिन्दी आलोचना क्षेत्र की प्रतिभा हैं, श्री लाल शुक्ल केवल कथा लेखन के क्षेत्र के हैं, इसी तरह रवीन्द्र कालिया और ज्ञान रंजन आदि एक सीमित विधा के महारथी हैं। जबकि मुद्राराक्षस ने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना और अपने सामाजिक राजनीतिक चिन्तन परक लेखों के जरिये इन सभी क्षेत्रों में एक सार्थक हस्तक्षेप किया है। उनके लेखन ने साहित्य और समाज को खासा आन्दोलित, प्रभावित और परिवर्तित किया है। मुझे नहीं लगता वर्तमान हिन्दी साहित्य में उनके समकक्ष कोई अन्य लेखक पहुँचता हो। इधर के वर्षों में मुद्राराक्षस अपने अखबारी कालम और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अपने हिन्दू धर्म विरोधी लेखों के कारण सुर्खियों में रहे हैं। जिसकी एक परिणति ‘धर्म ग्रंथों का पुनर्पाठ’ में दिखायी देती है। उनकी वचन बद्धता ईसाई और मुस्लिम धर्म के पुनर्पाठ के प्रति भी है। ईसाई धर्म को लेकर ‘गास्पेलों का पुनर्पाठ’ पुस्तक बाजार में उपलब्ध है और इसका एक अंग्रेजी एडीशन इंग्लैण्ड से भी प्रकाशित हो रहा है। धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ से लेकर गास्पेलों का पुनर्पाठ तक आते-आते मुद्राराक्षस की मुद्रा निरन्तर बदलती गयी है। लगता है इस्लाम धर्म के पुनर्पाठ तक पहुँचते-पहुँचते उनका यह तेवर कहीं मक्खन सा नम होकर उस पर महज पालिश भर न रह जाये। जिन लोगों ने धर्म ग्रंथों का पुनर्पाठ पढ़ा था, सराहा था। विरोध दर्ज कराया था, वे लोग मुद्राराक्षस के तेज तर्रार विवेचन-विश्लेषण, तर्काश्रित मुहावरे, विभिन्न तथ्यों के प्रति उनका बेबाक निजी दृष्टिकोण के कायल हुए बिना न रह सके थे। जिसमें एक खास था-उनका हिन्दू धर्मग्रंथों के प्रति अनुदार, पूर्वाग्रह युक्त हठधर्मी दृष्टिकोण। जिसमें उन्होंने कई बार तथ्यों को तोड़ मरोड़कर अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास किया। इन गुणों से आकर्षित होकर जब कोई पाठक ‘गास्पेलों का पुनर्पाठ’ की यात्रा के अन्तिम पड़ाव तक पहुँचता है तो उसे इनमें से बहुत कम गुण इस पुस्तक में मिलते हैं और अन्त तक मुद्राराक्षस ईसाई धर्म का पुनर्पाठ तो कम बल्कि उल्टे मसीहाई प्रचारक की भूमिका में रंगे अवश्य दिखाई देने लगते हैं। यह बौद्धिक चालाकी भूमिका से ही दिखाई देने लगती है। जहाँ उन्होंने लिखा है कि हमारे लिए महत्वपूर्ण यह जानना है कि बाइबिल या कुरआन की बनावट या उनके चरित्र में कोई युद्धोन्मादी या युद्ध के लिए उकसाने वाले तत्व हैं। कहने का मतलब धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ में उन्होंने वेदों से लेकर शंकराचार्य तक के ग्रंथों का आलोचनात्मक अध्ययन किया था जबकि ईसाई और यहूदी धर्म के सन्दर्भ में मुद्राराक्षस ओल्ड टेस्टामेन्ट, न्यू टेस्टामेंट, मैथ्यू, लूक, आर्क और जान गास्पेल्स जैसे ग्रंथों का आलोचनात्मक पाठ न करके उसका सरल रेखीय पाठ कर उसे उद्धृत कर किया है। यहाँ पर वे ईसाई धर्म की उन पुस्तकों पर दृष्टि तक नहीं डालते जिन्होंने ईसा मसीह को विवाहित और सन्तान शुदा बताने के (दा विंची कोड और होली ब्लड होली ग्रेल) दावे प्रस्तुत किये हैं। आखिर उनके प्रति मौन क्यों? स्पष्ट है हम दूसरे धर्मों के ग्रंथों का चाहे जितना अध्ययन करें किन्तु वहाँ पर होते हम एक आउट साइडर ही हैं यही कारण है यह पुस्तक हिन्दी जगत को नहीं लुभा पा रही है। हम एक छोटे से दृष्टान्त से उनकी कुन्द होती आलोचनात्मक दृष्टि को समझ सकते हैं कि वे ईसाइत के प्रति कितने नरम और धर्मभीरू तथा हिन्दू के प्रति किस कदर तीखे तेवर अपनाते हैं। मेरी अविवाहित माँ थी। जीसस का जन्म एक गैर विवाहिता की कोख से हुआ था। जोसेफ ने यह जानकर भी उससे विवाह कर लिया था। ऐसी स्त्रियों के प्रति यहूदी समाज कितना कठोर है, कैसी यातनाएं देता है इसका वे जिक्र तक नहीं करते बल्कि उन्हें तुलना के लिए भारत और राजस्थान याद आता है। जहाँ आज भी जन्म के समय ही लड़कियाँ मौत के घाट उतार दी जाती हैं, किन्तु मेरी का समाज कितना क्रूर था इसके विषय में वे चुप रहते हैं या संकेत भर करते हैं। यहाँ जीसस और कुमारिल भट्ट का प्रसंग देखना दिलचस्प होगा, एक बार जीसस जेरूसलम मंदिर के शिखर पर ले जाये गये और कहा गया-यहाँ से कूदो अगर ईश्वर तुम्हें अपनी हथेली पर रोक लेगा तो हम तुम्हें मान लेंगे। जीसस का जवाब देखें-ईश्वर का इम्तिहान नहीं लिया जाता। इसी तरह कुमारिल भट्ट और बौद्ध विद्वानों की बहस के बाद इसी से मिलता जुलता सवाल कुमारिल भट्ट से किया गया, अगर तुम मानते हो भगवान है तो तुम इस महल के कंगूरे से कूदो और कहो कि भगवान तुम्हें बचा ले। कुमारिल ने चुनौती स्वीकार की और उनके पैर टूट गये। यहाँ मुद्राराक्षस का यह कहना कि कुमारिल अतार्किक और जीसस तार्किक थे। किन्तु विचारणीय बिन्दु यह था कि भगवान तुम्हें बचा ले, यानी की मृत्यु से रक्षा, चुनौती स्वीकार करके भी कुमारिल मरते नहीं जीवित रहते हैं। ऐसे कितने ही प्रसंग मुद्राराक्षस की बौद्धिक प्रतिभा पर सवाल खड़े करते हैं और अन्तिम अध्याय ‘एक निहत्थे का युद्ध’ अत्यन्त संवेदनात्मक होने के साथ उसे एक कहानी का स्वरूप दे दिया है जो अत्यन्त भावनात्मक है। वे जीसस के चमत्कारों पर खुश होते हैं और हिन्दू संतों के चमत्कारों पर आक्रोशित, आखिर क्यों? एक ही वस्तु के प्रति दो दृष्टिकोण अपनाने के चलते मुद्राराक्षस की मुद्रा एक ईसाई प्रचारक के रूप मंे ही अधिक बनती है। -महंत विनयदास मो0 09235574885

