Friday, October 16, 2009
लो क सं घ र्ष !: महानायक का पेट कब भरेगा
फ़िल्म जगत के महानायक अमिताभ बच्चन का नाम देश के महानायकों में से आता है और दुनिया में लाखों लोग उनके प्रशंसक है किंतु इस महानायक का नाम हमेशा आर्थिक घोटालो में भी आता रहता है । नई पीढी इस तरह के दो अर्थी चरित्र से क्या प्रेरणा ले और क्या विश्वाश करे मुख्य बात यह है कि महानायक के परम मित्र अमर सिंह के साथ उनके ख़िलाफ़ जनपद कानपुर के बाबूपुरवा थाने में अपराध संख्या 458/09 अर्न्तगत धारा 420, 467 , 468, 471, 120 बी, आई पी सी, 3/7 मनीलॉण्ड़िरिंग एक्ट व 7/8/9/10/13 भ्रष्टाचार निरोधक कानून कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है । इस मामले में लगभग 300 करोड़ रुपये का घोटाला है । इसके पूर्व भी महानायक अमिताभ बच्चन ने बाराबंकी जनपद के दौलतपुर गाँव में अपने नाम रिकॉर्ड रूम के कर्मचारियों से मिलकर अपने नाम ग्राम समाज कि जमीन फर्जी तरीके से अंकित करा ली थी । महानायक को इस भूमि घोटाले में भी काफ़ी विवाद का सामना करना पड़ा था। यदि वह महानायक न होते साधारण व्यक्ति होते तो कई महीने उनको कई महीने कारागार में रहकर जमानत का इन्तजार करना पड़ता ।
इस तरह कि घटनाएँ देख कर लगता है कि महानायक जैसे लोग शुद्ध रूप से आर्थिक अपराधी है। आर्थिक अपराधियों को सजा देने के लिए सक्षम कानूनों का आभाव है जिसका लाभ उठा कर आर्थिक अपराधी तरह-तरह के अपराध कर देश कि अर्थ व्यवस्था को खोखला करते है । दुखद बात यह है कि इस देश के नवनिर्माण के लिए जो लोग प्रेरणा श्रोत्र हो सकते है । उनकी व्यक्तिगत ज़िन्दगी में इस तरह का आचरण दुखदाई है । अमिताभ बच्चन हालावाद के पर्वतक डॉ॰ हरिवंश राय बच्चन के पुत्र भी है और जब ऐसे लोग इस तरह के कृत्य करते है, तो समाज पर और विशेष कर नई पीढी पर इसका अच्छा प्रभाव नही पड़ता है । गंभीरता से सोचने पर यह सवाल आता है कि इस महानायक का पेट कब भरेगा ?
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
जो बोया वही काटेंगे
बंगाल की टीवी रिपोर्टर शोभा दास के खिलाफ केस, चंडीगढ़ में प्रेस से जुड़े लोगों को कमरे में बंद किया, जैसी खबरें अब आम हो गई हैं। महानगरों में रहने वाले,बड़ी बड़ी तनख्वाह पाने वाले, ऊँचे नाम वाले पत्रकारों को कोई अचरज इन ख़बरों से हो तो हो हमें तो नहीं है। हो भी क्यूँ, जो बोया वही तो काट रहें हैं। वर्तमान में अखबार अखबार नहीं रहा एक प्रोडक्ट हो गया और पाठक एक ग्राहक। हर तीस चालीस किलोमीटर पर अखबार में ख़बर बदल जाती है। ग्राहक में तब्दील हो चुके पाठक को लुभाने के लिए नित नई स्कीम चलाई जाती है। पाठक जो चाहता है वह अख़बार मालिक दे नहीं सकता,क्योंकि वह भी तो व्यापारी हो गया। इसलिए उसको ग्राहक में बदलना पड़ा। ग्राहक को तो स्कीम देकर खुश किया जा सकता है पाठक को नहीं। यही हाल न्यूज़ चैनल का हो चुका है। जो ख़बर है वह ख़बर नहीं है। जो ख़बर नहीं है वह बहुत बड़ी ख़बर है। हर ख़बर में बिजनेस,सनसनी,सेक्स,सेलिब्रिटी,क्रिकेट ,या बड़ा क्राईम होना जरुरी हो गया। इनमे से एक भी नहीं है तो ख़बर नहीं है। पहले फाइव डब्ल्यू,वन एच का फार्मूला ख़बर के लिए लागू होता था। अब यह सब नहीं चलता। जब यह फार्मूला था तब अख़बार प्रोडक्ट नहीं था। वह ज़माने लद गए जब पत्रकारों को सम्मान की नजर से देखा जाता था। आजकल तो इनके साथ जो ना हो जाए वह कम। यह सब इसलिए कि आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं। मालिक को वही पत्रकार पसंद आता है जो या तो वह बिजनेस दिलाये या फ़िर उसके लिए सम्बन्ध बना उसके फायदे मालिक के लिए ले। मालिक और अख़बार,न्यूज़ चैनल के टॉप पर बैठे उनके मैनेजर,सलाहाकार उस समय अपना मुहं फेर लेते हैं जब किसी कस्बे,नगर के पत्रकार के साथ प्रशासनिक या ऊँची पहुँच वाला शख्स नाइंसाफी करता है। क्योंकि तब मालिक को पत्रकार को नमस्कार करने में ही अपना फायदा नजर आता है। रिपोर्टर भी कौनसा कम है। एक के साथ मालिक की बेरुखी देख कर भी दूसरा झट से उसकी जगह लेने पहुँच जाता है।