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Friday, May 23, 2008

टी.वी पत्रकारिता का सच

पत्रकारिता कभी एक क्रान्तिकारी गली हुआ करती थी लेकिन आज ये एक बदनाम गली हो गई है ख़ास तौर पर लड़कियों के लिए क्योंकि लड़के तो अकसर बदनाम ही हुआ करते हैं। पहले बड़े से बड़ा मंत्री पत्रकार से डरता था कि कहीं उसकी कलई न खुल जाय लेकिन आज पत्रकारिता और ख़ास तौर पर टेलीविज़न पत्रकारिता ख़ुद ही कटघरे में खड़ी हो गयी है।मैं इलाहाबाद के ब्राह्मण परिवार से हूँ जहाँ लड़कियों का टेलीविज़न पत्रकारिता में आना बहुत अच्छा नहीं माना जाता लेकिन फिर भी अगर बच्चे ज़िद पर अड़े हों तो मॉ-बाप को उनकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ता है।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।परीक्षा की तैयारी की और भोपाल से जर्नलिज़्म की पढाई।आस-पड़ोस वालों के लिए टेलीविज़न पत्रकारिता का मतलब केवल माइक पकड़कर टीवी पर आना ही था।उन्हें लगने लगा कि लड़की अब सीधे आज-तक या स्टार न्यूज़ में ही दिखेगी।लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि इसमें पर्दे के पीछे भी बहुत सारे काम होते हैं जो उतने ही महत्तवपूर्ण होते हैं जितने कि पर्दे के सामने के।लेकिन सच्चाई भी यही है कि आज एक टीवी में दाख़िल होने के लिए एक लड़की को लगभग उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना बिना किसी गॉडफादर के एक लड़की को बॉलीवुड में एंट्री के लिए करना पड़ता है।ये फील्ड भी आज उतना ही ग्लैमराईज़ हो चुका है जितना बॉलीवुड।हर कदम पर यहॉ भूखे गिद्घ शिकार की ताक में बैठे रहते हैं। कब कोई शिकार आए और वो उसे एक सांस में निगल जांय।मेरे गुरूजी ने मुझे समझाते हुए एक बार कहा था- ये जगह काजल की कोठरी है जिसमें से तुम्हे बेदाग निकलना है।अगर आपकी सुकुमारी का मन सौम्य है तो ध्यान दें क्योंकि पत्रकारिता सौम्यता की दुश्मन है।अगर उसके कानों ने कभी अपशब्द नहीं सुने तो चैनल में हर रोज़ उसे दूसरों के मुँह से गालियॉ सुनने की आदत हो जाएगी क्योंकी ये टेलेविज़न का एक तहज़ीबी हिस्सा है।टेलीविज़न पत्रकारिता का सच वाकेयी कड़वा है लेकिन अगर आप इस काजल की कोठरी से साफ-सुथरे बाहर आ जाय तो ख़ुद को ख़ुशनसीब समझिएगा.....सच तो कड़वा ही होता है लेकिन फिर भी अगर आपमें माद्दा हो और हौसले बुलन्द हों तो कूद पड़िये इस महायुद्ध में।

Thursday, May 22, 2008

एहसास

उम्मीदों को दम घुटते देखा है मैंनें

सपनों को टूटते देखा है मैंनें

आशाओं की पलकों पर

ओस सी मखमली

पल में ढुलक पड़ती

कपोलों के धरातल पर अपना अधिकार समझ

ये जान कि व्यर्थ हो जाएगी ये बूंद

अपने में समेटे एहसास को

ये बूंद हो सकती है निर्जीव

लेकिन एहसास नहीं

वो तो फिर जागेंगे

छूने को नया आकाश

फिर उमड़ेंगे

शायद फिर बरसने को

या फिर हवा के तेज़ बहाव के साथ आगे बढ जाने को

तलाशने नया धरातल

नयी उम्मीद, नयी आशा, नये एहसास के साथ................

Tuesday, May 20, 2008

यह शायद एक स्टोरी हो ....