Monday, September 14, 2009

अब जिन्ना महेश

ख़बर--केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मन्त्री (स्वतन्त्र प्रभार) जयराम रमेश ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य देव भगवान शंकर के समान बताकर एक और अनावश्यक विवाद तो खड़ा किया ही है, हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति के अपमान का अक्षम्य अपराध भी किया है। श्री रमेश ने शनिवार को अपनी भोपाल यात्रा के दौरान महात्मा गान्धी की तुलना ब्रह्मा और नेहरूजी की तुलना भगवान विष्णु से कर डाली। ---- चुटकी---- गाँधी ब्रह्मा नेहरू विष्णु जिन्ना महेश, आपका तो भारत रत्न पक्का हुआ जयराम रमेश।

Sunday, September 13, 2009

लो क सं घ र्ष !: क्या मिलन विरह में अन्तर

क्या मिलन विरह में अन्तर, सम्भव जान पड़ते हैं। निद्रा संगिनी होती तो, सपने जगते रहते हैं॥ जीवन का सस्वर होना, विधि का वरदान नही है। आरोह पतन की सीमा, इतना जग नाम नही है॥ मिट्टी से मिट्टी का तन, मिट्टी में मिट्टी का तन। हिमबिंदु निशा अवगुण्ठन, ज्योतित क्षण भर का जीवन ॥ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह/ काव्य गोष्ठी/ ब्लॉगर्स महा सम्मेलन

[ रिपोर्ट: सुलभ सतरंगी ] साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित काव्य गोष्ठी सह ब्लॉगर्स महा सम्मेलन:
शनिवार 12-सितम्बर-2009 को माडर्न स्कूल सेक्टर -17 फरीदाबाद में पहली बार ब्लोग्गर्स स्नेह महासम्मलेन आयोजित किया गया। अवसर था साहित्याशिल्पी का प्रथम वार्षिक समारोह. कार्यक्रम के शुरुवात में श्री राजिव रंजन प्रसाद द्वारा साहित्याशिल्पी के एक वर्ष लघु सफ़र का जीवंत प्रस्तुतीकरण उपस्थित अतिथियों एवं ब्लोग्गर्स सदस्यों के समक्ष किया गया. इस पर एक काव्य गोष्ठी एवं इन्टरनेट पर साहित्य व ब्लॉग के उभरते आयामों पर घंटो परिचर्चा चलती रही.
मुख्य अतिथि: प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार ड़ॉ प्रेम जनमेजय जी
योगेन्द्र मौदगिल जी एवं श्री जे. के. कुन्द्रा जी
उपस्थित अतिथियों तथा साथियों में अविनाश वाचस्पति, अभिषेक सागर, अजय यादव, शेफाली पाण्डेय, विनीत कुमार, अरूण अरोरा, रितु रंजन, पवन चंदन, अजय कुमार झा, विनोद कुमार पाण्डेय, राजीव तनेजा, सुनीता शानू, अमन दलाल, इरशाद अली, विनीत कुमार, पुष्कर पुष्प, सुरेश यादव, खुशदीप सहगल, सुलभ सतरंगी, संजू तनेजा, विनोद कुमार पांडेय, नमिता राकेश, योगेश समदर्शी, शोभा महेन्द्रू, रचना सागर, सविता रंजन, वीरेन्द्र कंवर, विकेश बेनीवाल, अनिल बेताब, डॉ. वेद व्यथित, अब्दुल रहमान मंसूर, बागी चाचा, तन्हा् सागर, क्षिप्रा पांडेय, मीनाक्षी जिजीविषा आदि प्रमुख थे। विस्तृत रिपोर्ट यहाँ है - http://www.sahityashilpi.com/2009/09/blog-post_13.html धन्यवाद!

रॉकेट से हमला

---- चुटकी---- पाक ने भारत पर रॉकेट दागे, धन्य हमारे नेता, जो फ़िर भी नहीं जागे।

Saturday, September 12, 2009

लो क सं घ र्ष !: स्मृति शेष: घुपती हृदय में बल्लम सी जिसकी बात, उसे गपला ले गयी कलमुँही रात -02

