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Sunday, February 8, 2009

आदत

हमारी बोलने की आदत से परेशां होते हो तुम और गुस्सा करके चले जाते हो कही आज देखो हम मौन है और हमारे आसपास बिखरी अनगिनत खामोशिया फिर भी तुम्हारी गुस्सा करने की अदा का इंतज़ार बाकि शायाद अपनी अपनी आदत की बात है .......

7 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत गहरी बात कह दी आप ने इस छोटी सी कविता मे .
धन्यवाद

अविनाश said...

चले जाते हो कही
आज देखो हम मौन है
और हमारे आसपास बिखरी
अनगिनत खामोशिया

MARKANDEY RAI said...

एक अजब खामोश धड़कन
शुन्य में भी आती जीसकी आवाज
खोजता हूँ हर तरफ़
दर्द का पता नही
हर रोज सवाल करता हूँ
समाधान पाता नही
एक अजब खामोश धड़कन
वीचलीतहो रहा मन
मन वीराने में घुलकर खो गया
लगा राह में कही पर गुम हो गया
बेजान आखें देखती रही
वह आखों से ओझल हो गया
एक सुनसान घर
देखता रहा एकटक
अंदर से आती आवाज
वो अजीब अँधेरी रात
मै गया सहम
एक अजब खामोश धड़कन

MARKANDEY RAI said...

hum maun hai line bahut meaningful hai.

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut sunder mehek ji.

shyam kori 'uday' said...

... बहुत खूब, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

हमारी बोलने की आदत से
परेशां होते हो तुम
और गुस्सा करके
चले जाते हो कही.
आज देखो हम मौन है
और हमारे आसपास बिखरी
अनगिनत खामोशिया
फिर भी तुम्हारी गुस्सा करने की
अदा का इंतज़ार बाकि
शायाद अपनी अपनी आदत की बात है |
--------


महक जी,

आपकी यह कविता मेरे वर्तमान जीवन की सच्चाई से बहुत मिलती है | दिल की गहराईयों तक उतर गई |मेरे अंतर्मन को छू लिया |

खामोशियाँ भी बोलती हैं.......

जब तुम पास थे,

तब...

हर शै चहकती थी
हर दिशा सतरंगी थी
हर फ़िज़ां में रंगत थी
हर नज़र में तुम ही तुम थीं

अब तुम पास नहीं हो
अब खामोशियाँ भी खामोश हैं
और
तन्हाईयाँ भी तन्हाँ........

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