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Thursday, August 21, 2008

"काफी है "
वफ़ा का मेरी अब और क्या हसीं इनाम मिले मुझको, जिन्दगी भर दगाबाजी का सिर पे एक इल्जाम काफी है. बनके दीवार दुनिया के निशाने खंजर से बचाया था, होठ सी के नाम को भी राजे दिल मे छुपाया था, उसी महबूब के हाथों यूं नामे-ऐ -बदनाम काफी है ... यादों मे जागकर जिनकी रात भर आँखों को जलाते थे , सोच कर पल पल उनकी बात होश तक भी गवाते थे , मुकम-ऐ- मोह्हब्त मे मिली तन्हाई का एहसान काफी है…. कभी लम्बी लम्बी मुलाकतें, और सर्द वो चांदनी रातें, चाहत से भरे नगमे अब वो अफसाने अधुरें है , जीने को सिर्फ़ जहर –ऐ - जुदाई का ये भी अंजाम काफी है

4 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर,अति सुन्दर भाव
धन्यवाद

Anwar Qureshi said...

अच्छा लिखा है आप ने शुक्रिया आप का ..

Rakesh Kaushik said...

it's really thoughtfull

i like it

केतन कनौजिया said...

कभी लम्बी लम्बी मुलाकतें, और सर्द वो चांदनी रातें,
चाहत से भरे नगमे अब वो अफसाने अधुरें है ,
जीने को सिर्फ़ जहर –ऐ - जुदाई का ये भी अंजाम काफी है


khoob ehsaas... behad accha likha hai... yun hi kayam rakhiye zor-e-kalam...

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