प्रमोद उपाध्याय इस तथाकथित लोकतंत्र के बारे में भी ख़ूब सोचते और बातें करते थे। उनके पास बैंठे तो वे लोकतंत्र की ऐसी-ऐसी पोल खोलते थे कि मन दुखी हो जाता और देश के राजनेताओं को जूते मारने की इच्छा होने लगती। प्रमोद जी बार-बार लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच फैलती खाई की तरफ इशारा करते। उन्हीं के शब्दों में कहें तो-लोकतंत्र की बानगी देते हैं हुक्काम/टेबुल पर रख हड्डियाँ दीवारों पर चाम। ख़ुद मास्टर थे, लेकिन शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी कुछ यो करते- नई-नई तालीम में, सींचे गये बबूल बस्तों में ठूसे गये, मंदिर या स्कूल जब 1992 में बाबरी को ढहाया गया। प्रमोद जी ऐसे बिलख रहे थे जैसे किसी ने उनका झोपड़ा तोड़ दिया, जबकि प्रमोद जी न मंदिर जाते, न मस्जिद। प्रमोद जी ने साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को मौखिक रूप से जितनी गालियाँ बकीं, वो तो बकीं ही, पर साम्प्रदायिक राजनीति पर अपनी रचनाओं में जी भर कटाक्ष भी किया। देखिए एक बानगी- रामलला ओ बाबरी, अल्ला ओ भगवान भूखे जन से पूछिये, इनमें से कौन महान दीवारों पर टाँगना, ईसा सा इंसान यही सोचकर रह गईं, दीवारें सुनसान और एक शेर है कि- ख़ुदगर्जों का बढ़ा काफिला, क़ौम धरम को उकसाकर मोहरों से मोहरें लड़वाना इनका है ईमान मियाँ। प्रमोद जी का जाना केवल देवास के लिखने पढ़ने वालों, उनके क़रीबी साथियों और परिवार के लोगों को ही नहीं सालेगा, बल्कि उनको भी सालेगा, जिन्हें प्रमोद जी गालियाँ बकते थे, जिनमें से एक मैं भी हूँ मैं उनसे पैतीस किलो मीटर दूर इन्दौर में रहता हूँ। लेकिन मुझे नियमित रूप से सप्ताह में दो तीन बार फोन लगाते और कभी दस मिनट, कभी आधे घण्टे तक बातें करते, बातों में चालीस फीसदी गालियाँ होतीं। जब मैं उनसे पूछता-सर, आप मुझे गाली क्यों बक रहे हो? हर बार उनके पास कोई न कोई कारण होता और मैं फिर अपनी किसी भूल-ग़लती पर विचार करता। प्रमोद जी पिछले दो-तीन सालों से अपनी आँखों की पूर्ण रूप से रोशनी खो बैठे थे। मेरी कोई कहानी छपती तो वे बहादुर या किसी और मित्र से पाठ करने को कहते। वे कहानी का पाठ सुनते। सुनते-सुनते अगर कोई बात खटक जाती, तो पाठ रूकवा देते और बहादुर से कहते उसे फोन लगा। फोन पर तमाम गालियाँ देते और कहते-अगली बार ऐसी ग़लती की तो बीच चैराहे पर ‘पनही’ मारूँगा, मुझे बेबस ‘बोंदा बा’ मत समझना। कहानी में कोई बात बेहद पंसद आ जाती तो भी पाठ रुकवा देते। फिर फ़ोन पर गालियाँ देते और कहते- सत्तू .... मुझे तुझसे जलन हो रही है, इतनी अच्छी बात कही इस कहानी में। मैं शरीर से लाचार न होता, तो मैं तुझसे होड़ाजीबी करता। मेरे बाप ने या मेरे किसी दुश्मन ने भी मुझे इतनी गालियाँ नहीं बकी, जितनी प्रमोदजी ने बकी। वे उन गालियों में मुझे कितने मुहावरे, कहावते और कितना कुछ दे गये। लेकिन वह खोड़ली कलमुँही रात सई साँझ से ही मौक़े की ताक में काट रही थी चक्कर। और फिर जैसे साँझ को द्वार पर ढुक्की लगाकर बैठ जाती है भूखी काली कुतरी। बैठ गयी थी वह, और मौक़ा पाते ही क़रीब पौने बारह बजे लेकर खिसक ली। उसने जाने किस बैर का बदला लिया। उनकी गालियाँ सुनने की लत पड़ गयी थी मुझे। लेकिन अब मुझे गाली ही कौन देगा...? प्रमोद जी को भीगी आँखें और धूजते हृदय से श्रद्धांजलि। प्रमोद उपाध्यायजी की स्मृति में सत्यनारायण पटेल की रचनाः- सच के एवज में अपरिपक्व और भ्रष्ट लोकतंत्र में झूठ को सच का जामा पहनाने को कच्ची-पक्की राजनीतिक चेतना से सम्पन्न होते हैं इस्तेमाल सदा सच के खिलाफ़ जैसे भूख और हक़ के पक्ष में लड़ने और जीवन दाँव पर लगाने वालों के विरूद्ध सलवा जुडूम जैसे भूख से मरे आदिवासियों का सवाल पूछने पर आपरेशन लालगढ़ जैसे काँचली आये लम्बे साँप की भूख निगलने लगती अपनी ही पूँछ कभी-कभी प्रगतिशील गीत गाने वाले संगठन का मुखिया भी बन जाता है हिटलर का नाती जब चुभने लगते हैं उसकी आँख में उसी के कार्यकर्ता के बढ़ते क़दम तब साम्राज्यवाद की नाक पर मुक्का मारने से भी ज्यादा जरूरी हो जाता है कार्यकर्ता को ठिकाने लगाना और जब सार्वजनिक रूप से, क़त्ल किया जाता है कार्यकर्ता शक करने, सवाल पूछने, भ्रष्ट और साम्राज्यवादी दलालों के चेहरे से नक़ाब खींचने के एवज में तब कुछ क़त्ल के पक्ष में चुप-चाप गर्दन हिलाते खड़े रहते हैं कुछ डटकर खड़े हो जाते हैं क़ातिल के सामने मुट्ठियों को भींचे, दाँत पर दाँत पीसते कुछ ख़ुद को चतुरसुजान समझ मौन का घूँघट काढें़ खड़े होते हैं तटस्थ क़त्ल के बाद कुछ ‘हत्यारा कहो या विजेता’ के किस्से सुनाते हैं कुछ क़त्ल होने वाले की हरबोलों की तरह साहस गाथा गाते हैं तब भी चतुर सुजान तटस्थ हो देखते-सुनते हैं वक्त सुनायेगा एक दिन उनकी कायरता के भी क़िस्से। समाप्त सत्यनारायण पटेल, मो0-09826091605
---- चुटकी----- चिदम्बरम ने न्यूयार्क में सीखे सुरक्षा के गुर, भारत आते ही सब के सब हो जाते हैं फुर्र।

Friday, September 11, 2009

लो क सं घ र्ष !: स्मृति शेष: घुपती हृदय में बल्लम सी जिसकी बात, उसे गपला ले गयी कलमुँही रात-01

वह खोड़ली कलमुँही (6 अगस्त 09) रात थी, जब प्रमोद उपाध्याय जी ज़िन्दगी की फटी जेब से चवन्नी की तरह खो गये। प्रमोद जी इतने निश्छल मन थे कि कोई दुश्मन भी कह दे उनसे कि चल प्रमोद.... एक-एक पैग लगा लें, तो चल पड़े उसके साथ। उनकी ज़बान की साफ़गोई के आगे आइना भी पानी भरे। अपने छोटे से देवास में मालवी, हिन्दी के जादुई जानकार। भोले इतने कि एक बच्चा भी गपला ले, फिर सुना है मौत तो लोमड़ी की भी नानी होती है न, गपला ले गयी। प्रमोद जी को जो जानने वाले जानते हैं कि वह अपनी बात कहने के प्रति कितने जिम़्मेदार थे, अगर उन्हें कहना है और किसी मंच पर सभी हिटलर के नातेदार विराजमान हैं, तब भी वह कहे बिना न रहते। कहने का अंदाज और शब्दों की नोक ऐसी होती कि सामने वाले के हृदय में बल्लम-सी घुप जाती। जैसा सोचते वैसा बोलते और लिखते। न बाहर झूठ-साँच, न भीतर कीच-काच। उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल, दोहे सभी विधा की रचनाओं में मालवी का ख़ूबसूरत प्रयोग किया है। रचनाओं के विषय चयन और उनका निर्वहन ग़ज़ब का है, उन्हें पढ़ते हुए लगता-जैसे मालवा के बारे में पढ़ नहीं रहे हैं बल्कि मालवा को सांस लेते। निंदाई-गुड़ाई करते, हल-बक्खर हाँकते, दाल-बाफला बनाते-खाते और फिर अलसाकर नीम की छाँव में दोपहरी गालते देख रहें हैं। मालवा के अनेक रंग उनकी रचनाओं में स्थाईभाव के साथ उभरे हैं। यह बिंदास और फक्कड़ गीतकार कइयों को फाँस की तरह सालता रहा है। प्रमोद जी के एक गीत का हिस्सा देखिए- तुमने हमारे चैके चूल्हे पर रखा जबसे क़दम नून से मोहताज बच्चे पेट रह रहकर बजाते आजू बाजू भीड़ उनके और ऊँची मण्डियाँ हैं। सूने खेतों में हम खड़े सहला रहे खुरपी दराँते। देवास जिले के बागली गाँव में एक बामण परिवार में (1950) जन्मे प्रमोद उपाध्याय कभी बामण नहीं बन सके। उनका जीने का सलीका, लोगों से मिलने-जुलने का ढंग, उन्हें रूढ़ीवादी और गाँव में किसानों, मजदूरों को ठगने वाले बामण से सदा भिन्न ही नहीं, बल्कि उनके खिलाफ़ रहा। प्रमोद जी सदा मज़दूरों और ग़रीब किसानों के दुख-दर्द को, हँसी-ख़ुशी को, तीज-त्यौहार को गीत, कविता, दोहे और ग़ज़ल में ढालते रहे। उनके कुछ दोहे पढ़ें- सूखी रोटी ज्वार की काँदा मिरच नून चाट गई पकवान सब थोड़ी सी लहसून फ़सल पक्की है फाग में टेसू से मुख लाल कुछ तो मण्डी में गई, कुछ ले उड़े दलाल क्रमश : -सत्य नारायण पटेल मो0-09826091605