उसको इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसके साथी के साथ क्या हुआ,उसे तो बस खाली जगह भरने से मतलब है। अब तो ये देखना है कि जिन जिन न्यूज़ चैनल और अख़बार वालों के रिपोर्टर्स के साथ बुरा सलूक हुआ है,उनके मालिक क्या करते हैं। पत्रकारों से जुड़े संगठनों की क्या प्रतिक्रिया रहती है। अगर मीडिया मालिक केवल मुनाफा ही ध्यान में रखेंगें तो कुछ होनी जानी नहीं। संगठनों में कौनसी एकता है जो किसी की ईंट से ईंट बजा देंगे। उनको भी तो लाला जी के यहाँ नौकरी करनी है। किसी बड़े लाला के बड़े चैनल,अखबार से जुड़े रहने के कारण ही तो पूछ है। वरना तो नारायण नारायण ही है।
Thursday, October 15, 2009
लो क सं घ र्ष !: दीपावली के अवसर पर :
राम बनवास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया, जो नगर में आये
रक्से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
6 दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आए
जगमगाते थे जहाँ राम के कदमो के निशान
प्यार की कहकशां लेती थी अंगडाई जहाँ
मोड़ नफरत के उसी राहगुजर में आये
धर्म क्या उनका था, क्या जात थी, यह जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारे खंजर
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की खता, जख्म जो सर में आये
पाओ सरजू में अभी राम ने धोये भी न थे
के नजर आए वहां खून के गहरे धब्बे
पाओ धोये बिना सरजू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फिजा आई नही रास मुझे
6 दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे
आइये हम आप मिलकर सांप्रदायिक शक्तियों का नाश करने के युद्घ में आगे आयें और जिन लोगो ने हमारे नायक को फिर बनवास दिया है उनका नाश करें ।
दीपावली हमारा महापर्व है । हम आप सबकी सुख और सम्रद्धि की कामना करते है
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
Wednesday, October 14, 2009
लो क सं घ र्ष !: कैसे हो दीपावली ?
( चित्र : चर्चा हिन्दी चिट्ठो की से साभार )
असत्य पर सत्य की विजय का त्यौहार दीपावली एक महत्वपूर्ण सामाजिक पर्व है । बाराबंकी में इस वर्ष सरकार की लापरवाही से दो बार घाघरा नदी में कृतिम बाढ़ आ चुकी है । सितम्बर माह में भारत नेपाल सीमा पर बनकशा बाँध का पानी घाघरा नदी में छोड़ दिया गया जिससे लखीमपुर, सीतापुर व बाराबंकी में नदियों का पानी लाखो घरो के अन्दर दो-दो तीन-तीन फ़ुट भर गया । नदियों के किनारे के गावों में दस-दस फीट पानी आ गया और सब कुछ नष्ट हो गया । अब अक्टूबर माह में जो बची-खुची फसलें थी । फिर बनकशा बाँध ने पानी छोड़ा वो बाराबंकी में घाघरा नदी पर बने एल्गिन ब्रिज पर बने खतरे के निशान से 100 सेंटीमीटर अधिक पानी बहना शुरू कर दिया जहाँ कभी भी नदी का पानी नही पहुँचता था वहां भी धान की तैयार फसल उरद, गन्ना सहित सभी फसलें नष्ट हो गई है हजारो गावों में सांप बिच्छी जैसे खतरनाक जानवरों का राज्य हो गया है। काफ़ी लोग सांप काटने से मर रहे है । सड़क मार्ग गोंडा बहराइच रोड कई दिन तक बंद रही हैं । प्रशासन की तरफ़ से माचिस और नमक या थोड़ा अनाज दोनों बार देकर इतिश्री कर ली गई है प्रशासन की ह्रदय हीनता इस बात का प्रतीक है की वह हर साल इस तरह की प्राकृतिक आपदा का इन्तजार करता रहता है और इस तरह की आपदाओ में भी प्रशासन और दलाल लाखो रुपयों का वारा न्यारा करते है इस तरह की बाढ़ के पश्चात नदी के किनारे तटबंधो के बनने की बात उठती है करोडो और अरबो रुपयों के पत्थर कागजो पर आकार तटबंध बन जातें है ,केन्द्र सरकार व प्रदेश सरकार इस समस्या की तरफ़ स्थायी समाधान करने का प्रयाश नही करती है प्राकृतिक बाढ़ का मुकाबला नही किया जा सकता है किंतु कृतिम बाढ़ को रोका जा सकता है लेकिन शासन और प्रशासन की कमी का एक मद ख़तम हो जाएगा इसलिए लाखो करोडो लोगो की जिंदगियों से खेलकर इसका स्थायी समाधान नही किया जाता है । महंगाई के इस दौर में इन क्षेत्रो के लोगो के पास न फसलें बची है और न ही रुपया । भूख की ज्वाला कैसे शांत हो यह यक्ष प्रश्न है जानवरों व पक्षियों के भी खाने के लाले है । अच्छा यह होता की ज्योति पर्व हर साल यहाँ हो तो इसका स्थायी समाधान करना होगा अन्यथा यह यक्ष प्रश्न बना रहेगा की कैसे दीपावली हो ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com Tuesday, October 13, 2009
