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Wednesday, December 31, 2008

साल 2008

1. दिल्ली भी थर्राया, जयपुर बंगलोर भी थर्राई इस साल खुनी खेल में मुंबई भी नहाई क्या याद करे क्या बात करे साल 2008 की जश्न अधुरा नए साल का हर दिल में है खौफ समाई. 2. इस बीच इंडियन क्रिकेट का ऐसा कायापलट हुआ ICL और IPL का मुकाबला भी गज़ब हुआ क्रिकेट के आगे फुटबॉल हॉकी पानी भरते रहे धोनी नम्बर 1, सीढियाँ ऊपर चढ़ते रहे. 3. विश्व-अर्थव्यवस्था की बिगड़ी ऐसी चाल मार्केट गिरा मुंह के बल आया ऐसा भूचाल आया ऐसा भूचाल अमेरिका भी हारा रिजर्व बैंक हो या वर्ल्ड बैंक सब बेचारा कहत सुलभ कविराय कोई उपाय न सूझे रोजगार के हजारो दीये पलभर में बूझे Happy New Year to Rangkarmi family and all Readers. - Sulabh Jaiswal

अलविदा-2008

साल 2008 का अन्तिम सूर्यास्त
जैसे कह रहा हो :-
सूरज हूँ ज़िन्दगी की रमक छोड़ जाऊँगा, मैं डूब भी गया तो शफक छोड़ जाऊँगा।

" नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं"

" नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं"
दुखदायी जो पल थे उन्हें भुलाएं मधुर स्म्रतियों से नव वर्ष को गले लगायें , करते है दुआ हम रब से सर झुकाके ... इस साल के सारे सपने पुरे हो आपके.
"नव वर्ष २००९ - आप सभी ब्लॉग परिवार और समस्त देश वासियों के परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं "

आया नव वर्ष आया

आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार दे रहा है ये दस्तक , बार बार ! बीते बरस की बातों को , दे बिसार लेकर आया है ये , खुशियाँ और प्यार ! खुले बाहों से स्वागत कर ,इसका यार और मान ,अपने ईश्वर का आभार ! आओ , कुछ नया संकल्प करें यार मिटायें ,आपसी बैर ,भेदभाव ,यार ! लोगो में बाटें ,दोस्ती का उपहार और दिलो में भरे , बस प्यार ही प्यार ! अपने घर, समाज, और देश से करें प्यार हम सब एक है , ये दुनिया को बता दे यार ! कोई नया हूनर ,आओ सीखें यार जमाने को बता दे , हम क्या है यार ! आप सबको ,है विजय का प्यारा सा नमस्कार नव वर्ष मंगलमय हो ,यही है मेरी कामना यार ! आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार दे रहा है ये दस्तक , बार बार !