ओसामा रहेगा

---- चुटकी---- जब तक पाक है तब तक रहेगा ओसामा, कुछ भी कर ले भारत चाहे कुछ भी कर ले ओबामा।

Wednesday, September 9, 2009

लो क सं घ र्ष !: मंटो के नाम ख़त

प्यारे बड़े भाई सआदत हसन मंटो साहिब, आदाब, आज सन् 2008 के दूसरे महीने की दस तारीख़ है और मैं आपकी याद में होने वाले सेमिनार में जिसका मौज़ू ‘मंटोः हमारा समकालीन’ रखा गया है, आपके नाम लिखा हुआ अपना ख़त पढ़ रहा हूँ, ये मौजू शायद इसलिए रखा गया है कि आज भी हमारे मुल्क और दुनिया के तक़रीबन वही हालात हैं, जो आपके ज़माने में थे और कोई बड़ी तब्दीली नहीं आयी। वही महंगाई, बेरोज़गारी, बद अम्नी-जिसकी लाठी, उसकी भैंस। ग़रीबों और कमजोरों का माली, अख़्लाक़ी, जिन्सी और सियासी शोषण। वही तबक़ाती ऊँच- नीच, फ़िरक़ापरस्ती, खू़न-ख़राबा बौर ज़बानों के झगड़े। आपने कहा था कि आप अक़ीदे की बुनियाद पर होने वाले फ़िरक़ावाराना फ़सादात में मरना पसंद नहीं करते, मगर अब ख़ुदकुश हमलों की सूरत में ये फ़सादात रोज़मर्रा का मामूल हैं जिन में आए रोज़ बेशुमार मासूम और बेगुनाह लोगों की जाने जाती हैं. हां, साइंस और टेक्नोलॉजी में ख़ासी तरक्की हुई है और बहुत-सी हैरतअंगेज़ चीजें ईजाद हो गयी हैं, वे चीज़ें जिनकी आपने इब्तिदाई शक्लें देखी थीं और जिनका ज़िक्र आपने ‘स्वराज के लिए’ और कुछ दूसरे अफ़सानों में किया था (कण्डोम और प्रोजेक्टर वगै़रह) अब ख़ासी तरक्कीयाफ्ता सूरतों में आम तौर से मिलती हैं, कश्मीर का मस्अला भी वहीं का वहीं है, जहाँ आपके ज़माने में था और चचा साम (अमेरिका) से हमारे ताल्लुक़ात भी वैसे ही हैं। आपने एक ख़त में चचा साम के जापान पर एटमी हमले की ‘तारीफ़’ की थी और अपनी ज़रूरत की वज़ाहत करते हुए उनसे छोटे-से एक एटम बम की फ़रमाइश की थी. आपके किसी ख़ैरख्वाह ने ये ख़याल करके कि शायद चचा साम तक आपका उर्दू में लिखा हुआ ख़त न पहुँचा हो, उसका तर्जुमा करके आपकी बात उन तक पहुँचा भी दी थी और वह इंटरनेट पर इन लफ़्ज़ों में मौजूद हैः- आपने स्वयं बहुत से सराहनीय कार्य किये हैं और अब भी कर रहे हैं। आपने हिरोशिमा का विनाश कर दिया, आपने नागासाकी को धूल एवं धुएँ (राख के ढेर) में बदल कर रख दिया और आपने जापान में हजारों बच्चे पैदा करवाए। मैं आपसे मात्र इतना चाहता हूँ कि मेरे पास कुछ ड्राईक्लीनर्स भेज दे जो इस प्रकार है। यहाँ कुछ मुल्ला क़िस्म के लोग हैं जो पेशाब करने के पश्चात् एक पत्थर उठाते हैं और खुली शलवार के अन्दर एक हाथ से उस पत्थर को पेशाब की बची बूँदों को अवशोषित करने के लिए प्रयोग करते हैं, ऐसा वे चलते हुए एवं लोगों के सामने करते हैं। मैं चाहता हूँ कि जैसे ही कोई व्यक्ति ऐसा करता दिखाई दे, वैसे ही एक एटम बम, जो आप मुझे भेजेंगे, उसके ऊपर छोड़ दूँ जिससे कि वह मुल्ला और वह पत्थर (जो वह हाथ में पकड़े हुए है) दोनों खाक में मिल जाएँ। मगर चचा ने उसका कोई नोटिस न लिया था, बल्कि जब हम ने ख़ुद एटम बम बना लिया, तो उल्टा उसके पीछे पड़ गये कि आप अपने मुल्ला पर नहीं, हमारे भानजे (इस्राइल) पर मारेंगे, हालांकि हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था। आज के इस सेमिनार का मौज़ू’ इसलिए भी मौज़ू और मुनासिब मालूम होता है कि आपने ख़ुद तो लिखा था:- आज का अदीब बुनियादी तौर पर आज से पाँच सौ साल पहले के अदीब से कोई ज़्यादा मुख़्तलिफ़ नहीं, हर चीज़ पर नये पुराने वक़्त का लेबल लगाता है, इंसान नहीं लगाता। आज के नये मसाइल भी गुज़रे हुई कल के पुराने मसाइल से बुनियादी तौर पर मुख़्तलिफ़ नहीं, जो आज की बुराइयाँ हैं, गुज़रे हुए कल ही ने इनके बीज बोये थे। आपने ये भी कहा था कि हम क़ानूनसाज़ नहीं, मुह्तसिब (हिसाब लेने वाला) भी नहीं, हिसाब लेना और क़ानूनसाज़ी दूसरों का काम है। हम हुकूमतों पर नुक्ताचीनी करते हैं, लेकिन ख़ुद हाकिम नहीं बनते, हम इमारतों के नक़्शे बनाते हैं, लेकिन मेमार (बिल्डर) नहीं। हम मरज़ बनाते हैं, लेकिन दवाख़ानों के इन्चार्ज नहीं। हमारी तहरीरें आपको कडु़वी और कसैली लगती हैं, मगर जो मिठासें आपको पेश की जाती रहीं, उनसे इंसानियत को क्या फ़ायदा हुआ है! नीम के पत्ते कड़वे सही, मगर ख़ून ज़रूर साफ़ करते हैं। चूँकि हम आपकी इन बातों से इत्तिफ़ाक़ करते हैं, इसलिए आपको अपना हमअस्र (समकालीन) मानते हैं। और हाँ, एटम बम के अलावा कुछ और चीजे़ं भी हमने आपके