लो क सं घ र्ष !: सभ्य समाज के ऊपर तमाचा
उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारियों को लेकर सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायधीश आर. डी. निवेश कमेटी का गठन किया था गिरफ्तारियों की जांच से आतंकवादी फर्जी गतिविधियाँ रुक गयीं तथा फर्जी एनकाउंटर्स भी लगभग बंद से हो गए कचेहरी सीरियल बम्ब विस्फोट कांड के अभियुक्त मोहम्मद खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर आर. डी. एक्स व ड़िकोनेटर की बरामदगी के साथ दिखाई गई थी सूचना के अधिकार के तहत 15 सितम्बर 2009 को क्षेत्राधिकारी पुलिस मड़ियाहूँ जिला जौनपुर ने लिखित रूप से सूचना दी है कि 16-12-2007 को शाम 6:30 बजे एस टी एफ द्वारा खालिद मुजाहिद को मड़ियाहूँ बाजार जिला जौनपुर से गिरफ्तार किया था जो अपराधिक मामला बनता है इसलिए आगे की सूचना नही दी जा सकती है । इस तरह से यह पुलिस विभाग ने ही साबित कर दिया है कि खालिद मुजाहिद को 16-दिसम्बर-2007 को मड़ियाहूँ बाजार जिला जौनपुर से गिरफ्तार किया गया था । अब सवाल यह उठता है कि २२ दिसम्बर 2007 को बाराबंकी स्टेशन पर जो गिरफ्तारी दिखाई आर डी एक्स व ड़िकोनेटर के साथ दिखाई गई है वह फर्जी है जब खालिद मुजाहिद एस टी एफ कि अभिरक्षा में था तो किन पुलिस अधिकारियो ने उसके पास आर डी एक्स व ड़िकोनेटर दिखाया और उक्त दोनों बरामदशुदा सामान वह लोग कहाँ लाये यह जांच का महत्वपूर्ण विषय है । निवर्तमान पुलिस महानिदेशक के समय में आए दिन अखबारों में आतंकवाद से खबरें भरी होती थी और हद तो यहाँ तक हो गई थी कि कलकत्ता में चोरी के मामले में निरुद्ध व्यक्ति को लखनऊ में आर डी एक्स सप्लाई करते हुए दिखाया गया था । आज जरूरत इस बात कि है कि निवर्तमान पुलिस महानिदेशक के समय में आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियां की गई है और एनकाउंटर किए गए है उनकी जांच सरकार को अवश्य करनी चाहिए । जांच इसलिए आवश्यक है कि सभ्य लोकतांत्रिक समाज में किसी भी व्यक्ति को फर्जी कहानी गढ़ कर कारागार में निरुद्ध कर देना सम्पूर्ण मानवता के साथ अपराध है और किसी भी आदमी को घर से पकड़ कर गोली मारकर हत्या कर देना और मुठभेड साबित करना भी सभ्य समाज के ऊपर तमाचा है ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
Monday, October 12, 2009
लो क सं घ र्ष !: निंदक नियरे रखिये आँगन कुटी छवाये, बिन साबुन बिन तेल के निर्मल करे सुहाय
उत्तर प्रदेश की सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया है जो चिंता का विषय है । उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने ऊपर के अघोषित आदेशो के तहत उर्दू के सुप्रसद्दिध दैनिक अखबार जो लखनऊ व फैजाबाद से प्रकाशित होता है उसके विज्ञापन रोक दिए है और सरकार की कोशिश ये है की यह अखबार बंद हो जाए । इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार के पक्ष के मौलाना साहब की कथनी और करनी में अन्तर के संबंध में उर्दू दैनिक ने संसदीय चुनाव से पहले से ही प्रकाशित करना शुरू कर दिया था । मौलाना साहब ने अपने सरकारी तालुकात का इस्तेमाल करते हुए ऊपर से आदेश करा दिए कि इस अखबार के विज्ञापन रोक दिए जाएँ और हर सम्भव तरीके से सरकार उर्दू दैनिक अखबार को बंद कराने की कोशिश कर रही है । इस तरह की परंपरा जन विरोधी होती है और हिटलरशाही की परंपरा बढती है अगर एक व्यक्ति की नाराजगी से मीडिया चलने लगेगा तो उसके परिणाम अच्छे नही आते है । जब-जब प्रिंट मीडिया के संपादको ने सरकार की जी हाँ हजूरी की है तो उस सरकार को जनता ने वापस कर दिया है । इस सम्बन्ध में रहीम का यह दोहा :-