प्रीत,प्यार और स्नेह की धरा पर

वृन्दावन,नंदगाँव,बरसाना ये वो जगह है जहाँ पर श्री कृष्ण- राधा के अलावा कुछ भी नहीं है। गत पांच दिनों में से चार दिन इन्ही के सानिध्य में गुजरे। राधा कभी थी या नहीं, लेकिन आज इन स्थानों के चप्पे चप्पे पर राधा ही राधा है। बहती हवा राधा राधा करके कान के पास से उसके होने का अहसास करवाती है। दीवारों पर राधा, श्री राधा लिखा हुआ है। एक रिक्शा वाला भी घंटी नहीं बजाता, राधे राधे बोलकर राहगीरों को रास्ता छोड़ने को कहता है। वृन्दावन में ५५०० मन्दिर हैं। सब के सब राधा कृष्ण के। बांके बिहारी का मन्दिर, कोई समय ऐसा नहीं जब भीड़ ना होती हो। मन्दिर में आते ही मन निर्मल हो जाता है। आंखों के सामने, मन में केवल होता है बांके बिहारी। रास बिहारी मन्दिर। मन्दिर में चार शतक पुरानी मूर्तियाँ हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे आज ही उनको घडा गया हो। मन्दिर का रूप रंग देखते देखते मन नहीं भरता। श्री रंगराज का मन्दिर। मन्दिर में सोने की मूर्तियाँ, उनके सोने के वाहन,सोने के गरुड़ खंभ। क्या कहने! गोवर्धन की परिकर्मा। लोगों की आस्था को नमन करने के अलावा कुछ करने को जी नहीं हुआ। वाहन के लोग कहते हैं। वृन्दावन,नंदगाँव,बरसाना दूध दही का खाना। इस क्षेत्र में ताली बजाकर हंसने का भी बहुत महत्व है। हर किसी से सुनने को मिल जाएगा-जो वृन्दावन में हँसे,उसका घर सुख से बसे। जो वृन्दावन में roye वो अपने नैना खोये।वहां मधुवन है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ श्री कृष्ण गोपियों के संग रास रचाया करते थे। अब भी ऐसा होता है। इसलिए मधुवन में रात को किसी को भी रुकने नही दिया जाता। बाकायदा ढूंढ़ ढूंढ़ कर सबको वन से बहार निकल दिया जाता है। वृन्दावन में बंदरों का बहुत बोलबाला है। लेकिन आप उनके सामने राधे राधे बोलोगे तो बन्दर चुपचाप आपके निकट से चला जाएगा। इन बंदरों को चश्मा और पर्स बहुत पसंद हैं। पलक झपकते ही आपका चश्मा उतार लेंगें। इसलिए जगह जगह लिखा हुआ है कि चश्मा और पर्स संभाल कर रखें। यहाँ एक मन्दिर है इस्कोन। मन्दिर में कैमरा मोबाइल फ़ोन तक नहीं ले जा सकते। मन्दिर के अन्दर आरती के समय जब "हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" के स्वर गूंजते हैं तो हर कोई अपने आप ही झुमने को मजबूर हो जाता है। कृष्ण नाम की ऐसी मस्ती आती है की मन्दिर से जाने को जी नहीं करता। मथुरा तो है ही कृष्ण की जन्म स्थली। जन्म स्थली पर सी आर पी एफ की चौकसी है। सब कुछ देखने लायक। चार दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। अब उस व्यक्ति के बारे जिसकी भावना के चलते हम इन स्थानों के दर्शन कर सके। उनका नाम हैं श्री मारुती नंदन शास्त्री। कथा वाचक हैं, मुझ से स्नेह करतें हैं। उनका कोई आयोजन था। उन्होंने स्नेह से बुलाया और हम कच्चे धागे से बंधे चले गए। कहतें हैं कि वृन्दावन में किसी ना किसी बहाने से ही आना होता है। अगर आप सीधे वृन्दावन आने को प्रोग्राम बनाओगे तो आना सम्भव नही होता। इसलिए शास्त्री जी को धन्यवाद जिनके कारन हम प्रेम की नगरी में आ सके।

कम्बल

तेरी यादों का कम्बल लपेट कर घुमती है वो आज कल गुलाबी ठण्ड को इससे बढ़िया गर्माहट भला मिलती और कही

Tuesday, December 30, 2008

युद्ध? को भी बना देंगें बाज़ार

इतने दिन कहाँ रहा, ये चर्चा बाद में, पहले उस "युद्ध" की बात जिसका अभी कोई अता पता ही नही है। इन दिनों शायद ही कोई ऐसा मीडिया होगा जो "युद्ध" युद्ध" ना चिल्ला रहा हो। हर कोई "युद्ध" को अपने पाठकों को "बेच" रहा है जैसे कोई पांच पांच पैसे की गोली बेच रहा हो। इतने जिम्मेदार लोगों ने इसको बहुत ही हलके तरीके से ले रखा है। मेरा शहर बॉर्डर के निकट है। हमने १९७१ के युद्ध के समय भी बहुत कुछ झेला और देखा। इसके बाद वह समय भी देखा जब संसद पर हमले के बाद सीमा के निकट सेना को भेज दिया गया था। बॉर्डर के पास बारूदी सुरंगे बिछाई गई थी। तब पता नहीं कितने ही लोग इन सुरंगों की चपेट में आकर विकलांग हो गए। अब ऐसी कोई बात नहीं है। मैं ख़ुद बॉर्डर पर होकर आया हूँ। पुरा हाल देखा और जाना है। पाक में चाहे जो हो रहा हो, भारत में सेना अभी भी अपनी बैरकों में ही है। बॉर्डर की और जाने वाली किसी सड़क या गली पर सेना की आवाजाही नहीं है। मीडिया में पता नहीं क्या क्या दिखाया,बोला और लिखा जा रहा है। ठीक है वातावरण में तनाव है, दोनों पक्षों में वाक युद्ध हो रहा है, मगर इसको युद्ध की तरह परोसना, कमाल है या मज़बूरी?अख़बारों में बॉर्डर के निकट रहने वाले लोगों के देश प्रेम से ओत प्रोत वक्तव्य छाप रहें हैं।अब कोई ये तो कहने से रहा कि हम कमजोर हैं या हम सेना को अपने खेत नहीं देंगें। मुफ्त में देता भी कौन है। जिस जिस खेत में सुरंगें बिछाई गई थीं उनके मालिकों को हर्जाना दिया गया था। हमारे इस बॉर्डर पर तो सीमा सुरक्षा बल अपनी ड्यूटी कर रहा है. सेना उनके आस पास नहीं है। हैरानी तो तब होती है जब दिल्ली ,जयपुर के बड़े बड़े पत्रकार ये कहतें हैं कि आपके इलाके में सेना की हलचल शुरू हो गई। अब उनको कौन बताये कि इस इलाके में कई सैनिक छावनियां हैं , ऐसे में यहाँ सेना की हलचल एक सामान्य बात है। आम जन सही कहता है कि युद्ध केवल मीडिया में हो रहा है।