बाद बनायीं या वह ख़ुद ईजाद हो गयीं जैसे नज़रीयः ए-ज़रुरत नया पाकिस्तान (आधा) तालिबान, ख़ुदक़ुश हमले, आईन (संविधान) और नया दारूल-हुकूमत (राजधानी) वगै़रह। बाक़ी ईजादों के बारे में तफ़्सील फिर सही, मगर आईन और नये दारूल-हुकूमत के बारे में अर्ज़ है कि ये वही आईन है जिसको बना कर देने की आपने चचा साम सेे दख़्वास्त की थी। आप यक़ीन करें बड़े भाई, हमने ख़ुद बना लिया, ईमान से! और इसे ख़ूब लपेट-लपाट कर हिफ़ाज़त से रखते हैं और कभी-कभार ही निकालते हैं कि ज़्यादा इस्तेमाल से मैला न हो या फट न जाए। इसके बजाय हम सदारती आर्डिंनेंसों, वज़ारती धक्कों और कांस्टीट्यूशन एवेन्यू की रैलियों से काम चलाते हैं, जहाँ तक नये दारूल हुकूमत का ताल्लुक़ है, आप हैरान होंगे कि ये सेमिनार भी वहीं हो रहा है, ये भी हमने ख़ुद बनाया है। बहुत ख़ूबसूरत और साफ़-सुथरा शहर है और इसमें बहुत-सी ख़ूबियाँ हैं। लेकिन मैं सिर्फ़ ऐसी बातों का ज़िक्र करूँगा जैसी आपको पसंद हैं, आप अनोखी और चैंका देने वाली चीजें और बातें पसंद करते हैं ना! इस शहर की सबसे बड़ी ख़ूबी ये है कि इसका नाम इस्लामाबाद है, मगर इस्लामी मुसावात (समानता) की तालीम के बरअक्स यहाँ इन्सानों की तबका़ती तक़्सीम पर सख़्ती से अमल किया जाता है, यहाँ आदमियों की पहचान सेक्टरों, ग्रेडों और मकानों की केटेगरियों से होती है, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि जितना बड़ा ग्रेड, उतना बड़ा इंसान बल्कि अक्सर इसके उलट है। बहरहाल इस तक़सीम का एक फ़ायदा यह है कि ग्रेड, सेक्टर और केटेगरी से आदमी की हैसियत, बल्कि औक़ात का फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है। इस्लामबाद की सड़कें कुशादा और इमारतें आलीशान और ख़ूबसूरत हैं, मैंने अपने एक अफ़साने में इनका कुछ ज़िक्र किया है। एक किरदार को जुम्हूरीयत की रोड नहीं मिल रही थी, वह फ़ोन पर किसी से पूछता है: शाहजी, मैं बड़ी देर से भटक रहा हूँ, शार-ए-जुम्हूरीयत कहाँ वाक़े हैं? ‘आजकल मरम्मत के लिए बंद है। ‘मगर है कहाँ? ‘कांस्टीट्यूशन एवेन्यू के पास’ ‘और वह कहाँ है? ‘कांस्टीट्यूशन या एवेन्यू? ‘एवेन्यू यार!’ ‘पार्लियामेंट बिल्डिंग देखी है? ‘हाँ, उसी हांटेड हाउस के सामने तो हूँ जो अंडर... आॅफ़ प्रेज़ीडेंसी है’. ‘वहाँ से थोड़ा आगे चलो, तुम्हारे बाएं हाथ पर एक ख़ूबसूरत और पुरवक़ार इमारत होगी। ‘अच्छा, जहाँ कभी अज़ ख़ुद नोटिस लिये जाते थे? हाँ, वही तो कांस्टीट्यूशन एवेन्यू है, इस पर ज़रा आगे जाकर क्रासिंग आएगा,’ ‘आ गया और पहुँच गया, यहाँ दाएँ हाथ वाली जम्हूरीयत रोड है, ‘अच्छा मगर शाहजी! ये सड़क इतनी छोटी क्यों? ‘भाई, इस मुल्क में जम्हूरीयत की जितनी उम्र है, सड़क की लम्बाई उसके मुताबिक़ रखी गयी है. बड़े भाई साहब! पाकिस्तान सेक्रेट्रियेट की इमारतें भी क़रीब ही हैं। मैं जब भी इनको देखता हूँ, तो मुझे वज़ीराबाद का मिस्त्री कमालदीन उर्फ़ कमाला याद आ जाता है जो इनकी तामीर के दौरान में तीसरी मंज़िल पर पलस्तर करते हुए गिर गया था और उसकी दोनों टांगें टूट गयी थीं। जब कुछ अर्सा बाद वह अर्ज़ी हाथ में लेकर बैसाखियों पर चलता बमुश्किल यहाँ पहुँचा, तो उसे अंदर जाने की इजाज़त नहीं मिली थी, खैर, वह तो एक मामूली सा राजमिस्त्री था, इस शहर में ऐसी इमारतें भी हैं जिनका इफ़्तिताह (उद्घाटन) करने वाले वज़ीरों और वज़ीर आज़मों को भी अपने ओहदों से हट जाने और ऊपर वाले की नज़रों में गिर जाने के बाद अंदर दाखिल होने की इजाजत नहीं मिलती। इस शहर में अदब, आर्ट और कल्चर के बहुत से और बड़े बड़े इदारे हैं, मगर पता नहीं क्या मनहूसियत है कि यह शहर फिर भी बेरौनक़ और कल्चरल लिहाज़ से बंजर समझा जाता या मालूम होता है। मुल्क के दूसरे इलाक़ों से आने वाले और ख़ास तौर पर बच्चे यहाँ बहुत जल्द उकता जाते हैं और वालिदैन से वापस ‘पाकिस्तान’ चलने की ज़िद करने लगते हैं। इस शहर की सबसे अनोखी, मगर दिलचस्प चीज़ ज़ीरो प्वाइंट है। चूंकि यहाँ से हर वापस जाने वाला ख़ाली हाथ और ज़ीरो-ज़ीरो हो कर जाता है, इसलिए ये नाम बहुत मौज़ू मालूम होता है, शायद इसीलिए पाकिस्तान की मज़लूम तरीन और बरायेनाम ज़िन्दा खातून बेगम नुसरत भुट्टो ने कहा था: इस्लामाबाद के कूफ़े से मैं सिंध (मदीने) आयी। मुआफ़ कीजिये, बड़े भाई साहब, मैंने छूटते ही इस्लामबाद का तआर्रुफ़ शुरू कर दिया और अपने