( हाल ही में एक डाकुमेंटरी को शूट करने के लिए एक ख़ास जगह गया ..... ज़ाहिर है अनुभव भी ख़ास था ! मेरा एक कनिष्ठ साथी हिमांशु भी साथ था ..... उसका इस अनुभव पर क्या कहना है पढ़ लें !) हाल में पुराने भोपाल स्थित एक वृद्धाश्रम गया था । मयंक सक्सेना जी की एक डॉक्युमेंटरी के शूट के सिलसिले में। ऐसी जगहों पर आमतौर पर मेरे अन्दर का कवि जाग जाता है, पर उस दिन एक ऐसा मंज़र देखा जिसको देख कर मेरे अन्दर के कवि ने , मेरे अन्दर के पत्रकार को जगाया कि उठो और देखो तुम्हारे लिए सूचना है क्या तुम उसे स्टोरी बना सकते हो ? मैं भी अपने सभी पत्रकार भाइयों को ये सूचना दे रहा हूँ। मैं तो कोशिश कर ही रहा हूँ , अगर किसी सज्जन से बन पड़े तो इसे स्टोरी बनायें , एक स्टोरी जो किसी सार्थक अंत की ओर हो। क्यूंकि कहा जा रहा है कि मीडिया में खबरें नही हैं इसलिए खली स्टोरी बन रहा है --आसरा नाम का ये वृध्धाश्रम पुराने भोपाल में बाबे अली स्टेडियम के सामने स्थित है । यहाँ कुल ९६ वृद्ध लोगों का परिवार है , जिनमे से एक हैं पी सी शर्मा । १४ फ़रवरी १९०८ इनकी जन्मतिथि है । १०० साल पूरे कर चुके हैं पर हैं एक दम चुस्त दुरुस्त और बात चीत में कहते हैकि एक अपनी १०० साल की एक उम्र तो मैंने जी ली अब आज तो मैं ९० दिन का बच्चा हूँ .......... ये जीवट है उस व्यक्ति का , हाँ कुछ साल पहले गाय ने मार दिया था तो पेट में जख्म हो गया था , डॉक्टर ने ज्यादा चलने से मना किया है तो ज्यादातर समय व्हील चेयर पर रहता है , लेकिन फिर भी कैमरा ट्राई पोड उठा कर उसे शिफ्ट कर देता है .....ज़िंदगी पता नही कब साथ छोड़ दे पर अंग्रेज़ी उच्चारण सुधारना चाहता है , इसके लिए मुझसे एक डिक्शनरी मांगता है पर फ्री में नही , जेब में हाथ डाल कर पैसों के लिए टटोलता है....वह और भी कुछ चाहता है........ दरअसल शर्मा जी ने ब्रिटिश वायु सेना जिसे तब रोंयल एयर फोर्स कहा जाता था , के लिए १९३९ से १९५२ तक काम किया है । और वह अपनी इस सेवा के लिए ब्रिटिश सरकार से पेंशन चाहते हैं । कई चिट्ठियां लिखी हैं , पर पहले तो ब्रिटिश सरकार ने ये कह कर टाल दिया की आपकी सेवा का कोई प्रमाण नही है , जब शर्मा जी ने अपने प्रमाण पत्र भेजे जो कहा गया चूंकि भारत १९४७ में आजाद हो गया तो आपको ५२ तक फोर्स के लिए काम करने की जरुरत नही थी आपका सेवा काल सं ४७ तक ही माना जाएगा। और चूंकि पेंशन के लिए कम से कम १० साल की सेवा ज़रूरी है , इसलिए आपको पेंशन नही मिल सकती। शर्मा जी कहते हैं कि आज़ादी के वक्त वह पाकिस्तान में तैनात थे उनसे कहा गया कि रोयाल एयर फोर्स उसी तरह उनकी सेवा लेती रहेगी , वह फोर्स के नियमित कर्मचारी रहेंगे लेकिन जब पाकिस्तान में दंगे होने लगे तो शर्मा जी ने अपना नाम फकीर चंद रखा और कई मील पैदल चल के जनवरी कि ठंडक में नंगे बदन सरहद पार करके १९५३ में भारत पहुचे । उनके पास सभी प्रमाण मौजूद हैं कि वह १९५२ तक रोयाल एयर फोर्स के नियमित कर्मचारी रहे हैं। शर्मा जी कहते हैं कि लड़ाई पैसों कि नही इन्साफ की है । मैं अपने सभी पत्रकार भाइयों से अनुरोध करता हूँ कि अगर आपको लगता है कि शर्मा जी पर एक सार्थक स्टोरी बन सकता है तो कृपया जल्दी करें क्यूंकि शर्मा जी के पास वक्त नही है ........... और फ़िर आप भी तो खली से ऊब गए होंगे ! धन्यवाद ! - हिमांशु बाज्पयी असली पोस्ट देखे http://cavssanchar.blogspot.com/2008/05/blog-post_13.html

