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Tuesday, July 19, 2011

दुख्तक

रात गहरी और काली
मेरे राहों की तरह
कहीं कुछ सूझता ही नही ।

इस शहर में मौत का तांडव
कब हो जायेगा
कोई जानता ही नही ।

हम निकम्मे, बेईमान
किस को हम दोषी कहें
सब हमारा ही किया धरा ।

जिस जनता की रगों में
खून बहता ही नही
उसका जीना मरना क्या ।

छटपटाती जिंदगी
और बेरहम ये मौत भी
आज शरमिंदा है ।

मोटी चमडी, काले चश्मे
उजले लिबास, काली करतूतें
हमारे नेता हैं ये ।

3 comments:

देवेश प्रताप said...

bahut khoob .....maujooda daastaan ko byaan karti ye rachna.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हम निकम्मे, बेईमान
किस को हम दोषी कहें
सब हमारा ही किया धरा ।

जिस जनता की रगों में
खून बहता ही नही
उसका जीना मरना क्या ।

सच्चाई कहती अच्छी प्रस्तुति

Sawai Singh Rajpurohit said...

हम निकम्मे, बेईमान
किस को हम दोषी कहें
सब हमारा ही किया धरा ।

बहुत सही लिखा है आपने

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