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Sunday, September 7, 2008

आवाज़ .....

काफ़ी दिनों से इस कविता को पूरा करने के लिए परेशान था सो आज हो ही गई ...... ये हम सबकी हकीक़त है ..... सब जो सोचा करते हैं, तो पढ़ें ....

चुप रहो

तुम्हारी आवाज़

दूसरों के कानों तक न जाए

यही बेहतर है

तुम्हारी आवाज़

हो सकता है

सच बोले

जो दूसरों को हो नापसंद

तो कर लो इसे बंद

तुम्हारी आवाज़

हो सकता है

तुम्हारे पक्ष में हो

और उनको लगे अपने ख़िलाफ़

वो करेंगे नहीं माफ़

तुम्हारी आवाज़

हो सकता है इतनी बुलंद हो

कि उनके कानों के परदे फट जायें

फिर तुम्हारे साथी भी

तुमसे कट जाएँ

तुम्हारी आवाज़

दूसरी आवाजों से अलग हुई

तो

उन आवाजों को अच्छा नहीं लगेगा

वो

तब ?

तुम्हारी आवाज़ में

सवाल हो सकते हैं

सवालों से बडों का अपमान होता है

तुम्हारी आवाज़ में

अगर जवाब हुए तो

उनका हत मान होता है

तुम्हारी आवाज़

भले तुमको मधुर लगे

पर उनको ये पसंद नहीं

इसलिए

या तो चुप रहो

या फिर ज़ोर से चिल्लाओ

दुनिया को भूल जाओ

बंधन क्यूंकि

टूटने को उत्सुक है

4 comments:

राज भाटिय़ा said...

अति सुन्दर कविता
धन्यवाद

vijaymaudgill said...

kya baat hai dost. bahut hi badhia.
mujhe lagta hai ki apki bhi awaz buland hi hai.

badhai ho itni sundar rachna ke liye.

venus kesari said...

आवाज को बुलंद करिए चुप न रहिये

अच्छी कविता
वीनस केसरी

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत सुंदर..
धन्यवाद

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