"निंदक नियरे रखिये आँगन कुटी छवाय, बिन साबुन बिन तेल के निर्मल करे सुहाय" को लागू करना चाहिए तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था बची और बनी रह सकती है । अच्छा होता की उत्तर प्रदेश की सरकार उक्त मौलाना साहब के क्रियाकलापों की जांच करा कर दण्डित करती ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
Sunday, October 11, 2009
लो क सं घ र्ष !: प्रधानमंत्री एक कारपोरेट हाउस की पैरवी में
यह शायद पहली बार हुआ है कि भारत के प्रधान मंत्री ने किसी कारपोरेट घराने को फायदा पहुँचने के लिए खुले आम उसके लिए पैरवी की हो। पर अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक ऐसी गलती मिसाल कायम कर दी है। वैसे तो चोरी-छिपे इस तरह की सिफ़ारिशें पहले भी चलती रही होंगी , जैसा कि मित्तल परिवार के ही लक्ष्मी मित्तल द्वारा आरसेलर नामक विदेशी कंपनी के अधिग्रहण के समय हुआ, पर खुले आम इस तरह की सिफारिश कर प्रधानमंत्री ने एक ग़लत परम्परा की नींव डाल दी है।
एक भारतीय कंपनी -भारती एयरटेल और दक्षिण अफ्रीकी कंपनी-एमटीएन के बीच खरबों रुपयों का गठबंधन सौदा पिछले कई दिनों से अटका पड़ा था । सम्भावना व्यक्त की जा रही थी की 30 सितम्बर तक यह मामला नही सुलझा तो सौदा ही कैंसल हो जाएगा। भारती एयरटेल भारत के एक सबसे बड़े कारपोरेट-घराने मित्तल घराने की कंपनी है।
प्रधानमंत्री जी-20 शिखर सम्मलेन की बैठक में भाग लेने अमेरिका के पिट्सबर्ग शहर गए थे। लगता है जी-20 बैठक के आलावा सुनील मित्तल की कंपनी- भरती एयरटेल का सौदा भी उनके पिट्सबर्ग एजेंडे में शामिल था। सम्मलेन के दौरान अफ्रीका के राष्ट्रपति जैक्जूमा के साथ उनकी कोई मीटिंग निर्धारित नही थी तो भी प्रधानमंत्री के दिमाग में एक भारतीय पूंजीपति घराने का हित इस कदर हावी था की उन्होंने राष्ट्रपति जूमा से मुलाकात की और उनसे कहा की वे चाहते है कि भारती एयरटेल और ऍमटीएन का सौदा हो जाए।
प्रधानमंत्री के सिपहसलार इस मीटिंग को चाहे कोई भी नाम दें, इसके बारे में कोई भी सफाई दे, पर व्यवहारतः यह भारती एयरटेल के लिए प्रधानमंत्री की सिफारिश ही थी। बेशक पूंजीपरस्त ताकतें प्रधानमंत्री की इस सिफारिश को राष्ट्रिय हित का काम बता रही है, पर प्रधानमंत्री ने एक कंपनी की पैरवी कर प्रधानमंत्री पद की गरिमा को नुकसान पहुँचाया है और एक नई परम्परा शुरू कर दी है।
देश के एक प्रमुख आर्थिक पत्र "इकनॉमिक टाईम्स" ने एक निजी डील के लिए प्रधानमंत्री की पैरवी का स्वागत किया है। पर उसे भी यह लिखना पड़ा है कि प्रधानमंत्री का यह कदम एक ऐसी मिसाल का काम कर सकता है जिसे बाद में पिछलग्गु पूँजीवाद के रूप में अध: पतन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। जाहिर है इकनॉमिक टाईम्स यह भुलाने कि कोशिश कर रहा है कि देश में क्रोनी केप्टलिज्म का दौर पहले ही चल रहा है।
इकनॉमिक टाईम्स का विचार है कि प्रधानमंत्री कि "त्रुटिहीन एवं अनिंध विश्वाशनियता एवं इमानदारी के चलते इस डील विशेष के लिए प्रधानमंत्री द्वारा पैरवी का कोई भी अन्य अर्थ नही निकलेगा सिवाय इसके की उन्होंने यह काम एक "सामूहिक हित" के लिए किया। पता नही इकनॉमिक टाईम्स को एक कारपोरेट घराने के व्यवसायिक फायदे में "सामूहिक हित" कहाँ नजर आ रहा है ? और थोडी देर के लिए यदि सामूहिक हित की बात को भी मान लिया जाए तो "त्रुटिहीन एवं अनिंध विश्वसनीयता " वाले प्रधानमंत्री के प्रशासकीय एवं राजनैतिक लाव लश्कर में - जो कारपोरेट घरानों के इस इस तरह के मामलो को प्रधानमंत्री के एजेंडे में शामिल करता है- व्यापक भ्रष्टाचार से कौन आँखें मूँद सकता है और कैसे माना जा सकता है की बात इस सामूहिक हित" तक ही सीमित है?