Sunday, May 18, 2008

अरे क्या हो गया रंगकर्मियो पूरा हफ्ता गुजर गया कोई नई पोस्ट नही । क्या सारे रंग सूख गये या ब्रश झाडू हो गये? ऐसा कैसा चलेगा भाईयों और बहनो, भांजों और भांजियों, भतीजों और भतीजियों, पोते और पोतियों, नातिनों और नातीयों, कुछ करो , उठाओ कलम और दौडो कागज पर। सुना है दिल्ली में तूफान और बारिश के बाद थोडी ठंडक आई है मन में भी तो नये अंकुर फूटे होंगे, तो फिर देर किस बात की । इंतजार है कुछ नई कलाकृ़तियोंका ।

Friday, May 9, 2008

मन में उमंग

पानी में तरंग मन में उमंग प्रेम की पतंग उठने दो रिमझिम बरसात धडधड प्रपात मनका अवसाद गिरने दो रात की बात सपनों का साथ हाथों में हाथ रहने दो वीणा झंकार विविध प्रकार सपनें साकार होने दो

Wednesday, May 7, 2008

स्पर्श ज़िन्दगी का ....

रफ्ता - रफ्ता बातो की कडिया जुडी ज़िन्दगी अपना वेग तेज हवा में ले उडी जमी पर अब पाओ कंहा रहे गीतों की नदिया जैसे बह चली परिचय हुआ मात्र धडकनों की चहातो का पर स्पर्श जैसे अपना ज़िन्दगी से हो गया.... कीर्ती वैद्य....1st April 2008

Sunday, May 4, 2008

आंसू भी खनकते हैं...

हंसते हैं उजालों में रातों में तड़पते हैं जज़्बात मुहब्बत के मुश्किल से संभलते हैं ये इश्क नहीं आसाँ दरिया है शरारों का जो मौज से बचते हैं साहिल पे पिघलते हैं ज़ख्मों की कमाई है ख़्वाबों के खजाने हैं पलकों की तिजोरी में आंसू भी खनकते हैं जब याद सताती है भूले से सितमगर की इक साथ कई शीशे नस नस में चट्कते हैं आंखों की लड़ाई में कुछ हाथ नहीं आता इस खेल में शातिर भी करवट ही बदलते हैं कुछ वस्ल के अफ़साने कुछ हिज्र के नजराने 'तनहा' की निगाहों में दिन रात मचलते हैं -- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा'

Thursday, May 1, 2008

मन

मन चंचल चंचल मन कोमल कोमल मन विमल विमल अति तरल तरल मन गति, गतिमान मन शक्ती, शक्तीमान मन पवन पवन मन हवन हवन मन खल कामी दुष्ट मन शांत अति शिष्ट मन आसुरी आसुरी मन बाँसुरी बाँसुरी मन तरंग तरंग मन पतंग पतंग मन लहरा लहरा मन गहरा गहरा मन जाना पहचाना लगे दोस्त सा पुराना मन लगे अनजाना इसका न कोई ठिकाना

Sunday, April 27, 2008

कभी देखो किसी से दिल बदल के ...

दरो - दीवार की हद से निकल के अकेले हर कदम रक्खो सँभल के बदल डालो मआनी ज़िंदगी के कभी देखो किसी से दिल बदल के सँभालो आईना ये काग़ज़ी है गुरूर-ऐ- हुस्न का प्याला न छलके मसाइल हल न होंगे खंजरों से कटेगा हर सफ़र इक साथ चलके जलाओगे हमें ' तनहा ' जलोगे मिटोगे शमा की मानिंद जल के --- प्रमोद कुमार कुश ' तनहा '

Friday, April 25, 2008

ओह ...लड़की हुई है

महिला जिनके साथ ३२ साल जुड़ी रही, एक खुशमिजाज़ महिला जो घर के हर काम में निपुण थी अपनी बहु की लाडली सास जब भी उनकी कोई भी बहु गरभती होती तों उसके हजारो नखरे सर आंखो पर उठाती कभी उनके सर तेल डालती कभी उनकी रूचि का खट्टा - मीठा पकवान बनाती बच्चे के जनम के समय हमेशा सब से आगे हॉस्पिटल में खड़ी रहती ..कोई समस्या तों नही ....सब ठीक तों हैना डॉक्टर जी तभी एक नर्स लेबर रूम से चिल्लाती आती है "माता जी लड़की हुई है" ......और माता जी का पीला चेहरा और वो शब्द " ओह ...लड़की हुई है " जाने क्यों यह शब्द मुझे हमेशा उनसे बहुत दूर खींच ले जाते, ऐसा लगता की उन्होने मुझे और अपने को भी गाली दी है क्या सच में लड़की का होना अपराध है ? क्या एक औरत को दूसरी औरत का नव स्वागत ऐसे करना चाहिए ? क्यों लड़कियों और लड़को की परवरिश में भी फर्क रखा जाता है जबकि दोनों एक ही घर के बच्चे है , लड़का होता है तों ढोल पीते जाते है पूरे शहर का मुँह मीठा किया जाता है और अपनी ही बेटी के जन्म पर अपना ही मुँह खट्टा हो जाता है देश प्रगति की रहा पर है, शिकषित लोगो की संख्या बढ़ रही है पर हमारी सबकी सोच अब भी वंही के वंही थकी और बीमार पड़ी है कीर्ती वैद्य .....

