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Thursday, May 22, 2008

एहसास

उम्मीदों को दम घुटते देखा है मैंनें

सपनों को टूटते देखा है मैंनें

आशाओं की पलकों पर

ओस सी मखमली

पल में ढुलक पड़ती

कपोलों के धरातल पर अपना अधिकार समझ

ये जान कि व्यर्थ हो जाएगी ये बूंद

अपने में समेटे एहसास को

ये बूंद हो सकती है निर्जीव

लेकिन एहसास नहीं

वो तो फिर जागेंगे

छूने को नया आकाश

फिर उमड़ेंगे

शायद फिर बरसने को

या फिर हवा के तेज़ बहाव के साथ आगे बढ जाने को

तलाशने नया धरातल

नयी उम्मीद, नयी आशा, नये एहसास के साथ................

3 comments:

Keerti Vaidya said...

very nice....maza aa gaya padh kar.......likhti rahey hamesha ..

pramod kumar kush 'tanha' said...

लेकिन एहसास नहीं
वो तो फिर जागेंगे
छूने को नया आकाश
फिर उमड़ेंगे
शायद फिर बरसने को...

behad khoobsurat likha hai Smriti ji aapne.Badhaayee..
p k kush 'tanha'

Mrs. Asha Joglekar said...

आँसुओं से ही नये अहसास जागेंगे और वे व्यर्थ नही जायेंगे सार्थक हो जायेंगे ।

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