और अंत में क्या नतीजा निकला? इस सौदे को दक्षिण अफ्रीका की सरकार के अनुमोदन की जरूरत थी। प्रधानमंत्री की पैरवी के बावजूद दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने इस सौदे का अनुमोदन नही किया और सौदा नही हो पाया। अब क्या इज्जत रह गई हमारे प्रधानमंत्री की ?
आर. एस. यादव
ए निगेटिव रक्त चाहिए....आपातकालीन स्थिति....
आपका रक्त किसी की जान बचा सकता है.....दिल्ली और नॉएडा के वे सभी सज्जन जिनका रक्त ग्रुप ए निगेटिव है...उनसे करबद्ध निवेदन है कि एक महिला को आपके रक्त की आवश्यक्ता है....नॉएडा के कैलाश अस्पताल में भर्ती महिला डेंगू से पीड़ित हैं...और इनकी हालत बेहद चिंताजनक है। इनको खून चढ़ाया जाना है जो कि ए निगेटिव ग्रुप का है.....और इस ग्रुप का रक्त न मिल पाने से इनकी हालत बिगड़ती जा रही है। ऐसे में समस्त ब्लॉगर साथियों से निवेदन है कि आगे आकर इस परिवार की मदद करें। रक्तदान के इच्छुक लोग रुचि गोयल से 9873521510, 99990051 मोबाइल नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं......
Friday, October 9, 2009
लो क सं घ र्ष !: अब क्या होगा ?
Tuesday, October 6, 2009
लो क सं घ र्ष !: जियरा अकुलाय
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
तुम का जानौ मोरि बलमुआ मुनउक चढा बुखार,
घरी घरी पिया तुमहेंक पूंछैं फिरि अचेत होई जायं,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
किहें रहो तैं जिनते रिश्ता उई अतने सह्जोर ,
बिटिया कैंहा द्यउखै अइहैं पुनुवासी के भोर,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
चढा बुढापा अम्मा केरे बापू भे मजबूर,
खांसि खंखारि होति हैं बेदम गंठिया सेनी चूर,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
गिरा दौंगरा ई असाढ़ ख्यातन मां जुटे किसान ,
कौनि मददि अब कीसे मांगी घरमा चुका पिसान,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
काहे हमसे मुंह फेरे हो जाय बसेउ परदेश ,
साल बीत तुम घरे न आयेव धरेव फकीरी भेष,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
हँसी उडावे पास पड़ोसी रोजू दियैं उपदेश,
चोहल करैं सब मोरि कन्त कब अइहैं अपने देश ,
खबरि उनका देतिऊ पहुंचाय,
विकल तन मन जियरा अकुलाय।
डॉक्टर सुरेश प्रकाश शुक्ल
लखनऊ
Sunday, October 4, 2009
लो क सं घ र्ष !: पिया पैंजनियां
अन्नु भरि- भरि गे धानन की बाली मा ,
पिया पैंजनिया लैदे दीवाली मां ।
खैहैं मोहनभोग सोने की थाली मां ,
मोरी लक्ष्मिनियां चमकै दिवाली मां ।
तुम तो खुरपी - कुदरिनि मां ढ़ूंढ़ौ खुशी,
रोजु हमका चिढ़ौती है हमरी सखी,
चाव रहिगा न तनिकौ घरवाली मां ,
पिया पैंजनिया लैदे दीवाली मां ।
हाय जियरा दुखावौ न मोरी धनी,
जड़वाय लियौ मुंदरी मां हीरा कनी,
जगमगाय उठौ बखरी मां गाली मां,
मोरी लक्ष्मिनियां चमकै दिवाली मां ।
झूमि-झूमि उठै धरती मगन आसमां,
खूब फूलै फलै देश आपन जहाँ,
प्रेम के फल लदै डाली-डाली मां ।
अन्नु भरि- भरि गे धानन की बाली मां,
मोरी लक्ष्मिनियां चमकै दिवाली मां।
-डॉक्टर सुरेश प्रकाश शुक्ल
लखनऊ
Saturday, October 3, 2009
लो क सं घ र्ष !: "ब्लागप्रहरी"ब्लागर्स को नया तोहफ़ा, एक विशेष एग्रीगेटर की शुरूआत
ब्लाग जगत मे जब प्रहार ज्यादा होने लगे और सृजन की प्रक्रिया धीमी हो जाने लगे, तब यह भान हो जाना
चाहीये कि वक्त एक बड़े बदलाव का है। वर्तमान समय में ब्लागींग का गीरता स्तर, इसके शुभागमन के समय
अनुमानित लक्ष्यों से बहुत दूर धकेलने वाला है। इस दिशा में एक सार्थक पहल हुई है, और उस प्रयास को संज्ञा " ब्लागप्रहरी" देना सर्वथा प्रेरणात्मक है।
ब्लागप्रहरी का उद्देश्य ब्लाग जगत के दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे विसंगतियों से अलग एक आदर्शस्वरूप ब्लाग मंच मुहैया कराना है।स्वरूप से एक एग्रीगेटर होने के बावज़ूद इसकी कार्य-प्रणाली विस्तृत और नियंत्रित होगी।
(हमे ब्लागप्रहरी को एक एग्रीगेटर के रूप में नहीं बल्की विचार-विमर्श और ब्लागींग के एक सार्थक प्लेटफार्म के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।आपसे निवेदन है कि आप इसका मुल्यांकन किसी एग्रिगेटर से तुलना कर के न करें!)