Thursday, April 24, 2008

हमने ज़िन्दगी को...



आज मीठी धूप को अंगना से
नज़र झुकाए गुजरते देखा..
अलसाये मौसम की आँखों में
बेशुमार इश्क उमडते देखा
पीले फूलों की क्यारियों को
प्रेम गीत, गुनगुनाते सुना
भंवरा बेचारा भर रहा
आहे...शायद वो अकेला पड़ा
उदासी के आलम में भि
हमने ज़िन्दगी को, आज
नए रंग में पसरते देखा......

कीर्ती वैद्य २२ अप्रैल 2008

Thursday, April 17, 2008

तिब्बतीयों को आजादी कब मिलेगी.............

तकरीबन २ महीने से हमारे पड़ोसी देश तिब्बत के हालात काफी नाजुक दौर से गुजर रहे है। चीन की अति दमनकारी नीति से वहां के सारे नागरिक परेशान है। तिब्बत अब आजादी चाहता है..... और भारत में उसी विद्रोह की झलक हम हर दिन देख रहे है..... लेकिन कल पहली बार मैं तिब्बतियों का विरोध प्रदर्शन कवर करने गई थी..... पर वहां पर जो देखा वो शायद मैने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा था .... जंतर मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन था तो शांतिपूर्ण.... लेकिन वहां पर लगे हर पोस्टर में छिपे थे उनकी दर्द की वो कहानी जो बिना बोले सब कुछ बयां कर रही थी...... किसी का सर नहीं था तो किसी का हाथ नहीं कोई फटे कपड़ो में था तो कोई पूरी तरह से नग्न...छोटा बच्चा खून से लथपथ अपनी मां के पेट पर रो रहा था.... आकिर उस छोटे बच्चें से क्या दुशमनी थी.......क्या दुनिया एक मानव समाज है उस तिब्बती महिला की दास्ता सुनकर तो अब ऐसा नहीं लगता है..... यहीं पर एक महिला ने मुझे बताया कि ये जो आप देख रही है वो तो कुछ नहीं है चीन में तो दुध मुहें बच्चों का तंदुर में पका कर चिकन की तरह खा जाते है। इंसान और जानवर में कोई फर्क न रहा। ये संघर्ष कब खत्म होगा..... तिब्बत को आजादी कब मिलेगी.... तिब्बत को आजादी न मिलने का मतलब भारत के लिए भी मुश्किले बढ़ना है....... । मैं खुले तौर पर तिब्बतियों का समर्थन करती हूं आप क्या सोचते है इस बारे में जरूर लिखे । तूलिका सिंह

Monday, April 14, 2008


कल थी १३ अप्रैल और हम सब एक बार फिर कुछ भूल गए ..... कल के ही दिन १९१९ में जलियांवाला बाग़ में कातिल डायर के हाथों सैकडो निर्दोषों की जान गई थी कुछ याद पडा ? खैर कोई बड़ी बात नहीं हैं क्यूंकि अब यह आम बात हैं दरअसल फ़िल्म अभिनेताओ के जन्मदिन याद रखते रखते अब हम ये सब छोटी मोटी बातें भूलने लगे हैं ...


पर माफ़ी चाहूँगा कि मैंने जुर्रत की याद दिलाने की पर अब याद आ ही गई हैं तो भगत सिंह की डायरी से कुछ , यह कविता भगत सिंह ने जतीन दा की मृत्यु पर पढी थी, जिसके लेखक यू एन फिग्नर थे,


जो तेजस्वी था वह धराशायी हो गया
वे दफ़न किए गए किसी सूने में
कोई नहीं रोया उनके लिए
अजनबी हाथ उन्हें ले गए कब्र तक
कोई क्रोस नही
कोई शिलालेख नहीं बताता उनका गौरवशाली नाम
उनके ऊपर उग आई है घास ,
जिसकी झुकी पत्ती सहेजे है रहस्य
किनारे से बेतहाशा टकराती लहरों के सिवा
कोई इसका साक्षी नहीं
मगर वे शक्तिशाली लहरें
दूरवर्ती गृह तक विदा संदेश नहीं ले जा सकती ........