बारे में कुछ बताया ही नहीं कि मैं कौन हूँ और क्या हूँ? आप यक़ीनन मुझे नहीं जानते। आपने ख़त पर मेरा नाम तो देख ही लिया होगा, जिस बरस यानी 1955 में आपका इंतिक़ाल हुआ, मैं हाफ़िज़ाबाद के हाईस्कूल में मैट्रिक के इम्तिहान की तैयारी कर रहा था, मेरा पुख्ता इरादा था कि इम्तिहान से फ़ारिग़ होकर लाहौर ख़ाला के यहां जाऊँगा और आपसे मिलने या कम अज़ कम आपको देखने की कोई राह निकालूँगा, मगर अफ़सोस मेरे इम्तिहानात शुरू होने से पहले आपका इंतिक़ाल हो गया। जिसका मुझे बेहद सदमा हुआ, लेकिन मैं आपको हमेशा जिंद़ा रहने वाली तहरीरों की वजह से जिंदा ही समझता हूँ, इसीलिए ये ख़त लिख रहा हूँ। मैं उन दिनों स्कूल की लाइब्रेरी से किताबें ले कर पढ़ता था जहाँ अख़बार की कहानियों के अलावा मियाँ एम0 असलम, मौलाना रशीद अख़्तर नदवी, रईस अहमद जाफ़री और नसीम हिजाजी के नावेल मौजूद थे। कृश्नचंदर और हिजाब इम्तियाज़ अली के अफ़साने और मिर्ज़ा अदीब के सेहरानवर्द के ख़ुतूत भी मिल जाते थे। मैं ये किताबें पढ़ कर सोता, तो मुझे बड़े अच्छे-अच्छे और मीठे-मीठे ख़्वाब दिखायी देते, लेकिन फिर एक रिसाले में आपका एक अफ़साना पढ़ा, शायद उसका उन्वान ‘दस नंबरी था’. उसमें एक भिखारिन औरत की झोली मंे कोई सख़ावत का पुतला मर्द बच्चे का तुहफ़ा डाल देता है। इसके बाद वे लोग निढ़ाल होकर और सर्दी से ठिठुर कर मर जाते हैं। उन दोनों को साथ-साथ कब़्रे खोद कर दफ़ना दिया जाता है। बड़ी कब्र के साथ एक छोटी सी कब्र देखने वालों को दस का अंक मालूम होता हैं, वह कहानी पढ़कर मेरा दिल भर आया और मीठे सुहाने ख़्वाब देखने के बजाय वह रात मैंने जागकर आँखों में गुज़ारी, लेकिन पता नहीं उस कहानी में क्या जादू था कि मैं आपकी कहानियाँ तलाश करके पढ़ने और जागने लगा। मगर आपकी कोई किताब कहीं नज़र नहीं आती थी, बल्कि म्युनिसिपल लाइब्रेरी में भी आपकी कोई किताब मौजूद नहीं थी, मेरा ख़याल है अब भी नहीं होगी, क्योंकि टीचर्स और वालिदैन का ख़याल था कि आपकी किताबों से अख़्लाक़ पर बुरा असर पड़ता है। ये बात बहुत हद तक सही साबित हुई। उन सब लड़कों के चाल चलन ठीक रहे जो आपकी किताबें नहीं पढ़ते थे, वे नेक, शरीफ़ और लायक़ लड़के बड़े-बड़े ओहदों पर पहुँचे, उनमें से कुछ डिप्टी कमिश्नर और कर्नल, जरनैल बने। सिर्फ़ मेरे अख़्लाक़ पर असर पड़ा, क्योंकि अपने स्कूल की तारीख़ में सिर्फ़ मैं ही आपके नक़्शे-कद़म पर चला। मैं आपकी किताबें लाइब्रेरी से किराये पर ले कर चोरी छिपे पढ़ता था आपने मुझे सोचने महसूस करने और लिखने की अज़ीब लत लगा दी थी। आपकी कहानियाँ पढ़ने से पहले मेरी कहानियाँ बच्चों के रिसालों में शाए होती थीं, मुर्गों, बकरियों और शरीर बच्चों के बारे में। लेकिन दसवीं के इम्तिहान से फ़ारिग़ होते ही मैंने बालिग़ों के लिए कहानियाँ लिखना शुरू कर दीं। घर वालों का ख़याल था कि मेरे वक्त से पहले बालिग़ होने में आपकी कहानियों का हाथ था। चुनंाचे मेरा पहला अफ़साना उसी बरस (अक्टूबर 1955) शाए’ हुआ। जिससे मुझे ये खु़शफ़हमी भी हुई कि शायद क़ुदरत ने मुझे आपका मिशन जारी रखने के लिए मुन्तख़ब किया हो। भाईजान! आप यक़ीन करें, मेरा इरादा था कि आपकी तरह हक़ीक़तनिगारी का उस्लूब (ंशैली) इख़्तियार करूँगा, सचाई का साथ दूँगा और सच लिखूँगा, लेकिन फिर मैंने उर्दू ज़बान के बहुत बड़े हामी, उस्ताद, नक़्क़ाद, और दानिश्वर डाॅ. सय्यद अब्दुल्लाह की हक़ीक़तनिगारी, इस्मत चूग़ताई और आपके बारे मेें राय पढ़ी। उन्होंने लिखा थाः हक़ीक़तनिगारी यूँ भी अपने ज़ाहिरी लफ़्ज़ी मफ़हूम (अर्थ) के बरअक्स एक मर्हले पर पहुँच कर दरअस्ल भद्दी, ग़लीज़, नापाक और तल्ख़ सचाइयों और वाक़िओं जैसी हो जाती है, ख़ुद मुसव्विरी मंे इसका नतीजा महज़ चीज़ों और हालतों की तस्वीरकशी है। मंटो और इस्मत दोनों इस अंदाज़ की नुमाइंदगी करते हैं। हक़ीक़तनिगारी एक ख़ास हद तक बरहक़, मगर ज़िंदगी में सब कुछ कहने के बजाय बहुत कुछ छुपाना भी पड़ता है। इसलिए हक़ीक़तनिगारी कुल मिलाकर बेमुराद, अधूरी और नाकाम धारा है। मंटो और इस्मत दोनों के यहाँ तो यह एक इन्तिक़ामी-सी चीज़ मालूम होती है। इस वजह से इन्हें फ़न के दरबार में बड़ा मक़ाम तो मिलता है, मगर फ़न के लिए, ज़बान और क़लम की जिस नेकी की ज़रूरत है, अफ़सोस है कि वे इससे महरूम हैं। (डाॅ0 सय्यद अब्दुल्लाहःउर्दू अदब-1857 ता 