जैसा कि नाम मात्र से स्पष्ट है, इसका एकमात्र लक्ष्य ब्लाग जगत में एक आदर्श ब्लागींग के मापदंड की स्थापना करना और ब्लागींग जैसे सशक्त, अभिव्यक्ति के हथियार को धारदार बनाये रखना है।
क्या है योजना!
(1) ब्लागप्रहरी एक अत्यन्त आधुनिक और और नियंत्रित ब्लाग एग्रीगेटर होगा। याहां पर चुनिन्दा ब्लाग और लेखकों के लेख हीं प्रकाशित होंगे, जिसका निर्धारण 15 सदस्यीय ब्लागप्रहरी की टीम करेगी। वह टीम
आप ब्लागर्स के सुझाव पर आधारित एक परिभाषित व्यवस्था होगी। सर्व-सामान्य के लिये यक केवल पठन और प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहेगा। हां, हम लगातार नये ब्लाग शामिल करते रहेंगे और अनुचित सामग्री के प्रकाशन और अमर्यादित भाषा प्रयोग जैसे अन्य निर्धारकों के आधार पर सदस्यता समाप्त करना, अस्थायी प्रतिबंध जैसी तमाम हथियार मौजूद होंगें। यह एक नि:शुल्क जनहित योजना है, और इसका एकमात्र ध्येय
ब्लाग को वैकल्पिक मीडिया के स्वरूप में स्थापित करना है।
ऐसे मापदंड रखने के कारण क्या थे।?
हमारे पास मौजूद अन्य एग्रीगेटर सभी प्रविष्टियों को एक जगह दिखाते हैं। अब एक पाठक को यह चुनना मुश्किल होता है कि क्या पठनीय है और क्या नही। आजकल अनावश्यक विषयों पर मतांध लेख, व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप, अमर्यादित भाषाशैली का प्रयोग कर अपने पोस्ट पर पाठक बुलाने की परंपरा विधमान है। इस बीच कई बार सुसंस्कृत लेख भी नही पढ़े जाते, और एग्रीगेटर के पहले पृष्ठ पर से उपस्थिति खत्म होते हीं उनका सार्वजनिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।
क्यूं अलग है ब्लागप्रहरी: यहां प्रविष्टियों का संकलन और प्रकाशन वर्गीकृत होगा और एजेक्स पर आधारित
व्यव्स्था उनको लम्बे समय तक दिखाने में सक्षम है। आपके सामने मुख्य पृष्ठ 400 से ज्यादा चिट्ठे दिखाए जा सकते है।
महत्वपूर्ण और विशेष चिट्ठों को फ़िचर पोस्ट कैटेगरी के अंतर्गत दिखाया जायेगा, जिसकी संख्या नियंत्रित है। यह आटोमेटेड स्लाइड इन चिट्ठों को विशेष समय तक चला कर उनकी पठनीयता और प्रासंगिकता बनाए रखेगा। ब्लागप्रहरी ने मुख्य पृष्ठ पर किसी भी चिट्ठों के पसंद-नापसंद जैसा विवरण देना उचित नही समझा
ताकि आप पुर्वाग्रह से ग्रसित हो उनकी ओर न चले जायें। और हालिया प्रकरण (ब्लागवाणी पर विवाद) इस पाठक-लेखक की इस मानसिकता को दर्शाता है) ब्लागवाणी की सेवा निश्चित तौर पर ब्लागजगत के लिए बड़ा ऋण है और अनैतिक तरीके अपनाकर कुछ लोग अपनी तुच्छता का उदाहरण छोड़ जाते हैं।
(2) ब्लागप्रहरी पर किसी भी प्रकाशित सामग्री को आप वहीं पढ़ सकते हैं ( या उस लेखक के निजि ब्लाग पर जा सकते हैं)। शीर्षक पर क्लिक करते हीं, वह पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए वहीं खुल जायेगी और आप अपनी प्रतिक्रिया भी वहीं दर्ज कर सकते हैं।आपको लिंक फालो कर उस व्यक्ति विशेष की साइट पर जाने की आवश्यकता नही है।
इसके पिछे कारण क्या थे?