Saturday, December 27, 2008

चोरी करना पाप है

हद है! अब ब्लॉग पर भी चोरी होने लगी ।मामला ताजा है , फरवरी २००८ में ही कृत्या मॆ धूमिल पर एक आलेख छपा था, लेखक थे जाने माने कवि और आलोचक भाई सुशील कुमार। अब इसी को शब्दशः चुरा कर मुकुन्द नामक व्यक्ति ने कालचक्र पर छाप दिया है। यहाँ तक कि क़ोटेशन भी वही है।यह ब्लाग की मस्त कलन्दरी दुनिया को गन्दा करने वाला प्रयास है। इसकी लानत मलामत की जानी चाहिये।सबूत के लिये यहाँ

दोनों लिन्क दे रहा हूँ ।http://www.kritya.in/0309/hn/editors_choice.html इस पर सुशील जी का आलेख फ़रवरी मे छपा।http://kalchakra-mukund.blogspot.com/2008/09/blog-post_5626.html इस पर है मुकुन्द जी का स्वचुरित लेख है।

फ़ैसला आप ब्लागर देश के नागरिकों का।

Thursday, December 25, 2008

हैप्पी क्रिसमस

आप सभी को

रंगकर्मी परिवार की ओर से

क्रिसमस की ढेरों शुभकामनाऐं।

Monday, December 22, 2008

मंदी की मार, पत्रकार बेकार

श्रीगंगानगर में पत्रकारों पर मंदी की मार का असर होने लगा है। हिंदुस्तान के सबसे बड़े प्रिंट मीडिया ग्रुप दैनिक भास्कर के श्रीगंगानगर संस्करण से दो पत्रकारों को नौकरी से अलग कर दिया गया है। इसके विरोध में आज राजस्थान पत्रकार संघ और श्रमजीवी पत्रकार संघ ने अखबार के स्थानीय ऑफिस के आगे धरना देकर एक ज्ञापन कार्यकारी सम्पादक को दिया। ज्ञापन ग्रुप के चेयरमेन के नाम था। धरना स्थल पर अखबार के प्रतियाँ जलाई गईं। यह पहला मौका था जब पत्रकारों के संगठनो ने पत्रकारों को निकाले जाने के विरोध में धरना दिया। श्रीगंगानगर में बड़ी संख्या में दैनिक अख़बार प्रकाशित होते हैं। यहाँ अक्सर कोई ना कोई अखबार के sanchalak किसी reporter को रखते या नौकरी से अलग करते रहें हैं।तीन माह पहले तो एक चलता दैनिक अख़बार समाचार भारती अचानक बंद कर दिया गया। वी ओ आई ने अपना श्रीगंगानगर ऑफिस बंद करके कई जनों को चलता कर दिया था। तब किसी ने इस प्रकार का विरोध नही किया। चलो, देर आयद दुरस्त आयद। उम्मीद है यह सिलसिला बरक़रार रहेगा।

Sunday, December 21, 2008

मैं चाहता हूं

मैं चाहता हूं एक दिन आओ तुम इस तरह कि जैसे यूं ही आ जाती है ओस की बूंद किसी उदास पीले पत्ते पर और थिरकती रहती है देर तक मैं चाहता हूं एक दिन आओ तुम जैसे यूं ही किसी सुबह की पहली अंगड़ाइ के साथ होठों पर आ जाता है वर्षों पहले सुना कोई सादा सा गीत और पहले चुम्बन के स्वाद सा मैं चाहता हूं एक दिन यूं ही पुकारो तुम मेरा नाम जैसे शब्दों से खेलते-खेलते कोई बच्चा रच देता है पहली कविता और फिर गुनगुनाता रहता है बेखयाली में मैं चाहता हूं यूं ही किसी दिन ढूंढते हुए कुछ और तुम ढूंढ लो मेरे कोई पुराना सा ख़त और उदास होने से पहले देर तक मुस्कराती रहो मै चाहता हूँ यूँ ही कभी आ बैठो तुम उस पुराने रेस्तरां की पुरानी वाली सीट पर और सिर्फ एक काफी मंगाकर दोनों हाथों से पियो बारी बारी मैं चाहता हूँ इस तेजी से भागती समय की गाड़ी के लिए कुछ मासूम से कस्बाई स्टेशन