1966) इतने बड़े उस्ताद, नक्काद और आलिम इस्मत चुग़ताई की हक़ीक़तनिगारी और आपके बारे में ये बातें सुनकर मेरे तो छक्के छूट गये, मुझे सरकारी नौकरी करना और जिंदगी में आगे बढ़ना था। मैंने आपकी राह छोड़ दी। मानता हूँ कि मैं आपका मिशन जारी न रख सका। मैं समझ-बूझ, दुराव और बुज़दिली का शिकार हो गया, यूँ भी अब लोगों ने अफ़सानों के बजाय तफ़रीह की नई-नई चीजें़ तलाश कर ली थीं और अफ़सानों में दिलचस्पी लेना छोड़ दी थीं। लेकिन मैं अपने निश्चय से बिल्कुल ही नहीं फिर गया, मुझे बचा बचा कर और प्रतीकों रूपकों में लपेट कर चाहे किसी की समझ में आये या न आए, बात कहने का हुनर आ गया था। हमारी मुश्किल यह थी कि आप के दौर में हाकिम लोग सीधे-सादे थे। अफ़साने पर जो इल्ज़ाम लगाया जाता था, उसी के तहत मुक़द्दमा चलता और तहरीर से वही मानी लिये जाते थे जो उसमें होते थे। यही वजह थी कि आप जुर्माना दे कर या छोटी मोटी सज़ा भुगत कर छूट जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं हैं। हबीब जालिब ‘ऐसे दस्तूर को मैं नहीं मानता!’’ या उस्ताद दामन ‘पाकिस्तान विच मौजा ही मौजां, चारे पासे फ़ौजां ई फ़ौजां’’ लिखते हैं, तो उनके क़ब्जे़ से शराब या बम बरामद हो जाता है, मगर आपने बेधड़क अपनी किताब का नाम ‘नमरूद की ख़ुदाई रख लिया था, हालांकि आपने नमरूद की खुदाई, देखी तक न थी। लेकिन हम नहीं रख सकते। हमने देखी ही नहीं भुगती भी है। बड़े भाई! आपने एक जगह लिखा था: मुझे ऐसी जगहों से जिनको आश्रम, विद्यालय या जमाअतखाना, तकिया या दर्सगाह (मदरसा) कहा जाए, हमेशा से नफ़रत है, वह जगह जहँा फ़ितरत के खिलाफ उसूल बनाकर इन्सानों को एक लकीर पर चलाया जाये, मेरी नज़रों में कोई वक़्अत नहीं रखती। ऐसे आश्रमों, मदरसों, विद्यालयों और मूलियों के खेत में क्या फर्क़ है? लेकिन हम ऐसे इदारों को मूलियों के खेत नहीं कह सकते, हालांकि अब मूलियों और शलजमों के खेतों की भरमार है। खुद मेरे अपने घर में मूलियों की क्यारियाँ हैं और मुल्क के कुछ इलाक़ों में तो मूलियों के इस कदर ज़्यादा खेत हैं कि उन्हें मूलीस्तान कहना चाहिए लेकिन हम नहीं कह सकते, वर्ना वे हमारा मूली कुण्डा कर देंगे। बड़े भाई साहब! ये ठीक है कि हम आपकी दिखाई हुई सच्चाई और हक़ीक़तनिगारी की राह पर पूरी तरह न चल सके, मगर हमने आपसे बहुत कुछ सीखा। हमने आपसे सीखा कि नेक, शरीफ़, मोअज्ज़िज़ और बड़े लोगों की बात न करो, वे ख़ुद अपनी बात कर लेंगे, बल्कि मनवा लेंगे। तुम गिरे पड़े और छोटे लोगों की बात करो, उमरावजान ‘अदा’ अपनी बात किसी नवाबज़ादे या किसी मिर्ज़ा हादी रूस्वा के ज़रीए सब तक पहुुँचा लेगी, मगर ‘हत्तक’ की सौगंधी और ‘काली शलवार’ की सुल्ताना की बात अगर तुमने न सुनी तो कोई नहीं सुनेगा। आपने हमें सिखाया कि काम करने वाली कामी को कुम्मी-कमीन न कहो। इसी मेहनतकश के दम से सारी रौनक़ और चहल-पहल है। हक़ीर, फ़क़ीर और बुरे नज़र आने वाले लोगों से नफरत न करो, वे बीमार या मजबूर हैं, जोर आवरों के सताए हुए हैं। समाज के रौंदे, दुतकारे और कुचले हुए लोग हैं वे तबका़ती तक़सीम और नाइंसाफियों के शिकार हैं। दूसरों के बारे में तो कुछ कह नहीं सकता, लेकिन मैंने और असद मुहम्मद खां (कहानीकार और टी0वी0 स्क्रिप्ट राइटर) ने आप की ये बात जरूर पल्ले बाँध ली थी और अब तक इस पर क़ायम हैं। और बड़े भाई, आपको तो यह भी मालूम न होगा कि उन्होंने हीरोशिमा और नागासाकी के बाद अफ़गानिस्तान और इराक़ का क्या हाल किया और अब ईरान और पाकिस्तान के पीछे पड़े हैं। (और भारत व सऊदी अरब जैसे मुल्क अमेरिका के कदमों में पड़े हैं-हसन) लेकिन अल्लाह ख़ैर करेगा। अब हम इतने कमजोर भी नहीं (हाँ, मगर अमेरिका की दादागीरी और तालिबानियों के गै़र जुम्हूरी, बर्बर हमलों व क़ब्ज़ों के आगे हम बेबस हैं-हसन) बस, हमारी डेमोक्रेसी बहाल होने की देर है। बाक़ी बातें मैं अगले ख़त में लिखूँगा, क्योंकि ये ख़त तवील हो रहा है। दूसरा यह मुझे दो सरकारी इदारों के जे़रे इंतिज़ाम होने वाले प्रोग्राम में पढ़ना है। अगर वे नाराज़ हो गये तो आइन्दा मुझे अपने प्रोग्रामों में नही बुलायेंगे। आप इस बात पर ख़फ़ा न हों, सच्चाई और हक़ीक़तपसंदी अपनी जगह, मगर हमारी भी कुछ मजबूरियाँ हैं, अब इजाज़त। आपका छोटा भाई मंशा याद -मुहम्मद मंशा याद लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित

Tuesday, September 8, 2009

लो क सं घ र्ष !: मैं आज़मगढ़ हूँ

मैं आजमगढ़ हूँ बिलकुल अपने दूसरे भाइयों की तरह चाहे वे उत्तर प्रदेश से सम्बंधित हों या देश के किसी अन्य राज्य से। परन्तु सैकड़ों साल से मेरा अपना इतिहास है और अपनी अलग पहचान भी। विपरीत परिस्थितियों से निपटने की मुझमें अद्भुत क्षमता है। मेरी सन्तानों में गतिशीलता, स्वयं सहायता और जोखिम उठाने का अदम्य साहस है। इसीलिये कहा जाता है कि ‘‘जहाँ-जहाँ आदमी है, वहाँ-वहाँ आज़मी है। भारत का कोई राज्य या महानगर नहीं जो मेरे सपूतों से खाली हो। दुनिया का कोई देश नहीं जहाँ मेरी संताने न पहुँची हो। फिजी में तो मेरी भाषा बोली जाती है। मोरिशस में कासिम उत्तीम और त्रिनिडाड एण्ड टोबैगो में वासुदेव राष्ट्र प्रमुख तक बन चुके हैं। केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने मुझे कल कारखानों एवं रोजगार के अन्य स्रोतों से वंचित भले ही रखा हो पर मेरी सन्तानें देश प्रदेश के अन्य भागों से ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जाकर अपनी योग्यता, साहस और परिश्रम के बल पर अपने हिस्से की रोटी निकाल ही लाती हैं। मेरे अन्य भाइयों की सन्तानों की तरह मेरे लाल रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी और रोजगार आदि के लिये आन्दोलन नहीं करते, हिंसा पर नही उतरते। इसी प्रकार उनके शौक भी कुछ भिन्न हैं। पैसा कमाने के बाद सबसे पहले पक्के घर बनवाते हैं, फिर गाड़ी, मोबाइल और टी0वी0 का नम्बर आता है। भविष्य के लिये बचा कर रखने या पूँजी निवेश के बारे में बहुत कम सोचते हैं। यही कारण है कि अक्सर रोजगार छूट जाने की स्थिति में बहुत कष्ट भरा जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो जाते हैं। परन्तु अपनी परेशानी में भी खुशहाल दिखायी देने की कला भी उन्हें खूब आती है। मात्र रोजी के लिये ही मेरे लाल बाहर नही जाते बल्कि उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के लिये भी देश के विभिन्न महानगरों एवं विदेशों में जाते हैं पर अपनी धरती और अपने प्यारों से हमेशा जुड़े रहते हैं। संघर्ष मेरी घुट्टी में है। आत्म सम्मान की रक्षा के लिये सब कुछ दाँव पर लगा देना, शोषण और अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े होना मेरी मिट्टी में हैं। मेरी सन्तानों ने अंग्रेजों को भी कभी चैन से नहीं रहने दिया। शेख रजब अली को ही ले लो, जेल का दरवाजा तोड़कर ठाकुर कुंवर सिंह समेत दो सौ क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से छुड़ा लाया था। जब पूर्वी यू0पी0 में अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू को गिरफ्तार करना चाहते थे तो मेरे ही एक सपूत असद अली खां ने उन्हें बचाया था। मलेशिया, सिंगापुर, बर्मा और इण्डोनेशिया जैसे देशों में पैसा कमाने के लिये गये मेरे सैकड़ों सपूत आजाद हिन्द फौज की स्थापना के समय ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गये और अपने बाल बच्चों का पेट काटकर उसकी आर्थिक सहायता की। साहित्य का संसार हो या फिल्मों की दुनिया, धर्म का क्षेत्र हो या क्रांतिकारी मैदान मेरी उपस्थिति कहाँ नही है। राहुल सांकृत्यायन, शिबली नोमानी, अयोध्या सिंह उपाध्याय, कैफी आज़मी हो या फिर मेरी बेटी शबाना आज़मी, क्या इनके उल्लेख के बिना इतिहास सम्पूर्ण हो सकता है। विभिन्न समुदायों का सौहार्दपूर्ण सह अस्तित्व मेरी विशेषता रही है। इस व्यवस्था के ताने बाने बिखेरने का कुछ बाहरी तत्वों ने कई बार प्रयास किया परन्तु सफल नहीं हो पायेे। कुछ एक अवसरों पर समाचार माध्यमों ने भी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिये इन तत्वों की दूषित मानसिकता का जमकर बखान किया और मेरी ही संतानों के बीच भय और संदेह का वातावरण बनाने में उनके सहायक हो गये। बटाला हाउस मुठभेड़ (हत्याकाण्ड) के पश्चात तो चैनलों और समाचार पत्रों ने आग ही उगल डाला। अपनी लनतरानी में इतने आगे निकल गये कि मुझे ही ‘आतंकगढ़’ और ‘आतंक की नर्सरी’ कह डाला। मेरे लाल तो दिल्ली और लखनऊ उच्च एवं तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के लिये गये थे पर इन लोगों ने मात्र पुलिस की कहानी पर भरोसा करके उन पर आतंकवादी होने की मुहर लगा दी। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता के सभी सिद्धांतों को ताक पर रखकर चटपटी और गरम खबरें परोसने लगे जैसे देश और समाज के प्रति इनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। शायद देश में बढ़ती आतंकवादी घटनाओं के कारण जनता में उपजे रोष को अपनी व्यवसायिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए मीडिया में बैठे कुछ पूँजीवादी इस दुलर्भ अवसर को गँवाना नही चाहते थें। बाजारवाद की कोख से जन्मे समाचार माध्यमों के एक समूह ने महंगे विज्ञापन प्राप्त करने हेतु सनसनी पैदा करने वाले भावनात्मक प्रस्तुतीकरण का जिस प्रकार सहारा लिया वह समाज को तोड़ने वाला और निंदनीय था। मेरी संतानों पर भी इसका असर पड़ा और थोड़े समय के लिये उनमें भी भय और भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी। परन्तु मैं पहले ही कह चुका हूँ विपरीत परिस्थितियों से निपटने की मुझमें अद्भुत क्षमता है। मेरे सपूतों ने यह सिद्ध भी कर दिया। मेरे प्रति दुष्प्रचार करने वाले अब अपना सुर बदलने पर विवश हैं। दिल्ली पत्रकार संघ ने बटाला हाउस प्रकरण पर अपनी रिपोर्ट में पत्रकारिता के मूल्यों एवं सिद्धांतों के निम्न स्तरीय होने पर जिस प्रकार चिंता जतायी है उससे मेरी आपत्तियों की पुष्टि भी हो जाती है। मुझे इस बात में कोई संदेह नही कि आने वाले समय में देश के अन्दर और बाहर देशभक्ति और सभ्यता का मुखौटा लगाये असली आतंकवादी बेनकाब होंगे और मेरे लाडले सम्मानपूर्वक घर लौटेंगे। इसकी शुरूआत हो भी चुकी है। मसीहुद्दीन संजरी मो0 9455571488

सुरक्षा अस्त्र

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