लिंक फालो कर आप लगभग 2-3 मिनट में उस लेख तक पहूंचते हैं और आपका समय तब सार्थक होता है
जब आपको कुछ अच्छा पढ़ने को मिले। पर बात जो ज्यादा घातक है कि जिस तरह टी0आर0पी ने मुख्यधारा की मीडिया का बेड़ागर्क कर रखा है, उसी तरह रैंकिग विजेट, ट्रैफिक स्टैट्स काउन्टरों ने ब्लागर्स की मानसिकता पर गहरा और पथभ्रमित करने का प्रभाव डाला है। सामान्यत: पाठक बुलाउ शिर्षक दें कर कुछ लोग अपना पिठ स्टेट्स काउन्टर से थपथपा रहें है। यह तो सर्व विदित है कि ऐसे चोंचले अपनाकर
आप अस्थायी लोकप्रियता तो हाशिल कर सकते हैं, पर आपकी वास्त्विक पहचान आपकी कलम और
निष्पक्षता है।
क्यू अलग है ब्लागप्रहरी?
ब्लागप्रहरी पर पोस्ट वहीं खुलने की सुविधा होने के कारण आप पोस्ट वहीं पढ़ पाएगें, और कोइ कलमतोड़ू
लेखक इस मंच का उपयोग पाठक बुलाउ निति के सहारे नही कर सकता।
(3) याहां पर छपने वाले पोस्ट पर पर 15 ब्लागप्रहरियों की नज़र होगी। आप अपने पोस्ट के प्रति उतरदायी होंगे और किसी भी तथ्य या प्रसंग का उल्लेख करने पर आपको उसकी मौलिकता और सच्चाई का पता होना
चाहिए। किसी प्रहरी द्वारा किसी पहलू पर संबधित तथ्य का स्त्रोत मांगे जाने पर आपको उसको सामने रखना होगा। अगर आप अपने तथ्य के प्रति इमानदार नही पाए गये तो आपको सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ेगी।
साफ शब्दों में कहे तो वह शेअर तो आपने सुना हीं होगा:
आपका मंच है आपको रोका किसने, अपने पोखर को समन्दर कहिए…वाला फंडे पर नकेल लगेगी।
इससे आपकी और पूरे ब्लाग जगत की विस्वसनीयता बढ़ेगी और आपकी लेखनी भी अब जवाबदेह होने के कारण ज्यादा पैनी होगी।
(4)विशेष प्रहरी के तौर पर कई गणमान्य और वरिष्ठतम साहित्यिक, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल होंगे जो यदा-कदा अपने शामिल होने का अहसास आपको कराते रहेंगे और आपको अहसास नही होने देंगे की आपने उनकी प्रोफाइल लगा कर कोई अहसान किया है। ऐसे कई लोगों ने अभी तक अहसान कर दिया है, और कई का अहसान लेना बचा है। :)
इसके फायदे:----इससे ब्लागजगत को हम वैकल्पिक मीडिया के रूप में स्थापित कर पाएंगे। यह स्पष्ट है कि
अगर कोई विशेष व्यक्तित्व शायद हीं हम ब्लागर्स को पढ़ने की हिम्मत जुटा पाता है, और अगर ब्लागर भी सामान्य कद का हो, तो उसके पास जाने का कोई विकल्प नहीं। अगर वह किसी एग्रिगेटर पर जाता है, तो जीवन में ब्लाग पढ़ने की ग़लती वह दोबारा नही करेगा, क्योंकि शायद एक सौ पोस्ट के बाद एक पोस्ट पठनीय होती है। पर ब्लागप्रहरी विशिष्ट एग्रीगेटर है जो एक लेखक को पाठक के तौर पर Filtered posts,
monitered exposure and guaranteed readership देता है।
=======================================================================
हम खुद को ऐसे किसी भी तरह की परिभाषा स्थापित करने में खुद को नहीं उलझाना चाहेंगें, कि अच्छा या बुरा ब्लागर कौन है या उसके क्या परिमाण हैं। पर यह तो तय है कि कुछ अच्छे ब्लागर्स हैं जो सर्वमान्य हैं।
ऐसे हीं ब्लागर्स को साथ लेकर यह प्रयास चल पड़ा है एक सुनहलए सपने को पूरा करने।
=======================================================================
और क्या विशेष है? ब्लागप्रहरी में-----
(1) प्रतिदिन एक प्रविष्टि या चर्चाघर का निष्कर्ष सभी राष्टीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों के पास स-नाम भेज दी जायेगी। और उनसे यह अपेक्षा होगी कि वह इनको विशेष स्थान दे कर प्रकाशित करें। इस सम्बन्ध में बड़ी सफलता मिली है और भविष्य में और पत्र- पत्रिकाएं हमसे जुड़ जाएगें।