कुल मिला हम आगे भी शायद इनका बलिदान याद नहीं रखने वाले हैं जब तक कि याद न दिलाया जाए ! खैर कुछ लोग हमेशा इस याद दिलाने के काम में लगे रहेंगे .....


धन्यवाद महान नेताओं को
जागरूक मीडिया को
सेवक समाज सेवियो को
साम्यवादी कलाकारों को
देशभक्तों को परदे पर उतारते फ़िल्म कलाकारों को
बुद्धिजीविओं को
विद्वानों को
हम सबको
जो आज का दिन भूल गए
ठीक ही है .....
जब सामने मरता आदमी नहीं दिखता
तो वो तो बहुत पहले मर चुके !!
जलियावाला बाग़ में आज के दिन १९१९ में रोलेट एक्ट का विरोध करने एक आम सभा में करीब २० हज़ार लोग इकट्ठा हुए थे ........ दिन था फसलों के त्यौहार बैसाखी का ...... बाग़ से निकलने के इकलौते रास्ते को बंद करवा कर पंजाब के लेफ्टिनेंट माइकल ओ डायार ने १६५० राउंड फायर करवाए ....निर्दोष औरत, बच्चे , बूढे, और पुरूष क़त्ल...............१५०० घायल !!!
भूल गए
हो गई गलती .....
आख़िर कहाँ तक याद रखें ....!
मार्च १९४० में उधम सिंह ने डायर की लंदन में हत्या की ..... मकसद था जलियावाला का बदला लेना फांसी दिए जाने पर उधम सिंह ने कहा,
" मुझे अपनी मौत का कोई अफ़सोस नहीं है। मैंने जो कुछ भी किया उसके पीछे एक मकसद था जो पूरा हुआ ! "


पर हम भूल गए क्या कोई मकसद है हमारे पास ?????
सोचना शुरू करिये ....... आख़िर आप सब पत्रकार हैं !

सुनहरे भविष्य की शुभकामनाएं !!!

मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@जीमेल.com

Monday, April 7, 2008

मैं कौन ...


आज भि यही सवाल मेरे ज़हन
ढूँढ रही ना जाने कब से, मैं कौन?

शायद वो...
जो गुडयिया से घर-घर खेले
नाक -चश्मा, काँधे बस्ता
कच्ची सड़क नाप, सकूल पहुँच जाये
रोज़, ढूध इक सांस में गटक
घंटो साईकल लिए फिरे

शायद वो....
गीतों के धुन पे मोरनी बन नाचे
कटी पतंगो,कभी तितलियों के पीछे भागे
रोज़ घुटने कभी कोहनी चोट खाये
माँ की डांट पर कोने बैठ मुँह फुलाये
बहना से लड़ उसकी टोफ्फी चुरा खाये

शायद वो...
चोरी से सिगरेट के छल्ले बनाना सीखे
कभी बियर के बोतलों में ज़िन्दगी ढूंढे
कभी इक सांस में मंदिर की सीढिया चढ़े
कभी सालो इश्वर को अपने में ही ढूंढे

शायद वो...
बिन परवाह किये बिन सब बंधन तोड़ दे
अपनी हथेली सजी मेहंदी को ही रोंद दे
कभी बन पहाड़ घर-परिवार संभाले
कभी शोला बन दुनिया फूंक डाले ..

शायद वो...
इंसानी रिश्तो को बारीकी से समझे
कभी उन्ही रिश्तो में छली जाये
आधी अधूरी ज़िन्दगी को हाथो में समेटे
कभी दुनिया को अलविदा कह जाये

फिर भि अब तलक ना पता
मैं कौन ... ?

कीर्ती वैद्य ....०५ अप्रैल २००८

Tuesday, April 1, 2008

तुक्तक

कल आज परसों क्यूं है गिनना यह क्षण अपना है, इसी को पकडना सारा का सारा आनंद लेना, और धीरे से अगले क्षण में है जाना । बहती सरिता सा जीवन फूलों सा खिलता जीवन पंछी सा उडता जीवन हंसता मुस्काता जीवन मेरा तुम्हारा इसका उसका कुछ भी नही है, जो है वो सबका मुश्किल है लेकिन असंभव नही है मानना और आज़माना भी इसका आदमी का सिर्फ मन ही हो शरीर हो ही नही कितना स्वतंत्र हो जायेगा तब वह जब बंधन हो ही नही कहीं भी जाना, कुछ भी करना मोक्ष जिसे कहते है वो यही हो कुछ और हो ही नही

सुरक्षा अस्त्र

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