अशोक कुमार पाण्डेय

http://asuvidha.blogspot.com/

एक छोटी सी कहानी-प्यार की

एक अंधी लडकी थी । उसे उसके एक दोस्त के अलावा सबने ठुकरा दिया था । पर वो दोस्त उससे बहुत प्यार करता था । लडकी रोज़ उससे ये कहती कि अगर वो उसे देख पाती तो उसी से शादी करती । एक दिन किसी ने उस लडकी को अपने आंखे दे दीं । जब वो देखने लगी तो उसने देखा की उसका वह दोस्त अंधा था । लड़के ने उससे पूछा की क्या अब वो उससे शादी करेगी ? लडकी ने साफ़ इनकार कर दिया । इस पर उसका दोस्त मुस्कुराया और चुप चाप उसे एक कागज़ देकर चला गया । उस पर लिखा था -
"मेरी आखों का ख्याल रखना"

बचपन के अनोखे दिन

बचपन में हम उन दिनों बहुत ज्यादा शरमाते थे. कविता के दो लाइन भी खुलकर नही बोल पाते थे.

दूरदर्शन के आगे बैठ जंगल- जिंगल गाते थे. पापा घर में आ जाये तब डर से उनके घबराते थे.  

....................आगे पढ़े

Saturday, December 20, 2008

----चुटकी----

जिसका ना दीन ना कोई ईमान, उसका नाम है पाकिस्तान। ----गोविन्द गोयल

Friday, December 19, 2008

कमाऊ पूत की उपेक्षा

अक्सर यह सुनने को मिल ही जाता है कि माँ भी उस संतान का थोड़ा पक्ष जरुर लेती है जो घर चलने में सबसे अधिक योगदान देता हो। किंतु राजनीति में ऐसा नही है। ऐसा होता तो राजस्थान के सी एम अशोक गहलोत अपने मंत्री मंडल गठन में श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ की उपेक्षा नही करते। दोनों जिले खासकर श्रीगंगानगर आर्थिक,सामाजिकऔर सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। किंतु श्री गहलोत ने अपने मंत्री मंडल में इस जिले के किसी विधायक को शामिल नही किया। यह जिला सरकार को सबसे अधिक राजस्व देता है,लेकिन इसकी कोई राजनीतिक पहुँच दिल्ली और जयपुर के राजनीतिक गलियारों में नही है। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिले से कांग्रेस को ६ विधायक मिले। इसके अलावा २ निर्दलियों ने सरकार बनने हेतु अशोक गहलोत ने समर्थन दिया। समर्थन देने वाला एक निर्दलीय सिख समाज से है इसी ने सबसे पहले अशोक गहलोत को समर्थन दिया। यह पहले भी विधायक रह चुका है। सब लोग यहाँ तक की मीडिया भी सभी क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व मिलने के गीत गा रहा है। पता नहीं उनका ध्यान भारत-पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले की ओर क्यूँ नही जाता। क्या इस इलाके के विधायक उस गोलमा देवी जितने भी लायक नहीं जिसको शपथ लेनी भी नही आई। इस से साफ साबित होता है कि जयपुर के राजनीतिक गलियारों में हमारे जिले की क्या अहमियत है। किसी को यह सुनने में अटपटा लगेगा कि राजस्थान के इस लाडले जिले की कई मंडियों में रेल लाइन तक नहीं है जबकि वहां करोड़ों रुपयों का कारोबार हर साल होता है। छोटे से छोटा मुकदमा भी एस पी की इजाजत के बिना दर्ज नही होता। जिला कलेक्टर ओर एस पी नगर की गली ओर बाज़ार तक नहीं जानते। उनके पास नगर के ऐसे पॉँच आदमी भी नहीं जो नगर में कोई कांड होने पर उनकी मदद को आ सके, या उनके कहने से विवाद निपटाने आगे आयें। यहाँ उसी की सुनवाई होती है या तो जिसके पैर में जूता है या काम के पूरे दाम। इसके अलावा कुछ नहीं । हमारें नेताओं में इतनी हिम्मत ही नहीं जो अपना दबदबा जयपुर और दिल्ली के गलियारों में दिखा सकें। "चिंताजनक हैं आज जो हालात मेरी जां,हैं सब ये सियासत के कमालात मेरी जां" "खुदगर्जियों के जाल में उलझे हुये हैं सब,सुनकर समझिये सबके ख्यालात मेरी जां" "अब अपराधियों से ख़ुद ही निपटो, फरियादी का तो रपट लिखवाना मना है"

सुरक्षा अस्त्र

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