(2) आनलाइन रेडियो परिचर्चा का आयोजन पाक्षिक अन्तराल पर किया जायेगा। जिसके लिये स्टूडियो
का निर्माण हो गया है। भविष्य मे ब्लागप्रहरी हर रोज ब्लागसमाचार वाचन की भी योजना पर अमल करेगा।
(3)एक परिवार की तरह ब्लागप्रहरी की टीम ब्लागजगत को वैकल्पिक मीडिया के रूप मे स्थापित कर
अंधे और डूबाऊ मुख्यधारा के सामने एक आदर्श के रूप मे स्थापित करने के लिए वचनबद्ध है।
=======================================================================
कृपया इस पोस्ट को अपने ब्लाग पर लगाएं ।
अपने फ़ालोवर और लेखकों (अगर आपका ब्लाग सामुदायिक है) तथा अन्य ब्लाग मित्रों के मध्य इसी रूप में
भेज दें। उनसे यह आग्रह करें कि वह स्वयं के ब्लाग पर यह पोस्ट लगाने के साथ इसे आगे भेज दें। यह क्रम बना रहे ताकि सब आगाह हो जाएं…"अब आ गया है…ब्लागप्रहरी'!!!!
=========================================================================
GET THE IMAGE CODE BELOW AND HELP GROW WISE BLOGGING
कनिष्क कश्यप
सम्पर्क +91-9313294888
ईमेल- greatkanishka@gmail.com
http://www.blogprahari.com
Friday, October 2, 2009
लो क सं घ र्ष !: चीन से युद्घ करने की तमन्ना
1962 से पूर्व देश में हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लग रहा था वहीं तिब्बत में चीन के विरूद्व सीआईए की गतिविधियाँ तेज थी । चीन सरकार द्वारा भारत के शीर्ष नेतृत्व को कई बार अवगत कराया की उसके देश से होकर तिब्बत में सीआईए की गतिविधियाँ हो रही है । तिब्बत में सीआईए अपनी गतिविधियाँ कर चीन के ख़िलाफ़ षड़्यंत्र कर रहा है उसको रोकें । मजबूर होकर चीन ने तिब्बत में सीआईए की गतिविधियों को नष्ट कर दिया । भारत ने सड़क मार्ग से दलाई लामा को लाकर तिब्बत की निर्वासित सरकार हिमांचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थापित की जो आज भी चल रही है । चीन भारत युद्घ का मूल कारण यही था ।
आज अमेरिकन साम्राज्यवाद अपनी आर्थिक मंदी से उबरने के लिए चीन को नष्ट करना चाह रहा है स्वयं उसमें दम नही है कि वह चीन से युद्घ करे इसलिए ग़लत तथ्यों के आधार पर युद्घ की तैयारियों का प्रोपोगंडा कर किसी भी बहाने युद्घ करवा देना चाहता है जिससे हमारा विकास ठप्प हो और हमारी ताकत कम हो और चीन का भी विकार रुक जाए । गली मोहल्लो से लेकर दिल्ली तक सम्रज्य्वादियो के तनखैया लेखक, पत्रकार , कवि अपनी कलम चीन के ख़िलाफ़ तोड़ रहे है अच्छा यह होगा ।हम अपनी आर्थिक विकास डर को बढावें और देश को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में निर्मित करें ।
आज हमारी मुख्य समस्याऐं बेरोजगारी है , महंगाई है, देश में भुखमरी है , कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है, खाद्य पदार्थो में मिलावट है, हर्षद मेहता, नरेश जैनों का हमारे पास इलाज नही है । आज जरूरत इस बात की है की हम अपनी समस्यों का बेहतर समाधान खोजें । अमेरिकन साम्राज़्यवादियो के चक्कर में न हम पाकिस्तान से युद्घ करने की इच्छा रखें और न ही चीन से । चीन कोई हव्वा नही है । हमारा अच्छा मित्र भी हो सकता है । भारत, चीन, पाकिस्तान मिलकर एक नई और अच्छी दुनिया का निर्माण भी कर सकते है । लेकिन भारत और पाकिस्तान साम्राज्यवादियों के चक्कर में पड़कर हमेशा आपस में युद्घ की बात ही सोचते है और इस बात का समर्थन दोनों देशों की नासमझ जनता का भी मिलता है । इसलिए चाहे पाकिस्तान हो या चीन हो युद्घ करने की तम्मना नही पालनी चाहिए ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com
Thursday, October 1, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)




